अध्याय १३९
श्लोक 1
षष्टिसंवत्सराः ईश्वर उवाच षष्ट्यब्दानां प्रवक्ष्यामि शुभाशुभमतः शृणु ।प्रभवे यज्ञकर्माणि विभवे सुखिनो जनाः
ṣaṣṭisaṃvatsarāḥ īśvara uvāca ṣaṣṭyabdānāṃ pravakṣyāmi śubhāśubhamataḥ śṛṇu / prabhave yajñakarmāṇi vibhave sukhino janāḥ
हिन्दी अर्थ
(अब पञ्च स्वरोंकी उत्पत्ति कह रहे हैं) जिस तरह लकड़ीमें व्यापक अग्निको प्रतीति बिना जलाये नहीं होती है, उसी तरह शरीरमें विद्यमान शिव-शक्तिको प्रतीति ज्ञानके बिना नहीं होती है। महादेवी पार्वती! पहले ३कारस्वरसे विभूषित शक्तिको उत्पत्ति हुई। तत्पश्चात् बिन्दु 'एकार' रूपमें परिणत हुआ। पुनः ओंकारमें
English
Listen! I shall describe the names of sixty years and the good or bad results from them. Sacrificial rites (would be done) in Prabhava. The people would be comfortable in Vibhava.