Agni Purana· Agni Purāṇa
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अध्याय 128 / 381

Adhyaya 128

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अध्याय १२८

श्लोक 1

कोटचक्रम् ईअवर उवाच कोटचक्रं प्रवक्ष्यामि चतुरस्रं पुरं लिखेत् ।चतुरस्रं पुनर्मध्ये तन्मध्ये चतुरस्रकम्

koṭacakram īavara uvāca koṭacakraṃ pravakṣyāmi caturasraṃ puraṃ likhet / caturasraṃ punarmadhye tanmadhye caturasrakam

हिन्दी अर्थ

क्रमसे दसगुने बड़े हैं। महत्तत्वको भी आवृत करके प्रधान (प्रकृति) स्थित है। वह अनन्त है; क्योंकि उसका कभी अन्त नहीं होता। इसीलिये उसकी कोई संख्या अथवा माप नहीं है। मुने! वह सम्पूर्ण जगतका कारण है । उसे ही ' अपरा प्रकृति ' कहते हैं उसमें ऐसे-ऐसे असंख्य ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुए हैं। जैसे काठमें अग्नि और तिलमें तेल रहता है, उसी प्रकार प्रधानमें स्वयंप्रकाश चेतनात्मा

English

The zodiacal signs Aries etc. (should be assigned) to the directions east etc. (in the three squares) which are the symbols of the three nSdis (tubular organs in the body). The (asterism) Krttika (is located) in the east and the (asterism) Alle§a in the south-east.

अध्याय १२८

श्लोक 2

नाडीत्रितयचिह्नाढ्यं मेषाद्याः पूर्वदिङ्मुखाः ।कृत्तिका पूर्वभागे तु अश्लेषाग्नेयगोचरे

nāḍītritayacihnāḍhyaṃ meṣādyāḥ pūrvadiṅmukhāḥ / kṛttikā pūrvabhāge tu aśleṣāgneyagocare

हिन्दी अर्थ

व्यापक पुरुष विराजमान है॥ १४-१६ ३ ॥ महाज्ञान मुने! ये संश्रयधर्मी (परस्पर संयुक्त हुए) प्रधान और पुरुष सम्पूर्ण भूतोंको आत्मभूता विष्णुशक्तिसे आवृत हैं। महामुने! भगवान् विष्णुकी

English

(Asterism) Bharani should be placed in the south. Visakha should be assigned in the south-west. (Asterism) Anu- radha (should be located) in the west and Sravaa in the north¬ west.

अध्याय १२८

श्लोक 3

भरणी दक्षिणे देया विशाखां नैरृते न्यसेत् ।अनुराधां पश्चिमे च श्रवणं वायुगोचरे

bharaṇī dakṣiṇe deyā viśākhāṃ nairṛte nyaset / anurādhāṃ paścime ca śravaṇaṃ vāyugocare

हिन्दी अर्थ

स्वरूपभूता वह शक्ति ही प्रकृति और पुरुषके संयोग और वियोगमें कारण है। वही सृष्टिके समय उनमें क्षोभका कारण बनती है। जैसे जलके सम्पर्कमें आयी हुई वायु उसकी कर्णिकाओंमें व्यास शीतलताको धारण करती है, उसी प्रकार भगवान् विष्णुको शक्ति भी प्रकृति-पुरुषमय जगत्को धारण करती है । विष्णु-शक्तिका आश्रय लेकर ही देवता आदि प्रकट होते हैं। वे भगवान्

English

(Asterism) Dhanistha should be located in the north and Revati in the north-east. These eight asterisms are located in the outer n&di carefully.

अध्याय १२८

श्लोक 4

धन्बिष्ठाञ्चोत्तरे न्यस्य ऐशान्यां रेवतीं तथा ।वाह्यनाड्यां स्थितान्येव अष्टौ ह्य् ऋक्षाणि यत्नतः

dhanbiṣṭhāñcottare nyasya aiśānyāṃ revatīṃ tathā / vāhyanāḍyāṃ sthitānyeva aṣṭau hy ṛkṣāṇi yatnataḥ

हिन्दी अर्थ

विष्णु स्वयं ही साक्षात् ब्रह्म हैं, जिनसे इस सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति होती है॥ १७-२० ३॥ मुनिश्रेष्ठ ! सूर्यदेवके रथका विस्तार नौ सहस्र योजन है तथा उस रथका ईषादण्ड (हरसा)

English

The asterisms Rohini, Pu§ya, (Purva) Phalguni, Svati, Jyestha, Abhijit, 8atatara and Aivini (are located) in the middle square in order.

