Agni Purana· Agni Purāṇa
122
अध्याय 122 / 381

Adhyaya 122

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अध्याय १२२

श्लोक 1

कालगणनं अग्निर् उवाच कालः समागणो वक्ष्ये गणितं कालबुद्धये ।कालः समागणो ऽर्कघ्नो(१) मासैश् चैत्रादिभिर्युतः

kālagaṇanaṃ agnir uvāca kālaḥ samāgaṇo vakṣye gaṇitaṃ kālabuddhaye / kālaḥ samāgaṇo 'rkaghno(1) māsaiś caitrādibhiryutaḥ

हिन्दी अर्थ

कृष्ण अष्टमीको ' पित्र्या' कहते हैं।

English

Any epoch or starting point in time might be adopted, like, for instance the Kalpa or the beginning of creation, the Caturyuga, Kaliyuga etc. or any of the eras like the Saka.

अध्याय १२२

श्लोक 2

द्विघ्नो द्विस्ट्ःअः सवेदः स्यात् पञ्चाङ्गष्टयुतोगुणः(२) ।त्रिष्ठो मध्यो वसुगुणः पुनर्वेदगुणश् च सः

dvighno dvisṭḥaḥ savedaḥ syāt pañcāṅgaṣṭayutoguṇaḥ(2) / triṣṭho madhyo vasuguṇaḥ punarvedaguṇaś ca saḥ

हिन्दी अर्थ

उक्त चार अष्टकाओंका क्रमशः इन्द्र, विश्वेदेव, प्रजापति तथा पितृ-देवतासे सम्बन्ध है । अष्टकाके दूसरे दिन जो नवमी आती है, उसे ' अन्वष्टका' कहते हैं। ' अष्टका संस्कार'-कर्म है; अतः एक ही बार किया जाता है, प्रतिवर्ष नहीं। उस दिन मातृपूजा और आभ्युदयिक श्राद्धके पश्चात् गृह्याग्निमें होम किया जाता है।

English

Multiplying the months from epoch by 2 (i.e. 121 X 2 = 242) and placing them in two places: 242 242

अध्याय १२२

श्लोक 3

अष्टरन्ध्राग्निहीनः(३) स्यादधः सैकरसाष्टकैः ।मध्यो हीनः षष्टिहतो(४) लब्धयुक्तस्तथोपरि

aṣṭarandhrāgnihīnaḥ(3) syādadhaḥ saikarasāṣṭakaiḥ / madhyo hīnaḥ ṣaṣṭihato(4) labdhayuktastathopari

हिन्दी अर्थ

३. पिता, पितामह, प्रपितामह, माता, पितामही, प्रपितामही, मातामह, प्रमातामह तथा वृद्ध प्रमातामह -ये नौ देवता हैं। इनके लिये किया जानेवाला श्राद्ध 'नवदेवताक' या 'नवहैवत्य' कहलाता है। इसमें मातामही आदिका भाग मातामह आदिके साथ ही सम्मिलित रहता है। जहाँ मातामही, प्रमातामही और वृद्ध प्रमातामहीको भी पृथक् पिण्ड दिया जाय, वहाँ बारह देवता होनेसे वह

English

Subtract 398 (asta-randhra-agni) from the lower and 87 (saika-rasasfaka) from the 'middle*. Divide (the 'middle' and the 'lower') by 60 and add the quotients to the preceding, (keep¬ ing the remainders in their places ).2

अध्याय १२२

श्लोक 4

न्यूनः सप्तकृतो वारस्तदधस्तिथिनाडयः ।सगुणो द्विगुणश्चोरोद्ध्वं त्रिभिरूनो गुणः पुनः

nyūnaḥ saptakṛto vārastadadhastithināḍayaḥ / saguṇo dviguṇaścoroddhvaṃ tribhirūno guṇaḥ punaḥ

हिन्दी अर्थ

'द्वादशदेवताक' श्राद्ध है। करे। फिर इस प्रकार कहे-- पिता, पितामह

English

Placing the gum) in three places

अध्याय १२२

श्लोक 5

अधः स्वरामसंयुक्तो रसार्काष्टफलैर् युतः ।अष्टाविंशच्छेषपिण्डस्तिथिनाड्या अधः स्थितः

adhaḥ svarāmasaṃyukto rasārkāṣṭaphalair yutaḥ / aṣṭāviṃśaccheṣapiṇḍastithināḍyā adhaḥ sthitaḥ

