Agni Purana· Agni Purāṇa
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अध्याय 170 / 381

Adhyaya 170

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अध्याय १७०

श्लोक 1

प्रायश्चित्तानि पुष्कर उवाच महापापानुयुक्तानां(१) प्रायश्चित्तानि(२) वच्मिते ।संवत्सरेण पतति पतितेन सहाचरन्

prāyaścittāni puṣkara uvāca mahāpāpānuyuktānāṃ(1) prāyaścittāni(2) vacmite / saṃvatsareṇa patati patitena sahācaran

हिन्दी अर्थ

कर्मको '“प्रवृत्तकर्म' कहते हैं। ज्ञानपूर्वक निष्कामभावसे जो कर्म किया जाता है, उसका नाम 'निवृत्तकर्म' है। वेदाभ्यास, तप, ज्ञान, इन्द्रियसंयम, अहिंसा तथा गुरुसेवा-ये परम

English

I shall describe the expiations (to be practised) by those who associate with major sinners. A man having asso¬ ciated with a degraded person for a year would himself be degraded.

अध्याय १७०

श्लोक 2

याजनाद्ध्यापनाद्यौनान्न तु यानाशनासनात् ।यो येन पतितेनैषां संसर्गं याति मानवः

yājanāddhyāpanādyaunānna tu yānāśanāsanāt / yo yena patitenaiṣāṃ saṃsargaṃ yāti mānavaḥ

हिन्दी अर्थ

उत्तम कर्म निःश्रेयस (मोक्षरूप कल्याण)-के साधक हैं। इन सबमें भी आत्मज्ञान सबसे उत्तम बताया गया है॥ १--५॥ वह सम्पूर्ण विद्याओंमें श्रेष्ठ है । उससे अमृतत्वको प्राप्ति होती है। सम्पूर्ण भूतोंमें आत्माको और आत्मामें सम्पूर्ण भूतोंको समानभावसे देखते हुए

English

Those eligible to have the same rice-ball offering.

अध्याय १७०

श्लोक 3

स तस्यैव व्रतं कुर्यात्तत्संसर्गस्य शुद्धये ।पतितस्योदकं कार्यं सपिण्डैर् बान्धवैः सह

sa tasyaiva vrataṃ kuryāttatsaṃsargasya śuddhaye / patitasyodakaṃ kāryaṃ sapiṇḍair bāndhavaiḥ saha

हिन्दी अर्थ

जो आत्माका ही यजन (आराधन) करता है, वह स्वाराज्य-अर्थात् मोक्षको प्राप्त होता है। आत्मज्ञान तथा शम (मनोनिग्रह)-के लिये सदा यत्नशील रहना चाहिए। यह सामर्थ्यं या अधिकार

English

One gets free (from the sin) of accepting a gift from a vile person by repeating the sSvitri {mantra) for three thousand times and drinking milk at the cow-shed for a month.

अध्याय १७०

श्लोक 4

निन्दिते ऽहनि सायाह्णे ज्ञात्यृत्विग् गुरुसन्निधौ ।दासो घटमपां पूर्णं पर्यस्येत् प्रेतवत्पदा(३)

nindite 'hani sāyāhṇe jñātyṛtvig gurusannidhau / dāso ghaṭamapāṃ pūrṇaṃ paryasyet pretavatpadā(3)

हिन्दी अर्थ

द्विजमात्रको-विशेषत: ब्राह्मणको प्राप्त है। जो वेद-शास्त्रके अर्थका तत्त्वज्ञ होकर जिस-किसी भी आश्रममें निवास करता है, वह इसी लोकमें रहते हुए ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है। (यदि नया अन्न तैयार हो गया हो तो) आवण मासको पूर्णिमाको अथवा श्रवणनक्षत्रसे युक्त दिनको अथवा हस्तनक्षत्रसे युक्त श्रावण शुक्ला पञ्चमीको अपनी शाखाके अनुकूल प्रचलित गृह्यसूत्रकी

English

For having forsaken a person who had sought refuge and having violated the Veda a brahmin gets rid of that sin by taking limited food for a month.

अध्याय १७०

श्लोक 5

अहोरात्रमुपासीतन्नशौचं बान्धवैः सह ।निवर्तयेरंस्तस्मात्तु ज्येष्ठांशम्भाषणादिके

ahorātramupāsītannaśaucaṃ bāndhavaiḥ saha / nivartayeraṃstasmāttu jyeṣṭhāṃśambhāṣaṇādike

हिन्दी अर्थ

विधिके अनुसार वेदोंका नियमपूर्वक अध्ययन प्रारम्भ करे। यदि श्रावणमासमें नयी फसल तैयार न हो तो जब वह तैयार हो जाय तभी भाद्रपदमासमें श्रवणनक्षत्रयुक्त दिनको वेदोंका

English

Consists of taking urine or dung or milk or curd or butter of a cow or the kuSa immersed water and fasting for a night.

