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प्रकरण 20: बीसवाँ प्रकरणश्लोक २/१४14%

अध्याय 20 · अंतिम मौन

अष्टावक्र गीता, श्लोक 20.2

समीक्षा आवश्यक

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

क्व शास्त्रं क्वात्मविज्ञानं क्व वा निर्विषयं मनः । क्व तृप्तिः क्व वितृष्णात्वं गतद्वन्द्वस्य मे सदा ॥ २ ॥

[पृष्ठ से सत्यापन आवश्यक] पुस्तक के छपे पाठ में भेद मिला है; नीचे “स्रोत और सत्यापन” देखें। पाठ को पुस्तक में जैसा छपा है वैसा ही रखा गया है।

IAST लिप्यंतरण

kva śāstraṃ kvātmavijñānaṃ kva vā nirviṣayaṃ manaḥ | kva tṛptiḥ kva vitṛṣṇātvaṃ gatadvandvasya me sadā || 2 ||

सरल उच्चारण: kva shaastram kvaatmavijnyaanam kva vaa nirvishayam manah kva triptih kva vitrishnaatvam gatadvandvasya me sadaa (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

क्व, शास्त्रम्, क्व, आत्म-विज्ञानम्, क्व, वा, निर्विषयम्, मनः, क्व, तृप्तिः, क्व, वितृष्णत्वम्, गत-द्वन्द्वस्य, मे, सदा

क्व शास्त्रम् क्व आत्म-विज्ञानम्
शास्त्र कहाँ, आत्मविज्ञान कहाँ
क्व निर्विषयम् मनः
विषय-रहित मन कहाँ
क्व तृप्तिः क्व वितृष्णत्वम्
तृप्ति कहाँ, तृष्णा का अभाव कहाँ
गत-द्वन्द्वस्य मे सदा
सदा द्वंद्वों से पार मेरे लिए

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

सदा द्वंद्वों से पार मेरे लिए शास्त्र कहाँ, आत्मविज्ञान कहाँ, निर्विषय मन कहाँ, तृप्ति कहाँ और वितृष्णा कहाँ?

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

शास्त्र और उसकी फलश्रुति एक साथ पूछी गई है। गतद्वन्द्वस्य मे इस प्रकरण की दूसरी धुरी है। इस श्लोक की टीका का पृष्ठ इस सत्र में फिर नहीं देखा गया।

सरल हिन्दी में समझें

किताब, आत्मज्ञान का शब्द, विषयों से हटा मन, तृप्त होना और इच्छा का न रहना। ये साधना के बड़े नाम हैं।

अष्टावक्र कहते हैं कि जिसके द्वंद्व गिर चुके हैं, उसके लिए ये कहाँ हैं।

सीखने वाला पुस्तक बंद न करे। यह वाक्य उसकी अवस्था का वर्णन है जो कथा से आगे कह रहा है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. शास्त्र साधन है। आत्मविज्ञान उसका कहा हुआ फल है। दोनों प्रश्न हैं। 2. निर्विषय मन एक साधना-लक्ष्य है। वह भी पकड़ हो सकता है। 3. तृप्ति और वितृष्णा पास-पास हैं, ताकि तृप्ति की चाह नई तृष्णा न बने। 4. गतद्वन्द्व भूतकाल की तरह कहा गया है। यह आदेश नहीं, वर्णन है। 5. सदा इस वर्णन को हर क्षण का प्रदर्शन नहीं बनाता। 6. अध्ययन का तिरस्कार इसमें नहीं पढ़ना चाहिए।

तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती।

उदाहरण से समझें: जैसे नाव नदी पार कराती है और पार पहुँचे को नाव सिर पर नहीं रहती, वैसे ही शास्त्र पार कराने की बात है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

कोई व्यक्ति पाठ्यपुस्तक पढ़ता है, पर परीक्षा के बाद भी उसी पृष्ठ को अपनी पहचान नहीं बनाए रखता। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: शास्त्र पढ़ें। पढ़े हुए को द्वंद्व और गर्व का नया जोड़ा न बनाएँ।

सामान्य गलतफहमी

क्व शास्त्रं का अर्थ सीखना छोड़कर निष्क्रिय हो जाना नहीं है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज कुछ पढ़ें, और पढ़ते ही यह न जोड़ें कि अब आप तृप्त सिद्ध हो गए। (पढ़ते समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या आत्मविज्ञान का शब्द मेरे लिए नई तृष्णा बन गया है?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट बिना नया निष्कर्ष जोड़े बैठें। फिर आज का एक पढ़ने या करने का काम याद रखें।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: द्वंद्वों से पार मेरे लिए शास्त्र, आत्मविज्ञान, निर्विषय मन, तृप्ति और वितृष्णा कहाँ हैं?

English

Translation: Where are scripture, knowledge of the Self, a mind without objects, contentment, or desirelessness for me, always beyond pairs?

Simple explanation: The names of study and of desirelessness are questioned together, so that desirelessness does not become a new desire.

विषय और संबंधित श्लोक

  • शास्त्र-प्रश्न
  • निर्विषय-मन
  • तृप्ति-वितृष्णा
  • गतद्वन्द्व
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 20.1: क्व भूतानि क्व देहो
  • श्लोक 20.3: क्व विद्या क्व च

स्रोत और सत्यापन

समीक्षा आवश्यक पृष्ठ इस सत्र में नहीं देखा गया

संपादकीय टिप्पणी: मूल श्लोक सार्वजनिक अष्टावक्रगीता के विंश क्रम से। इस सत्र में पुस्तक का स्कैन नहीं देखा गया। समीक्षा आवश्यक।