Agni Purana· Agni Purāṇa
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अध्याय 162 / 381

Adhyaya 162

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अध्याय १६२

श्लोक 1

धर्मशास्त्रकथनं पुष्कर उवाच मनुर्विष्णुर्याज्ञवल्को हारीतो ऽत्रिर्यमो ऽङिगिराः ।वसिष्ठदक्षसंवर्तशातातपपराशराः

dharmaśāstrakathanaṃ puṣkara uvāca manurviṣṇuryājñavalko hārīto 'triryamo 'ṅigirāḥ / vasiṣṭhadakṣasaṃvartaśātātapaparāśarāḥ

हिन्दी अर्थ

मनुका नाम उत्तम हुआ; उनके पुत्र अज आदि थे। उनके समयमें सुशान्ति नामक इन्द्र, सुधामा आदि देवता तथा वसिष्ठके पुत्र सप्तर्षि थे। चौथे

English

A period of four months during which an ascetic has to stay at the same place.

अध्याय १६२

श्लोक 2

आपस्तम्बोशनोव्यासाः कात्ययनबृहस्पती ।गोतमः शङ्खलिखितौ धर्ममेते यथाब्रुवन्

āpastambośanovyāsāḥ kātyayanabṛhaspatī / gotamaḥ śaṅkhalikhitau dharmamete yathābruvan

हिन्दी अर्थ

मनु तामस नामसे विख्यात हुए; उस समय स्वरूप आदि देवता, शिखरी इन्द्र, ज्योतिहोम आदि ब्राह्मण (सप्तर्षि) थे तथा उनके ख्याति आदि नौ पुत्र हुए॥ १--५॥ रैवत नामक पाँचवें मन्वन्तरमें वितथ इन्दर, अमिताभ देवता, हिरण्यरोमा आदि मुनि तथा बलबन्ध आदि पुत्र थे। छठे चाक्षुष मन्वन्तरमें मनोजव नामक इन्द्र और स्वाति आदि देवता थे।

English

Apastamba, Ushanas, Vyasa, Katyayana, Brihaspati, Gautama, Shankha and Likhita — as these spoke dharma,

अध्याय १६२

श्लोक 3

तथा वक्ष्ये समासेन भुक्तिमुक्तिप्रदं शृणु ।प्रवृत्तञ्च निवृत्तञ्च द्विविधङ्कर्म वैदिकं

tathā vakṣye samāsena bhuktimuktipradaṃ śṛṇu / pravṛttañca nivṛttañca dvividhaṅkarma vaidikaṃ

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात् सातवें मन्वन्तरमें सूर्यपुत्र श्राद्धदेव मनु हुए। इनके समयमें आदित्य, वसु तथा रुद्र आदि

English

so I shall tell briefly, giving enjoyment and liberation; hear. Vedic action is twofold: engaged and withdrawn;

अध्याय १६२

श्लोक 4

काम्यं कर्म प्रवृत्तं स्यान्निवृत्तं ज्ञानपूर्वकं ।वेदाभ्यासस्तपो ज्ञानमिन्दियाणाञ्च संयमः

kāmyaṃ karma pravṛttaṃ syānnivṛttaṃ jñānapūrvakaṃ / vedābhyāsastapo jñānamindiyāṇāñca saṃyamaḥ

हिन्दी अर्थ

सप्तर्षि हँ। यह वर्तमान मन्वन्तरका वर्णन है। वैवस्वत मनुके इक्ष्वाकु आदि पुत्र थे। इन सभी मन्वन्तरोंमें भगवान् श्रीहरिके अंशावतार हुए हैं। स्वायम्भुव मन्वन्तरमें भगवान् “मानस' के नामसे प्रकट हुए थे। तदनन्तर शेष छः मन्वन्तरोंमें क्रमशः अजित, सत्य, हरि, देववर, वैकुण्ठ और वामन रूपमें श्रीहरिका प्रादुर्भाव हुआ। छायाके गर्भसे उत्पन्न सूर्यनन्दन सावर्णि आठवें मनु होंगे

English

desire-based action is engaged; withdrawn is preceded by knowledge. Study of the Veda, austerity, knowledge, restraint of the senses,

अध्याय १६२

श्लोक 5

अहिंसा गुरुसेवा च निःश्रेयसकरं परं ।सर्वेषामपि चैतेषामत्मज्ञानं परं स्मृतं

ahiṃsā gurusevā ca niḥśreyasakaraṃ paraṃ / sarveṣāmapi caiteṣāmatmajñānaṃ paraṃ smṛtaṃ

हिन्दी अर्थ

वे अपने पूर्वज (ज्येष्ठ भ्राता) श्राद्धदेवके समान वर्णवाले हैं, इसलिये 'सावर्णि' नामसे विख्यात होंगे। उनके समयमें सुतपा आदि देवता,

