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प्रकरण 9: नौवाँ प्रकरणश्लोक ४/८50%

अध्याय 9 · निर्वेद और विरक्ति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 9.4

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल नहीं छपा; भावार्थ के संदर्भ से)

कोऽसौ कालो वयः किं वा यत्र द्वन्द्वानि नो नृणाम् । तान्युपेक्ष्य यथाप्राप्तवर्ती सिद्धिमवाप्नुयात् ॥ ४ ॥

IAST लिप्यंतरण

ko ’sau kālo vayaḥ kiṃ vā yatra dvandvāni no nṛṇām | tāny upekṣya yathāprāptavartī siddhim avāpnuyāt || 4 ||

सरल उच्चारण: ko sau kaalo vayah kim vaa yatra dvandvaani no nrinaam taany upekshya yathaapraaptavartee siddhim avaapnuyaat (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

कः, असौ, कालः, वयः, किम्, वा, यत्र, द्वन्द्वानि, नो, नृणाम्, तानि, उपेक्ष्य, यथाप्राप्तवर्ती, सिद्धिम्, अवाप्नुयात्

कः असौ कालः वयः किं वा
ऐसा कौन-सा समय या अवस्था है
यत्र द्वन्द्वानि नो नृणाम्
जिसमें मनुष्यों के लिए द्वन्द्व न हों
तानि उपेक्ष्य
उनकी उपेक्षा कर (उन पर ध्यान न टिकाकर)
यथाप्राप्तवर्ती
जो मिल जाए उसी में वर्तने वाला
सिद्धिम् अवाप्नुयात्
सिद्धि (मोक्ष) पाता है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

वह कौन-सा काल या अवस्था है जिसमें मनुष्यों के लिए सुख-दुख के द्वन्द्व न हों? उन द्वन्द्वों की उपेक्षा करके, जो सहज प्राप्त हो उसमें वर्तता हुआ मनुष्य सिद्धि पाता है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

पुस्तक के अनुसार पुरुषों के लिए सुख-दुख जैसे द्वन्द्व किसी विशेष समय या अवस्था में नहीं आते; वे सभी अवस्थाओं और सभी कालों में देह धारण करने वाले के साथ बराबर बने रहते हैं। इसलिए जो इन द्वन्द्वों का स्मरण-मोह छोड़कर, सहज प्राप्त वस्तुओं में बर्तता है, वह सिद्धि यानी मोक्ष पाता है।

टीका इसे सुख के बाद दुख और दुख के बाद सुख के क्रम तथा पानी और कीचड़ के घुले-मिले होने के रूपक से समझाती है, और कहती है कि विवेकी पुरुष इन द्वन्द्वों में इच्छा छोड़कर देह को प्रारब्ध के आश्रय छोड़ देता है। (इसके साथ अध्यात्म-रामायण का एक उद्धरण दिया गया है।)

सरल हिन्दी में समझें

यह श्लोक एक सीधा सवाल करता है: ऐसा कौन-सा समय है जब सुख-दुख के जोड़े नहीं आते? जवाब है कि कोई नहीं। इसलिए बुद्धिमानी यह है कि उन्हें हटाने की कोशिश में जीवन न खपाया जाए, बल्कि जो सहज मिले उसमें सहजता से चला जाए।

‘उपेक्षा’ का अर्थ ‘पूरी तरह नज़र अंदाज़ करना’ या ‘संवेदनहीन होना’ नहीं है। यह उन्हें इतना बड़ा नहीं बनाना है कि वे जीवन चलाने लगें। जो आवश्यक कदम या उपचार हैं, वे लिए जाते हैं।

