Agni Purana· Agni Purāṇa
143
अध्याय 143 / 381

Adhyaya 143

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अध्याय १४३

श्लोक 1

कुब्जिकापूजा ईश्वर उवाच कुब्जिकाक्रमपूजाञ्च(१) वक्ष्ये सर्वार्थसाधनीं ।यया जिताः सुरा देवैः शस्त्राद्यैर् आज्यसंयुतैः

kubjikāpūjā īśvara uvāca kubjikākramapūjāñca(1) vakṣye sarvārthasādhanīṃ / yayā jitāḥ surā devaiḥ śastrādyair ājyasaṃyutaiḥ

हिन्दी अर्थ

( सर्पाकार राहुचक्रका फल -- ) मुखवाले सात नक्षत्रोंमें संग्राम करनेसे मरण होता है, स्कन्धवाले सात नक्षत्रॉमें युद्ध करनेसे पराजय होती है, पेटवाले सात नक्षत्रोंमें युद्ध करनेसे सम्मान तथा विजयको प्राप्ति होती है, कटिवाले नक्षत्रॉमें संग्राम करनेसे शत्रुओंका हरण होता है, पुच्छवाले नक्षत्रमें संग्राम करनेसे कीर्ति होती है और राहुसे दृष्ट नक्षत्रमें संग्राम करनेसे मृत्यु होती

English

I shall describe the mode of worship of (goddess) Kub- jika that accomplishes all comforts. (It is only by such worship) the celestials had conquered the demons together with their weapons and kingdom.

अध्याय १४३

श्लोक 2

१ कुब्जिकाचक्रपूजाच्चेति ख॥ , छ॥ च :प् ९५ मायाबीजं च गुह्याङ्गे षट्कमस्त्रं करे न्यसेत् ।काली कालीति हृदयं दुष्टचाण्डालिका शिरः

1 kubjikācakrapūjācceti kha.. , cha.. ca :p 95 māyābījaṃ ca guhyāṅge ṣaṭkamastraṃ kare nyaset / kālī kālīti hṛdayaṃ duṣṭacāṇḍālikā śiraḥ

हिन्दी अर्थ

है। इसके बाद फिर सूर्यसे राहुतक ग्रहोंके बलका वर्णन करूँगा॥ ८--१०॥

English

(The eight goddesses) Brahmni, MaheI, Kauman,

अध्याय १४३

श्लोक 3

ह्रौं स्फें ह स ख क छ ड ॐ कारो भैरवः शिखा ।भेलखी कवचं दूती नेत्राख्या रक्तचण्डिका

hrauṃ spheṃ ha sa kha ka cha ḍa oṃ kāro bhairavaḥ śikhā / bhelakhī kavacaṃ dūtī netrākhyā raktacaṇḍikā

हिन्दी अर्थ

(अर्धयामेशका वर्णन करते हैं --) जैसे चार प्रहरका एक दिन होता है तो एक दिनमें आठ अर्धप्रहर होंगे। यदि दिनमान बत्तीस दण्डका हो तो एक अर्ध प्रहरका मान चार दण्डका होगा। दिनमान-प्रमाणमें आठसे भाग देनेपर जो लब्धि होगी, वही एक अर्धप्रहरका मान होता है। रवि आदि सात वारोंमें प्रत्येक अर्धप्रहरका कौन ग्रह स्वामी होगा-इसपर विचार करते हुए केवल

English

"Haum Sphem Ha Sa Kha Ka Chha Da" — the Om-syllable is Bhairava, the crest. Bhelakhi the armor; the messenger; the eye-called Raktachandika;

अध्याय १४३

श्लोक 4

ततो गुह्यक्रुञ्जिकास्त्रं मण्डले स्थानके यजेत् ।अग्नौ कूर्चशिरो रुद्रे नैरृत्ये ऽथ शिखानिले

tato guhyakruñjikāstraṃ maṇḍale sthānake yajet / agnau kūrcaśiro rudre nairṛtye 'tha śikhānile

हिन्दी अर्थ

रविवारके दिन प्रत्येक अर्धप्रहरके स्वामियोंको बता रहे हैं। जैसे रविवारमें एकसे लेकर आठ अर्धप्रहरोंके स्वामी क्रमशः सूर्य, शुक्र, बुध, सोम, शनि, गुरु, मङ्गल और राहु ग्रह होते हैं। (इनमें

