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अध्याय 19 · धारणाओं से परे
अष्टावक्र गीता, श्लोक 19.4
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मूल संस्कृत
क्व चात्मा क्व च वानात्मा क्व शुभं क्वाशुभं यथा । क्व चिन्ता क्व च वाचिन्ता स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥ ४ ॥
IAST लिप्यंतरण
kva cātmā kva ca vānātmā kva śubhaṃ kvāśubhaṃ yathā | kva cintā kva ca vācintā svamahimni sthitasya me || 4 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
क्व, च, आत्मा, क्व, च, वा, अनात्मा, क्व, शुभम्, क्व, अशुभम्, यथा, क्व, चिन्ता, क्व, च, वा, अचिन्ता, स्व-महिम्नि, स्थितस्य, मे
- क्व आत्मा क्व अनात्मा
- आत्मा कहाँ, अनात्मा कहाँ
- क्व शुभम् क्व अशुभम्
- शुभ कहाँ, अशुभ कहाँ
- क्व चिन्ता क्व अचिन्ता
- चिंता कहाँ, चिंता का अभाव कहाँ
- यथा स्व-महिम्नि स्थितस्य मे
- जैसे अपनी महिमा में स्थित मेरे लिए
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
अपनी महिमा में स्थित मेरे लिए आत्मा और अनात्मा कहाँ, शुभ और अशुभ कहाँ, चिंता और अचिंता कहाँ?
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
यथा इस श्लोक को पिछले प्रश्न से जोड़ता है। आत्मा-अनात्मा भी उसी तरह पूछे गए हैं जैसे शुभ-अशुभ। इस श्लोक की टीका का पृष्ठ इस सत्र में फिर नहीं देखा गया।
सरल हिन्दी में समझें
हम आत्मा को अच्छा और शरीर को दूसरा मानकर भी एक नई दीवार खड़ी कर लेते हैं। शुभ और अशुभ की दीवार, चिंता और निश्चिंतता की दीवार भी ऐसी ही है।
जनक पूछते हैं कि अपनी महिमा में ये दीवारें कहाँ हैं।
शुभ कर्म छोड़ना इस प्रश्न का अर्थ नहीं है। अर्थ यह है कि शुभ का गर्व और अशुभ का डर दोनों पकड़ हैं।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. आत्मा और अनात्मा का युग्म भी प्रश्न बनता है। आत्मा का शब्द भी पकड़ हो सकता है। 2. शुभ और अशुभ व्यावहारिक विवेक के नाम हैं। यहाँ उनकी स्वामित्व-भावना पूछी गई है। 3. चिन्ता और अचिन्ता एक जोड़ा है। चिंता मिटाकर अचिंता का गर्व नया बोझ है। 4. यथा पिछले श्लोकों की रीति को इस श्लोक पर चढ़ाता है। 5. स्वमहिम्नि स्थितस्य मे फिर कर्ता नहीं, स्थिति कहता है। 6. नैतिक चुनाव जीवन में रहता है। वह शांति की पहचान नहीं रह जाता।
ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती।
उदाहरण से समझें: जैसे तराजू दो पलड़ों के बिना नहीं तौलती, और तौलने वाला स्वयं पलड़ा नहीं बनता, वैसे ही शुभ-अशुभ तराजू है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
कोई व्यक्ति ईमानदारी से काम करता है, पर किए हुए अच्छे काम की सूची को अपना चेहरा नहीं बनाता। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: शुभ करें। शुभ और अशुभ की सूची को अपनी पहचान न बनाएँ, और हानि पहुँचाने वाले काम को शुभ मत कहें।
सामान्य गलतफहमी
क्व शुभं क्वाशुभं का अर्थ अनैतिक काम को बराबर मान लेना नहीं है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज एक ठीक काम करें और उसे डायरी में अपनी महानता की तरह न लिखें। (शाम को)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं आत्मा और शुभ के शब्दों से एक नई पहचान गढ़ रहा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट बैठें। शुभ और अशुभ दो शब्द मन में आएँ तो दोनों को नाम देकर छोड़ें। किसी की हानि का विचार आए तो उसे शुभ न कहें।
एक पंक्ति में सार: अपनी महिमा में मेरे लिए आत्मा, अनात्मा, शुभ, अशुभ, चिंता और अचिंता कहाँ हैं?
English
Translation: Where are self and not-self, good and evil, worry and its absence, for me established in my own majesty?
Simple explanation: Even the words self and good become questions. Daily honesty remains. The pride of being the good one does not.
विषय और संबंधित श्लोक
- आत्मा-अनात्मा
- शुभ-अशुभ
- चिंता-अचिंता
- स्वमहिमन्
- श्लोक 19.3: क्व भूतं क्व भविष्यद्
- श्लोक 19.5: क्व स्वप्नः क्व सुषुप्ति
स्रोत और सत्यापन
समीक्षा आवश्यक
संपादकीय टिप्पणी: मूल श्लोक सार्वजनिक अष्टावक्रगीता के नवदश क्रम से। इस सत्र में पुस्तक का स्कैन नहीं देखा गया। समीक्षा आवश्यक।