अध्याय ११५
श्लोक 1
गयायात्राविधिः अग्निर् उवाच उद्यतश्चेद्गयां यातुं(१) श्राद्धं कृत्वा विधानतः ।विधाय कार्पटीवेशं ग्रामस्यापि प्रदक्षिणं
gayāyātrāvidhiḥ agnir uvāca udyataścedgayāṃ yātuṃ(1) śrāddhaṃ kṛtvā vidhānataḥ / vidhāya kārpaṭīveśaṃ grāmasyāpi pradakṣiṇaṃ
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार संशोधन करके, लिङ्गके ऊर्ध्व- भागमें ब्रह्मा और अन्त (मूल) भागमें विष्णुका पूजन आदि करके, शुद्धिके लिये पूर्ववत् सारा कार्य सम्पन्न कर, होम-संख्याके अनुसार जप आदि करे। कुशके मध्यभागसे लिङ्गके मध्यभागका और कुशके अग्रभागसे लिङ्गके अग्रभागका स्पर्श करे। जिस मन्त्रसे जिस प्रकार संधान किया जाता है, वह इस समय बताया
English
In the offaka ceremony and in the vfddhi rite at Gaya on the day of death, separate rite is performed for the mother at Gaya. But it is performed along with the husband at other places.