English

non-violence and service of the teacher bring the supreme good. Of all these, knowledge of the Self is declared supreme;

अध्याय १६२

श्लोक 6

तच्चग्र्यं सर्वविद्यानां प्राप्यते ह्य् अमृतं ततः ।सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि

taccagryaṃ sarvavidyānāṃ prāpyate hy amṛtaṃ tataḥ / sarvabhūteṣu cātmānaṃ sarvabhūtāni cātmani

हिन्दी अर्थ

और विरज आदि मनृपुत्र होंगे। नवें मनुका नाम दक्षसावर्णि होगा। उस समय पार आदि देवता होंगे। उन देवताओंके इन्द्रकी ' आद्भुत' संज्ञा होगी। उनके समयमें सवन आदि श्रेष्ठ ब्राह्मण सप्तर्षि होंगे और ' धृतकेतु' आदि मनृपुत्र। तत्पश्चात् दसवें मनु ब्रह्मसावर्णिके नामसे प्रसिद्ध होंगे। उस समय सुख आदि देवगण, शान्ति इन्द्र, हविष्य आदि मुनि तथा सुक्षेत्र आदि मनृपुत्र होंगे॥ १२--१५॥

English

that is foremost of all knowledges; from it immortality is attained. Seeing the Self in all beings and all beings in the Self,

अध्याय १६२

श्लोक 7

समम्पश्यन्नात्मयाजी स्वाराज्यमधिगच्छति ।आत्मज्ञाने समे च स्याद्वेदाभ्यासे च यत्नवान्

samampaśyannātmayājī svārājyamadhigacchati / ātmajñāne same ca syādvedābhyāse ca yatnavān

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर धर्मसावर्णि नामक ग्यारहवें मनुका अधिकार होगा। उस समय विहङ्ग आदि देवता, गण इन्द्र, निश्चर आदि मुनि तथा सर्वत्रग आदि मनृपुत्र होंगे। इसके बाद बारहवें मनु रुद्रसावर्णिके

English

equal-minded, the self-sacrificer attains self-rule. In knowledge of the Self and evenness and in study of the Veda one should be diligent;

अध्याय १६२

श्लोक 8

एतद्द्विजन्मसामर्थ्यं(१) ब्राह्मणस्य विशेषतः ।१ एतद्द्विजन्मसाग्र्यमिति ख॥ , ङ॥ , झ॥ , ञ॥ , ट॥ च ।एतद्द्विजन्मसामग्रीति घ।:प् १४८ वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो यत्र तत्राश्रमे वसन्

etaddvijanmasāmarthyaṃ(1) brāhmaṇasya viśeṣataḥ / 1 etaddvijanmasāgryamiti kha.. , ṅa.. , jha.. , ña.. , ṭa.. ca / etaddvijanmasāmagrīti gha. :p 148 vedaśāstrārthatattvajño yatra tatrāśrame vasan

हिन्दी अर्थ

नामसे विख्यात होंगे। उनके समयमें ऋतधामा नामक इन्द्र और हरित आदि देवता होंगे। तपस्य आदि सप्तर्षि और देववान् आदि मनृपुत्र होंगे। तेरहवें मनुका नाम होगा रौच्य। उस समय सूत्रामणि आदि देवता तथा दिवस्पति इन्द्र होंगे, जो दानव-हैत्य आदिका मर्दन करनेवाले होंगे। रौच्य मन्वन्तरमें निर्मोह आदि सप्तर्षि तथा चित्रसेन आदि मनृपुत्र होंगे। चौदहवें मनु भौत्यके

English

this is the capacity of the twice-born, especially of a Brahmin. Knowing the truth of Veda and scripture, living in whatever stage,

अध्याय १६२

श्लोक 9

इहैव लोके तिष्ठन् हि ब्रह्मभूयाय कल्प्यते(१) ।स्वाध्यायानामुपाकर्म श्रावण्यां श्रावणेन तु

ihaiva loke tiṣṭhan hi brahmabhūyāya kalpyate(1) / svādhyāyānāmupākarma śrāvaṇyāṃ śrāvaṇena tu

हिन्दी अर्थ

नामसे प्रसिद्ध होंगे। उनके समयमें शुचि इन्द्र, चाक्षुष आदि देवता तथा अग्निबाह आदि सप्तर्षि होंगे। चौदहवें मनुके पुत्र ऊरु आदिके नामसे

English

staying in this very world he becomes fit for becoming Brahman. The opening of Vedic study is on the full moon of Shravana, with Shravana;

अध्याय १६२

श्लोक 10

हस्ते चौषधिवारे च पञ्चम्यां श्रावणस्य वा ।पौषमासस्य रोहिण्यामष्टकायामथापि वा

haste cauṣadhivāre ca pañcamyāṃ śrāvaṇasya vā / pauṣamāsasya rohiṇyāmaṣṭakāyāmathāpi vā