अध्याय १२८

श्लोक 5

रोहिणीपुष्यफल्गुण्यः स्वाती ज्येष्ठा क्रमेण तु ।अभिजिच्छततारा तु अश्विनी मध्यनाडिका

rohiṇīpuṣyaphalguṇyaḥ svātī jyeṣṭhā krameṇa tu / abhijicchatatārā tu aśvinī madhyanāḍikā

हिन्दी अर्थ

इससे दूना बड़ा अर्थात् अठारह हजार योजनका है। उसका धुरा डेढ़ करोड़ सात लाख योजन लंबा है, जिसमें उस रथका पहिया लगा हुआ है। उसमें पूर्वाह्ण, मध्याह और अपराहृरूप तीन नाभियाँ हैं। संवत्सर, परिवत्सर, इडावत्सर, अनुवत्सर और वत्सर-ये पाँच प्रकारके वर्ष उसके पाँच अरे हैं। छहों ऋतुएँ उसकी छः नेमियाँ हैं और उत्तर-दक्षिण दो अयन उसके

English

I shall describe the n&4i the middle of the drawing. In that inner square, the (asterism) Mrga(iirsa) (is located) at the east, and Punarvasu at the south-east.

अध्याय १२८

श्लोक 6

कोटमध्ये तु या नाडी कथयामि प्रयत्नतः ।मृगश्चाभ्यन्तरे पूर्वं तस्याग्नेये पुनर्वसुः

koṭamadhye tu yā nāḍī kathayāmi prayatnataḥ / mṛgaścābhyantare pūrvaṃ tasyāgneye punarvasuḥ

हिन्दी अर्थ

शरीर हैं। ऐसे संवत्सरमय रथचक्रमें सम्पूर्ण कालचक्र प्रतिष्ठित है। महामते! भगवान् सूर्यके रथका दूसरा धुरा साढ़े पैंतालीस हजार योजन लंबा है। दोनों धुरोंके परिमाणके तुल्य ही उसके

English

(The asterisms) Ardra, Hasta, the four Aadha and the three Uttara* should be placed inside the central square as four pillars.

अध्याय १२८

श्लोक 7

उत्तराफल्गुनी याम्ये चित्रा नैरृतसंस्थिता ।मूलन्तु पश्चिमे न्यस्योत्तराषाढान्तु वायवे

uttarāphalgunī yāmye citrā nairṛtasaṃsthitā / mūlantu paścime nyasyottarāṣāḍhāntu vāyave

हिन्दी अर्थ

युगाद्धोंका परिमाण है॥ २१--२५॥ उस रथके दो धुरोंमेंसे जो छोटा है वह, और उसका युगाद्ध ध्रुवके आधारपर स्थित है। उत्तम त्रतका पालन करनेवाले मुने! गायत्री, बृहती,

English

Fortifications should be made thus. A belligerent com¬ ing from outside from the direction of lord (planet) (that presides over the day) and the asterisms (representing tlxat

अध्याय १२८

श्लोक 8

पूर्वभाद्रपदा सौम्ये रेवती ईशगोचरे ।कोटस्याभ्यन्तरे नाडी ह्य् ऋक्षाष्टकसमन्विता

pūrvabhādrapadā saumye revatī īśagocare / koṭasyābhyantare nāḍī hy ṛkṣāṣṭakasamanvitā

हिन्दी अर्थ

सात छन्द ही सूर्यदेवके सात घोड़े कहे गये हैं। सूर्यका दिखायी देना उदय है और उनका दृष्टिसे ओझल हो जाना ही अस्तकाल है, ऐसा जानना चाहिए। वसिष्ठ! जितने प्रदेशमें ध्रुव स्थित है,

English

The POrv&t&a and Uttar&ai.

अध्याय १२८

श्लोक 9

आर्द्रा हस्ता तथाषाढा चतुष्कञ्चोत्तरात्रिकम् ।मध्ये स्तम्भचतुष्कन्तु दद्यात् कोटस्य कोटरे

ārdrā hastā tathāṣāḍhā catuṣkañcottarātrikam / madhye stambhacatuṣkantu dadyāt koṭasya koṭare

हिन्दी अर्थ

पृथ्वीसे लेकर उस प्रदेश-पर्यन्त सम्पूर्ण देश प्रलयकालमें नष्ट हो जाता है। सप्तर्षियोंसे उत्तर दिशामें ऊपरकी ओर जहाँ ध्रुव स्थित है, आकाशमें वह दिव्य एवं प्रकाशमान स्थान ही विराट्रूपधारी भगवान् विष्णुका तीसरा पद है। पुण्य और पापके क्षीण हो जानेपर दोषरूपी पङ्कसे रहित संयतचित्त महात्माओंका यही परम उत्तम स्थान है। इस विष्णुपदसे ही गङ्गाका

English

Hie Uttaraph&Igunl, Uttar&f&dha and Uttarapropada.

