Agni Purana· Agni Purāṇa
193
अध्याय 193 / 381

Adhyaya 193

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अध्याय १९३

श्लोक 1

शिवरात्रिव्रतम् अग्निर् उवाच शिवरात्रिव्रतं वक्ष्ये भुक्तिमुक्तिप्रदं शृणु(१) ।माघफाल्गुनयोर्मध्ये कृष्णा या तु चतुर्दशी

śivarātrivratam agnir uvāca śivarātrivrataṃ vakṣye bhuktimuktipradaṃ śṛṇu(1) / māghaphālgunayormadhye kṛṣṇā yā tu caturdaśī

हिन्दी अर्थ

और श्रावणमें 'शर्व'का पूजन करके मन्दारके पुष्पका भक्षण करे। भाद्रपदमें रात्रिके समय 'ज्यम्बक'का पूजन करके बिल्वपत्रका भक्षण करे। आश्विनमें 'ईश'की अर्चना करके चावल और कार्तिकमें 'रुद्र'का पूजन करके दधिका भोजन करे। वर्षकी समाप्ति होनेपर होम करे और सर्वतो (लिङ्गतो)-भद्रका निर्माण करके उसमें भगवान् शंकरका पूजन करे। तदनन्तर

English

One elevates hundreds of manes by staying therein, by repetition (of divine names) and by doing ancestoral rites. The path to Jambu also lies therein, as also the sacred spot of Taneju- likasrama.

अध्याय १९३

श्लोक 2

कामयुक्ता तु सोपोष्या कुर्वन् जागरणं व्रती ।शिवरात्रिव्रतं कुर्वे चतुर्दश्यामभोजनं

kāmayuktā tu sopoṣyā kurvan jāgaraṇaṃ vratī / śivarātrivrataṃ kurve caturdaśyāmabhojanaṃ

हिन्दी अर्थ

आचार्यको गौ, वस्त्र और सुवर्णका दान करे। अन्य ब्राह्मणोंको भी उन्हीं वस्तुओंका दान करे। ब्राह्मणोंको आमन्त्रित करके भोजन कराकर मनुष्य भोग और मोक्ष प्राप्त कर लेता है॥ २ ७ ॥

English

Whoever always says, "I will go to Kuruk§etra and live, therein", becomes free of sin and goes to heaven.

अध्याय १९३

श्लोक 3

रात्रिजागरणेनैव पूजयामि शिवं व्रती ।आवाहयाम्यहं शम्भुं भुक्तिमुक्तिप्रदायकं

rātrijāgaraṇenaiva pūjayāmi śivaṃ vratī / āvāhayāmyahaṃ śambhuṃ bhuktimuktipradāyakaṃ

हिन्दी अर्थ

प्रत्येक मासके दोनों पक्षोंकी अष्टमी तिथियोंको रात्रिमें भोजन करे और वर्षके पूर्ण होनेपर गोदान करे। इससे मनुष्य इन्द्रपदको प्राप्त कर लेता है। यह 'स्वर्गति-ब्रत' कहा जाता है। कृष्ण अथवा शुक्ल--किसी भी पक्षमें अष्टमीको बुधवारका योग हो, उस दिन व्रत रखे और एक समय भोजन करे। जो मनुष्य अष्टमीका ब्रत करते हैं, उनके घरमें कभी सम्पत्तिका अभाव

English

"By night vigil alone I, the vower, worship Shiva; I invoke Shambhu, giver of enjoyment and liberation;

अध्याय १९३

श्लोक 4

नरकार्णवकोत्तारनावं शिव नमो ऽस्तु ते ।नमः शिवाय शान्ताय प्रजाराज्यादिदायिने

narakārṇavakottāranāvaṃ śiva namo 'stu te / namaḥ śivāya śāntāya prajārājyādidāyine

हिन्दी अर्थ

नहीं होता। दो अँगुलियाँ छोड़कर आठ मुठ्ठी चावल ले और उसका भात बनाकर कुशयुक्त आम्रपत्रके दोनेमें रखे। कुलाम्बिकासहित बुधका पूजन करना चाहिए और 'बुधाष्टमी-व्रत'की

English

boat for crossing the ocean of hell, Shiva, homage to you. Homage to Shiva, the peaceful, giver of offspring, kingdom and the rest,

अध्याय १९३

श्लोक 5

सौभाग्यारोग्यविद्यार्थस्वर्गमार्गप्रदायिने(२) ।धर्मन्देहि धनन्देहि कामभोगादि देहि मे

saubhāgyārogyavidyārthasvargamārgapradāyine(2) / dharmandehi dhanandehi kāmabhogādi dehi me

हिन्दी अर्थ

कथा सुनकर भोजन करे। तदनन्तर ब्राह्मणको ('बुधाष्टमी-ब्रत'को कथा निम्नलिखित है--) धीर नामक एक ब्राह्मण था। उसकी पत्नीका नाम था रम्भा और पुत्रका नाम कौशिक था। उसके एक पुत्री भी थी, जिसका नाम

English

giver of good fortune, health, learning, wealth and the path to heaven. Give me dharma, give wealth, give desires, enjoyment and the rest;

अध्याय १९३

श्लोक 6

गुणकीर्तिसुखं देहि स्वर्गं मोक्षं च देहि मे ।लुब्धकः प्राप्तवान् पुण्यं पापी सुन्दरसेनकः

guṇakīrtisukhaṃ dehi svargaṃ mokṣaṃ ca dehi me / lubdhakaḥ prāptavān puṇyaṃ pāpī sundarasenakaḥ

हिन्दी अर्थ

विजया था। उस ब्राह्मणके धनद नामका एक बैल था। कौशिक उस बैलको ग्वालोंके साथ चरानेको ले गया। कौशिक गङ्गामें स्नानादि कर्म करने लगा, उस समय चोर बैलको चुरा ले गये।

English

give me virtue, fame, happiness; give me heaven and liberation." The hunter obtained merit, the sinner Sundarasena.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 193
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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