English

then one should worship the secret Kunjika weapon in the mandala-place: in fire the Kurcha-head, in Rudra's, in the southwest the crest in the wind;

अध्याय १४३

श्लोक 5

कवचम्मध्यतो नेत्रं अस्त्रन्दिक्षु च मण्डले ।द्वात्रिंशता कर्णिकायां स्र्ॐहसक्षमलनववषडसचात्ममन्त्रवीजकं

kavacammadhyato netraṃ astrandikṣu ca maṇḍale / dvātriṃśatā karṇikāyāṃ sroṃhasakṣamalanavavaṣaḍasacātmamantravījakaṃ

हिन्दी अर्थ

जिस विभागका स्वामी शनि होता है, वह समय शुभ कार्यामें त्याज्य है और उसे ही 'वारवेला' (विशेष -रविवारके अर्धयामेशोंको देखनेसे यह अनुमान होता है कि रविवारके अतिरिक्त जिस दिनका अर्धयामेश जानना हो तो प्रथम

English

the armor in the middle, the eye, the weapon in the directions in the mandala; in the pericarp with thirty-two the self-mantra seed "Srom Ha Sa Ksha Ma La Na Va Va Sha Da Sa..."

अध्याय १४३

श्लोक 6

ब्रह्माणी चैव माहेशो कौमारी वैष्णवी तथा ।वाराही चैव माहेन्द्री चामुण्डा चण्डिकेन्द्रकात्

brahmāṇī caiva māheśo kaumārī vaiṣṇavī tathā / vārāhī caiva māhendrī cāmuṇḍā caṇḍikendrakāt

हिन्दी अर्थ

अर्धयामेश तो दिनपति ही होगा और बादके अर्धयामोंके स्वामी छः संख्यावाले ग्रह होंगे। इसी आधारपर रविवारसे लेकर शनिवारतकके अर्धयामोंके स्वामी नीचे चक्रमें दिये जा रहे हैं

English

Brahmani, Maheshi, Kaumari, Vaishnavi, Varahi, Mahendri, Chamunda, Chandika from Indra's,

अध्याय १४३

श्लोक 7

यजेद्रवलकसहान् शिवेन्दाग्नियमे ऽद्निपे ।जले तु कुसुममालामद्रिकाणां च पञ्चकं

yajedravalakasahān śivendāgniyame 'dnipe / jale tu kusumamālāmadrikāṇāṃ ca pañcakaṃ

हिन्दी अर्थ

शनि, सूर्य तथा राहुको यत्नसे पीठ पीछे करके जो संग्राम करता है, वह सैन्यसमुदायपर विजय प्राप्त करता है तथा जूआ, मार्ग और युद्धमें सफल होता है (नक्षत्रोंकी स्थिरादि संज्ञा तथा उसका प्रयोजन कहते हैं --) रोहिणी, तीनों उत्तराएँ, मृगशिरा-- इन पाँच नक्षत्रोंकी 'स्थिर' संज्ञा है। अश्विनी,

English

one should worship... in Shiva's, moon's, fire's, Yama's quarters; in the water the five garlands of Matrikas,

अध्याय १४३

श्लोक 8

जालन्धरं पूर्णगिरिं कामरूपं क्रमाद्यजेत् ।मरुदेशाग्निनैरृत्ये मध्ये वै वज्रकुब्जिकां

jālandharaṃ pūrṇagiriṃ kāmarūpaṃ kramādyajet / marudeśāgninairṛtye madhye vai vajrakubjikāṃ

हिन्दी अर्थ

नक्षत्रोंकी 'क्षिप्र' संज्ञा है । इनमें यात्रार्थीको यात्रा करनी चाहिए। अनुराधा, हस्त, मूल, मृगशिरा, पुष्य, पुनर्वसु --इनमें प्रत्येक कार्य हो सकता है। ज्येष्ठा, चित्रा, विशाखा, तीनों पूर्वाएँ, कृत्तिका,

English

Jalandhara, Purnagiri, Kamarupa in order; in Marut, Isha, fire, southwest, in the middle Vajrakubjika;

