Agni Purana· Agni Purāṇa
215
अध्याय 215 / 381

Adhyaya 215

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अध्याय २१५

श्लोक 1

सन्ध्याविधिः अग्निर् उवाच ओङ्कारं यो विजानाति स योगी स हरिः पुमान् ।ओङ्कारमभ्यसेत्तस्मान्मृन्मन्त्रसारन्तु सर्वदं

sandhyāvidhiḥ agnir uvāca oṅkāraṃ yo vijānāti sa yogī sa hariḥ pumān / oṅkāramabhyasettasmānmṛnmantrasārantu sarvadaṃ

हिन्दी अर्थ

यज्ञो वषट्कार आपो ज्योती रसोऽमृतम् "॥

English

One who unweariedly repeats these everyday for three years, reaches the supreme brahman becoming the wind and embodying the sky.

अध्याय २१५

श्लोक 2

सर्वमन्त्रप्रयोगेषु प्रणवः प्रथमः स्मृतः ।तेन सम्परिपूर्णं यत्तत् पूर्णं कर्म नेतरत्

sarvamantraprayogeṣu praṇavaḥ prathamaḥ smṛtaḥ / tena samparipūrṇaṃ yattat pūrṇaṃ karma netarat

हिन्दी अर्थ

“उदुत्यं जातवेदसं० ' इस मन्त्रके प्रस्कण्व ऋषि कहे गये हैं। इसका गायत्री छन्द और सूर्य विनियोग होता है (परंतु संध्योपासनामें इसका सूर्योपस्थान-कर्ममें विनियोग किया जाता है)।

English

There would be the indicated success with (oblation done) ten thousand times and the mentally desired (benefit) with a lakh times. One would be released from (the sin accrued) by killing a brahmin, be lord Hari and the elevator of the family with (oblations done) crore times.

अध्याय २१५

श्लोक 3

ओङ्कारपूर्विकास्तिस्रो महाव्याहृतयो ऽव्ययाः ।त्रिपदा चैव सावित्री विज्ञेयं ब्रह्मणी मुखं

oṅkārapūrvikāstisro mahāvyāhṛtayo 'vyayāḥ / tripadā caiva sāvitrī vijñeyaṃ brahmaṇī mukhaṃ

हिन्दी अर्थ

चित्रं देवानां० ' इस तऋृचाके कौत्स ऋषि कहे गये हैं। इसका छन्द त्रिष्टुप् और देवता सूर्य माने गये हैं। यहाँ इसका भी विनियोग सूर्योपस्थानमें ही है॥ ४२--५० ॥

English

Gayatrl, Usnik, Anustubh, Bj-hati, Pahkti, Trisjubh, and Jagati are said to be metres (of these) respectively.

अध्याय २१५

श्लोक 4

यो ऽधीते ऽहन्यहन्येतास्त्रीणि वर्षाण्यतन्त्रितः ।स ब्रह्मपरमभ्येति वायुभूतः खमूर्तिमान्

yo 'dhīte 'hanyahanyetāstrīṇi varṣāṇyatantritaḥ / sa brahmaparamabhyeti vāyubhūtaḥ khamūrtimān

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'संध्याविधिका वर्णन” नामक दो सौ पन्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ गायत्री-मन्त्रके तात्पर्यार्थका वर्णन

English

One should recite (the hymn) rtamca, the destroyer of sins, thrice in the water. Sindhudvipa is the sage for the hymn dpo hi sfhd.

अध्याय २१५

श्लोक 5

एकाक्षरं परं ब्रह्म प्राणायामपरन्तपः ।सावित्र्यास्तु परन्नास्ति मौनात् सत्यं विशिष्यते

ekākṣaraṃ paraṃ brahma prāṇāyāmaparantapaḥ / sāvitryāstu parannāsti maunāt satyaṃ viśiṣyate

हिन्दी अर्थ

अग्निदेव कहते हैं वसिष्ठ! इस प्रकार संध्याका विधान करके गायत्रीका जप और स्मरण करे। यह अपना गान करनेवाले साधकोंके शरीर और प्राणोंका त्राण करती है, इसलिये इसे

English

5LV. 10.9.1.

अध्याय २१५

श्लोक 6

सप्तावर्ता पापहरा दशभिः प्रापयेद्दिवं ।विंशावर्ता तु सा देवी नयते हीश्वरालयं

saptāvartā pāpaharā daśabhiḥ prāpayeddivaṃ / viṃśāvartā tu sā devī nayate hīśvarālayaṃ

हिन्दी अर्थ

“गायत्री ' कहा गया है। सविता (सूर्य)-से इसका प्रकाशन--प्राकट्य हुआ है, इसलिये यह “सावित्री ' कहलाती है। वाक्स्वरूपा होनेसे ' सरस्वती ' नामसे भी प्रसिद्ध है

English

AV. 6.115.3.

अध्याय २१५

श्लोक 7

अष्टोत्तरशतं जप्त्वा तीर्णः संसारसागरात् ।रुद्रकुष्माण्डजप्येभ्यो गायत्री तु विशिष्यते

aṣṭottaraśataṃ japtvā tīrṇaḥ saṃsārasāgarāt / rudrakuṣmāṇḍajapyebhyo gāyatrī tu viśiṣyate

हिन्दी अर्थ

“तत्’ पदसे ज्योतिःस्वरूप परब्रह्म परमात्मा अभिहित है। ' भर्गः? पद तेजका वाचक है; क्योंकि 'भा' धातु दीप्त्यर्थक है और उसीसे 'भर्ग' शब्द सिद्ध है। “भातीति भर्गः'-इस

English

Designation of B.V. 9.1.1 ff

अध्याय २१५

श्लोक 8

न गायत्र्याः परञ्जप्यं न व्याहृतिसमं हुतं ।गायत्र्याः पादमप्यर्धमृगर्धमृचमेव वा

na gāyatryāḥ parañjapyaṃ na vyāhṛtisamaṃ hutaṃ / gāyatryāḥ pādamapyardhamṛgardhamṛcameva vā

हिन्दी अर्थ

प्रकार इसकी व्युत्पत्ति है। अथवा ' भ्रस्ज पाके'- इस धातुसूत्रके अनुसार पाकार्थक ' भ्रस्ज' धातुसे २. आपो हिष्ठेत्यादि तृचस्य सिन्धुद्वीप ऋषिः, गायत्री छन्दः, आपो देवता ब्राह्मस्नानाय मार्जने विनियोगः ।

English

IV.10.190. 1.