हिन्दी अर्थ

सप्तर्षि द्विजगण भूमण्डलपर वेदोंका प्रचार करते हैं, देवगण यज्ञ-भागके भोक्ता होते हैं तथा मनृपुत्र इस पृथ्वीका पालन करते हैं। ब्रह्मन्! ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मनु होते हैं। मनु, प्रत्येक द्वापरके अन्तमें व्यासरूपधारी श्रीहरि वेदका विभाग करते हैं। आदि वेद एक ही था, जिसमें चार चरण और एक लाख ऋचाएँ थीं। पहले एक ही यजुर्वेद था, उसे मुनिवर व्यासजीने

English

in Hasta, on the day of herbs, or on the fifth of Shravana; or in Pausha on Rohini, or on Ashtaka,

अध्याय १६२

श्लोक 11

जलान्ते छन्दसाङ्कुर्यादुत्सर्गं विधिवद्वहिः ।त्र्यहं प्रेतेष्वनध्यायः शिष्यर्त्विग्गुरुबन्धुषु

jalānte chandasāṅkuryādutsargaṃ vidhivadvahiḥ / tryahaṃ preteṣvanadhyāyaḥ śiṣyartviggurubandhuṣu

हिन्दी अर्थ

चार भागोंमें विभक्त कर दिया। उन्होंने अध्वर्युका काम यजुर्भागसे, होताका कार्य ऋग्वेदकी ऋचाओंसे, उद्गाताका कर्म साम-मन्त्रोंसे तथा ब्रह्माका कार्य अथर्ववेदके मन्त्रोंसे होना निश्चित किया। व्यासके

English

at the water's edge one should do the closing of the meters outside by rule. For three days no study for the dead — disciples, priests, teachers, kin;

अध्याय १६२

श्लोक 12

उपाकर्मणि चोत्सर्गं स्वशाखाश्रोत्रिये तथा(२) ।सन्ध्यागर्जितनिर्घाते भूकम्पोल्कानिपातने

upākarmaṇi cotsargaṃ svaśākhāśrotriye tathā(2) / sandhyāgarjitanirghāte bhūkampolkānipātane

हिन्दी अर्थ

प्रथम शिष्य पैल थे, जो ऋग्वेदके पारंगत पण्डित हुए इन्द्रने प्रमति और बाष्कलको संहिता प्रदान की। बाष्कलने भी बौध्य आदिको चार भागोंमें विभक्त अपनी संहिता दी। व्यासजीके शिष्य परम बुद्धिमान् वैशम्पायनने यजुर्वेदरूप वृक्षको सत्ताईस

English

at the opening and closing, and for a Shrotriya of one's own branch; in the roar of twilight, a thunderclap, earthquake, falling meteor,

अध्याय १६२

श्लोक 13

समाप्य वेदं ह्य् अनिशमारण्यकमधीत्य च ।पञ्चदश्यां चतुर्दश्यामष्टम्यां राहुसूतके

samāpya vedaṃ hy aniśamāraṇyakamadhītya ca / pañcadaśyāṃ caturdaśyāmaṣṭamyāṃ rāhusūtake

हिन्दी अर्थ

शाखाएँ निर्माण कीं। काण्व और वाजसनेय आदि शाखाओंको याज्ञवल्क्य आदिने सम्पादित किया है। व्यास-शिष्य जैमिनिने सामवेदरूपी वृक्षकी शाखाएँ बनायीं। फिर सुमन्तु और सुकर्माने एक-

English

having completed the Veda and read the Aranyaka continuously, on the fifteenth, fourteenth, eighth, at Rahu's birth,

अध्याय १६२

श्लोक 14

ऋतुसन्धिषु भुक्त्वा वा श्राद्विकं प्रतिगृह्य च ।पशुमण्डूकनकुलश्वाहिमार्जारशूकरैः(३)

ṛtusandhiṣu bhuktvā vā śrādvikaṃ pratigṛhya ca / paśumaṇḍūkanakulaśvāhimārjāraśūkaraiḥ(3)

हिन्दी अर्थ

एक संहिता रची। सुकर्माने अपने गुरुसे एक हजार संहिताओंको ग्रहण किया। व्यास-शिष्य सुमन्तुने अथर्ववेदकी भी एक शाखा बनायी तथा उन्होंने पैप्पल आदि अपने सहस्रों शिष्योंको उसका अध्ययन कराया। भगवान् व्यासदेवजीको कृपासे सूतने पुराण-संहिताका विस्तार किया

English

at the junctures of seasons, after eating or accepting ancestral-rite food; between animals, frogs, mongooses, dogs, snakes, cats and boars,

अध्याय १६२

श्लोक 15

कृतेन्तरे त्वहोरात्रं शक्रपाते तथोच्छ्रिये ।श्वक्रोष्टुगर्धभोलूकमासवाणर्तुनिस्वने

kṛtentare tvahorātraṃ śakrapāte tathocchriye / śvakroṣṭugardhabholūkamāsavāṇartunisvane

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्नेय महापृराणमें “मन्वन्तरोका वर्णन” नामक एक सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

for a day and night, at the fall of Indra's banner, at the sound of a dog, jackal, ass, owl, ...