अध्याय १७०

श्लोक 6

ज्येष्ठांशम्प्राप्नुयाच्चास्य यवीयान् गुणतो ऽधिकः ।१ महापापोपपन्नानामिति ङ॥ २ प्रायश्चित्तं वदामि त इति झ॥ ३ प्रेतवत् सदेति ख॥ , ग॥ , घ॥ , ङ॥ च :प् १७५ प्रायश्चित्ते तु चरिते पूर्णं कुम्भमपां नवं

jyeṣṭhāṃśamprāpnuyāccāsya yavīyān guṇato 'dhikaḥ / 1 mahāpāpopapannānāmiti ṅa.. 2 prāyaścittaṃ vadāmi ta iti jha.. 3 pretavat sadeti kha.. , ga.. , gha.. , ṅa.. ca :p 175 prāyaścitte tu carite pūrṇaṃ kumbhamapāṃ navaṃ

हिन्दी अर्थ

उपाकर्म करे। (और उस समयसे लेकर लगातार साढ़े चार मासतक वेदोंका अध्ययन चालू रखे।) फिर पौषमासमें रोहिणीनक्षत्रके दिन अथवा अष्टका तिथिको नगर या गाँवके बाहर जलके समीप अपने गृह्योक्त विधानसे वेदाध्ययनका उत्सर्ग (त्याग) करे। (यदि भाद्रपदमासमें

English

The observance marking the completion of one's study.

अध्याय १७०

श्लोक 7

तेनैव सार्धं प्राश्येयुः स्नात्वा पुण्यजलाशये ।एवमेव विधिं कुर्युर्योषित्सु पपितास्वपि

tenaiva sārdhaṃ prāśyeyuḥ snātvā puṇyajalāśaye / evameva vidhiṃ kuryuryoṣitsu papitāsvapi

हिन्दी अर्थ

प्रतिपदाको उत्सर्जन करना चाहिए --ऐसा मनुका (४। ९७) कथन है ।) ॥ ६--१० ३ ॥

English

A kind of severe penance to be finished in 12 nights.

अध्याय १७०

श्लोक 8

वस्त्रान्नपानन्देयन्तु वसेयुश् च गृहान्तिके ।तेषां द्विजानां सावित्री नानूद्येत(१) यथाविधि

vastrānnapānandeyantu vaseyuś ca gṛhāntike / teṣāṃ dvijānāṃ sāvitrī nānūdyeta(1) yathāvidhi

हिन्दी अर्थ

शिष्य, ऋत्विज्, गुरु और बन्धुजन--इनकी चाहिए। उपाकर्म (वेदाध्ययनका प्रारम्भ) और उत्सर्जन (अध्ययनकी समाप्ति) जिस दिन हो, उससे तीन दिनतक अध्ययन बंद रखना चाहिए। अपनी शाखाका अध्ययन करनेवाले विद्वान्की

English

Eating for nine days the quantity of water one can hold in the band and fasting for three days. But compare the e]q>lanation given in the next chter.

अध्याय १७०

श्लोक 9

तांश्चारयित्वा त्रीन् कृछ्रान् यथाविध्युपनाययेत् ।विकर्मस्थाः परित्यक्तास्तेषां मप्येतदादिशेत्

tāṃścārayitvā trīn kṛchrān yathāvidhyupanāyayet / vikarmasthāḥ parityaktāsteṣāṃ mapyetadādiśet

हिन्दी अर्थ

उचित है। संध्याकालमें, मेघकी गर्जना होनेपर, आकाशमें उत्पात-सूचक शब्द होनेपर, भूकम्प और उल्कापात होनेपर, मन्त्र-ब्राह्यणात्मक वेदकी समाप्ति होनेपर तथा आरण्यकका अध्ययन करनेपर

English

Fasting for twelve days.

अध्याय १७०

श्लोक 10

जपित्वा त्रीणि सावित्र्याः सहस्त्राणि समाहितः ।मासङ्गोष्ठे पयः पीत्वा मुच्यते ऽसत्प्रतिग्रहात्

japitvā trīṇi sāvitryāḥ sahastrāṇi samāhitaḥ / māsaṅgoṣṭhe payaḥ pītvā mucyate 'satpratigrahāt

हिन्दी अर्थ

चाहिए। पूर्णिमा, चतुर्दशी, अष्टमी तथा चन्द्रग्रहण- सूर्यग्रहणके दिन भी एक दिन-रातका अनध्याय रखना उचित है। दो ऋतुओंकी संधिमें आयी हुई प्रतिपदा तिथिको तथा श्राद्ध-भोजन एवं श्राद्धका प्रतिग्रह स्वीकार करनेपर भी एक दिन-रात अध्ययन बंद रखे। यदि स्वाध्याय करनेवालोंके बीचमें कोई पशु, मेढक, नेवला, कुत्ता, सर्प,

English

A woman in her courses touched by another woman in her courses belonging to the same caste no doubt gets purified by bathing that day itself.

अध्याय १७०

श्लोक 11

ब्रात्यानां याजनं कृत्वा परेषामन्त्यकर्म च ।अभिचारमहीनानान्त्रिभिः कृच्छैर् व्यपोहति(२)

brātyānāṃ yājanaṃ kṛtvā pareṣāmantyakarma ca / abhicāramahīnānāntribhiḥ kṛcchair vyapohati(2)

हिन्दी अर्थ

बिलाव और चूहा आ जाय तो एक दिन-रातका अनध्याय होता है॥ ११--१४॥

English

A woman in her courses having been touched by a

अध्याय १७०

श्लोक 12

शरणागतं परित्यज्य वेदं विप्लाव्य च द्विजः ।संवत्सं यताहारस्तत्पापमपसेधति

śaraṇāgataṃ parityajya vedaṃ viplāvya ca dvijaḥ / saṃvatsaṃ yatāhārastatpāpamapasedhati

हिन्दी अर्थ

जब इन्द्रध्वजको पताका उतारी जाय, उस भी पूरे दिन-रातका अनध्याय होना चाहिए।

English

Drinking milk, ghee or water heated once every dtreedays.

