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प्रकरण 19: उन्नीसवाँ प्रकरणश्लोक ८/८100%

अध्याय 19 · धारणाओं से परे

अष्टावक्र गीता, श्लोक 19.8

समीक्षा आवश्यक

मूल संस्कृत

वक्ता: जनक (पुस्तक में वक्ता-लेबल: जनक उवाच)

अलं त्रिवर्गकथया योगस्य कथयाप्यलम् । अलं विज्ञानकथया विश्रान्तस्य ममात्मनि ॥ ८ ॥

[पृष्ठ से सत्यापन आवश्यक] पुस्तक के छपे पाठ में भेद मिला है; नीचे “स्रोत और सत्यापन” देखें। पाठ को पुस्तक में जैसा छपा है वैसा ही रखा गया है।

IAST लिप्यंतरण

alaṃ trivargakathayā yogasya kathayāpy alam | alaṃ vijñānakathayā viśrāntasya mamātmani || 8 ||

सरल उच्चारण: alam trivargakathayaa yogasya kathayaapy alam alam vijnyaanakathayaa vishraantasya mamaatmani (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

अलम्, त्रिवर्ग-कथया, योगस्य, कथया, अपि, अलम्, अलम्, विज्ञान-कथया, विश्रान्तस्य, मम, आत्मनि

त्रिवर्ग-कथया अलम्
धर्म-अर्थ-काम की कथा काफी है
योगस्य कथया अपि अलम्
योग की कथा भी काफी है
विज्ञान-कथया अलम्
विज्ञान की कथा भी काफी है
आत्मनि विश्रान्तस्य मम
आत्मा में विश्राम किए हुए मेरे लिए

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

आत्मा में विश्राम किए मेरे लिए त्रिवर्ग की कथा काफी, योग की कथा भी काफी, और विज्ञान की कथा भी काफी।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

तीन बार अलम् एक ही विश्राम पर खत्म होता है। जनक और कथा नहीं माँगते। वे आत्मनि विश्रान्त हैं। इस श्लोक की टीका का पृष्ठ इस सत्र में फिर नहीं देखा गया। जो अभी सीख रहा है, उसके अध्ययन और सदाचार का यह निषेध नहीं है।

सरल हिन्दी में समझें

अलम् का सीधा अर्थ है: काफी। जनक तीन कथाएँ रोकते हैं। एक लोक के तीन पुरुषार्थों की, दूसरी योग की, तीसरी ज्ञान की।

रोक इसलिए नहीं कि ये झूठी हैं। रोक इसलिए कि वे आत्मा में विश्राम कर चुके हैं।

नया सीखने वाला इस श्लोक को पढ़कर पुस्तक बंद न करे। यह विश्राम पा चुके जनक की भाषा है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. त्रिवर्गकथा धर्म, अर्थ और काम की चर्चा है। 2. योगकथा विधि और समाधि की चर्चा है। 3. विज्ञानकथा ज्ञान की चर्चा है। तीनों के लिए अलग अलम् है। 4. विश्रान्तस्य मम आत्मनि इस प्रकरण का अंतिम ठहराव है। 5. अलम् मौन की तैयारी है। अगला प्रकरण अष्टावक्र का है। 6. आरंभिक अभ्यास का तिरस्कार इस भूतकाल की भाषा में नहीं पढ़ना चाहिए।

तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती।

उदाहरण से समझें: जैसे यात्री घर पहुँचकर रास्ते का नक्शा फाड़ता नहीं, केवल जेब में रख देता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

कोई व्यक्ति शास्त्र पढ़ चुका है और अब हर सभा में वही बात दोहराने के बजाय अपना काम शांत होकर करता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: कथा वहीं रोकें जहाँ वह बोझ बन गई हो। सीखने, सदाचार और अपने काम को इस श्लोक से बंद न करें।

सामान्य गलतफहमी

अलं योगस्य कथया का अर्थ अभ्यास, अध्ययन या नैतिक जीवन छोड़ देना नहीं है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज एक आध्यात्मिक चर्चा को बीच में ही पर्याप्त मानें, और बचा समय एक साधारण जिम्मेदारी में लगाएँ। (बातचीत में)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं विश्राम के नाम पर सीख और उत्तरदायित्व रोक रहा हूँ, या केवल अतिरिक्त कथा रोक रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट बिना नए विचार जोड़े बैठें। अंत में आज का एक बाकी काम याद करें और उसे छोड़ें नहीं।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: आत्मा में विश्राम किए मेरे लिए त्रिवर्ग, योग और विज्ञान की कथा काफी है।

English

Translation: Enough of talk of the three aims, enough of talk of yoga, enough of talk of knowledge, for me resting in the Self.

Simple explanation: Janaka stops three kinds of talk because he is at rest in the Self. A beginner’s study and duty are not cancelled.

विषय और संबंधित श्लोक

  • अलम्
  • त्रिवर्ग-कथा
  • योग-कथा
  • आत्म-विश्रान्ति
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 19.7: क्व मृत्युर्जीवितं वा
  • श्लोक 20.1: क्व भूतानि क्व देहो

स्रोत और सत्यापन

समीक्षा आवश्यक पृष्ठ इस सत्र में नहीं देखा गया

संपादकीय टिप्पणी: मूल श्लोक सार्वजनिक अष्टावक्रगीता के नवदश क्रम से। इस सत्र में पुस्तक का स्कैन नहीं देखा गया। समीक्षा आवश्यक।