अध्याय २१५

श्लोक 9

ब्रह्महत्या सुरापानं सुवर्णस्तेयमेव च ।गुरुदारागमश् चैव जप्येनैव पुनाति सा

brahmahatyā surāpānaṃ suvarṇasteyameva ca / gurudārāgamaś caiva japyenaiva punāti sā

हिन्दी अर्थ

. अघमर्षणसूक्तस्याघमर्षण ऋषिरनुष्टुपूछन्दो भाववृत्तो देवता अघमर्षणे विनियोगः । . शिरसः प्रजापतिर्क्रषिसत्रिपदा गायत्री छन्दो ब्रह्माग्निवायुसूर्या देवता यजुः प्राणायामे विनियोगः । . इसका पाठ आजकलकी संध्याप्रतियोंमें इस प्रकार उपलब्ध होता है--

English

IV.10.9.

अध्याय २१५

श्लोक 10

पापे कृते तिलैर् होमो गायत्रीजप ईरितः ।जप्त्वा सहस्रं गायत्र्या उपवासी स पापहा(१)

pāpe kṛte tilair homo gāyatrījapa īritaḥ / japtvā sahasraṃ gāyatryā upavāsī sa pāpahā(1)

हिन्दी अर्थ

ॐ अन्तश्चरसि भूतेषु गुहायां विश्वतोमुखः । त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कार आपो ज्योती रसोऽमृतम् ॥ ६. उदुत्यमिति प्रस्कण्व ऋषिर्गायत्री छन्दः सूर्यो देवता सूर्योपस्थाने विनियोगः । ७. चित्रमित्यस्य कौत्स ऋषिस्त्रष्टुपूछन्दः सूर्यो देवता सूर्योपस्थाने विनियोगः । भी 'भर्ग' शब्द निष्पन्न होता है; क्योंकि सूर्यदेवका तेज ओषधि आदिको पकाता है। 'भ्राजु' धातु भी दीप्त्यर्थक होता है। ' भ्राजते इति भर्ग: '-इस व्युत्पत्तिके अनुसार ' भ्राज' धातुसे भी ' भर्ग' शब्द

English

When sin is done, oblation with sesame and recitation of the Gayatri are declared; having repeated the Gayatri a thousand times, fasting, he is a sin-destroyer.

अध्याय २१५

श्लोक 11

गोघ्नः पितृघ्नो मातृघ्नो ब्रह्महा गुरुतल्पगः ।ब्रह्मघ्नः स्वर्णहारी च सुरापो लक्षजप्यतः

goghnaḥ pitṛghno mātṛghno brahmahā gurutalpagaḥ / brahmaghnaḥ svarṇahārī ca surāpo lakṣajapyataḥ

हिन्दी अर्थ

बनता है। बहुलं छन्दसि'--इस वैदिक व्याकरणसूत्रके अनुसार उक्त सभी धातुओंसे आवश्यक प्रत्यय, आगम एवं विकारको ऊहा करनेसे ' भर्ग' शब्द बन सकता है। 'वरेण्य'का अर्थ है-' सम्पूर्ण तेजोंसे

English

A cow-killer, father-killer, mother-killer, Brahmin-killer, violator of the teacher's bed, Brahmin-killer, gold-thief, liquor-drinker — by a lakh of recitations

अध्याय २१५

श्लोक 12

शुध्यते वाथ वा स्नात्वा शतमन्तर्जले जपेत् ।अपः शतेन पीत्वा तु गायत्र्याः पापहा भवेत्

śudhyate vātha vā snātvā śatamantarjale japet / apaḥ śatena pītvā tu gāyatryāḥ pāpahā bhavet

हिन्दी अर्थ

श्रेष्ठ परमपदस्वरूप'। अथवा स्वर्ग एवं मोक्षकी कामना करनेवालोंके द्वार सदा ही वरणीय होनेके कारण भी वह 'वरेण्य' कहलाता है; क्योंकि 'वुञ्' धातु वरणार्थक है। ' धीमहि’ पदका यह अभिप्राय है कि “हम जाग्रत् और सुषुप्ति आदि अवस्थाओंसे अतीत नित्य शुद्ध, बुद्ध, एकमात्र सत्य एवं ज्योतिःस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरका मुक्तिके लिये ध्यान करते हैं'

English

he is purified; or having bathed one should recite a hundred in the water. Having drunk water with a hundred Gayatris one becomes a sin-destroyer.

अध्याय २१५

श्लोक 13

शतं जप्ता तु गायत्री पापोपशमनी स्मृता ।सहस्रं शप्ता सा देवी उपपातकनाशिनी

śataṃ japtā tu gāyatrī pāpopaśamanī smṛtā / sahasraṃ śaptā sā devī upapātakanāśinī

हिन्दी अर्थ

जगत्को सृष्टि आदिके कारण भगवान् श्रीविष्णु ही वह ज्योति हैं। कुछ लोग शिवको वह ज्योति मानते हैं, कुछ लोग शक्तिको मानते हैं और कोई सूर्यको तथा कुछ अग्निहोत्री वेदज्ञ अग्निको वह

English

The Gayatri recited a hundred times is remembered as sin-quieting; recited a thousand times that goddess destroys minor sins;