अध्याय १६२

श्लोक 16

अमेध्यशवशूद्रान्त्यश्मशानपतितान्तिके ।अशुभासु च तारासु विद्युत्स्तनितसम्प्लवे

amedhyaśavaśūdrāntyaśmaśānapatitāntike / aśubhāsu ca tārāsu vidyutstanitasamplave

हिन्दी अर्थ

वर्ण और आश्रमके सामान्य धर्म, वर्णों तथा विलोमज जातियोंके विशेष धर्म अग्निदेव कहते हैं--मनु आदि राजर्षि जिन धर्मोका अनुष्ठान करके भोग और मोक्ष प्राप्त कर चुके हैं, उनका वरुण देवताने पुष्करको उपदेश किया था और पुष्करने श्रीपरशुरामजीसे उनका

English

near the impure, a corpse, a Shudra, outcaste, cremation ground and fallen persons; under inauspicious stars; in a flood of lightning and thunder;

अध्याय १६२

श्लोक 17

भुत्क्वार्द्रपाणिरम्भोन्तरर्धरात्रे ऽतिमारुते ।पांशुवर्षे दिशान्दाहे सन्ध्यानीहारभीतिषु

bhutkvārdrapāṇirambhontarardharātre 'timārute / pāṃśuvarṣe diśāndāhe sandhyānīhārabhītiṣu

हिन्दी अर्थ

पुष्करने कहा--परशुरामजी ! मैं वर्ण, आश्रम तथा इनसे भिन्न धर्मोका आपसे वर्णन करूँगा। वे धर्म सब कामनाओंको देनेवाले हैं। मनु आदि धर्मात्माओंने भी उनका उपदेश किया है

English

after eating, with wet hands, in the water, at midnight, in a great wind, rain of dust, burning of directions, in twilight, fog and fear,

अध्याय १६२

श्लोक 18

धावतः प्राणिबाधे च विशिष्टे गृहमागते ।१ ब्रह्मचर्याय कल्प्यते इति ङ॥ २ स्वशाखाश्रोत्रिये मृते इति घ॥ , झ॥ , ञ॥ , ट च ३ शशमार्जारशूकरैर् इति ङ॥ :प् १४९ खरोष्ट्रयानहस्त्यश्वनौकावृक्षादिरोहणे

dhāvataḥ prāṇibādhe ca viśiṣṭe gṛhamāgate / 1 brahmacaryāya kalpyate iti ṅa.. 2 svaśākhāśrotriye mṛte iti gha.. , jha.. , ña.. , ṭa ca 3 śaśamārjāraśūkarair iti ṅa.. :p 149 kharoṣṭrayānahastyaśvanaukāvṛkṣādirohaṇe

हिन्दी अर्थ

तथा वे भगवान् वासुदेव आदिको संतोष प्रदान करनेवाले हैं। भृगुश्रेष्ठ! अहिंसा, सत्य- भाषण, दया, सम्पूर्ण प्राणियोंपर अनुग्रह, तीर्थांका अनुसरण, दान, ब्रह्मचर्य, मत्सरताका अभाव, देवता, गुरु और ब्राह्मणोंकी सेवा, सब धर्मोंका श्रवण, पितरोंका पूजन, मनुष्योंके स्वामी श्रीभगवानूमें सदा भक्ति रखना, उत्तम शास्त्रोंका अवलोकन करना, क्रूरताका अभाव, सहनशीलता तथा

English

for one running, in harm to creatures, when a distinguished guest comes, on climbing an ass, camel, vehicle, elephant, horse, boat or tree —

अध्याय १६२

श्लोक 19

सप्तत्रिंशदनध्यायानेतांस्तात्कालिकान्विदुः

saptatriṃśadanadhyāyānetāṃstātkālikānviduḥ //

हिन्दी अर्थ

आस्तिकता (ईश्वर और परलोकपर विश्वास रखना)-ये वर्ण और आश्रम दोनोंके लिये “सामान्य धर्म' बताये गये हैं। जो इसके विपरीत है, वही 'अधर्म' है। यज्ञ करना और कराना,

English

thirty-seven non-study occasions, these are the temporary ones, they know.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 162
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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