Agni Purana· Agni Purāṇa
110
अध्याय 110 / 381

Adhyaya 110

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अध्याय ११०

श्लोक 1

गङामाहात्म्यं अग्निर् उवाच गङामाहात्म्यमाख्यास्ये सेव्या सा भुक्तिमुक्तिदा ।येषां मध्ये याति गङ्गा ते देशा पावना वराः

gaṅāmāhātmyaṃ agnir uvāca gaṅāmāhātmyamākhyāsye sevyā sā bhuktimuktidā / yeṣāṃ madhye yāti gaṅgā te deśā pāvanā varāḥ

हिन्दी अर्थ

भगवान् शिव कहते हैं-स्कन्द! पुरोहितको यज्ञमण्डपको पधारे। (मूर्तिभिर्जापिभिर्विप्रैः -- चाहिए कि वह स्नान करके प्रातःकाल और इस पाठान्तरके अनुसार मूर्तियों और जपकर्ता मध्याहृकाल, दोनों समयोंका नित्यकर्म सम्पन्न ब्राह्मणोंके साथ यज्ञमण्डपमें जाय, ऐसा अर्थ करके मूर्तिरक्षक सहायक ब्राह्मणोंके साथ समझना चाहिए।) फिर वहाँ शान्ति आदि

English

I shall describe the greatness of (river) Gahga. She should be worshipped. She yields enjoyment and liberation. The countries through which she flows are holy and excellent.

अध्याय ११०

श्लोक 2

१ तीर्थं कणखलमित्यादिः, कालिकासङ्गमुत्तममित्यन्तः पाठो छ॥ पुस्तके नास्ति २ श्रीपर्वतं कोन्द्रगिरिरिति छ॥ ।श्रीपर्वतं कोलगिरिमिति ज॥ ३ शृङ्गवेरपुअरं वरमिति घ॥ ४ अग्निर् उवाच ।माहात्म्यं सर्वतीर्थानामित्यादिः, नैमिषं परमन्तीर्थं भुक्तिमुक्तिप्रदायकं ।इत्य् आग्नेये महापुराणे तीर्थयात्रामाहात्म्यमित्यन्तः पाठो झ॥ पुस्तके नास्ति :प् ३७४ गतिर्गङ्गा तु(१) भूतानां गतिमन्वेषतां(२) सदा गङ्गा तारयते(३) चोभौ वंशौ नित्यं हि सेविता

1 tīrthaṃ kaṇakhalamityādiḥ, kālikāsaṅgamuttamamityantaḥ pāṭho cha.. pustake nāsti 2 śrīparvataṃ kondragiririti cha.. / śrīparvataṃ kolagirimiti ja.. 3 śṛṅgaverapuaraṃ varamiti gha.. 4 agnir uvāca / māhātmyaṃ sarvatīrthānāmityādiḥ, naimiṣaṃ paramantīrthaṃ bhuktimuktipradāyakaṃ / ity āgneye mahāpurāṇe tīrthayātrāmāhātmyamityantaḥ pāṭho jha.. pustake nāsti :p 374 gatirgaṅgā tu(1) bhūtānāṃ gatimanveṣatāṃ(2) sadā gaṅgā tārayate(3) cobhau vaṃśau nityaṃ hi sevitā

हिन्दी अर्थ

२०८ अग्निपुराण द्वारोंका पूर्ववत् क्रमशः पूजन करे। इन द्वारोंकी दोनों शाखाओंपर प्रदक्षिणक्रमसे द्वारपालोंकी पूजा करनी चाहिए। पूर्व दिशामें द्वारपाल नन्दी और महाकालकी, दक्षिण दिशामें भृङ्गी और

English

The drinking of the waters of Ganges (confers the merits of performance of) thousands of Candrayana. One who worships the Ganges for a month gets the fruits of all sacrificial rites.

अध्याय ११०

श्लोक 3

चान्द्रायणसहस्राच्च गङ्गाम्भःपानमुत्तमं ।गङां मासन्तु संसेव्य सर्वयज्ञफलं लभेत्

cāndrāyaṇasahasrācca gaṅgāmbhaḥpānamuttamaṃ / gaṅāṃ māsantu saṃsevya sarvayajñaphalaṃ labhet

हिन्दी अर्थ

विनायककी, पश्चिम दिशामें वृषभ और स्कन्दकी तथा उत्तर दिशामें देवी और चण्डकी पूजा करे। द्वार-शाखाओंके मूलदेशमें पूर्वादि क्रमसे दो-दो कलशोंकी पूजा करे। उनके नाम इस प्रकार हैं-

English

The goddess (Ganges) destroys all sins and confers (ac¬ cess to) heavens. One continues to stay in heavens as long as (his) bones remain in the (waters of the) Ganges.

अध्याय ११०

श्लोक 4

सकलाघहरी देवी स्वर्गलोकप्रदायिनी ।यावदस्थि च गङ्गायां तावत् स्वर्गे स तिष्ठति

sakalāghaharī devī svargalokapradāyinī / yāvadasthi ca gaṅgāyāṃ tāvat svarge sa tiṣṭhati

हिन्दी अर्थ

पूर्व दिशामें प्रशान्त और शिशिर, दक्षिणमें पर्जन्य और अशोक, पश्चिममें भूतसंजीवन और अमृत तथा उत्तरमें धनद और श्रीप्रद-इन दो-दो कलशोंको क्रमशः पूजाका विधान है। इनके नामके आदिमें “प्रणव? और अन्तमें 'नमः' जोड़कर चतुर्थ्यन्त रूप रखे। यही इनके पूजनका

English

Blind people and others attain equal staftis with the

अध्याय ११०

श्लोक 5

अन्धादयस्तु(४) तां सेव्य देवैर् गच्छन्ति तुल्यतां(५) ।गङ्गातीर्थसमुद्भूतमृद्धारी सो ऽघहार्कवत्(६)

andhādayastu(4) tāṃ sevya devair gacchanti tulyatāṃ(5) / gaṅgātīrthasamudbhūtamṛddhārī so 'ghahārkavat(6)

हिन्दी अर्थ

लोक दो, ग्रह दो, वसु दो, द्वारपाल दो,

English

(The river) purifies hundreds and thousands of holy men who look at it, touch it, drink (its waters) and repeat (the word) Ganges.

अध्याय ११०

श्लोक 6

दर्शनात् स्पर्शनात् पानात्तथा गङ्गेतिकीर्तनात् ।पुनाति पुण्यपुरुषान् शतशीथ सहस्रशः

darśanāt sparśanāt pānāttathā gaṅgetikīrtanāt / punāti puṇyapuruṣān śataśītha sahasraśaḥ

हिन्दी अर्थ

तथा गणेश--इतने देवता यज्ञमण्डपके प्रत्येक द्वारपर रहते हैं। इनका कार्य है-विश्नसमूहका निवारण और यज्ञका संरक्षण। पूर्वादि दस दिशाओंमें वज्र, शक्ति, दण्ड, खड्ग, पाश, ध्वज, गदा, त्रिशूल, चक्र और कमलको क्रमशः पूजा करे तथा प्रत्येक दिशामें दिक्पालको पताकाका भी पूजन करे। पूजनके मन्त्रका स्वरूप इस प्रकार है-3 हूं हः वज्राय हूं फट्। ३» हूं हः

English

(The river) purifies hundreds and thousands of holy men who look at it, touch it, drink (its waters) and repeat (the word) Ganges.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 110
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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