अध्याय २१५

श्लोक 14

अभीष्टदा कोटिजप्या देवत्वं राजतामियात् ।ओङ्कारं पूर्वमुच्चार्य भूर्भुवः स्वस्तथैव च

abhīṣṭadā koṭijapyā devatvaṃ rājatāmiyāt / oṅkāraṃ pūrvamuccārya bhūrbhuvaḥ svastathaiva ca

हिन्दी अर्थ

ज्योति मानते हैं। वस्तुतः अग्नि आदि रूपोंमें स्थित विष्णु ही वेद-वेदाङ्गोंमें 'ब्रह्म' माने गये हैं। इसलिये ' देवस्य सवितुः '— अर्थात् जगत्के उत्पादक श्रीविष्णुदेवका ही वह परमपद माना गया है; क्योंकि वे स्वयं ज्योतिःस्वरूप भगवान् श्रीहरि महत्तत्त्व आदिका प्रसव (उत्पत्ति) करते हैं। वे ही पर्जन्य,

English

recited a crore she gives what is desired; one attains divinity and kingship. Having first uttered Omkara, then "bhur bhuvah svah" likewise,

अध्याय २१५

श्लोक 15

गायत्री प्रणवश्चान्ते जपे चैवमुदाहृतं ।विश्वामित्र ऋषिच्छन्दो गायत्रं सविता तथा

gāyatrī praṇavaścānte jape caivamudāhṛtaṃ / viśvāmitra ṛṣicchando gāyatraṃ savitā tathā

हिन्दी अर्थ

अन्नका पोषण करते हैं। अग्निमें विधिपूर्वक दी हुई आहुति सूर्यको प्राप्त होती है और सूर्यसे वृष्टि, वृष्टिसे अन्न और अन्नसे प्रजाओंकी उत्पत्ति होती है। “धीमहि ' पद धारणार्थक ' डुधाज्' धातुसे भी

English

the Gayatri, and Pranava at the end — this is the stated form in recitation. Vishvamitra is the seer, the meter Gayatri, and Savitri;

अध्याय २१५

श्लोक 16

देवतोपनये जप्ये विनियोगो हुते तथा ।अग्निर्वायू रविर्विद्युत् यमो जलपतिर्गुरुः

devatopanaye japye viniyogo hute tathā / agnirvāyū ravirvidyut yamo jalapatirguruḥ

हिन्दी अर्थ

सिद्ध होता है। इसलिये हम उस तेजका मनसे धारण-चिन्तन करते हैं-यह भी अर्थ होगा। (यः) परमात्मा श्रीविष्णुका वह तेज (नः) हम सब प्राणियोंकी (धियः) बुद्धि-वृत्तियोंको (प्रचोदयात्) प्रेरित करे। वे ईश्वर ही कर्मफलका भोग करनेवाले समस्त प्राणियोंके प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष परिणामोंसे युक्त समस्त कमॉमें विष्णु, सूर्य और अग्निरूपसे स्थित हैं। यह प्राणी ईश्वरकी

English

the deity; in initiation, in recitation and in oblation is the application: Agni, Vayu, Ravi, Vidyut, Yama, the lord of waters, Guru,

अध्याय २१५

श्लोक 17

पर्जन्य इन्द्रो गन्धर्वः पूषा च तदनन्तरं ।मित्रो ऽथ वरुणस्त्वष्टा वसवो मरुतः शशी

parjanya indro gandharvaḥ pūṣā ca tadanantaraṃ / mitro 'tha varuṇastvaṣṭā vasavo marutaḥ śaśī

हिन्दी अर्थ

प्रेरणासे ही शुभाशुभ कर्मानुसार स्वर्ग अथवा नरकको प्राप्त होता है। श्रीहरि द्वारा महत्तत्व आदि रूपसे निर्मित यह सम्पूर्ण जगत् ईश्वरका आवासस्थान है। वे सर्वसमर्थ हंसस्वरूप परम पुरुष स्वर्गादि लोकोंसे

English

Parjanya, Indra, Gandharva, Pusha next, Mitra, Varuna, Tvashtri, the Vasus, the Maruts, the Moon,

अध्याय २१५

श्लोक 18

अङ्गिरा विश्वनासत्यौ कस् तथा सर्वदेवताः ।रुद्रो ब्रह्मा च विष्णुश् च क्रमशो ऽक्षरदेवताः

aṅgirā viśvanāsatyau kas tathā sarvadevatāḥ / rudro brahmā ca viṣṇuś ca kramaśo 'kṣaradevatāḥ

हिन्दी अर्थ

क्रीड़ा करते हैं, इसलिये वे 'देव'' कहलाते हैं । आदित्यमें जो ' भर्ग' नामसे प्रसिद्ध दिव्य तेज है, वह उन्हींका स्वरूप है । मोक्ष चाहनेवाले पुरुषोंको जन्म-मरणके कष्टसे और हैहिक, हैविक तथा भौतिक त्रिविध दुःखोंसे छुटकारा पानेके लिये ध्यानस्थ होकर इन परमपुरुषका सूर्यमण्डलमें दर्शन करना चाहिए। वे ही 'तत्त्वरमसि' आदि

English

Angiras, the Vishvedevas, the Ashvins, Ka, and all gods; Rudra, Brahma and Vishnu are in order the deities of the syllables;

अध्याय २१५

श्लोक 19

गयत्र्या जपकाले तु कथिताः पापनाशनाः ।पादाङ्गुष्ठौ च गुल्फौ च नलकौ जानुनी तथा

gayatryā japakāle tu kathitāḥ pāpanāśanāḥ / pādāṅguṣṭhau ca gulphau ca nalakau jānunī tathā

हिन्दी अर्थ

परब्रह्म हैं। सम्पूर्ण लोकोंका निर्माण करनेवाले सविता देवताका जो सबके लिये वरणीय भर्ग है, बह विष्णुका परमपद है और वही गायत्रीका ब्रह्मरूप “चतुर्थ पाद’ है। ' धीमहि’ पदसे यह

