अध्याय १७२
श्लोक 1
सर्वपापप्रायश्चित्तानि पुष्कर उवाच परदारपरद्रव्यजीवहिंसादिके यदा ।प्रवर्तते नृणां चित्तं प्रायश्चित्तं स्तुतिस्तदा
sarvapāpaprāyaścittāni puṣkara uvāca paradāraparadravyajīvahiṃsādike yadā / pravartate nṛṇāṃ cittaṃ prāyaścittaṃ stutistadā
हिन्दी अर्थ
स्थानोंमें स्थित हों, वह पुरुष उस ग्रहकी उस समय विशेष यत्नपूर्वक पूजा करे । ब्रह्माजीने इन ग्रहोंको वर दिया है कि जो तुम्हारी पूजा करें, उनकी तुम भी पूजा (मनोरथपूर्तिपूर्वक सम्मान) करना। राजाओंके धन और जातिका उत्कर्ष तथा जगतूकी जन्म-मृत्यु भी ग्रहोंके ही अधीन है; अतः ग्रह सभीके लिये पूजनीय हैं॥ १--१४॥
English
When the minds of men indulge in (coveting) other's wives or other's property or in doing harm (to others) the expiation for that is the extollation (of the god).