अध्याय १७०

श्लोक 13

श्वशृगालखरैर् दष्टो ग्राम्यैः क्रव्याद्भिरेव च ।नरोष्ट्राश्वैर् वराहैश् च(३) प्राणायामेन शुद्ध्यति

śvaśṛgālakharair daṣṭo grāmyaiḥ kravyādbhireva ca / naroṣṭrāśvair varāhaiś ca(3) prāṇāyāmena śuddhyati

हिन्दी अर्थ

आर्त प्राणीका शब्द सुनायी देनेपर, अपवित्र वस्तु,

English

A man having discharged urine passing through a road and drinking water forgetfully becomes pure after fasting a day and night and by taking the five products got from a cow.

अध्याय १७०

श्लोक 14

स्नातकव्रतलोपे च कर्मत्यागे ह्य् अभोजनं ।हुङ्कारं(४) ब्राह्मणस्योक्त्वा त्वङ्करञ्च गरीयसः

snātakavratalope ca karmatyāge hy abhojanaṃ / huṅkāraṃ(4) brāhmaṇasyoktvā tvaṅkarañca garīyasaḥ

हिन्दी अर्थ

इनका सांनिध्य होनेपर, अशुभ ताराओंमें, बारंबार तात्कालिक अनध्याय होता है। भोजन करके तथा गीले हाथ अध्ययन न करे। जलके भीतर, आधी रातके समय, अधिक आँधी चलनेपर भी अध्ययन बंद कर देना चाहिए। धूलकी वर्षा होनेपर,

English

A brahmin having discharged urine and eaten for¬ getfully without having cleansed himself becomes pure after drinking barley (water) for three nights.

अध्याय १७०

श्लोक 15

स्नात्वानश्नन्नहःशेषमभिवाद्य प्रसादयेत् ।अवगूर्य चरेक्षच्छ्रमतिकृच्छ्रन्निपातने

snātvānaśnannahaḥśeṣamabhivādya prasādayet / avagūrya carekṣacchramatikṛcchrannipātane

हिन्दी अर्थ

दिशाओंमें दाह होनेपर, दोनों संध्याओंके समय कुहासा पड्नेपर, चोर या राजा आदिका भय प्राप्त होनेपर तत्काल स्वाध्याय बंद कर देना चाहिए। दौड़ते समय अध्ययन न करे। किसी प्राणीपर

English

One whose face comes into contact with the sandal or impure thing, the means of purification for him are the earth, cow-dung or the five things got from a cow.

अध्याय १७०

श्लोक 16

कृच्छ्रातिकृच्छ्रं कुर्वीत विप्रस्योत्पाद्य शोणितं ।१ न युज्येतेति ख॥ २ कृच्छ्रैर् विशुद्ध्यति इति ग॥ , घ॥ , ङ॥ च ३ नरोष्टविड्वराहैश्चेति ङ॥ ४ क्रूङ्कारमिति ख॥ , घ॥ , छ॥ च ।ओङ्कारमिति ग॥ , ङ॥ च ।हङ्कारञ्चेति ख॥ :प् १७६ चाण्डालादिरविज्ञातो यस्य तिष्ठेत वेश्मनि

kṛcchrātikṛcchraṃ kurvīta viprasyotpādya śoṇitaṃ / 1 na yujyeteti kha.. 2 kṛcchrair viśuddhyati iti ga.. , gha.. , ṅa.. ca 3 naroṣṭaviḍvarāhaiśceti ṅa.. 4 krūṅkāramiti kha.. , gha.. , cha.. ca / oṅkāramiti ga.. , ṅa.. ca / haṅkārañceti kha.. :p 176 cāṇḍālādiravijñāto yasya tiṣṭheta veśmani

हिन्दी अर्थ

श्रेष्ठ पुरुषके पधारनेपर भी अनध्याय रखना उचित है। गदहा, ऊँट, रथ आदि सवारी, हाथी, घोड़ा, नौका तथा वृक्ष आदिपर चढ़नेके समय और ऊसर या मरुभूमिमें स्थित होकर भी अध्ययन बंद रखना चाहिए। इन सैंतीस प्रकारके अनध्यायोंको तात्कालिक (केवल उसी समयके लिये आवश्यक) माना गया है

English

A brahmin who had shaved or sold or wears blue colour¬ ed cloth etc. for the purpose of austerity becomes pure by (doing) three krcchras.

अध्याय १७०

श्लोक 17

सम्यग् ज्ञातस्तु कालेन तस्य कुर्वीत शोधनं ।चान्द्रायणं पराकं वा द्विजानान्तु विशोधनं

samyag jñātastu kālena tasya kurvīta śodhanaṃ / cāndrāyaṇaṃ parākaṃ vā dvijānāntu viśodhanaṃ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्नेय महापृराणमें 'धर्मशास्त्रका वर्णन” नामक एक सौ बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

A woman in her courses having been touched by a low caste or a cantata becomes pure on the fourth day. She has to observe (a vow for) three nights.

