श्लोक 8.1
तदा बन्धो यदा चित्तं किञ्चिद्वाञ्छति शोचति । किञ्चिन्मुञ्चति गृह्णाति किञ्चिद्धृष्यति कुप्यति ॥ १ ॥
चाह, शोक, पकड़, छोड़, हर्ष और क्रोध की डोर में खिंचा मन ही बंधन है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंअध्याय 8 · आठवाँ प्रकरण
पहले सात प्रकरणों की परीक्षा के बाद अष्टावक्र बंध और मुक्ति के सीधे लक्षण बताते हैं: चित्त की चाह, शोक, पकड़-छोड़, हर्ष-क्रोध की डोर ही बंधन है और उसमें न खिंचना ही मुक्ति।
सातवें प्रकरण में जनक ने महासमुद्र और नौका के रूपक से कहा था कि हलचल बनी भी रहे तो आत्मा अक्षुब्ध है। पुस्तक की भावार्थ-टीका बताती है कि पहले सात प्रकरणों से अष्टावक्र ने सब प्रकार से जनक के अनुभव की परीक्षा कर ली, और अब आठवें प्रकरण में चार श्लोकों से अपने शिष्य के अनुभव की श्लाघा करते हैं। इस प्रकरण में पुस्तक कोई वक्ता-लेबल नहीं छापती; संदर्भ से वक्ता अष्टावक्र हैं।
चारों श्लोक बंध और मोक्ष की एक ही कसौटी देते हैं। पहला श्लोक बंध का लक्षण है: जब चित्त चाहता, शोक करता, छोड़ता, पकड़ता, हर्षित और क्रुद्ध होता है (8.1)। दूसरा उसका उलटा है: जब चित्त इनमें से किसी से नहीं खिंचता, तब मुक्ति है (8.2)। तीसरा दोनों को एक वाक्य में समेटता है: जहाँ मन चिपका है वहाँ बंध, जहाँ चिपकन नहीं वहाँ मोक्ष (8.3)। चौथा इस सबकी जड़ पर पहुँचता है: ‘मैं’ की पकड़ बंधन है और उसका अभाव मोक्ष, इसलिए खेल-खेल में न पकड़ और न छोड़ (8.4)।
इस प्रकरण में सावधानी की बात यह है कि बंधन यहाँ मन की चाल है, कोई बाहरी वस्तु नहीं। इसे अपने या दूसरों को ‘बँधा’ या ‘मुक्त’ ठहराने के पैमाने की तरह उपयोग न करें। और ‘न पकड़ और न छोड़’ का अर्थ कर्तव्य और देखभाल छोड़ देना नहीं है।
मैं बंधन किसे कहता हूँ, और क्या वह बाहर की चीज़ है या मन की चाल?
पुस्तक के अनुसार बंध और मुक्ति का भेद वस्तुओं में नहीं, चित्त की चाल में है। जब चित्त चाह, शोक, पकड़-छोड़ और हर्ष-क्रोध में बहता है, तब बंध है; जब वह इनसे नहीं खिंचता, किसी भी विषय में आसक्त नहीं होता, तब मुक्ति है। इस सबकी जड़ अहंकार की पकड़ बताई गई है, जो ‘मैं ज्ञानी हूँ, मैं त्यागी हूँ’ जैसे रूपों में भी आती है। इसलिए बिना ज़ोर लगाए, खेल-खेल में न पकड़ना और न छोड़ना सिखाया गया है। यह परम दृष्टि है; व्यावहारिक जीवन में कर्तव्य, देखभाल, संबंध और ज़िम्मेदारियाँ बनी रहती हैं।
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तदा बन्धो यदा चित्तं किञ्चिद्वाञ्छति शोचति । किञ्चिन्मुञ्चति गृह्णाति किञ्चिद्धृष्यति कुप्यति ॥ १ ॥
चाह, शोक, पकड़, छोड़, हर्ष और क्रोध की डोर में खिंचा मन ही बंधन है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंतदा मुक्तिर्यदा चित्तं न वाञ्छति न शोचति । न मुञ्चति न गृह्णाति न हृष्यति न कुप्यति ॥ २ ॥
मुक्ति भावनाओं का अभाव नहीं, भावनाओं की डोर में न खिंचना है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंतदा बन्धो यदा चित्तं सक्तं कास्वपि दृष्टिषु । तदा मोक्षो यदा चित्तमसक्तं सर्वदृष्टिषु ॥ ३ ॥
चिपकन बंध है, अनासक्ति मुक्ति; चीज़ें नहीं, मन की पकड़ असली बात है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंयदा नाहं तदा मोक्षो यदाहं बन्धनं तदा । मत्वेति हेलया किञ्चिन्मा गृहाण विमुञ्च मा ॥ ४ ॥
‘मैं’ की पकड़ बंधन है; उसे खेल-खेल में ढीला करना ही मुक्ति की दिशा है, कर्तव्य छोड़ना नहीं।
पूरी व्याख्या पढ़ेंआठवाँ प्रकरण बंध और मुक्ति के सीधे लक्षण देता है। जब चित्त कुछ चाहता, शोक करता, पकड़ता, छोड़ता, खुश या क्रुद्ध होता है, तब बंध है। जब वह इनसे नहीं खिंचता, तब मुक्ति है। एक ही वाक्य में: जहाँ मन चिपका है वहाँ बंध, जहाँ चिपकन नहीं वहाँ मोक्ष। अंत में इसकी जड़ बताई गई है: ‘मैं’ की पकड़, जो ‘मैं ज्ञानी हूँ’ जैसे रूप में भी आती है। इसलिए बिना ज़ोर लगाए, खेल-खेल में न पकड़ना और न छोड़ना। यह परम दृष्टि है; इसमें कर्तव्य, देखभाल और संवेदना की जगह बनी रहती है।
पाँच मिनट आराम से बैठिए। आज की एक चाह, एक शोक और एक हर्ष या क्रोध को याद कीजिए और हर एक को नाम दीजिए। फिर देखिए कि उन्हें जानने वाली जगह कैसी है। किसी निष्कर्ष की जल्दी न करें। यह कोई चिकित्सा या उपचार नहीं, केवल एक चिंतन-अभ्यास है। कोई असुविधा या भारीपन बढ़े तो तुरंत रुकें और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात करें।
पुस्तक में इस प्रकरण में वक्ता का नाम छपा नहीं है। भावार्थ के संदर्भ से वक्ता अष्टावक्र हैं, जो शिष्य के अनुभव की श्लाघा कर रहे हैं।
नहीं। पुस्तक उस बाध्यकारी, बेचैन खिंचाव की बात करती है जो चित्त को बहा ले जाता है। चाह, स्नेह और आनंद अपने आप में दोष नहीं बताए गए।
नहीं। यह भावशून्यता नहीं है। शोक और स्नेह मानवीय हैं। मुक्ति का अर्थ है कि भावनाएँ चित्त को पूरी तरह बहा नहीं ले जातीं।
पुस्तक के अनुसार जब तक ‘मैं ब्राह्मण हूँ, मैं ज्ञानी हूँ, मैं त्यागी हूँ’ जैसा अहंकार बैठा है, तब तक मुक्ति नहीं हो सकती। इसलिए अच्छी पहचानें भी पकड़ बन सकती हैं।
नहीं। यह बिना ज़ोर और खींच-तान के, सहज भाव से जीने की बात है। कर्तव्य, देखभाल और संबंध बने रहते हैं।
यह प्रकरण आत्म-निरीक्षण का एक पैमाना देता है, किसी का दर्जा तय करने का नहीं। इसे स्वयं को या दूसरों को ठहराने के लिए उपयोग न करें।