अध्याय १३६
श्लोक 1
नक्षत्रचक्रं ईश्वर उवाच अथ चक्रं प्रवक्ष्यामि यात्रादौ च फलप्रदम् ।अश्विन्यादौ लिखेच्चक्रं त्रिनाडीपरिभूषितं
nakṣatracakraṃ īśvara uvāca atha cakraṃ pravakṣyāmi yātrādau ca phalapradam / aśvinyādau likheccakraṃ trināḍīparibhūṣitaṃ
हिन्दी अर्थ
२. इस विषयपर भास्कराचार्य अपनी गणिताध्याय' नामक पुस्तकके 'कालमानाध्याय' में लिखते हैं- गुर्वक्षरैः खेन्दुमितैरणुस्तैः षङ्भिः पलं तैर्घटिका खषड्भिः । स्याद्वा घटीषष्टिरहः खरामैर्मासो दिनैस्तैिकुभिश्च वर्षम् “दस गुरु अक्षरोंके उच्चारणमें जितना समय लगता है, उसे एक अणु' कहते हैं और ६ अणुओंका एक 'पल' होता है । ६० पलका १ 'दण्ड', ६० दण्डका १ ' अहोरात्र ३० दिन-रातका एक 'मास' और १२ मासका एक 'वर्ष' होता है।''
English
The illumination (rite) should be done with the repe¬ tition of mantras of the tuft ending with (the syllable) phat. Oblation should be done with the mantras like Om, hrim, oblations to Siva.