अध्याय १२१
श्लोक 1
ज्योतिःशास्त्रं अग्निर् उवाच ज्योतिःशास्त्रं प्रवक्ष्यामि शुभाशुभविवेकदं ।चातुर्लक्षस्य सारं यत् तज् ज्ञात्वा सर्वविद्भवेत्
jyotiḥśāstraṃ agnir uvāca jyotiḥśāstraṃ pravakṣyāmi śubhāśubhavivekadaṃ / cāturlakṣasya sāraṃ yat taj jñātvā sarvavidbhavet
हिन्दी अर्थ
चाहनेवाले मुनि और देवता वहाँ स्नान करके सिद्धि प्राप्त कर चुके हैं। पुष्करमें देवताओं और पितरोंको पूजा करनेवाले मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त करके ब्रह्मलोकमें जाते हैं। जो कार्तिकको पूर्णिमाको वहाँ अन्नदान करता है, वह शुद्धचित्त होकर ब्रह्मलोकका भागी होता है। पुष्करमें जाना दुष्कर है, पुष्करमें तपस्याका सुयोग मिलना दुष्कर है, पुष्करमें दानका अवसर
English
Hawn salutations to Siva at the base, Om ham hum him horn in the head, hrm to the tuft, haim to the armour, hah to the weapons and to one with the attendants.