हिन्दी अर्थ

इन सबको तथा अन्य पितराँको भी उनके उद्धारके लिये मैं पिण्ड देता हुँ। सोम, मङ्गल

English

Subtracting 398 and 87

अध्याय १२२

श्लोक 6

१ समागणोर्काब्द इति ख॥ , छ॥ च २ पञ्चदशयुतो गण इति ज॥ ३ अष्टचन्द्राग्निहीन इति ज॥ ४ षष्टिहत इति ङ॥ :प् ३९ गुणस्तिसृभिरूनोर्धं द्वाभ्यां च गुणयेत् पुनः ।मध्ये रुद्रगुणः कार्यो ह्य् अधः सैको नवाग्निभिः(१)

1 samāgaṇorkābda iti kha.. , cha.. ca 2 pañcadaśayuto gaṇa iti ja.. 3 aṣṭacandrāgnihīna iti ja.. 4 ṣaṣṭihata iti ṅa.. :p 39 guṇastisṛbhirūnordhaṃ dvābhyāṃ ca guṇayet punaḥ / madhye rudraguṇaḥ kāryo hy adhaḥ saiko navāgnibhiḥ(1)

हिन्दी अर्थ

राहु और केतुरूप भगवान् सूर्यको प्रणाम है ।' उत्तर-मानस-तीर्थमें स्नान करनेवाला पुरुष अपने समस्त कुलका उद्धार कर देता है॥ १०--१६॥ सूर्यदेवको नमस्कार करके मनुष्य मौन- भावसे दक्षिण-मानस-तीर्थको जाय और यह भावना करे-- मैं पितरोंको तृप्तिके लिये दक्षिण- मानस-तीर्थमें स्नान करता हूँ। मैं गयामें इसी

English

Dividing the 'upper' by 7 for weekrdays and rejecting the quotient, we get the i;arfl-correction for tithi as 5-0-10.

अध्याय १२२

श्लोक 7

लब्धहीनो(२) भवेन्मध्यो द्वाविंशतिविवर्जितः ।षष्टिशेषे ऋणं ज्ञेयं लब्धमूर्ध्वं विनिक्षिपेत्

labdhahīno(2) bhavenmadhyo dvāviṃśativivarjitaḥ / ṣaṣṭiśeṣe ṛṇaṃ jñeyaṃ labdhamūrdhvaṃ vinikṣipet

हिन्दी अर्थ

उद्देश्यसे आया हूँ कि मेरे सम्पूर्ण पितर स्वर्गलोकको चले जायँ।' तदनन्तर श्राद्ध और पिण्डदान करके भगवान् सूर्यको प्रणाम करते हुए इस प्रकार कहे -- सबका भरण-पोषण करनेवाले भगवान्

English

Multiplying the 'guptf' (264-27) by"2 (*.«. 528-54 and subtracting 3

अध्याय १२२

श्लोक 8

सप्तविंशतिशेषस्तु ध्रुवो नक्षत्रयोगयोः ।मासि मासि क्षिपेद् वारन्द्वात्रिंशद्घटिकास्तिथौ

saptaviṃśatiśeṣastu dhruvo nakṣatrayogayoḥ / māsi māsi kṣiped vārandvātriṃśadghaṭikāstithau

हिन्दी अर्थ

भानुको नमस्कार है। प्रभो! आप मेरे अभ्युदयके साधक हों। मैं आपका ध्यान करता हूँ। आप मेरे सम्पूर्ण पितरोंको भोग और मोक्ष देनेवाले हों। कव्यवाट्, अनल, सोम, यम, अर्यमा, अग्निष्वात्त, पितर हैं, उनको पिण्डदान करनेके उद्देश्यसे मैं इस गयातीर्थमें आया हूँ।' मुण्डपृष्ठके उत्तर भागमें

English

The 'guna* is halved, 3 subtracted (from its second figure) and the whole expression multiplied by 2. The first figure here is multiplied by 11 {judra)\ the second figure is increased by 1 and divided by 39, the quotient being subtracted from the first figure and the remainder kept in its place. The resultant is termed madhya. Subtract 22 from the first figure and divide it by 60; the remainder is deductive; the quotient is added to the (second) 'upper' (of verses 4b-5). The first figure is divided by 27 and the remainder set down in its place. The resultant expres¬ sion is the constant for the correction of naksatra .ndyoga.

