Agni Purana· Agni Purāṇa
190
अध्याय 190 / 381

Adhyaya 190

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अध्याय १९०

श्लोक 1

अखण्डद्वादशीव्रतं अग्निर् उवाच अखण्डद्वादशीं वक्ष्ये व्रतसम्पूर्णताकृतं ।मार्गशीर्षे सिते विष्णुं द्वादश्यां समुपोषितः

akhaṇḍadvādaśīvrataṃ agnir uvāca akhaṇḍadvādaśīṃ vakṣye vratasampūrṇatākṛtaṃ / mārgaśīrṣe site viṣṇuṃ dvādaśyāṃ samupoṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

षष्ठी तिथिके व्रत

English

They are Trikuta, Sisira, Patahga, Rucaka and Nisada. See Vi. P. II.ii.27.

अध्याय १९०

श्लोक 2

पञ्चगव्यजले स्नातो यजेत्तत्प्राशनो व्रती ।यवव्रीहियुतम्पात्रन्द्वादश्यां हि द्विजे ऽर्पयेत्

pañcagavyajale snāto yajettatprāśano vratī / yavavrīhiyutampātrandvādaśyāṃ hi dvije 'rpayet

हिन्दी अर्थ

अग्निदेव कहते हैं-- अब मैं षष्ठी-सम्बन्धी हैं। भाद्रपदके कृष्णपक्षकी षष्ठी तिथिमें ' अक्षयषष्ठी ब्रतोंको कहता हूँ। कार्तिके कृष्णपक्षकी घष्ठीको व्रत' करना चाहिए। इसे मार्गशीर्षमें भी करना फलमात्रका भोजन करके कार्तिकेयके लिये चाहिए। इस अक्षयषष्ठीके दिन किसी भी एक अर्घ्यदान करना चाहिए। इससे मनुष्य भोग और वर्ष निराहार रहनेसे मानव भोग और मोक्ष प्राप्त मोक्ष प्राप्त करता है। इसे 'स्कन्दषष्ठी-व्रत' कहते कर लेता है

English

They arc Sikhivasa, Vaidurya, Kapila, Gandhamadana and JS- rudlii. See Vi.P. II.ii.28.

अध्याय १९०

श्लोक 3

सप्तजन्मनि यत् किञ्चिन्मया खण्डं व्रतं कृतं ।भगवंस्त्वत्प्रसादेन तदखण्डमिहास्तु मे

saptajanmani yat kiñcinmayā khaṇḍaṃ vrataṃ kṛtaṃ / bhagavaṃstvatprasādena tadakhaṇḍamihāstu me

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्नेय महापृराणमें “षष्ठीके व्रतोका वर्णन” नामक एक सौ इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

"Whatever vow of mine in seven births was broken, O Lord, by your grace let it be unbroken here.

अध्याय १९०

श्लोक 4

यथाखण्डं जगत् सर्वं त्वमेव पुरुषोत्तम ।तथाखिलान्यखण्डानि व्रतानि मम सन्तु वै

yathākhaṇḍaṃ jagat sarvaṃ tvameva puruṣottama / tathākhilānyakhaṇḍāni vratāni mama santu vai

हिन्दी अर्थ

सप्तमी तिथिके व्रत अग्निदेव कहते हैं--वसिष्ठ! अब मैं निराहार रहकर सूर्यदेवका पूजन करनेसे सारे सप्तमी तिथिके व्रत कहूँगा। यह सबको भोग पापोंका विनाश होता है

English

As this whole world is unbroken in you alone, Purushottama, so may all my vows be unbroken."

अध्याय १९०

श्लोक 5

एवमेवानुमासञ्च चातुर्मास्यो विधिः स्मृतः ।अन्यच्चैत्रादिमासेषु शक्तुपात्राणि(१) चार्पयेत्

evamevānumāsañca cāturmāsyo vidhiḥ smṛtaḥ / anyaccaitrādimāseṣu śaktupātrāṇi(1) cārpayet

हिन्दी अर्थ

और मोक्ष प्रदान करनेवाला है। माघ मासके माघके कृष्णपक्षमें 'सर्वाप्ति-सप्तमी 'का व्रत शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथिको (अष्टदल अथवा करना चाहिए। इससे सभी अभीष्ट वस्तुओंको द्वादशदल) कमलका निर्माण करके उसमें भगवान् प्राप्ति होती है। फाल्गुनके कृष्णपक्षमें ' नन्द- सूर्यका पूजन करना चाहिए। इससे मनुष्य शोकरहित सप्तमी "का व्रत करना चाहिए। मार्गशीर्षके शुक्ल-

English

So also monthly the Chaturmasya rule is remembered. Besides, in the months from Chaitra one should offer vessels of barley meal;

अध्याय १९०

श्लोक 6

श्रावणादिषु चारभ्य कार्त्तिकान्तेषु पारणं ।सप्तजन्मसु वैकल्यं व्रतानां सफलं कृते

śrāvaṇādiṣu cārabhya kārttikānteṣu pāraṇaṃ / saptajanmasu vaikalyaṃ vratānāṃ saphalaṃ kṛte

हिन्दी अर्थ

हो जाता है॥ १॥ पक्षमें “अपराजिता सप्तमी 'को भगवान् सूर्यका भाद्रपद मासमें शुक्लपक्षकी सप्तमीको भगवान् पूजन और व्रत करना चाहिए। एक वर्षतक आदित्यका पूजन करनेसे समस्त अभीष्ट वस्तुओँकी मार्गशीर्षके शुक्लपक्षका “पुत्रीया सप्तमी' व्रत प्राप्ति होती है। पौषमासमें शुक्लपक्षकी सप्तमीको स्त्रियोंको पुत्र प्रदान करनेवाला है इस प्रकार आदि आग्नेय महापृराणमें 'सप्तमीके व्रतोंका वर्णन” नामक एक सौ बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

beginning from Shravana and ending in Kartika, the breaking of the fast; the defects of vows in seven births are made fruitful.

अध्याय १९०

श्लोक 7

आयुरारोग्यसौभाग्यराज्यभोगादिमाप्नुयात्(२)

āyurārogyasaubhāgyarājyabhogādimāpnuyāt(2) /

हिन्दी अर्थ

अष्टमी तिथिके व्रत

English

One obtains long life, health, good fortune, kingdom, enjoyment and the rest.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 190
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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