अध्याय १७०

श्लोक 18

प्राजापत्यन्तु शूद्राणां शेषन्तदनुसारतः ।गुंडङ्कुसुम्भं लवणं तथा धान्यानि यानि च

prājāpatyantu śūdrāṇāṃ śeṣantadanusārataḥ / guṃḍaṅkusumbhaṃ lavaṇaṃ tathā dhānyāni yāni ca

हिन्दी अर्थ

श्राद्धकल्पका वर्णन पुष्कर कहते हैं परशुराम! अब मैं भोग श्राद्धकर्ता पुरुष मन और इऱ्द्रियोंको वशमें और मोक्ष प्रदान करनेवाले श्राद्धकल्पका वर्णन रखकर, पवित्र हो, श्राद्धसे एक दिन पहले करता हुँ, सावधान होकर श्रवण कीजिये। ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। उन ब्राह्मणोंको भी मनुजीका कथन है-' युक्तश्छन्दांस्यधीयीत मासान् विप्रोऽर्धपञ्चमान्।' (मनु० ४। ९५)

English

One who has touched a canddla or Svapaca or the dis¬ charge from a delivered woman or a dead body or a person who has touched it (dead body) becomes pure immediately after bathing.

अध्याय १७०

श्लोक 19

कृत्वा गृहे ततो द्वारि तेषान्दद्याद्धुताशनं ।मृणमयानान्तु भाण्डानां त्याग एव विधीयते

kṛtvā gṛhe tato dvāri teṣāndadyāddhutāśanaṃ / mṛṇamayānāntu bhāṇḍānāṃ tyāga eva vidhīyate

हिन्दी अर्थ

उसी समयसे मन, वाणी, शरीर तथा क्रियाद्वारा पूर्ण संयमशील रहना चाहिए। श्राद्धके दिन अपराहृकालमें आये हुए ब्राह्मणोंका स्वागतपूर्वक पूजन करे। स्वयं हाथमें कुशकी पवित्री धारण

English

A kind of simple expiation.

अध्याय १७०

श्लोक 20

द्रव्याणां परिशेषाणां द्रव्यशुद्धिर्विधीयते ।कूपैकपानसक्ता ये स्पर्शात्सङ्कल्पदूषिताः(१)

dravyāṇāṃ pariśeṣāṇāṃ dravyaśuddhirvidhīyate / kūpaikapānasaktā ye sparśātsaṅkalpadūṣitāḥ(1)

हिन्दी अर्थ

किये रहे। जब ब्राह्मणलोग आचमन कर लें, तब उन्हें आसनपर बिठाये। देवकार्यमें अपनी शक्तिके और श्राद्धमें अयुग्म (एक, तीन, पाँच आदि संख्यावाले) ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। सब ओरसे घिरे हुए गोबर आदिसे लिपे-पुते पवित्र स्थानमें, जहाँ दक्षिण दिशाकी ओर भूमि कुछ

English

See note 2 on

अध्याय १७०

श्लोक 21

शुद्ध्येयुरुपवासेन पञ्चगव्येन वाप्यथ ।यस्तु संस्पृश्य चण्डालमश्नीयाच्च स्वकामतः

śuddhyeyurupavāsena pañcagavyena vāpyatha / yastu saṃspṛśya caṇḍālamaśnīyācca svakāmataḥ

हिन्दी अर्थ

नीची हो, श्राद्ध करना चाहिए। वैश्वदेव- श्राद्धमें दो ब्राह्मणोंको पूर्वाभिमुख बिठाये और पितृकार्यमें तीन ब्राह्मणोंको उत्तराभिमुख। अथवा दोनोमें

English

Rite performed immediately after the birth of a child.

अध्याय १७०

श्लोक 22

द्विजश्चान्द्रायणं कुर्यात्तप्तकृच्छ्रमथापि वा ।भाण्डसङ्कलसङ्कीर्णश्चाण्डालादिजुगुप्सितैः

dvijaścāndrāyaṇaṃ kuryāttaptakṛcchramathāpi vā / bhāṇḍasaṅkalasaṅkīrṇaścāṇḍālādijugupsitaiḥ

हिन्दी अर्थ

कुशयुक्त ब्राह्मणके हाथमें या कुशापर गिरा दे। तत्पश्चात् हाथ धोनेके लिये जल देकर क्रमशः अर्पण करे। पुनः हस्त-शुद्धिके लिये जल दे। (विश्वेदेवोंको जो कुछ भी देना हो, वह सव्यभावसे उत्तराभिमुख होकर दे और पितरोंको प्रत्येक वस्तु अपसव्यभावसे दक्षिणाभिमुख होकर देनी

English

A twice-born should perform Chandrayana or Taptakrichchhra, if mixed with vessels contaminated by Chandalas and the despised;

अध्याय १७०

श्लोक 23

भुक्त्वापीत्वा तथा तेषां षड्रात्रेण विशुद्ध्यति ।अन्त्यानां भुक्तशेषन्तु भक्षयित्वा द्विजातयः

bhuktvāpītvā tathā teṣāṃ ṣaḍrātreṇa viśuddhyati / antyānāṃ bhuktaśeṣantu bhakṣayitvā dvijātayaḥ

हिन्दी अर्थ

वैश्वदेव-काण्डके अनन्तर यज्ञोपवीत अपसव्य करके पिता आदि तीनों पितरोंके लिये तीन द्विगुणभुग्न कुशोंको उनके आसनके लिये अप्रदक्षिण-क्रमसे दे। फिर पूर्ववत् ब्राह्मणोंको

English

having eaten and drunk with them he is purified in six nights. Having eaten the leavings of low-caste people, the twice-born

अध्याय १७०

श्लोक 24

व्रतं चान्द्रायणं कुर्युस्त्रिरात्रं शूद्र एव तु ।चण्डालकूपभाण्डेषु अज्ञानात्पिवते जलं

vrataṃ cāndrāyaṇaṃ kuryustrirātraṃ śūdra eva tu / caṇḍālakūpabhāṇḍeṣu ajñānātpivate jalaṃ