अध्याय १४३

श्लोक 9

अनादिविमलः पूज्यः सर्वज्ञविमलस्तुतः ।प्रसिद्धविमलश्चाथ संयोगविमलस्तुतः

anādivimalaḥ pūjyaḥ sarvajñavimalastutaḥ / prasiddhavimalaścātha saṃyogavimalastutaḥ

हिन्दी अर्थ

भरणी, मघा, आर्द्रा, आश्लेषा--इनकी 'दारुण' संज्ञा है। स्थिर कार्योमें स्थिर संज्ञावाले नक्षत्रोंको लेना चाहिए। यात्रामें 'क्षिप्र' संज्ञक नक्षत्र उत्तम माने गये हैं। “मृदु' संज्ञक नक्षत्रॉंमें सौभाग्यका काम तथा 'उग्र' संज्ञक नक्षत्रोंमें उग्र काम करना चाहिए। “ दारुण' संज्ञक नक्षत्र दारुण (भयानक) कामके लिये उपयुक्त होते हैं

English

Anadi-vimala is to be worshipped, praised by Sarvajna-vimala; then Prasiddha-vimala, praised by Samyoga-vimala,

अध्याय १४३

श्लोक 10

समयाख्यो ऽथ विमल एतद्विमलपञ्चकं ।मरुदीशाननैरृत्ये वह्नौ चोत्तरशृङ्गके

samayākhyo 'tha vimala etadvimalapañcakaṃ / marudīśānanairṛtye vahnau cottaraśṛṅgake

हिन्दी अर्थ

(अब अधोमुख, तिर्यङ्मुख आदि नक्षत्रोंका नाम तथा प्रयोजन कहता हूँ-) कृत्तिका,

English

then Samaya-vimala — these five Vimalas; in the northwest, northeast, southwest, fire, and on the northern peak;

अध्याय १४३

श्लोक 11

कुब्जार्थं खिंखिनी षष्ठा सोपन्ना सुस्थिरा तथा ।रत्नसुन्दरी चैशाने शृङ्गे चाष्टादिनाथकाः

kubjārthaṃ khiṃkhinī ṣaṣṭhā sopannā susthirā tathā / ratnasundarī caiśāne śṛṅge cāṣṭādināthakāḥ

हिन्दी अर्थ

पूर्वाएँ-ये अधोमुख नक्षत्र हैं। इनमें अधोमुख कर्म करना चाहिए। उदाहरणार्थं कूप, तड़ाग, विद्याकर्म, चिकित्सा, स्थापन, नौका-निर्माण, कूपोंका विधान, गड्ढा खोदना आदि कार्य इन्हीं अधोमुख नक्षत्रोंमें करना चाहिए। रेवती, अश्विनी,

English

for Kubja, Khinkhini the sixth, Sopanna, Susthira, and Ratnasundari in Ishana; on the peak the eight lords;

अध्याय १४३

श्लोक 12

मित्र ओडीशषष्ठ्याख्यौ वर्षा अग्न्यम्बुपे ऽनिले ।भवेद्गगनरत्नं स्याच्चाप्ये कवचरत्नकं

mitra oḍīśaṣaṣṭhyākhyau varṣā agnyambupe 'nile / bhavedgaganaratnaṃ syāccāpye kavacaratnakaṃ

हिन्दी अर्थ

ज्येष्ठ--ये नौ नक्षत्र तिर्यङ्मुख हैं। इनमें राज्याभिषेक, हाथी तथा घोड़ेको पट्टा बाँधना, बाग लगाना, गृह तथा प्रासादका निर्माण, प्राकार बनाना, क्षेत्र, तोरण, ध्वजा, पताका लगाना-इन सभी कार्योको

English

Mitra, Odisha, Shashthya, Varsha in fire, water, wind; there is Gaganaratna; in the west Kavacharatna;

अध्याय १४३

श्लोक 13

ब्रुं मर्त्यः पञ्चनामाख्यो(१) मरुदीशानवह्निगः ।याम्याग्नेये पञ्चरत्नं ज्येष्ठा रौद्री तथान्तिका

bruṃ martyaḥ pañcanāmākhyo(1) marudīśānavahnigaḥ / yāmyāgneye pañcaratnaṃ jyeṣṭhā raudrī tathāntikā

