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अध्याय 20 · अंतिम मौन
अष्टावक्र गीता, श्लोक 20.3
समीक्षा आवश्यक
मूल संस्कृत
क्व विद्या क्व च वाविद्या क्वाहं क्वेदं मम क्व वा । क्व बन्ध क्व च वा मोक्षः स्वरूपस्य क्व रूपिता ॥ ३ ॥
IAST लिप्यंतरण
kva vidyā kva ca vāvidyā kvāhaṃ kvedaṃ mama kva vā | kva bandha kva ca vā mokṣaḥ svarūpasya kva rūpitā || 3 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
क्व, विद्या, क्व, च, वा, अविद्या, क्व, अहम्, क्व, इदम्, मम, क्व, वा, क्व, बन्ध, क्व, च, वा, मोक्षः, स्वरूपस्य, क्व, रूपिता
- क्व विद्या क्व अविद्या
- विद्या कहाँ, अविद्या कहाँ
- क्व अहम् क्व इदम् क्व मम
- मैं कहाँ, यह कहाँ, मेरा कहाँ
- क्व बन्ध क्व मोक्षः
- बंध कहाँ, मोक्ष कहाँ
- स्वरूपस्य क्व रूपिता
- स्वरूप की रूपिता कहाँ
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
विद्या और अविद्या कहाँ, मैं, यह और मेरा कहाँ, बंध और मोक्ष कहाँ, और स्वरूप की रूपिता कहाँ?
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
सार्वजनिक पाठ में ‘क्व बन्ध’ बिना विसर्ग छपा है। पुस्तक की वर्तनी इस सत्र में नहीं मिलाई गई। अहं, इदं और मम तीनों पकड़ के शब्द हैं। इस श्लोक की टीका का पृष्ठ इस सत्र में फिर नहीं देखा गया।
सरल हिन्दी में समझें
जानना और न जानना, मैं और यह और मेरा, बंधन और मुक्ति। अष्टावक्र इन जोड़ों को स्वरूप पर लादते नहीं।
अंतिम टुकड़ा पूछता है: जिसका अपना रूप ही प्रश्न है, उसकी रूपिता कहाँ है।
बंध कहाँ है, इसका अर्थ गलत काम को मुक्त कहना नहीं है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. विद्या और अविद्या ज्ञान की प्रचलित जोड़ी हैं। 2. अहम्, इदम् और मम भाषा के तीन बंध हैं। 3. बन्ध और मोक्ष एक जोड़ा है। एक के बिना दूसरा भी कहानी है। 4. रूपिता स्वरूप को रूप देने की चेष्टा है। 5. क्व बन्ध की वर्तनी सार्वजनिक पाठ की है। 6. नैतिक उत्तरदायित्व इस प्रश्न से नहीं कटता।
ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती।
उदाहरण से समझें: जैसे सोने को अंगूठी कहने से सोना अंगूठी नहीं हो जाता, वैसे ही स्वरूप की रूपिता नाम है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
कोई व्यक्ति अपनी गलती सुधारता है, पर अपने आपको सदा के लिए बद्ध या मुक्त की उपाधि नहीं दे देता। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: मैं और मेरा पहचानें। बंध और मोक्ष के शब्द अनैतिक काम को जायज़ न बनाएँ।
सामान्य गलतफहमी
क्व बन्ध क्व मोक्षः का अर्थ कानून या किसी की हानि से आँख मूँदना नहीं है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज एक अपना कहा हुआ वाक्य देखें और केवल इतना पूछें कि उसमें मेरा कितना बोझ था। (बातचीत के बाद)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं मुक्त होने की पहचान भी एक नया मैं बनाए बैठा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट बैठकर मैं, यह और मेरा तीन शब्द छोड़ें। किसी के प्रति बचा कर्तव्य याद रखें।
एक पंक्ति में सार: विद्या, अविद्या, मैं, यह, मेरा, बंध, मोक्ष और स्वरूप की रूपिता कहाँ हैं?
English
Translation: Where are knowledge and ignorance, I, this, and mine, bondage and liberation, or the forming of one’s own nature?
Simple explanation: Even bondage and liberation are a pair. The question does not license harm.
विषय और संबंधित श्लोक
- विद्या-अविद्या
- अहं-इदं-मम
- बन्ध-मोक्ष
- रूपिता
- श्लोक 20.2: क्व शास्त्रं क्वात्मविज्ञानं
- श्लोक 20.4: क्व प्रारब्धानि कर्माणि
स्रोत और सत्यापन
समीक्षा आवश्यक
संपादकीय टिप्पणी: मूल श्लोक सार्वजनिक अष्टावक्रगीता के विंश क्रम से। इस सत्र में पुस्तक का स्कैन नहीं देखा गया। समीक्षा आवश्यक। सार्वजनिक पाठ में ‘क्व बन्ध’ है।