‘यथाप्राप्त’ का अर्थ आलसी होना या कोशिश छोड़ देना भी नहीं है; यह प्रयास करते हुए परिणाम पर ज़िद न रखना है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. श्लोक कहता है कि द्वन्द्व किसी अवस्था में अनुपस्थित नहीं हैं, इसलिए उनकी उपेक्षा कर सहज प्राप्त में वर्तने वाला सिद्धि पाता है। 2. यह किसी विशेष समय या अवस्था में द्वन्द्व-मुक्त जीवन की आशा करने की पहचान को चुनौती देता है। 3. यह द्वन्द्व, सहजता और सिद्धि के संबंध को प्रकट करता है। 4. वैराग्य के आठ श्लोकों में चौथा है, जो द्वन्द्वों की सार्वकालिकता बताता है। 5. 9.1 के द्वन्द्वों के शांत न होने की बात का ठोस रूप। 6. यह परम दृष्टि और व्यावहारिक सलाह दोनों है। 7. इसे प्रयास छोड़ने या उपचार-सहायता से मुँह मोड़ने का आधार न बनाएँ।

वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है।

उदाहरण से समझें: जैसे नदी में नाव चलाने वाला धारा के उतार-चढ़ाव को रोकने की जगह उन्हें साधकर चलता है, वैसे द्वन्द्वों के रहते हुए सहजता से जिया जाता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

प्रतीकात्मक चित्र-व्याख्या

संपादकीय सहायक चित्र; यह श्लोक का शाब्दिक अर्थ नहीं है।

वैराग्य

वस्तु का उपयोग, पर उस पर मानसिक निर्भरता नहीं।

चित्र का वर्णन: एक खुली हथेली पर रखी गोल वस्तु, उँगलियाँ उसे जकड़ती नहीं।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

कोई व्यक्ति सोचता है कि कुछ बड़ा पूरा होने पर ही चैन से जिएगा। फिर वह देखता है कि हर अवस्था में कोई नई चिंता मौजूद है, और अब वह चिंता के साथ-साथ दिन को अच्छे से जीने की कोशिश करता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: चैन के लिए किसी ‘बाद’ का इंतज़ार मत कीजिए; आज जो मिला है उसमें सहज रहना सीखिए।

सामान्य गलतफहमी

यह श्लोक सहज प्राप्त में रहने की बात करता है, आलस्य, कोशिश छोड़ने या ज़रूरी सहायता से इनकार की नहीं। दुख की उपेक्षा का अर्थ दूसरों के दुख के प्रति उदासीन होना भी नहीं है। तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब कोई सुख या दुख आए, उसे नाम दीजिए और अपना अगला आवश्यक काम कीजिए। (हर बार 30 सेकंड)

आत्मचिंतन प्रश्न: किस ‘बाद’ का इंतज़ार करके मैं आज की सहजता खो रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट बैठकर लिखिए: ‘जब ____ हो जाएगा, तब मैं चैन से रहूँगा।’ फिर पूछिए: ‘आज कितना चैन संभव है?’

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: द्वन्द्व हर अवस्था में हैं; उनकी उपेक्षा कर सहज प्राप्त में जीना ही सिद्धि का मार्ग है।

English

Translation: What time or stage of life is there in which people are free of the pairs of opposites? Letting them be, living in what comes naturally, one attains fulfilment.

Simple explanation: The verse notes that pleasure and pain accompany every stage of life, so it points to living simply with what comes rather than waiting for a time free of both. It is not an argument for laziness or for ignoring others’ suffering.

विषय और संबंधित श्लोक

  • द्वन्द्व
  • सहजता
  • वैराग्य
  • सिद्धि
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 9.1: द्वन्द्वों का कभी शांत न होना।
  • श्लोक 7.5: हेय-उपादेय की खींच-तान का अभाव।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 137–138 (PDF पृ. 144–145)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पृष्ठ से पढ़ा गया (छपे मूल में ‘यथा प्राप्तवर्त्ती’ अलग-अलग दिखता है; पदच्छेद ‘यथाप्राप्तवर्ती’ देता है)। टीका का शब्दार्थ ‘सिद्धि’ को मोक्ष लेता है।