हिन्दी अर्थ

करना चाहिए। रविवारको द्वादशी, सोमवारको एकादशी, मङ्गलवारको दशमी, बुधवारको तृतीया, बृहस्पतिवारको षष्टी, शुक्रबारको द्वितीया, शनिवारको सप्तमी हो तो 'दग्धयोग' होता है (अब त्रिपुष्कर योग बतलाते हैं--) द्वितीया,

English

"Brum" — a mortal, called the five names, in the wind, Ishana, fire; the five jewels in south and southeast: Jyeshtha, Raudri and Antika;

अध्याय १४३

श्लोक 14

तिस्रो ह्य् आसां महावृद्धाः पञ्चप्रणवतो ऽखिलाः ।सप्तविंशत्यष्टविंशभेदात् सम्पूजनं द्विधा

tisro hy āsāṃ mahāvṛddhāḥ pañcapraṇavato 'khilāḥ / saptaviṃśatyaṣṭaviṃśabhedāt sampūjanaṃ dvidhā

हिन्दी अर्थ

शनि-तीन वारये छः 'त्रिपुष्कर' हैं तथा विशाखा, कृत्तिका, दोनों उत्तराएँ, पुनर्वसु, पूर्वाभाद्रपदा-ये छः नक्षत्र भी 'त्रिपुष्कर' हैं। अर्थात् रवि, शनि, मङ्गलवारोंमें द्वितीया, सप्तमी,

English

these three of them are the great old ones; all with five Oms; by difference of twenty-seven and twenty-eight the worship is twofold:

अध्याय १४३

श्लोक 15

ॐ ऐं गूं क्रमगणपतिं प्रणवं वटुकं यजेत् ।चतुरस्रे मण्डले च दक्षिणे गणपं यजेत्

oṃ aiṃ gūṃ kramagaṇapatiṃ praṇavaṃ vaṭukaṃ yajet / caturasre maṇḍale ca dakṣiṇe gaṇapaṃ yajet

हिन्दी अर्थ

द्वादशीमेंसे कोई तिथि हो तथा उपर्युक्त नक्षत्रोंमेंसे कोई नक्षत्र हो तो 'त्रिपुष्कर-योग' होता है। त्रिपुष्कर योगमें लाभ, हानि, विजय, वृद्धि, पुत्रजन्म, वस्तुओंका नष्ट एवं विनष्ट होना-ये सब त्रिगुणित हो जाते हैं

English

"Om Aim Gum" — one should worship Kramaganapati, Om, Vatuka; in a square mandala on the right Ganapa one should worship,

अध्याय १४३

श्लोक 16

वामे च वटुकं कोणे गुरून् सोडशनाथकान् ।वायव्यादौ चाष्ट दश प्रतिषट्कोणके ततः

vāme ca vaṭukaṃ koṇe gurūn soḍaśanāthakān / vāyavyādau cāṣṭa daśa pratiṣaṭkoṇake tataḥ

हिन्दी अर्थ

(अब नक्षत्रोंकी स्वक्ष, मध्याक्ष, मन्दाक्ष और अन्धाक्ष संज्ञा तथा प्रयोजन कहते हैं-) अश्विनी, भरणी, आश्लेषा, पुष्य, स्वाती, विशाखा, श्रवण, पुनर्वसु ये दृढ़ नेत्रवाले नक्षत्र हैं और दसों

English

on the left Vatuka, in the corner the teachers, sixteen lords; in the northwest and the rest eighteen, at each hexagon corner then;

अध्याय १४३

श्लोक 17

ब्रह्माद्याश्चाष्ट परितस्तन्मध्ये च नवात्मकः ।कुब्जिका कुलटा चैव क्रमपूजा तु सर्वदा

brahmādyāścāṣṭa paritastanmadhye ca navātmakaḥ / kubjikā kulaṭā caiva kramapūjā tu sarvadā

हिन्दी अर्थ

प्रत्येक दिनकी अर्धयामेश-संख्या आठ है तथा दिनपति रविसे लेकर शनितक सात ही हैं। अतः आठवें अर्धयामको ग्रन्थान्तरोंमें “निरीश' माना गया है। जैसे

English

eight Brahmas around, in the middle nine-natured; Kubjika and Kulata — the order of worship always.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 143
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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