अध्याय १२२

श्लोक 9

द्वे पिण्डे द्वे च नक्षत्रे नाड्य एकादश ह्य् ऋणे ।वारस्थाने तिथिन्दद्यात् सप्तभिर्भार्गवमाहरेत्

dve piṇḍe dve ca nakṣatre nāḍya ekādaśa hy ṛṇe / vārasthāne tithindadyāt saptabhirbhārgavamāharet

हिन्दी अर्थ

नामक तीर्थ है, वह तीनों लोकोंमें विख्यात है। सिद्ध पुरुषोंक लिये आनन्ददायक और पापियोंके लिये भयंकर बड़े-बड़े नाग, जिनकी जीभ लपलपाती रहती है, उस तीर्थकी प्रतिदिन रक्षा

English

Adding the h7/«-constant (2-32-00) to the t'era-hVAi correction (j-0-10), we have 7-32-10, being the earaA' (\■eck, day etc.) correction for the point of time taken for consideration. For the nakfatra of that point of time, add the nakfatra constant (2-11-00) to the nakfatra correction (got in verses 6-8a), i.e. 7-30-38, and we have the nakfatra as 9-41-38. In other words, at the point of time taken, nine nakfalras have passed by, and in the currenlOth nakfatra, magha, it is 41 nddikds and 38 vinddikas.

अध्याय १२२

श्लोक 10

शेषवाराश् च सूर्याद्या घटिकासु च पातयेत् ।पिण्डिकेषु तिथिन्दद्याद्धरेच्चैव चतुर्दश

śeṣavārāś ca sūryādyā ghaṭikāsu ca pātayet / piṇḍikeṣu tithindadyāddhareccaiva caturdaśa

हिन्दी अर्थ

करते हैं। वहाँ स्नान करके मनुष्य इस भूतलपर सुखपूर्वक क्रीडा करते और अन्तमें स्वर्गलोकको जाते हैं ॥ १७--२४॥

English

Adding the constant (2-32-00) to the vdra-tithi correction (5-0-10). we get 7-32-10 for the week, day, which means that 7 days have elapsed as / counted from Sunday, and at the point of time in consideration, i.c. ukla- pratipad in Vaisakha, it is Sunday at 32 nddikds and 10 vinddikds (Mean).

अध्याय १२२

श्लोक 11

ऋणं धनं धनमृणं क्रमाज् ज्ञेयं चतुर्दशे ।प्रथमे त्रयोदशे पञ्च द्वितीयद्वादशे दश

ṛṇaṃ dhanaṃ dhanamṛṇaṃ kramāj jñeyaṃ caturdaśe / prathame trayodaśe pañca dvitīyadvādaśe daśa

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात् महानदीमें स्थित परम उत्तम फल्गु- तीर्थपर जाय। यह नाग, जनार्दन, कूप, वट और उत्तर-मानससे भी उत्कृष्ट है। इसे 'गयाका शिरोभाग' कहा गया है । गयाशिरको ही ' फल्गु-

English

The nddikd corrections enunciated are:

अध्याय १२२

श्लोक 12

पञ्चदशस्तृतीये च तथाचैकादशे स्मृतां ।चतुर्थे दशमे चैव भवेदेकोनविंशतिः

pañcadaśastṛtīye ca tathācaikādaśe smṛtāṃ / caturthe daśame caiva bhavedekonaviṃśatiḥ

हिन्दी अर्थ

तीर्थ” कहते हैं। यह मुण्डपृष्ठ और नग आदि तीर्थकी अपेक्षा सारसे भी सार वस्तु है। इसे “ आभ्यन्तर-तीर्थ’ कहा गया है। जिसमें लक्ष्मी, कामधेनु गौ, जल और पृथ्वी सभी फलदायक होते हैं तथा जिससे दृष्टि रमणीय, मनोहर वस्तुएँ फलित होती हैं, वह “फल्गु-तीर्थ' है। फल्गु- तीर्थ किसी हलके-फुलके तीर्थके समान नहीं है। फल्गु-तीर्थमें स्नान करके मनुष्य भगवान्

English

The vikald corrections enunciated are;

अध्याय १२२

श्लोक 13

पञ्चमे नवमे चैव द्वाविंशतिरुदाहृताः ।षष्ठाष्टमे त्वखण्डाः स्युश् चतुर्विंशतिरेव च

pañcame navame caiva dvāviṃśatirudāhṛtāḥ / ṣaṣṭhāṣṭame tvakhaṇḍāḥ syuś caturviṃśatireva ca