अध्याय १२८

श्लोक 10

एवं दुर्गस्य विन्यासं वाह्ये स्थानं दिशाधिपात् ।आगन्तुको यदा योद्धा ऋक्षवान् स्यात्फलान्वितः

evaṃ durgasya vinyāsaṃ vāhye sthānaṃ diśādhipāt / āgantuko yadā yoddhā ṛkṣavān syātphalānvitaḥ

हिन्दी अर्थ

प्राकट्य हुआ है, जो स्मरणमात्रसे सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाली हैं

English

If the planets and asterisms at the innermost square are good, it is known that those remaining in the inner square would be victorious and defeat for that person coming (from outside).

अध्याय १२८

श्लोक 11

कोटमध्ये ग्रहाः सौम्या यदा ऋक्षान्विताः पुनः ।जयं मध्यस्थितानान्तु भङ्गमागामिनो विदुः

koṭamadhye grahāḥ saumyā yadā ṛkṣānvitāḥ punaḥ / jayaṃ madhyasthitānāntu bhaṅgamāgāmino viduḥ

हिन्दी अर्थ

आकाशमें जो शिशुमार (सूँस)-की आकृतिवाला ताराओंका समुदाय देखा जाता है, उसे भगवान् विष्णुका स्वरूप जानना चाहिए। उस शिशुमारचक्रके पुच्छभागमें ध्रुवको स्थिति है। यह ध्रुव स्वयं घूमता हुआ चन्द्रमा और सूर्य आदि ग्रहोंको घुमाता है। भगवान् सूर्यका वह रथ प्रतिमास भिन्न-भिन्न आदित्य-

English

In the middle of a fort, if benefic planets are with stars again, victory to those in the middle; they know defeat for the one arriving.

अध्याय १२८

श्लोक 12

प्रवेशभे प्रवेष्टव्यं निर्गमभे च निर्गमेत् ।भृगुः सौम्यस् तथा भौम ऋक्षान्तं सकलं यदा

praveśabhe praveṣṭavyaṃ nirgamabhe ca nirgamet / bhṛguḥ saumyas tathā bhauma ṛkṣāntaṃ sakalaṃ yadā

हिन्दी अर्थ

सर्प तथा राक्षसोंसे अधिष्ठित होता है। भगवान् सूर्य ही सर्दी, गर्मी तथा जल-वर्षाके कारण हैं। वे ही ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदमय भगवान् विष्णु हैं; वे ही शुभ और अशुभके कारण हैं

English

At the entering star one should enter; at the departing star one should depart. When Venus, Mercury and Mars all reach the end of a star,

अध्याय १२८

श्लोक 13

तदा भङ्गं विजानीयाज्जयमागन्तुकस्य च ।प्रवेशर्क्षचतुष्के तु सङ्ग्रामञ्चारभेद् यदा

tadā bhaṅgaṃ vijānīyājjayamāgantukasya ca / praveśarkṣacatuṣke tu saṅgrāmañcārabhed yadā

हिन्दी अर्थ

चन्द्रमाका रथ तीन पहियॉंसे युक्त है। उस रथके बायें और दायें भागमें कुन्द-कुसुमकी भाँति श्वेत रंगके दस घोड़े जुते हुए हैं। उसी रथके द्वारा वे चन्द्रदेव नक्षत्रलोकमें विचरण करते हैं। तैंतीस हजार तैंतीस सौ तैंतीस (३६३३३)

English

then one should know defeat, and victory for the newcomer. When one begins war in the four stars of entry,

अध्याय १२८

श्लोक 14

तदा सिद्ध्यति तद्दुर्गं न कुर्यात्तत्र विस्मयम्

tadā siddhyati taddurgaṃ na kuryāttatra vismayam //

हिन्दी अर्थ

करते हैं। अमावास्याके दिन 'अमा' नामक एक रश्मि (कला)-में स्थित हुए पितृगण चन्द्रमाकी बची हुई दो कलाओंमेंसे एकमात्र अमृतमयी कलाका पान करते हैं। चन्द्रमाके पुत्र बुधका रथ

English

then that fort is conquered; one should not marvel there.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 128
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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