हिन्दी अर्थ

आज्ञा लेकर ' उशन्तस्त्वा०' (यजु० १९।७०) इत्यादि मन्त्रसे पितरोंका आवाहन करके, आयन्तु एक-एक ब्राह्मणको ही सम्मिलित करे। मातामहोंके नः०' (यजु० १९।५८) इत्यादिका जप करे।

English

should perform the Chandrayana vow; a Shudra three nights. One who unknowingly drinks water from a Chandala's well or vessel,

अध्याय १७०

श्लोक 25

द्विजः शान्तपनं कुर्याच्छूद्रश्चोपवसेद्दिनं ।चण्डालेन तु संस्पृष्टो(२) यस्त्वपः पिवते द्विजः

dvijaḥ śāntapanaṃ kuryācchūdraścopavaseddinaṃ / caṇḍālena tu saṃspṛṣṭo(2) yastvapaḥ pivate dvijaḥ

हिन्दी अर्थ

श्राद्धमे भी ऐसा ही करना चाहिए। अर्थात् दो वैश्वदेव-श्राद्धमें और तीन मातामहादि-श्राद्धमें अथवा उभय पक्षमें एक-ही-एक ब्राह्मण रखे। वैश्वदेव-्द्धके लिये ब्राह्मणका हाथ धुलानेके

English

a twice-born should do Shantapana; a Shudra should fast a day. A twice-born who drinks water touched by a Chandala

अध्याय १७०

श्लोक 26

त्रिरात्रन्तेन कर्तव्यं शूद्रश्चोपवसेद्दिनं ।उच्छिष्टेन यदि(३) स्पृष्टः शुना शूद्रेण वा द्विजः

trirātrantena kartavyaṃ śūdraścopavaseddinaṃ / ucchiṣṭena yadi(3) spṛṣṭaḥ śunā śūdreṇa vā dvijaḥ

हिन्दी अर्थ

निमित्त उसके हाथमें जल दे और आसनके लिये कुश दे। फिर ब्राह्मणसे पूछे-- मैं बिश्वेदेवोंका आवाहन करना चाहता हूँ।' तब ब्राह्मण आज्ञा दें-' आवाहन करो।' इस प्रकार उनकी आज्ञा पाकर 'विश्वेदेबास आगत०' (यजु० ७। ३४) इत्यादि ऋचा पढ़कर विश्वेदेवोंका आवाहन करे। तब ब्राह्मणके समीपकी भूमिपर जौ बिखेरे। फिर पवित्रीयुक्त अर्घ्यपात्रमें “शं नो देवी०' (यजु०

English

should do three nights; a Shudra fast a day. If a twice-born is touched by leavings, a dog or a Shudra,

अध्याय १७०

श्लोक 27

१ स्पर्शसङ्कल्पभूषिता इति झ॥ २ संसृष्ट इति क॥ ३ यदेति ख॥ , ग॥ , घ॥ , ङ॥ , छ॥ च :प् १७७ उपोष्य रजनीमेकां पञ्चगव्येन शुद्ध्यति ।वैश्येन क्षत्रियेणैव स्नानं नक्तं समाचरेत्

1 sparśasaṅkalpabhūṣitā iti jha.. 2 saṃsṛṣṭa iti ka.. 3 yadeti kha.. , ga.. , gha.. , ṅa.. , cha.. ca :p 177 upoṣya rajanīmekāṃ pañcagavyena śuddhyati / vaiśyena kṣatriyeṇaiva snānaṃ naktaṃ samācaret

हिन्दी अर्थ

३६। १२)--इस मन्त्रसे जल छोड़े। 'यवो5सि० '-- इत्यादिसे जौ डाले। फिर बिना मन्त्रके ही गन्ध

English

having fasted one night he is purified by the five cow-products. By Vaishya and Kshatriya a bath at night should be done.

अध्याय १७०

श्लोक 28

अध्वानं प्रस्थितो विप्रः कान्तारे यद्यनूदके ।पक्वान्नेन गृहीतेन मूत्रोच्चारङ्करोति वै

adhvānaṃ prasthito vipraḥ kāntāre yadyanūdake / pakvānnena gṛhītena mūtroccāraṅkaroti vai

हिन्दी अर्थ

आपः०' इस मन्त्रसे अर्घ्यको अभिमन्त्रित करके ब्राह्मणके हाथमें संकल्पपूर्वक अर्घ्य दे और कहे-' अमुकश्राद्धे विश्वेदेवाः इदं वो हस्तार्घ्य नमः।' यों कहकर वह अर्घ्यजल २।२।८)'—यह मन्त्र पढ़कर सब ओर तिल बिखेरे। वैश्वदेवश्राद्धमें जो कार्य जौसे किया जाता है, वही पितृ-श्राद्धमें तिलसे करना चाहिए। अर्घ्य आदि पूर्ववत् करे । संस्रव (ब्राह्मणके हाथसे

English

A Brahmin on a journey in a waterless wilderness, who relieves himself carrying cooked food in hand,

अध्याय १७०

श्लोक 29

अनिधायैव तद्द्रव्यं अङ्गे कृत्वा तु संस्थितं ।शौचं कृत्वान्नमभ्युक्ष्य अर्कस्याग्नेयश् च दर्शयेत्

anidhāyaiva taddravyaṃ aṅge kṛtvā tu saṃsthitaṃ / śaucaṃ kṛtvānnamabhyukṣya arkasyāgneyaś ca darśayet

हिन्दी अर्थ

चूये हुए जल) पितृपात्रमें ग्रहण करके, भूमिपर दक्षिणाग्र कुश रखकर, उसके ऊपर उस पात्रको अधोमुख करके ढुलका दे और कहे - पितृभ्यः स्थानमसि।' फिर उसके ऊपर अर्घ्यपात्र और

English

without putting the thing down, having kept it on the body, having done cleansing, sprinkling the food, should show it to the sun and fire.