English

at the time of Gayatri recitation they are told as sin-destroyers. Great toes of feet, ankles, shins, knees,

अध्याय २१५

श्लोक 20

जङ्घे शिश्रश् च वृषणौ कटिर् नाभिस्तथोदरं ।१ उपपातकपापहेति ग॥ , घ॥ , ङ॥ च :प् २८३ स्तनौ च हृदयं ग्रीवा मुखन्तालु च नासिके

jaṅghe śiśraś ca vṛṣaṇau kaṭir nābhistathodaraṃ / 1 upapātakapāpaheti ga.. , gha.. , ṅa.. ca :p 283 stanau ca hṛdayaṃ grīvā mukhantālu ca nāsike

हिन्दी अर्थ

अभिप्राय ग्रहण करना चाहिए कि देहादिको जाग्रत्-अवस्थामें सामान्य जीवसे लेकर ब्रह्मपर्यन्त मैं ही ब्रह्म हुँ और आदित्यमण्डलमें जो पुरुष है, वह भी मैं ही हूँ-मैं अनन्त सर्वतः परिपूर्ण ओम् (सच्चिदानन्द) हूँ। ' प्रचोदयात्’ पदके कर्तारूपसे उन परमेश्वरको ग्रहण करना चाहिए, जो सदा यज्ञ आदि शुभ कर्मोके प्रवर्तक हैं

English

thighs, genital, testicles, waist, navel, belly, breasts, heart, neck, mouth, palate, nose,

अध्याय २१५

श्लोक 21

चक्षुषी च भ्रुवोर्मध्यं ललाटं पूर्वमाननं ।दक्षिणोत्तरपार्श्वे द्वे शिर आस्यमनुक्रमात्

cakṣuṣī ca bhruvormadhyaṃ lalāṭaṃ pūrvamānanaṃ / dakṣiṇottarapārśve dve śira āsyamanukramāt

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्नेय महापृराणमें “गायत्री-मन्त्रके तात्पर्यका वर्णन” नामक दो सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

eyes, between the brows, forehead, the east face, the right and left sides, head and mouth in order:

अध्याय २१५

श्लोक 22

पीतः श्यामश् च कपिलो मरकतो ऽग्निसन्निभः ।रुक्मविद्युद्धूम्रकृष्णरक्तगौरेन्द्रनीलभाः

pītaḥ śyāmaś ca kapilo marakato 'gnisannibhaḥ / rukmavidyuddhūmrakṛṣṇaraktagaurendranīlabhāḥ

हिन्दी अर्थ

'देव' शब्द क्रीडार्थक 'दिवु' धातुसे बनता है। गायत्रीसे निर्वाणकी प्राप्ति

English

yellow, dark, tawny, emerald, fire-like, gold, lightning, smoky, black, red, fair, sapphire-hued;

अध्याय २१५

श्लोक 23

स्फाटिकस्वर्णपाण्ड्वाभाः पद्मरागो ऽखिलद्युतिः(१) ।हेमधूम्ररक्तनीलरक्तकृष्णसुवर्णभाः

sphāṭikasvarṇapāṇḍvābhāḥ padmarāgo 'khiladyutiḥ(1) / hemadhūmraraktanīlaraktakṛṣṇasuvarṇabhāḥ

हिन्दी अर्थ

अग्निदेव कहते हैं-- वसिष्ठ! किसी अन्य वसिष्ठने गायत्री-जपपूर्वक लिङ्गमूर्ति शिवको स्तुति करके भगवान् शंकरसे निर्वाणस्वरूप परब्रह्मकी प्राप्ति को

English

crystal, golden, pale, ruby, all-radiant, golden, smoky, red, blue, red, black, golden-hued;

अध्याय २१५

श्लोक 24

शुक्लकृष्णपालाशाभा(२) गायत्र्या वर्णकाः क्रमात् ।ध्यानकाले पापहरा हुतैषा सर्वकामदा

śuklakṛṣṇapālāśābhā(2) gāyatryā varṇakāḥ kramāt / dhyānakāle pāpaharā hutaiṣā sarvakāmadā

हिन्दी अर्थ

( वसिष्ठने कहा -- ) कनकलिङ्गको नमस्कार, वेदलिङ्गको नमस्कार, परमलिङ्गको नमस्कार और आकाशलिङ्गको नमस्कार है। मैं सह्रलिङ्ग, वह्रिलिङ्ग, पुराणलिङ्ग और वेदलिङ्ग शिवको बारंबार नमस्कार करता हूँ। पाताललिङ्ग, ब्रह्मलिङ्ग, सप्तद्वीपोर्ध्वलिङ्गको बारंबार नमस्कार है। मैं सर्वात्मलिङ्ग, सर्वलोकाङ्गलिङ्ग, अव्यक्तलिङ्ग, बुद्धिलिङ्ग, अहंकारलिङ्ग, भूतलिङ्ग, इन्द्रियलिङ्ग,

English

white, black, palasha-colored — these are the colors of the Gayatri in order. At the time of meditation she removes sin; oblation to her gives all desires.

