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प्रकरण 8: आठवाँ प्रकरणश्लोक १/४25%

अध्याय 8 · बंधन और मुक्ति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 8.1

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल नहीं छपा; भावार्थ के संदर्भ से)

तदा बन्धो यदा चित्तं किञ्चिद्वाञ्छति शोचति । किञ्चिन्मुञ्चति गृह्णाति किञ्चिद्धृष्यति कुप्यति ॥ १ ॥

IAST लिप्यंतरण

tadā bandho yadā cittaṃ kiñcid vāñchati śocati | kiñcin muñcati gṛhṇāti kiñcid dhṛṣyati kupyati || 1 ||

सरल उच्चारण: tadaa bandho yadaa chittam kinychid vaanychhati shochati kinychin munychati grihnaati kinychid dhrishyati kupyati (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

तदा, बन्धः, यदा, चित्तम्, किञ्चित्, वाञ्छति, शोचति, किञ्चित्, मुञ्चति, गृह्णाति, किञ्चित्, हृष्यति, कुप्यति

यदा चित्तम् वाञ्छति
जब मन कुछ चाहता है
शोचति
शोक करता है
मुञ्चति गृह्णाति
छोड़ता है, ग्रहण करता है
हृष्यति कुप्यति
प्रसन्न होता है, दुखी या क्रुद्ध होता है
तदा बन्धः
तब बंध है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

जब मन कुछ चाहता है, शोक करता है, कुछ छोड़ता है, कुछ ग्रहण करता है, कुछ पर प्रसन्न होता है और कुछ पर कुपित होता है, तब बंध है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

पुस्तक के अनुसार पहले सात प्रकरणों से अष्टावक्र ने सब प्रकार से जनक के अनुभव की परीक्षा कर ली। अब आठवें प्रकरण में चार श्लोकों से अपने शिष्य के अनुभव की श्लाघा करते हैं। वे कहते हैं कि हे जनक, जो तूने पहले कहा कि मुझ अनन्त-स्वरूप आत्मा में त्याग और ग्रहण की कल्पना नहीं है, वह ठीक कहा। क्योंकि जब चित्त विषयों की इच्छा वाला होकर किसी पदार्थ की प्राप्ति की इच्छा करता है और उसके न मिलने पर शोक करता और कष्ट पाता है, तब उसके त्याग की इच्छा करता है। जब चित्त में लोभ उत्पन्न होता है, तब ग्रहण की इच्छा करता है, तथा पदार्थ की प्राप्ति पर हर्ष और अप्राप्ति पर क्रोध पाता है। इस प्रकार जब अनेक वासनाओं से चित्त युक्त होता है, तब जीव को बंध होता है।

टीका योगवासिष्ठ का एक श्लोक-भाव देती है कि स्त्री-पुत्र आदि में स्नेह, धन के लोभ और मणियों आदि के लाभ से चित्त दीनता को प्राप्त होता है। फिर दूसरे श्लोक-भाव में कहा गया है कि चित्त में अनेक भोगों की वासना ही बंधन का कारण है, और वासना के क्षय का नाम ही मोक्ष है; जब वासना छोड़ी जाए और मोक्ष की इच्छा भी न रहे, तब सुख होता है।

टीका एक लंबी शंका उठाती है कि संसार में निर्वासनिक पुरुष कोई दिखता नहीं, गृहस्थ और संन्यासी दोनों में वासनाएँ दिखती हैं, तो ज्ञानी का अभाव और मुक्ति का अभाव सिद्ध होगा? उत्तर में एक वन के सिंह और लाखों सियारों का उदाहरण देकर कहा गया है कि वासना-रहित ज्ञानवान् कोई विरला ही होता है। (इस प्रसंग में टीका वेश धारण कर दूसरों को ठगने वाले कुछ लोगों पर कठोर टिप्पणी और जुलाहों की एक कथा देती है; उसे यहाँ शब्दशः नहीं उतारा गया। किसी वर्ग या व्यक्ति पर आरोप लगाना इस पुनर्लेखन का उद्देश्य नहीं है।)

