अध्याय ११८
श्लोक 1
भारतवर्षं अग्निर् उवाच उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश् चैव दक्षिणं ।वर्षं तद् भारतं नाम नवसाहस्रविस्तृतं
bhāratavarṣaṃ agnir uvāca uttaraṃ yat samudrasya himādreś caiva dakṣiṇaṃ / varṣaṃ tad bhārataṃ nāma navasāhasravistṛtaṃ
हिन्दी अर्थ
बीचमें जो कोणवर्ती दो पद हैं, उनमें सविताकी उत्तरके छः पदोंमें धराधर (पृथ्वीधर)-का स्थिति है और उनसे निम्नभागके दो पदोंमें यजन करे। फिर मण्डलके बाहर ईशानादि सावित्र तेज या सावित्रीकी। उसके नीचे छः कोणोंके क्रमसे चरकी, स्कन्द, बिदारीविकट, पदोंमें विवस्वान् विद्यमान हैं। पितरों और पूतना, जम्भ, पापा (पापराक्षसी) तथा पिलिपिच्छ
English
The orb of fire should be conceived as three-sided, red (in colour), marked with (the sign of) svastika and as the form of knowledge and endowed with the principal syllabic hum.