अध्याय २१५

श्लोक 25

गायत्र्या तु तिलैर् होमः सर्वपापप्रणाशनः ।शान्तिकामो यवैः कुर्यादायुष्कामो घृतेन च

gāyatryā tu tilair homaḥ sarvapāpapraṇāśanaḥ / śāntikāmo yavaiḥ kuryādāyuṣkāmo ghṛtena ca

हिन्दी अर्थ

समलिङ्ग, यज्ञाङ्गलिङ्ग, यज्ञलिङ्ग, तत््वलिङ्ग और देवानुगतलिङ्गरूप आप शंकरको बारंबार नमस्कार करता हुँ। प्रभो! आप मुझे परमयोगका उपदेश कीजिये और मेरे समान पुत्र प्रदान कीजिये।

English

Oblation of sesame with the Gayatri destroys all sin. One desiring peace should do it with barley, one desiring life with ghee,

अध्याय २१५

श्लोक 26

सिद्धार्थकैः कर्मसिद्ध्यै पयसा ब्रह्मवर्चसे ।पुत्रकामस् तथा दध्ना धान्यकामस्तु शालिभिः

siddhārthakaiḥ karmasiddhyai payasā brahmavarcase / putrakāmas tathā dadhnā dhānyakāmastu śālibhiḥ

हिन्दी अर्थ

भगवन्! मुझे अविनाशी परब्रह्म एवं परमशान्तिको प्राप्ति कराइये। मेरा बंश कभी क्षीण न हो और मेरी बुद्धि सदा धर्में लगी रहे अग्निदेव कहते हैं-- प्राचीनकालमें श्रीशैलपर वसिष्ठके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् शंकर प्रसन्न हो गये और वसिष्ठको वर देकर वहीं अन्तर्धान हो गये

English

with mustard seed for success of works, with milk for Brahmic radiance; desiring a son likewise with curds, desiring grain with rice,

अध्याय २१५

श्लोक 27

क्षीरवृक्षसमिद्धिस्तु ग्रहपीडोपशान्तये ।धनकामस् तथा बिल्वैः श्रीकामः कमलैस् तथा

kṣīravṛkṣasamiddhistu grahapīḍopaśāntaye / dhanakāmas tathā bilvaiḥ śrīkāmaḥ kamalais tathā

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्नेय महापृराणमें 'गायत्री-निर्वाणका कथन” नामक दो सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

with fuel sticks of milk-trees for quieting planetary affliction; desiring wealth with bilva, desiring prosperity with lotuses,

अध्याय २१५

श्लोक 28

आरोग्यकामो दूर्वाभिर्गुरूत्पाते स एव हि ।सौभाग्येच्छुर्गुग्गुलुना विद्यार्थी पायसेन च

ārogyakāmo dūrvābhirgurūtpāte sa eva hi / saubhāgyecchurguggulunā vidyārthī pāyasena ca

हिन्दी अर्थ

राजाके अभिषेककी विधि अग्निदेव कहते हैं- वसिष्ठ! पूर्वकालमें परशुरामजीके पूछनेपर पुष्करने उनसे जिस प्रकार राजधर्मका वर्णन किया था, वही मैं तुमसे बतला रहा हूँ

English

desiring health with durva grass; in grave portents that same; desiring good fortune with guggulu, a student with pudding;

अध्याय २१५

श्लोक 29

अयुतेनोक्तसिद्धिः स्याल्लक्षेण मनसेप्सितं ।कोट्या ब्रह्मबधान् मुक्तः कुलोद्धारी हरिर्भवेत्

ayutenoktasiddhiḥ syāllakṣeṇa manasepsitaṃ / koṭyā brahmabadhān muktaḥ kuloddhārī harirbhavet

हिन्दी अर्थ

पुष्करने कहा-- राम! मैं सम्पूर्ण राजधर्मोसे संगृहीत करके राजाके धर्मका वर्णन करूँगा। राजाको प्रजाका रक्षक, शत्रुओंका नाशक और दण्डका उचित उपयोग करनेवाला होना चाहिए।

English

by ten thousand the stated success results, by a lakh what the mind desires; by a crore he is freed from Brahmin-killing and becomes Hari, saver of the family.

अध्याय २१५

श्लोक 30

ग्रहयज्ञमुखो वापि होमो ऽयुतमुखो ऽर्थकृत् ।१ पद्मरागो ऽमलद्युतिरिति ख॥ , छ॥ , ज॥ , ट॥ च २ शुक्लपद्मपलाशाभेति ङ॥ , ञ॥ च :प् २८४ आवाहनञ्च गायत्र्यास्तत ओङ्कारमभ्यसेत्

grahayajñamukho vāpi homo 'yutamukho 'rthakṛt / 1 padmarāgo 'maladyutiriti kha.. , cha.. , ja.. , ṭa.. ca 2 śuklapadmapalāśābheti ṅa.. , ña.. ca :p 284 āvāhanañca gāyatryāstata oṅkāramabhyaset

हिन्दी अर्थ

वह प्रजाजनोंसे कहे कि 'धर्म-मार्गपर स्थित रहनेवाले आप सब लोगोंकी मैं रक्षा करूँगा' और अपनी इस प्रतिज्ञाका सदा पालन करे। राजाको वर्षफल बतानेवाले एक ज्यौतिषी तथा ब्राह्मण पुरोहितका वरण कर लेना चाहिए। साथ

English

Or oblation beginning with the planet-sacrifice, by ten thousand it brings wealth. Then one should practice the invocation of the Gayatri and Omkara;

अध्याय २१५

श्लोक 31

स्मृत्वौङ्कारन्तु गायत्र्या निबध्नीयाच्छिखान्ततः ।पुनराचम्य हृडयं नाभिं स्कन्धौ च संस्पृशेत्

smṛtvauṅkārantu gāyatryā nibadhnīyācchikhāntataḥ / punarācamya hṛḍayaṃ nābhiṃ skandhau ca saṃspṛśet

हिन्दी अर्थ

ही सम्पूर्ण राजशास्त्रीय विषयों तथा आत्माका ज्ञान रखनेवाले मन्त्रियोंका और धार्मिक लक्षणोंसे सम्पन्न राजमहिषीका भी वरण करना उचित है। राज्यभार ग्रहण करनेके एक वर्ष बाद राजाको

English

having remembered Omkara one should bind the top-knot with the Gayatri; having rinsed again one should touch heart, navel and shoulders.