हिन्दी अर्थ

गदाधरका दर्शन करे तो इससे पुण्यात्मा पुरुषोंको क्या नहीं प्राप्त होता? भूतलपर समुद्र- पर्यन्त जितने भी तीर्थ और सरोवर हैं, वे सब प्रतिदिन एक बार फल्गु-तीर्थमें जाया करते हैं। जो तीर्थराज

English

For the third correction, multiply the 32-10 (of vciscs

अध्याय १२२

श्लोक 14

सप्तमे पञ्चविंशः स्यात् खण्डशः पिण्डिकाद् भवेत्(३) ।कर्कटादौ हरेद्राशिमृतुवेदत्रयैः क्रमात्

saptame pañcaviṃśaḥ syāt khaṇḍaśaḥ piṇḍikād bhavet(3) / karkaṭādau haredrāśimṛtuvedatrayaiḥ kramāt

हिन्दी अर्थ

फल्गु-तीर्थमें श्रद्धाके साथ स्नान करता है, उसका वह स्नान पितरोंको ब्रह्मलोककी प्राप्ति करानेवाला तथा अपने लिये भोग और मोक्षको सिद्धि करनेवाला होता है श्राद्धकर्ता पुरुष स्नानके पश्चात् भगवान् ब्रह्माजीको प्रणाम करे। (उस समय इस प्रकार कहे) “ कलियुगमें सब लोग महेश्वरके उपासक हैं; किंतु इस गया-तीर्थमें भगवान् गदाधर उपास्यदेव हैं।

English

Togas form variable divisions of time during which the joint motion of the Sun and the Moon in longitude is 13°' 20' or 800 kalds. In a cycle there are 27 yogas, some of them being considered as auspicious and others inauspi¬ cious. Their significances are taken due note of in deciding ipon the times for rituals and domestic ceremonies. The 27 yogas are:

अध्याय १२२

श्लोक 15

तुलादौ प्रातिलोम्येन त्रयो वेदरसाः क्रमात् ।१ सैकेन सप्तकैर् इति ख॥ , ग॥ च २ ऋतुहीन इति ङ॥ ३ खण्डकः पिण्डकाद्भवेदिति ख॥ , ग॥ , घ॥ , ङ॥ , छ॥ , ज॥ च :प् ४० मकरादौ दीयते च रसवेदत्रयः क्रमात्

tulādau prātilomyena trayo vedarasāḥ kramāt / 1 saikena saptakair iti kha.. , ga.. ca 2 ṛtuhīna iti ṅa.. 3 khaṇḍakaḥ piṇḍakādbhavediti kha.. , ga.. , gha.. , ṅa.. , cha.. , ja.. ca :p 40 makarādau dīyate ca rasavedatrayaḥ kramāt /

हिन्दी अर्थ

यहाँ लिङ्गस्वरूप ब्रह्माजीका निवास है, उन्हीं महेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। भगवान् गदाधर (वासुदेव), बलराम (संकर्षण), प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, नारायण, ब्रह्मा, विष्णु, नृसिंह तथा वराह आदिको

English

Viskambha 10. Ganca 19. Parigha

अध्याय १२२

श्लोक 16

मेषादौ प्रातिलोम्येन त्रयो वेदरसाः क्रमात्(१) ।खेषवः खयुगा मैत्रं मेषादौ विकला धनम्

meṣādau prātilomyena trayo vedarasāḥ kramāt(1) / kheṣavaḥ khayugā maitraṃ meṣādau vikalā dhanam

हिन्दी अर्थ

मैं प्रणाम करता हूँ।' तदनन्तर श्रीगदाधरका दर्शन करके मनुष्य अपनी सौ पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। दूसरे दिन धर्मारण्य-तीर्थका दर्शन करे। वहाँ मतङ्ग मुनिके श्रेष्ठ आश्रममें मतङ्ग-वापीके जलमें स्नान करके श्राद्धकर्ता पुरुष पिण्डदान करे। वहाँ मतङ्गेश्वर एवं सुसिद्धेश्वरको मस्तक झुकाकर इस प्रकार कहे--' सम्पूर्ण देवता प्रमाणभूत

English

Priti 11. Vrddhi 20. Siva

अध्याय १२२

श्लोक 17

कर्कटे प्रातिलोम्यं स्यादृणमेतत् तुलादिके ।चतुर्गुणा तिथिर्ज्ञेया विकलाश्चेह सर्वदा

karkaṭe prātilomyaṃ syādṛṇametat tulādike / caturguṇā tithirjñeyā vikalāśceha sarvadā