अध्याय १७०

श्लोक 30

म्लेच्छैर् गतानां चौरैर् वा कान्तारे वा प्रवासिनां ।भक्ष्याभक्ष्यविशुद्ध्यर्थं(१) तेषां वक्ष्यामिनिष्कृतिं

mlecchair gatānāṃ caurair vā kāntāre vā pravāsināṃ / bhakṣyābhakṣyaviśuddhyarthaṃ(1) teṣāṃ vakṣyāminiṣkṛtiṃ

हिन्दी अर्थ

पवित्र आदि रखकर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप आदि पितरोंको निवेदित करे। इसके बाद ' अग्नौकरण ' कर्म करे। घीसे तर किया हुआ अन्न लेकर ब्राह्मणोंसे पूछे -' अग्नौ करिष्ये।' (मैं अग्निमें इसकी आहुति दूँगा।) तब ब्राह्मण इसके लिये आज्ञा दें। इस प्रकार आज्ञा लेकर पितृ-यज्ञकी भाँति उस अन्नकी दो आहुति दे। उस समय ये

English

For those gone with barbarians or thieves, or travelers in wilderness, I shall tell their atonement for purification of edible and inedible:

अध्याय १७०

श्लोक 31

पुनः प्राप्य स्वदेशञ्च वर्णानामनुपूर्वशः ।कृच्छ्रस्यान्ते ब्राह्मणस्तु पुनः संस्कारमर्हति

punaḥ prāpya svadeśañca varṇānāmanupūrvaśaḥ / kṛcchrasyānte brāhmaṇastu punaḥ saṃskāramarhati

हिन्दी अर्थ

(यजु० २। २९) फिर होमशेष अन्नको एकाग्रचित्त

English

having returned to their country, of the castes in order: after Krichchhra the Brahmin deserves the sacrament again;

अध्याय १७०

श्लोक 32

पादोनान्ते क्षत्रियश् च अर्धान्ते वैश्य एव च ।पादं कृत्वा तथा शूद्रो दानं दत्वा विशुद्ध्यति

pādonānte kṣatriyaś ca ardhānte vaiśya eva ca / pādaṃ kṛtvā tathā śūdro dānaṃ datvā viśuddhyati

हिन्दी अर्थ

होकर यथाप्राप्त पात्रोमेँ --विशेषतः चाँदीके पात्रोंमें परोसे। इस प्रकार अन्न परोसकर, “पृथिवी ते पढ़कर पात्रको अभिमन्त्रित करे। फिर “इदं विष्णु:० ' (यजु० ५। १५) इत्यादि मन्त्रका उच्चारण करके अन्नमें ब्राह्मणके अँगूठेका स्पर्श कराये।

English

at a quarter less, the Kshatriya; at a half the Vaishya; having done a quarter, the Shudra is purified by giving gifts.

अध्याय १७०

श्लोक 33

उदक्या तु सवर्णा या स्पृष्टा चेत् स्यादुदक्यया ।तस्मिन्नेवाहनि स्नाता शुद्धिमाप्नोत्यसंशयं

udakyā tu savarṇā yā spṛṣṭā cet syādudakyayā / tasminnevāhani snātā śuddhimāpnotyasaṃśayaṃ

हिन्दी अर्थ

तीन ऋचाओंका जप करे और ब्राह्मणोंसे कहे-- “आप सुखपूर्वक अन्न ग्रहण करें।' फिर वे ब्राह्मण भी मौन होकर प्रसन्नतापूर्वक भोजन करें। (उस समय यजमान क्रोध और उतावलीको

English

A menstruating woman of the same caste touched by a menstruating woman, bathed the same day, attains purity without doubt.

अध्याय १७०

श्लोक 34

रजस्वला तु नाश्नीयात् संस्पृष्टा हीनवर्णया ।यावन्न शुद्धिमाप्नोति शुद्धस्नानेन शुद्ध्यति

rajasvalā tu nāśnīyāt saṃspṛṣṭā hīnavarṇayā / yāvanna śuddhimāpnoti śuddhasnānena śuddhyati

हिन्दी अर्थ

न हो जाये, तबतक पूछ-पूछकर प्रिय अन्न और या पाठ करते रहना चाहिए। तत्पश्चात् अन्न लेकर ब्राह्मणोंसे पूछे --' क्या आप पूर्ण तृप्त हो

English

A menstruating woman should not eat if touched by one of lower caste; until she attains purity she is purified by pure bathing.

अध्याय १७०

श्लोक 35

मूत्रं कृत्वा व्रजन्वर्त्म स्मृतिभ्रंशाज्जलं पिवेत् ।अहोरात्रोषितो भूत्वा पञ्चगव्येन शुद्ध्यति

mūtraṃ kṛtvā vrajanvartma smṛtibhraṃśājjalaṃ pivet / ahorātroṣito bhūtvā pañcagavyena śuddhyati

हिन्दी अर्थ

यजमान फिर पूछे 'शेष अन्नका क्या किया जाय ?' ब्राह्मण कहें-'इष्टजनोंके साथ भोजन करो।' उनको इस आज्ञाको 'बहुत अच्छा' कहकर स्वीकार करे। फिर हाथमें लिये हुए

English

Having urinated and walked the road, if from lapse of memory one drinks water, having fasted a day and night he is purified by the five cow-products.

