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प्रकरण 20: बीसवाँ प्रकरणश्लोक १/१४7%

अध्याय 20 · अंतिम मौन

अष्टावक्र गीता, श्लोक 20.1

समीक्षा आवश्यक

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

क्व भूतानि क्व देहो वा क्वेन्द्रियाणि क्व वा मनः । क्व शून्यं क्व च नैराश्यं मत्स्वरूपे निरञ्जने ॥ १ ॥

[पृष्ठ से सत्यापन आवश्यक] पुस्तक के छपे पाठ में भेद मिला है; नीचे “स्रोत और सत्यापन” देखें। पाठ को पुस्तक में जैसा छपा है वैसा ही रखा गया है।

IAST लिप्यंतरण

kva bhūtāni kva deho vā kvendriyāṇi kva vā manaḥ | kva śūnyaṃ kva ca nairāśyaṃ matsvarūpe nirañjane || 1 ||

सरल उच्चारण: kva bhootaani kva deho vaa kvendriyaani kva vaa manah kva shoonyam kva cha nairaashyam matsvaroope niranyjane (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

क्व, भूतानि, क्व, देहः, वा, क्व, इन्द्रियाणि, क्व, वा, मनः, क्व, शून्यम्, क्व, च, नैराश्यम्, मत्-स्वरूपे, निरञ्जने

क्व भूतानि क्व देहः
भूत कहाँ, देह कहाँ
क्व इन्द्रियाणि क्व मनः
इन्द्रियाँ कहाँ, मन कहाँ
क्व शून्यम् क्व नैराश्यम्
शून्य कहाँ, नैराश्य कहाँ
मत्-स्वरूपे निरञ्जने
मेरे निरञ्जन स्वरूप में

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

मेरे निरञ्जन स्वरूप में भूत कहाँ, देह कहाँ, इन्द्रियाँ कहाँ, मन कहाँ, शून्य कहाँ और नैराश्य कहाँ?

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

अंतिम प्रकरण देह से शुरू होता है। शून्य और नैराश्य भी उसी प्रश्न में हैं, ताकि खालीपन एक नई पहचान न बन जाए। इस श्लोक की टीका का पृष्ठ इस सत्र में फिर नहीं देखा गया।

सरल हिन्दी में समझें

पाँच भूत, शरीर, आँख-कान, और मन। इनके बाद लोग शून्य और निराशा को भी आध्यात्मिक पद बना लेते हैं।

अष्टावक्र पूछते हैं कि निरञ्जन स्वरूप में ये कहाँ हैं।

भूख, नींद, इलाज और थकान इस प्रश्न से नहीं मिटते। मिटती है यह धारणा कि शरीर या शून्य शांति का स्वामी है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. भूत और देह स्थूल आरंभ हैं। 2. इन्द्रिय और मन भीतरी उपकरण हैं। वे भी पूछे गए हैं। 3. शून्य और नैराश्य इसलिए साथ हैं कि रिक्तता का गर्व नया आवरण है। 4. निरञ्जन कलंक या उपाधि से रहित कहता है। 5. मत्स्वरूपे अष्टावक्र की अपनी भाषा है, शिष्य को पद देने की नहीं। 6. देह का प्रश्न उपचार रोकने का आदेश नहीं है।

यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती।

उदाहरण से समझें: जैसे दर्पण में चेहरा दिखता है और दर्पण चेहरा नहीं बन जाता, वैसे ही देह स्वरूप में दिखती है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

कोई व्यक्ति समय पर खाता और सोता है, पर न शरीर को अपनी पूरी कहानी बनाता है न खालीपन को ऊँची अवस्था। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: देह और मन को पहचानें। उनकी देखभाल रोककर शून्य मत बनें।

सामान्य गलतफहमी

क्व देहः का अर्थ स्वास्थ्य, सुरक्षा, विश्राम या आवश्यक उपचार की उपेक्षा नहीं है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज एक भोजन और एक विश्राम पूरा करें, और उसे आध्यात्मिक कमी मत कहें। (दिन में)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं शरीर को तुच्छ कहकर उसकी साधारण देखभाल छोड़ रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट पैरों का भार महसूस करें। देह को शत्रु न कहें। फिर एक गिलास पानी पिएँ।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: मेरे निरञ्जन स्वरूप में भूत, देह, इन्द्रिय, मन, शून्य और नैराश्य कहाँ हैं?

English

Translation: Where are the elements, the body, the senses, the mind, the void, or hopelessness in my stainless own nature?

Simple explanation: Body and emptiness are both questioned. Ordinary care of the body stays.

विषय और संबंधित श्लोक

  • देह-प्रश्न
  • इन्द्रिय-मन
  • शून्य-नैराश्य
  • निरञ्जन
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 19.8: अलं त्रिवर्गकथया
  • श्लोक 20.2: क्व शास्त्रं क्वात्मविज्ञानं

स्रोत और सत्यापन

समीक्षा आवश्यक पृष्ठ इस सत्र में नहीं देखा गया

संपादकीय टिप्पणी: मूल श्लोक सार्वजनिक अष्टावक्रगीता के विंश क्रम से। इस सत्र में पुस्तक का स्कैन नहीं देखा गया। समीक्षा आवश्यक।