हिन्दी अर्थ

होकर रहें, समस्त लोकपाल साक्षी हों, मैंने इस मतङ्ग-तीर्थमें आकर पितरोंका उद्धार कर दिया।' तत्पश्चात् ब्राह्म-तीर्थं नामक कूपमें स्नान, तर्पण और श्राद्ध आदि करे। उस कूप और यूपके

English

Ayusman 12. Dhruva 21. Siddha

अध्याय १२२

श्लोक 18

हन्याल्लिप्तागतागामिपिण्डसङ्ख्याफलन्तरैः ।षष्ट्याप्तं प्रथमोच्चार्ये हानौ देयन्धने धनम्

hanyālliptāgatāgāmipiṇḍasaṅkhyāphalantaraiḥ / ṣaṣṭyāptaṃ prathamoccārye hānau deyandhane dhanam

हिन्दी अर्थ

मध्यभागमें किया हुआ श्राद्ध सौ पीढ़ियोंका उद्धार करनेवाला है। वहाँ धर्मात्मा पुरुष महाबोधि- वृक्षको नमस्कार करके स्वर्गलोकका भागी होता है। तीसरे दिन नियम एवं व्रतका पालन करनेवाला पुरुष “ब्रह्म-सरोवर' नामक तीर्थमें स्नान करे। उस समय इस प्रकार प्रार्थना करे-- मैं ब्रह्मर्षियोंद्वारा सेवित ब्रह्म-सरोवर-तीर्थमें पितरोंको ब्रह्मलोकको प्राप्ति करनेके लिये स्नान करता हूँ।' श्राद्धकर्ता

English

Saubhagya 13. Vyaghata 22. sadhya

अध्याय १२२

श्लोक 19

द्वितीयोच्चरिते वर्गे वैपरीत्यमिति स्थितिः ।तिथिर्द्विगुणिता कार्या षड्भागपरिवर्जिता

dvitīyoccarite varge vaiparītyamiti sthitiḥ / tithirdviguṇitā kāryā ṣaḍbhāgaparivarjitā

हिन्दी अर्थ

पुरुष तर्पण करके पिण्डदान दे। फिर वृक्षको सींचे। जो वाजपेय-यज्ञका फल पाना चाहता हो, वह ब्रह्माजीद्वारा स्थापित यूपको प्रदक्षिणा करे

English

Sobhana 14. Harsana 23. Subha

अध्याय १२२

श्लोक 20

रविकर्मविपरीता तिथिनाडीसमायुता ।ऋणे शुद्धे तु नाड्यः स्युरृणं शुध्येत नो यदा

ravikarmaviparītā tithināḍīsamāyutā / ṛṇe śuddhe tu nāḍyaḥ syurṛṇaṃ śudhyeta no yadā

हिन्दी अर्थ

उस तीर्थमें एक मुनि रहते थे, वे जलका घडा और कुशका अग्रभाग हाथमें लिये आमके पेड़की जड़में पानी देते थे। इससे आम भी सींचे गये और पितरोंको भी तृप्ति हुई। इस प्रकार एक ही क्रिया दो प्रयोजन सिद्ध करनेवाली हो गयी । ब्रह्माजीको नमस्कार करके मनुष्य अपनी सौ पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। चौथे दिन फल्गु-तीर्थमें स्नान करके देवता आदिका तर्पण

English

Atiganda 15. Vajra 24. Sukra

अध्याय १२२

श्लोक 21

सषष्टिकं प्रदेयन्तत् षष्ट्याधिक्ये च तत्त्यजेत्(२) ।नक्षत्रं तिथिमिश्रं स्याच्चतुर्भिर्गुणिता तिथिः

saṣaṣṭikaṃ pradeyantat ṣaṣṭyādhikye ca tattyajet(2) / nakṣatraṃ tithimiśraṃ syāccaturbhirguṇitā tithiḥ

हिन्दी अर्थ

करे। फिर गयाशीर्षमें श्राद्ध और पिण्डदान करे। गयाका क्षेत्र पाँच कोसका है। उसमें एक कोस केवल 'गयाशीर्ष' है। उसमें पिण्डदान करके

English

Sukarma 16. Siddhi 25. Brahma

अध्याय १२२

श्लोक 22

तिथिस्त्रिभागसंयुक्ता ऋणेन च तथान्विता ।तिथिरत्र चिता कार्या तद्वेदाद्योगशोधनं

tithistribhāgasaṃyuktā ṛṇena ca tathānvitā / tithiratra citā kāryā tadvedādyogaśodhanaṃ

