अध्याय १४५
श्लोक 1
मालिनीनानामन्त्राः ईश्वर उवाच नानामन्त्रान् प्रवक्ष्यामि षोढान्यासपुरःसरम् ।न्यासस्त्रिधा तु षोढा स्युः शाक्तशाम्भवयामलाः
mālinīnānāmantrāḥ īśvara uvāca nānāmantrān pravakṣyāmi ṣoḍhānyāsapuraḥsaram / nyāsastridhā tu ṣoḍhā syuḥ śāktaśāmbhavayāmalāḥ
हिन्दी अर्थ
आये, दिशाओंमें दाहका अनुभव होता हो, केतु अर्थात् पुच्छल तारा दिखायी पड़ता हो, रक्तवृष्टि हो, अधिक गर्मीका अनुभव हो, पत्थर पड़े, तो जनतामें नेत्रका रोग, अतिसार (हैजा) और अग्निभय होता है। गायें दूध कम कर देती हैं। वृक्षोंमें फल-पुष्प कम लगते हैं। उपज कम होती है। वर्षा भी स्वल्प होती है। चारों वर्ण
English
Bhavodbhava, Sarvabhuta, Sarvabhutasukhaprada (Grantcr of felicity to all), Sarvasannidhyakft, (all pervasive) arc worshipped by Brahma, Visnu and Rudra.