अध्याय २१५

श्लोक 32

प्रणवस्य ऋषिर्ब्रह्मा गायत्रीच्छन्द एव च ।देवो ऽग्निः परमात्मा स्याद्योगो वै सर्वकर्मसु

praṇavasya ṛṣirbrahmā gāyatrīcchanda eva ca / devo 'gniḥ paramātmā syādyogo vai sarvakarmasu

हिन्दी अर्थ

सब सामग्री एकत्रित करके अच्छे समयमें विशेष समारोहके साथ अपना अभिषेक कराना चाहिए। पहलेवाले राजाको मृत्यु होनेपर शीघ्र ही राजासन ग्रहण करना उचित है; ऐसे समयमें कालका कोई नियम नहीं है। ज्यौतिषी और पुरोहितके द्वारा तिल, सर्षप आदि सामग्रियोंका उपयोग करते हुए राजा स्नान करे तथा भद्रासनपर विराजमान होकर समूचे राज्यमें राजाको विजय घोषित

English

The seer of Pranava is Brahma, the meter Gayatri, the deity Agni, the Supreme Self; its application is in all rites.

अध्याय २१५

श्लोक 33

शुक्ला चाग्निमुखी देव्या कात्यायनसगोत्रजा ।त्रैलोक्यवरणा दिव्या पृथिव्याधारसंयुता

śuklā cāgnimukhī devyā kātyāyanasagotrajā / trailokyavaraṇā divyā pṛthivyādhārasaṃyutā

हिन्दी अर्थ

करे। फिर अभयकी घोषणा कराकर राज्यके

English

The goddess is white, fire-faced, of Katyayana gotra, choosing the three worlds, divine, joined with the earth as support,

अध्याय २१५

श्लोक 34

अक्षरसूत्रधरा देवी पद्मासनगता शुभा ।ॐ तेजो ऽसि महो ऽसि बलमसि भ्राजो ऽसि देवानान्धामनामासि ।विश्वमसि विश्वायुः सर्वमसि सर्वायुः ॐ अभि भूः आगच्छ वरदे देवि जप्ये मे सन्निधौ भव

akṣarasūtradharā devī padmāsanagatā śubhā / oṃ tejo 'si maho 'si balamasi bhrājo 'si devānāndhāmanāmāsi / viśvamasi viśvāyuḥ sarvamasi sarvāyuḥ oṃ abhi bhūḥ āgaccha varade devi japye me sannidhau bhava

हिन्दी अर्थ

समस्त कैदियोंको बन्धनसे मुक्त कर दे। पुरोहितके द्वारा अभिषेक होनेसे पहले इन्द्र देवताकी शान्ति करानी चाहिए। अभिषेकके दिन राजा उपवास करके वेदीपर स्थापित की हुई अग्निमें मन्त्रपाठपूर्वक हवन करे। विष्णु, इन्द्र, सविता, विश्वेदेव और सोम-देवतासम्बन्धी वैदिक ऋचाओंका तथा

English

the goddess bearing a rosary, seated in a lotus posture, auspicious. "Om, you are radiance, you are greatness, you are strength, you are splendor, you are the abode of the gods; you are the universe, universal life, all, all-life. Om, come, boon-giving goddess; be near me in recitation."

अध्याय २१५

श्लोक 35

व्याहृतीनान्तु सर्वासामृषिरेव प्रजापतिः ।व्यस्ताश् चैव समस्ताश् च ब्राह्ममक्षरमोमिति

vyāhṛtīnāntu sarvāsāmṛṣireva prajāpatiḥ / vyastāś caiva samastāś ca brāhmamakṣaramomiti

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात् अग्निके दक्षिण किनारे अपराजिता देवी तथा सुवर्णमय कलशकीो, जिसमें जल गिरानेके लिये अनेकों छिद्र बने हुए हों, स्थापना करके चन्दन और फूलोंके द्वारा उनका पूजन करे।

English

Of all the vyahritis the seer is Prajapati; separately and together the Brahma-syllable is Om.

अध्याय २१५

श्लोक 36

विश्वामित्रो यमदग्निर्भरद्वाजो ऽथ गोतमः ।ऋषिरत्रिर्वशिष्ठश् च काश्यपश् च यथाक्रमं

viśvāmitro yamadagnirbharadvājo 'tha gotamaḥ / ṛṣiratrirvaśiṣṭhaś ca kāśyapaś ca yathākramaṃ

हिन्दी अर्थ

यदि अग्निको शिखा दक्षिणावर्त हो, तपाये हुए सोनेके समान उसकी उत्तम कान्ति हो, रथ और मेघके समान उससे ध्वनि निकलती हो, धुआँ बिलकुल नहीं दिखायी देता हो, अग्निदेव अनुकूल होकर हविष्य ग्रहण करते हों, होमाग्निसे उत्तम गन्ध फैल रही हो, अग्निसे स्वस्तिकके आकारकी लपटें निकलती हों, उसकी शिखा स्वच्छ हो और ऊँचेतक उठती हो तथा उसके भीतरसे

English

Vishvamitra, Jamadagni, Bharadvaja, Gautama, Atri, Vasishtha and Kashyapa are in order the seers;

अध्याय २१५

श्लोक 37

अग्निर्वायू रविश् चैव वाक्पतिर्वरुणस् तथा ।इन्द्रो विष्णुर्व्याहृतीनां दैवतानि यथाक्रमं

agnirvāyū raviś caiva vākpatirvaruṇas tathā / indro viṣṇurvyāhṛtīnāṃ daivatāni yathākramaṃ

हिन्दी अर्थ

चिनगारियाँ नहीं छूटती हों तो ऐसी अग्नि- ज्वाला श्रेष्ठ एवं हितकर मानी गयी है

English

Agni, Vayu, Ravi, Vakpati, Varuna, Indra and Vishnu are in order the deities of the vyahritis.