सरल हिन्दी में समझें

आठवाँ प्रकरण बंधन की एक बहुत साफ़ परिभाषा से खुलता है। गुरु कहते हैं: जब मन कुछ चाहता है, उसके न मिलने पर शोक करता है, कुछ छोड़ना और कुछ पकड़ना चाहता है, और हर्ष या क्रोध में डोलता है, तब वही बंधन है।

ध्यान दीजिए कि बंधन यहाँ कोई बाहरी रस्सी नहीं, मन की यही उलझी चाल है। इसका मतलब यह नहीं कि चाहना या खुश होना ही गलत है, या कि सारे काम छोड़ देने चाहिए। पुस्तक उस बाध्यकारी और बेचैन खिंचाव की बात कर रही है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. श्लोक कहता है कि चाह, शोक, ग्रहण, त्याग, हर्ष और क्रोध में बहता चित्त ही बंध है। 2. यह बंधन को किसी बाहरी वस्तु या स्थिति मानने की पहचान को चुनौती देता है। 3. यह चित्त और वासना के संबंध को प्रकट करता है। 4. अध्याय का पहला श्लोक है, जो बंध का लक्षण देता है। 5. 7.5 में हेय-उपादेय की बेचैन खींच-तान के निषेध के बाद यहाँ उसी खींच-तान को बंध कहा गया है। 6. यह परम दृष्टि और सामान्य मनोविज्ञान-जैसा विवरण दोनों है। 7. इसे अपने या दूसरों की भावनाओं को ‘बंधन’ कहकर दोषी ठहराने के अर्थ में न पढ़ें।

ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती।

उदाहरण से समझें: जैसे पतंग डोर से खिंचकर कभी ऊपर कभी नीचे डोलती है, वैसे चित्त चाह और शोक की डोर से खिंचा रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

कोई व्यक्ति दिन में दर्जनों बार किसी की प्रतिक्रिया का इंतज़ार करता है, मिलने पर खुश होता है, न मिलने पर बेचैन। जब वह इस पूरे चक्र को बस देख पाता है, तो इसकी पकड़ ढीली होने लगती है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: बंधन बाहर की चीज़ नहीं, चाह और शोक की यह आदत-चाल है; उसे देखना ही उससे अलग होने की शुरुआत है।

सामान्य गलतफहमी

वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। साक्षीभाव का अर्थ भावनाओं को दबाना नहीं है। पुस्तक वासना-रहित ज्ञानवान् को विरला कहती है; इसे दूसरों को ‘अज्ञानी’ ठहराने का आधार न बनाएँ।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज दो बार, जब कोई चाह या शोक उठे, उसे नाम दीजिए: ‘यह चाह है’ या ‘यह शोक है’, और फिर अपना काम जारी रखिए। (हर बार 30 सेकंड)

आत्मचिंतन प्रश्न: मेरे मन की कौन-सी चाह या शोक सबसे ज़्यादा बार लौटता है?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट के लिए आज की हर चाह, शोक, हर्ष और क्रोध की एक सूची बनाइए। किसी को दोष न दें; बस देखिए कि दिन में कितनी बार मन डोला।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: चाह, शोक, पकड़, छोड़, हर्ष और क्रोध की डोर में खिंचा मन ही बंधन है।

English

Translation: There is bondage when the mind desires something, grieves, rejects something, accepts something, or is pleased or angered by something.

Simple explanation: The chapter opens by defining bondage as the mind’s tug-of-war of wanting, grieving, grasping, rejecting, delight and anger, not an outer chain. It does not say wanting or joy is wrong, nor does it ask anyone to abandon duties.

विषय और संबंधित श्लोक

  • बंधन
  • वासना
  • चित्त
  • आत्मचिंतन
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 7.5: हेय-उपादेय की कल्पना का अभाव।
  • श्लोक 8.2: मुक्ति की परिभाषा: जब चित्त न चाहता, न शोचता।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 121–123 (PDF पृ. 128–130)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पृष्ठ से पढ़ा गया (‘किञ्चिद्धृष्यति’ मूल में; पदच्छेद में ‘हृष्यति’ का रूप ‘हृष्यति’ छपा है)। टीका के लंबे प्रसंग में दूसरों पर कठोर टिप्पणियाँ और एक कथा है; उन्हें शामिल नहीं किया गया।