अध्याय १७०

श्लोक 36

मूत्रोच्चारं द्विजः कृत्वा अकृत्वा शौचमात्मनः ।मोहाद्भुक्त्वा(२) त्रिरात्रन्तु यवान् पीत्वा विशुद्ध्यति

mūtroccāraṃ dvijaḥ kṛtvā akṛtvā śaucamātmanaḥ / mohādbhuktvā(2) trirātrantu yavān pītvā viśuddhyati

हिन्दी अर्थ

अन्नको ब्राह्मणोंके आगे उनकी जूठनके पास ही दक्षिणाग्र-कुश भूमिपर रखकर उन कुशोंपर तिल-जल छोड़कर रख दे। उस समय ' अग्निदग्धाश्च ये०' इत्यादि मन्त्रका पाठ करे। फिर ब्राह्मणोंके हाथमें कुल्ला करनेके लिये एक- एक बार जल दे। फिर पिण्डके लिये तैयार किया हुआ सारा अन्न लेकर, दक्षिणाभिमुख हो, पितृयज्ञ-कल्पके अनुसार तिलसहित पिण्डदान

English

A twice-born who has urinated without cleaning himself and eaten through delusion is purified by drinking barley for three nights.

अध्याय १७०

श्लोक 37

ये प्रत्यवसिता विप्राः प्रव्रज्यादिबलात्तथा ।१ भक्ष्यभोज्यविशुद्ध्यर्थमिति झ॥ २ लोभाद्भुक्त्वेति ख॥ , ग॥ , घ॥ , ङ॥ , छ॥ च :प् १७८ अनाशकनिवृताश् च तेषां शुद्धिः प्रचक्ष्यते

ye pratyavasitā viprāḥ pravrajyādibalāttathā / 1 bhakṣyabhojyaviśuddhyarthamiti jha.. 2 lobhādbhuktveti kha.. , ga.. , gha.. , ṅa.. , cha.. ca :p 178 anāśakanivṛtāś ca teṣāṃ śuddhiḥ pracakṣyate

हिन्दी अर्थ

करे। इसी प्रकार मातामह आदिके लिये पिण्ड दे। फिर ब्राह्मणोंके आचमनार्थ जल दे। तदनन्तर ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराये और उनके हाथमें

English

Brahmins who have returned after taking renunciation or by force and those returned from fasting — their purification is declared:

अध्याय १७०

श्लोक 38

चारयेत्त्रीणि कृच्छ्राणि चान्द्रायणमथापि वा ।जातकर्मादिसंस्कारैः संस्कुर्यात्तं तथा पुनः

cārayettrīṇi kṛcchrāṇi cāndrāyaṇamathāpi vā / jātakarmādisaṃskāraiḥ saṃskuryāttaṃ tathā punaḥ

हिन्दी अर्थ

जल देकर उनसे प्रार्थनापूर्वक कहे --'' आपलोग अस्तु' बोलें। इसके बाद उन्हें यथाशक्ति दक्षिणा देकर कहे-' अब मैं स्वधा-वाचन कराऊँगा।' ब्राह्मण कहें-'स्वधा-वाचन कराओ।' इस प्रकार उनकी आज्ञा पाकर “पितरों और मातामहादिके

English

one should perform three Krichchhras or Chandrayana, and one should be re-sanctified by birth-rite and other sacraments.

अध्याय १७०

श्लोक 39

उपानहममेध्यं च यस्य संस्पृशते मुखं ।मृत्तिकागोमयौ तत्र पञ्चगव्यञ्च शोधनं

upānahamamedhyaṃ ca yasya saṃspṛśate mukhaṃ / mṛttikāgomayau tatra pañcagavyañca śodhanaṃ

हिन्दी अर्थ

लिये आप यह स्वधा-वाचन करें'-एऐसा कहे। तब ब्राह्मण बोलें-' अस्तु स्वधा।' इसके अनन्तर पृथ्वीपप जल सींचे और "विश्वेदेवाः प्रीयन्ताम्।'- यों कहे । ब्राह्मण भी इस वाक्यको

English

One whose sandal or impure thing touches the mouth: clay, cow-dung and the five cow-products purify.

अध्याय १७०

श्लोक 40

वापनं विक्रयञ्चैव नीलवस्त्रादिधारणं ।तपनीयं हि विप्रस्य त्रिभिः कृछ्रैर् विशुद्ध्यति

vāpanaṃ vikrayañcaiva nīlavastrādidhāraṇaṃ / tapanīyaṃ hi viprasya tribhiḥ kṛchrair viśuddhyati

हिन्दी अर्थ

दुहरायें--' प्रीयन्तां विश्वेदेवाः '। तदनन्तर ब्राह्मणोंकी आज्ञासे श्राद्धकर्ता निम्नाङ्कित मन्त्रका जप करे- श्रद्धा कम न हो और हमारे पास दानके लिये

English

Shaving, selling, wearing blue cloth and the like — for a Brahmin these are purified by three Krichchhras.