अध्याय २१५

श्लोक 38

गायत्र्यष्टिगनुष्टुप् च वृहती पङ्क्तिरेव च ।त्रिष्टुप् च जगती चेति छन्दांस्याहुरनुक्तामात्

gāyatryaṣṭiganuṣṭup ca vṛhatī paṅktireva ca / triṣṭup ca jagatī ceti chandāṃsyāhuranuktāmāt

हिन्दी अर्थ

राजा और आगके मध्यसे बिल्ली, मृग तथा . पक्षी नहीं जाने चाहिए। राजा पहले पर्वतशिखरकी मृत्तिकासे अपने मस्तकको शुद्धि करे। फिर बाँबीकी मिट्टीसे दोनों कान, भगवान् विष्णुके मन्दिरको धूलिसे मुख, इन्द्रके मन्दिरको मिट्टीसे ग्रीवा, राजाके आँगनकी मृत्तिकासे हृदय, हाथीके दाँतोंद्वारा खोदी हुई मिट्टीसे दाहिनी बाँ, बैलके सींगसे उठायी हुई मृत्तिकाद्वारा बायीं भुजा,

English

Gayatri, Ushnih, Anushtubh, Brihati, Pankti, Trishtubh and Jagati — the meters, they say, in order.

अध्याय २१५

श्लोक 39

विनियोगे व्याहृतीनां प्राणायामे च होमके ।आपोहिष्ठेत्यृचा चापान्द्रुपदादीति वा स्मृता(१)

viniyoge vyāhṛtīnāṃ prāṇāyāme ca homake / āpohiṣṭhetyṛcā cāpāndrupadādīti vā smṛtā(1)

हिन्दी अर्थ

पोखरेकी मिट्टीसे पीठ, दो नदियोंके संगमकी मृत्तिकासे पेट तथा नदीके दोनों किनारोंको मिट्टीसे अपनी दोनों पसलियोंका शोधन करे। वेश्याके दरवाजेकी मिट्टीसे राजाके कटिभागकी

English

In the application of the vyahritis, in breath-control and in oblation, with the verse "Apo hi shtha" or "Drupadadiva" it is remembered;

अध्याय २१५

श्लोक 40

१ द्रुपदादीनि वाप्यृचा इति ङ॥ , ज॥ , ञ॥ च :प् २८५ तथा हिरण्यवर्णाभिः पावमानीभिरन्ततः ।विप्रुषो ऽष्टौ क्षिपेदूर्ध्वमाजन्मकृतपापजित्

1 drupadādīni vāpyṛcā iti ṅa.. , ja.. , ña.. ca :p 285 tathā hiraṇyavarṇābhiḥ pāvamānībhirantataḥ / vipruṣo 'ṣṭau kṣipedūrdhvamājanmakṛtapāpajit

हिन्दी अर्थ

शुद्धि की जाती है, यज्ञशालाकी मृत्तिकासे वह दोनों ऊरु, गोशालाकी मिट्टीसे दोनों घुटनों, घुड्सारकी मिट्टीसे दोनों जाँघ तथा रथके पहियेकी मृत्तिकासे दोनों चरणोंको शुद्धि करे। इसके बाद पञ्चगव्यके द्वारा राजाके मस्तकको शुद्धि करनी चाहिए। तदनन्तर चार अमात्य भद्रासनपर बैठे हुए राजाका कलशोंद्वारा अभिषेक करें। ब्राह्मणजातीय सचिव पूर्व दिशाको ओरसे घृतपूर्ण सुवर्णकलशद्वारा

English

likewise at the end with the Hiranyavarna and Pavamani verses; one should throw eight drops upward, conquering sin done since birth.

अध्याय २१५

श्लोक 41

अन्तर्जले ऋतञ्चेति उपेत्त्रिरघमर्षणं ।आपोहिष्ठेत्यृचो ऽस्याश् च सिन्धुद्वीप ऋषिः स्मृतः

antarjale ṛtañceti upettriraghamarṣaṇaṃ / āpohiṣṭhetyṛco 'syāś ca sindhudvīpa ṛṣiḥ smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

अभिषेक आरम्भ करे। क्षत्रिय दक्षिणको ओर खड़ा होकर दूधसे भरे हुए चाँदीके कलशसे, वैश्य पश्चिम दिशामें स्थित हो ताम्र कलश एवं दहीसे तथा शूद्र उत्तरकी ओरसे मिट्टीके घड़ेके

English

Within the water, with "Rtam ca" and so on, thrice the Aghamarshana. For the verses "Apo hi shtha" the seer is remembered as Sindhudvipa;

अध्याय २१५

श्लोक 42

ब्रह्मस्नानाय छन्दो ऽस्य गायत्री देवता जलं ।मार्जने विनियोगस्य हयावभृथके क्रतोः

brahmasnānāya chando 'sya gāyatrī devatā jalaṃ / mārjane viniyogasya hayāvabhṛthake kratoḥ

हिन्दी अर्थ

जलसे राजाका अभिषेक करे तदनन्तर बह्नचों (ऋग्वेदी विद्वानों) -में श्रेष्ठ ब्राह्मण मधुसे और 'छन्दोग' अर्थात् सामवेदी विप्र कुशके जलसे नरपतिका अभिषेक करे। इसके बाद पुरोहित जल गिरानेके अनेकों छिद्रोंसे

English

for Brahma-bathing its meter is Gayatri, the deity water; the application is in sprinkling and in the Hayavabhritha of the sacrifice.

अध्याय २१५

श्लोक 43

अघमर्षणसूक्तस्य ऋषिरेवाघमर्षणं ।अनुष्टुप् च भवेच्छन्दो भाववृत्तस्तु दैवतं

aghamarṣaṇasūktasya ṛṣirevāghamarṣaṇaṃ / anuṣṭup ca bhavecchando bhāvavṛttastu daivataṃ

हिन्दी अर्थ

युक्त (सुवर्णमय) कलशके पास जा, सदस्योंके बीच विधिवत् अग्निरक्षाका कार्य सम्पादन करके, राज्याभिषेकके लिये जो मन्त्र बताये गये हैं, उनके द्वारा अभिषेक करे। उस

English

For the Aghamarshana hymn the seer is Aghamarshana; the meter would be Anushtubh; the deity is Bhavavritta.

