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अध्याय 9 · निर्वेद और विरक्ति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 9.5
सत्यापित
मूल संस्कृत
नाना मतं महर्षीणां साधूनां योगिनां तथा । दृष्ट्वा निर्वेदमापन्नः को न शाम्यति मानवः ॥ ५ ॥
IAST लिप्यंतरण
nānā mataṃ maharṣīṇāṃ sādhūnāṃ yogināṃ tathā | dṛṣṭvā nirvedam āpannaḥ ko na śāmyati mānavaḥ || 5 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
नाना, मतम्, महर्षीणाम्, साधूनाम्, योगिनाम्, तथा, दृष्ट्वा, निर्वेदम्, आपन्नः, कः, न, शाम्यति, मानवः
- नाना मतम्
- अनेक प्रकार के मत
- महर्षीणाम् साधूनाम् योगिनाम्
- महर्षियों, साधुओं और योगियों के
- दृष्ट्वा
- देखकर
- निर्वेदम् आपन्नः
- वैराग्य को प्राप्त हुआ
- कः मानवः न शाम्यति
- कौन मनुष्य शांत नहीं होता?
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
महर्षियों, साधुओं और योगियों के अनेक प्रकार के मत देखकर, वैराग्य को प्राप्त हुआ कौन मनुष्य शांत नहीं होता?
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
पुस्तक के अनुसार अष्टावक्र कहते हैं कि ऋषियों और योगियों के अनेक मत देखकर वैराग्य उपजता है और वह शांति देता है। टीका इसे इस रूप में खोलती है कि तर्क-शास्त्र के मतों और केवल कर्मकांड की निष्ठा को छोड़कर आत्म-ज्ञान में ही निष्ठा रखनी चाहिए, क्योंकि केवल तर्क की उलझनें बुद्धि को भ्रमित कर सकती हैं।
टीका आगे अनेक दार्शनिक मतों (न्याय की ईश्वर और जीव की धारणाएँ, परमाणुवाद, मीमांसा और जैमिनि के स्वर्ग-मोक्ष संबंधी विचार) और कर्मकांड की बहुलता का खंडन करती है, और यह निष्कर्ष देती है कि स्वर्ग और कर्म-फल अनित्य हैं, इसलिए मोक्ष केवल आत्म-ज्ञान से है; साथ ही उद्धरण देती है कि कर्मों से जीव बँधता है और आत्म-विद्या से छूटता है। (इसमें अन्य मतों के खंडन के लंबे तर्क हैं; उन्हें यहाँ शब्दशः नहीं उतारा गया, और किसी दर्शन या परंपरा को निम्न ठहराना इस पुनर्लेखन का उद्देश्य नहीं है।)
सरल हिन्दी में समझें
यह श्लोक कहता है कि जब कोई महान ऋषियों और योगियों के अलग-अलग मतों को देखता है, तो सब कुछ जान लेने की भूख और मतों में उलझने की बेचैनी ढीली पड़ सकती है और मन शांत हो सकता है।
पुस्तक इसके साथ यह भी कहती है कि आत्म-ज्ञान में निष्ठा ही असली केंद्र है। इसका अर्थ यह नहीं कि कोई दूसरे मतों को गलत ठहराए, या सीखना ही छोड़ दे। यह अलग-अलग मतों की टकराहट से थकने के बजाय अपने अनुभव और सीधे देखने पर टिकने की बात है।
इसे किसी परंपरा या विचारधारा का उपहास करने के लिए उपयोग न करें।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. श्लोक कहता है कि अनेक मतों के भेद देखकर वैराग्य को प्राप्त मनुष्य शांत हो जाता है। 2. यह मतों की बहुलता में ही अंतिम उत्तर खोजने की पहचान को चुनौती देता है। 3. यह मतभेद और भीतरी शांति के संबंध को प्रकट करता है। 4. वैराग्य के आठ श्लोकों में पाँचवाँ है, जो मतों की बहुलता से वैराग्य की बात करता है। 5. 9.3 के अनित्य जगत् से यहाँ अनित्य विचारों की ओर बढ़ा गया है। 6. यह परम दृष्टि है; यह सीखने या विचार-विमर्श के विरुद्ध नहीं है। 7. इसे किसी परंपरा, दर्शन या व्यक्ति को निम्न ठहराने का आधार न बनाएँ।
वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है।
उदाहरण से समझें: जैसे किसी शहर के अनेक रास्ते बताने वालों की बातें सुनकर यात्री अपनी आँख से नक्शा पढ़ना सीख ले, वैसे मतों की भीड़ में अपना अनुभव सहारा बनता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
प्रतीकात्मक चित्र-व्याख्या
वैराग्य
वस्तु का उपयोग, पर उस पर मानसिक निर्भरता नहीं।
आज की जिंदगी से उदाहरण
कोई व्यक्ति इंटरनेट पर आध्यात्मिकता के दर्जनों दावे पढ़कर उलझ जाता है। फिर एक दिन वह सब छोड़कर कुछ मिनट चुपचाप बैठता है और देखता है कि अपना अनुभव ज़्यादा भरोसेमंद सहारा है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: मतों की भीड़ में थकिए मत; अपना सीधा अनुभव भी एक कसौटी है।
सामान्य गलतफहमी
यह श्लोक सीखने, पढ़ने या दूसरी परंपराओं का सम्मान छोड़ने का उपदेश नहीं है। पुस्तक की टीका में यहाँ स्त्रियों, अन्य मतों और कुछ प्रकार के शिक्षकों पर कठोर टिप्पणियाँ और कथाएँ हैं; वे इस पुनर्लेखन में शामिल नहीं की गईं। किसी व्यक्ति, लिंग, वर्ग या मत को निम्न ठहराना इस श्लोक की शिक्षा नहीं है। तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज किसी एक विचार पर ठहरकर पूछिए: ‘मेरे अपने अनुभव में इसका क्या आधार है?’ (लगभग 5 मिनट)
आत्मचिंतन प्रश्न: किस मत की बहस में मैं सबसे ज़्यादा थक जाता हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट बैठकर एक बहस या मत लिखिए जो आपको उलझाता है, और उसके नीचे लिखिए कि आपने खुद क्या अनुभव किया है।
एक पंक्ति में सार: मतों की बहुलता देखकर वैराग्य उपजे तो मन शांत होता है; अपने अनुभव पर टिकना सहारा है।
English
Translation: Seeing the many differing views of great sages, holy people and yogis, who, grown dispassionate, would not find calm?
Simple explanation: Seeing how many differing views even sages hold, a person can tire of chasing every argument and settle on direct experience. It is not a call to stop learning or to dismiss any tradition.
विषय और संबंधित श्लोक
- वैराग्य
- मत-बहुलता
- आत्म-ज्ञान
- शांति
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पृष्ठ से पढ़ा गया। टीका के अन्य दार्शनिक मतों के खंडन और कर्मकांड पर लंबे तर्क शामिल नहीं किए गए।