हिन्दी अर्थ

मनुष्य अपनी सौ पीढ़ियोंका उद्धार कर सकता है। परम बुद्धिमान् महादेवजीने मुण्डपृष्ठमें अपना पैर रखा है। मुण्डपृष्ठमें ही गयासुरका साक्षात् सिर है, अतएव उसे 'गया-शिर' कहते हैं। जहाँ साक्षात् गयाशीर्ष है, वहीं फल्गु-तीर्थका आश्रय है। फल्गु अमृतकी धारा बहाती है। वहाँ पितरोंके उद्देश्यसे किया हुआ दान अक्षय होता है। दशाश्वमेध-तीर्थमें स्नान तथा ब्रह्माजीका

English

Dhrti 17. Vyatipata 26. Indra

अध्याय १२२

श्लोक 23

रविचन्द्रौ समौ कृत्वा योगो भवति निश् चलः ।एकोना तिथिर्द्विगुणा सप्तभिन्ना कृतिर्द्विधा(३)

ravicandrau samau kṛtvā yogo bhavati niś calaḥ / ekonā tithirdviguṇā saptabhinnā kṛtirdvidhā(3)

हिन्दी अर्थ

दर्शन करके महादेवजीके चरण (रुद्रपाद)-का स्पर्श करनेपर मनुष्य पुनः इस लोकमें जन्म नहीं लेता। गयाशीर्षमें शमीके पत्ते-बराबर पिण्ड देनेसे भी नरकोंमें पड़े हुए पितर स्वर्गको चले

English

Sula 18. Variyan 27. Vaidhyti

अध्याय १२२

श्लोक 24

तिथिश् च द्विगुणैकोना कृताङ्गैः करणन्निशि ।१ मकरादौ इत्य् आदिः, वेदरसाः क्रमादित्यन्तः पाठः छ॥ पुस्तके नास्ति २ सन्त्यजेदिति घ॥ ३ सप्तभिन्ना गतिर्द्विधेति ख॥ ।सप्तच्छिन्ना कृतिर्द्विधेति घ॥ , ज॥ च :प् ४१ कृष्णचतुर्दश्यन्ते शकुनिः पर्वणीह चतुष्पदं

tithiś ca dviguṇaikonā kṛtāṅgaiḥ karaṇanniśi / 1 makarādau ity ādiḥ, vedarasāḥ kramādityantaḥ pāṭhaḥ cha.. pustake nāsti 2 santyajediti gha.. 3 saptabhinnā gatirdvidheti kha.. / saptacchinnā kṛtirdvidheti gha.. , ja.. ca :p 41 kṛṣṇacaturdaśyante śakuniḥ parvaṇīha catuṣpadaṃ

हिन्दी अर्थ

जाते हैं और स्वर्गवासी पितरोंको मोक्षकी प्राप्ति होती है। वहाँ खीर, आटा, सत्तू चरु और चावलसे पिण्डदान करे। तिलमिश्रित गेहुँसे भी रुद्रपादमें पिण्डदान करके मनुष्य अपनी सौ पीढ़ियोंका उद्धार कर सकता है॥ ४०--४८ ॥ इसी प्रकार 'विष्णुपदी'में भी श्राद्ध और पिण्डदान करनेवाला पुरुष पितृ-ऋणसे छुटकारा पाता है और पिता आदि ऊपरकी सौ पीढ़ियों

English

In the alternative method of calculating the yoga, the longitudes of the Sun and the Moon are added and the sunx divided by 800 (which is the said sum in terms of six kalds). The quotient will give the number of the yogas elapsed and the remainder the nadikas etc. elapsed in the current yoga.

अध्याय १२२

श्लोक 25

प्रथमे तिथ्यर्धतो हि किन्तुघ्नं प्रतिपन्मुखे

prathame tithyardhato hi kintughnaṃ pratipanmukhe //

हिन्दी अर्थ

तथा अपनेको भी तार देता है। 'ब्रह्मपद'में श्राद्ध करनेवाला मानव अपने पितरोंको ब्रह्मलोकमें पहुँचाता है। दक्षिणाग्नि, गार्हपत्य-अग्नि तथा आहवनीय-अग्निके स्थानमें श्राद्ध करनेवाला

English

In the alternative method of calculating the yoga, the longitudes of the Sun and the Moon are added and the sunx divided by 800 (which is the said sum in terms of six kalds). The quotient will give the number of the yogas elapsed and the remainder the nadikas etc. elapsed in the current yoga.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 122
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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