अध्याय २१५

श्लोक 44

आपीज्योरीरस इति गायत्र्यास्तु शिरः स्मृतं ।ऋषिः प्रजापतिस्तस्य छन्दोहीनं यजुर्यतः

āpījyorīrasa iti gāyatryāstu śiraḥ smṛtaṃ / ṛṣiḥ prajāpatistasya chandohīnaṃ yajuryataḥ

हिन्दी अर्थ

समय ब्राह्मणोंको वेद-मन्त्रोच्चारण करते रहना चाहिए। तत्पश्चात् पुरोहित वेदीके निकट जाय और सुवर्णके बने हुए सौ छिद्रोंवाले कलशसे अभिषेक आरम्भ करे। “या ओषधीः० '-- इत्यादि फूलोंद्वारा, ' ब्राह्मण: ० ' इत्यादि मन्त्रसे बीजोंद्वारा, ' आशुः शिशानः०' आदि मन्त्रसे रत्मोंद्वारा तथा “ये देवाः० '-- इत्यादि मन्त्रसे कुशयुक्त जलोंद्वारा अभिषेक करे। यजुर्वेदी और अथर्ववेदी ब्राह्मण

English

"Apo jyoti raso" is remembered as the head of the Gayatri; its seer is Prajapati; being a yajus it has no meter;

अध्याय २१५

श्लोक 45

ब्रह्माग्निवायुसूर्याश् च देवताः परिकीर्तिताः ।प्राणरोधात्तु वायुः स्याद्वायोरग्निश् च जायते

brahmāgnivāyusūryāś ca devatāḥ parikīrtitāḥ / prāṇarodhāttu vāyuḥ syādvāyoragniś ca jāyate

हिन्दी अर्थ

' गन्धद्वारां दुराधर्षा' इत्यादि मन्त्रसे गोरोचनद्वारा मस्तक तथा कण्ठमें तिलक करे। इसके बाद अन्यान्य ब्राह्मण सब तीर्थोके जलसे अभिषेक

English

Brahma, Agni, Vayu and Surya are declared the deities. By restraint of breath there is Vayu; from Vayu Agni is born;

अध्याय २१५

श्लोक 46

अग्नेरापस्ततः शुद्धिस्ततश्चाचमनञ्चरेत् ।अन्तश् चरति भूतेषु गुहायां विश्वमूर्तिषु

agnerāpastataḥ śuddhistataścācamanañcaret / antaś carati bhūteṣu guhāyāṃ viśvamūrtiṣu

हिन्दी अर्थ

उस समय कुछ लोग गीत और बाजे आदिके शब्दोंके साथ चँवर और व्यजन धारण करें। राजाके सामने सर्वौषधियुक्त कलश लेकर खड़े हों। राजा पहले उस कलशको देखें, फिर दर्पण तथा घृत आदि माङ्गलिक वस्तुओंका दर्शन करें। इसके बाद विष्णु, ब्रह्मा और इन्द्र आदि

English

from Agni water; then purity; then one should perform the rinsing. "Within, he moves in beings, in the cave, in the universal forms;"

अध्याय २१५

श्लोक 47

तपोयज्ञवषट्कार आपो ज्योती रसो ऽमृतं ।उदुत्यं जातवेदसमृषिः प्रष्कन्न उच्यते

tapoyajñavaṣaṭkāra āpo jyotī raso 'mṛtaṃ / udutyaṃ jātavedasamṛṣiḥ praṣkanna ucyate

हिन्दी अर्थ

मधुपर्क आदि देकर राजाके मस्तकपर मुकुट बाँधे। पाँच प्रकारके चमड़ोंके आसनपर बैठकर राजाको मुकुट बँधाना चाहिए। ' ्रुवाद्यैः ० '— इत्यादि मन्त्रके द्वारा उन आसनोंपर बैठे। वृष,

English

austerity, sacrifice, vashat-call, waters, light, essence, nectar. For "Ud u tyam jatavedasam" the seer is called Prashkanva;

अध्याय २१५

श्लोक 48

गायत्रीच्छन्द आख्यातं सूर्यश् चैव तु दैवतम् ।अतिरात्रे नियोगः स्यादग्नीषोमो नियोगकः

gāyatrīcchanda ākhyātaṃ sūryaś caiva tu daivatam / atirātre niyogaḥ syādagnīṣomo niyogakaḥ

हिन्दी अर्थ

वृषभांश, वृक, व्याघ्र और सिंह-इन्हीं पाँचोंके चर्मका उस समय आसनके लिये उपयोग किया जाता है। अभिषेकके बाद प्रतीहार अमात्य और सचिव आदिको दिखाये--प्रजाजनोंसे उनका परिचय दे। तदनन्तर राजा गौ, बकरी, भेड़ तथा गृह आदि दान करके सांवत्सर (ज्यौतिषी) और

English

the meter is declared Gayatri, and the deity Surya; the application is in the Atiratra; Agni-Soma is the application;

अध्याय २१५

श्लोक 49

चित्रं देवेति ऋचके ऋषिः कौत्स उदाहृतः ।त्रिष्टुप् छन्दो दैवतञ्च सूर्यो ऽस्याः परिकीर्तितं

citraṃ deveti ṛcake ṛṣiḥ kautsa udāhṛtaḥ / triṣṭup chando daivatañca sūryo 'syāḥ parikīrtitaṃ

हिन्दी अर्थ

पुरोहितका पूजन करे। फिर पृथ्वी, गौ तथा अन्न आदि देकर अन्यान्य ब्राह्मणोंकी भी पूजा करे। तत्पश्चात् अग्निकी प्रदक्षिणा करके गुरु (पुरोहित) - को प्रणाम करे। फिर बैलकी पीठका स्पर्श

English

for the verse "Chitram devanam" the seer is said to be Kutsa; the meter Trishtubh; its deity is declared Surya.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 215
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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