अध्याय १७०

श्लोक 41

अन्त्यजातिश्वपाकेन(१) संस्पृष्टा स्त्री रजस्वला ।चतुर्थे ऽहनि शुद्धा सा त्रिरात्रं तत्र आचरेत्(२)

antyajātiśvapākena(1) saṃspṛṣṭā strī rajasvalā / caturthe 'hani śuddhā sā trirātraṃ tatra ācaret(2)

हिन्दी अर्थ

--यह कहकर ब्राह्मणोंसे नम्रतापूर्वक प्रियवचन बोले और उन्हें प्रणाम करके विसर्जन करे- “बाजे वाजे०' (यजु० ९। १८) इत्यादि ऋचाओंको पढ़कर प्रसन्नतापूर्वक पितरोंका विसर्जन करे।

English

A menstruating woman touched by an outcaste or dog-cooker is pure on the fourth day; she should observe three nights.

अध्याय १७०

श्लोक 42

चाण्डालश्वपचौ स्पृष्ट्वा तथा पूयञ्च सूतिकां ।शवं तत्स्पर्शिनं स्पृष्ट्वा(३) सद्यः स्नानेन शुद्ध्यति

cāṇḍālaśvapacau spṛṣṭvā tathā pūyañca sūtikāṃ / śavaṃ tatsparśinaṃ spṛṣṭvā(3) sadyaḥ snānena śuddhyati

हिन्दी अर्थ

पहले पितरोंका, फिर विश्वेदेवोंका विसर्जन करना चाहिए। पहले जिस अर्घ्यपात्रमें संस्रबका जल डाला गया था, उस पितृ-पात्रको उतान करके ब्राह्मणोंको बिदा करना चाहिए। ग्रामको सीमातक ब्राह्मणोंके पीछे-पीछे जाकर, उनके कहनेपर उनकी परिक्रमा करके लौटे और पितृसेवित श्राद्धान्नको इष्टजनोंके साथ भोजन करे। उस रात्रिमें यजमान और ब्राह्मण -दोनोंको

English

Having touched Chandala, Shvapacha, pus, a woman in childbirth, a corpse or one who touched it, one is purified at once by bathing.

अध्याय १७०

श्लोक 43

नारं स्पृष्ट्वास्थि सस्नेहं स्नात्वा विप्रो विशुद्ध्यति ।रथ्यार्कद्दमतोयेन अधीनाभेर्मृदोदकैः

nāraṃ spṛṣṭvāsthi sasnehaṃ snātvā vipro viśuddhyati / rathyārkaddamatoyena adhīnābhermṛdodakaiḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मचारी रहना चाहिए॥ ६--२२॥

English

A Brahmin having touched a human bone with grease is purified by bathing; with water from the road, arka, durva, and with clay and water from low ground,

अध्याय १७०

श्लोक 44

वान्तो विविक्तः स्नात्वा तु घृतं प्राश्य विशुद्ध्यति ।स्नानात् क्षुरकर्मकर्ता कृच्छ्रकृद्ग्रहणे ऽन्नभुक्

vānto viviktaḥ snātvā tu ghṛtaṃ prāśya viśuddhyati / snānāt kṣurakarmakartā kṛcchrakṛdgrahaṇe 'nnabhuk

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार पुत्रजन्म और विवाहादि वृद्धिके अवसरोंपर प्रदक्षिणावृत्तिसे नान्दीमुख-पितरोंका यजन करे। दही और बेर मिले हुए अन्नका पिण्ड दे और तिलसे किये जानेवाले सब कार्य जौसे करे। एकोदिष्टश्राद्ध बिना वैश्वदेवके होता है। उसमें एक ही अर्घ्यपात्र तथा एक ही पवित्रक दिया जाता है। इसमें आवाहन और अग्नौकरणकी क्रिया नहीँ होती। सब कार्य

English

having vomited, in private, having bathed, one is purified by eating ghee. The barber after bathing; one who does Krichchhra eats in an eclipse;

अध्याय १७०

श्लोक 45

अपाङ्क्तेयाशी गव्याशी शुना दष्टस् तथा शुचिः ।कृमिदष्टश्चात्मघाती कृच्छ्राज्जप्याच्च होमतः

apāṅkteyāśī gavyāśī śunā daṣṭas tathā śuciḥ / kṛmidaṣṭaścātmaghātī kṛcchrājjapyācca homataḥ

हिन्दी अर्थ

जनेऊको अपसव्य रखकर किये जाते हैं। ' अक्षय्यमस्तु' के स्थानमें 'उपतिष्ठताम्' का प्रयोग करे। “बाजे वाजे०' इस मन्त्रसे ब्राह्मणका विसर्जन करते समय ' अभिरम्यताम्।' कहे और

English

eating with the outcast row, eating cow-products, bitten by a dog likewise pure; bitten by a worm, a suicide: by Krichchhra, repetition and oblation,

अध्याय १७०

श्लोक 46

होमाद्यैश्चानुतापेन पूयन्ते पापिनो ऽखिलाः(४)

homādyaiścānutāpena pūyante pāpino 'khilāḥ(4)

हिन्दी अर्थ

सपिण्डीकरण- श्राद्धमे पूर्वोक्त विधिसे अर्घ्यसिद्धिके लिये गन्ध, जल और तिलसे युक्त चार अर्घ्यपात्र तैयार करे। (इनमेंसे तीन तो पितरोंके पात्र हैं और एक प्रेतका पात्र होता है।) इनमें प्रेतके पात्रका जल पितरोंके पात्रोंमें डाले। उस समय “ये समाना० ' इत्यादि दो मन्त्रोंका उच्चारण करे । शेष क्रिया पूर्ववत् करे। यह सपिण्डीकरण और एकोहद्दिष्टश्राद्ध माताके लिये भी करना चाहिए।

English

by oblation and the rest and repentance all sinners are purified.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 170
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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