Agni Purana· Agni Purāṇa
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अध्याय 222 / 381

Adhyaya 223

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अध्याय २२२

श्लोक 1

राजधर्माः पुष्कर उवाच वक्ष्ये ऽन्तःपुरचिन्तां च धर्माद्याः पुरुषार्थकाः ।अन्योन्यरक्षया तेषां सेवा कार्या स्त्रिया नृपैः

rājadharmāḥ puṣkara uvāca vakṣye 'ntaḥpuracintāṃ ca dharmādyāḥ puruṣārthakāḥ / anyonyarakṣayā teṣāṃ sevā kāryā striyā nṛpaiḥ

हिन्दी अर्थ

हड्पनेकी चेष्टा करता है, उसके ऊपर राजाको पाँच सौका दण्ड लगाना चाहिए। यदि उसने अनजानमें ऐसा किया हो तो दो सौका ही दण्ड लगाना उचित है। सीमाका भेदन करनेवाले सभी

English

It should not be vulnerable for attack by others and should abound with flowers, fruits and grains. It should be im¬ passable by foreign army and should be free from rogues and thieves.

अध्याय २२२

श्लोक 2

१ मासेनैकेनेति छ॥ , ज॥ च :प् ३१२ धर्ममूलो ऽर्थविटपस् तथा कर्मफलो महान् ।त्रिवर्गपादपस्तत्र रक्षया फलभागं भवेत्

1 māsenaikeneti cha.. , ja.. ca :p 312 dharmamūlo 'rthaviṭapas tathā karmaphalo mahān / trivargapādapastatra rakṣayā phalabhāgaṃ bhavet

हिन्दी अर्थ

लोगोंको प्रथम श्रेणीके साहस (ढाई सौ पण) - का दण्ड देना चाहिए परशुरामजी! ब्राह्मणको नीचा दिखानेवाले क्षत्रियपर सौका दण्ड लगाना उचित है। इसी अपराधके लिये वैश्यसे दो सौ जुर्माना वसूल करे और शूद्रको कैदमें डाल दे। क्षत्रियको

English

Such a fort should have the market place, temple and other things. A fort furnished with weapons and implements and surrounded by water is an excellent one.

अध्याय २२२

श्लोक 3

कामाधीनाः(१) स्त्रियो राम तदर्थं रत्नसङ्ग्रहः ।सेव्यास्ता नातिसेव्याश् च भूभुजा विषयैषिणा

kāmādhīnāḥ(1) striyo rāma tadarthaṃ ratnasaṅgrahaḥ / sevyāstā nātisevyāś ca bhūbhujā viṣayaiṣiṇā

हिन्दी अर्थ

कलंकित करनेपर ब्राह्मणको पचासका दण्ड, वैश्यपर दोषारोपण करनेसे पचीसका और शूद्रको कलंक लगानेपर उसे बारहका दण्ड देना उचित है। यदि वैश्य क्षत्रियका अपमान करे तो उसपर

English

Residing in the fort possessing the characteristics of a dwelling place, (the king) should propitiate gods. (He) should protect the subjects, conquer the wicked and make gifts.

अध्याय २२२

श्लोक 4

आहारो मैथुनन्निद्रा सेव्या नाति हि रुग् भवेत् ।मञ्चाधिकारे(२) कर्तव्याः स्त्रियः सेव्याः स्वरामिकाः(३)

āhāro maithunannidrā sevyā nāti hi rug bhavet / mañcādhikāre(2) kartavyāḥ striyaḥ sevyāḥ svarāmikāḥ(3)

हिन्दी अर्थ

प्रथम साहस (ढाई सौ पण)-का दण्ड लगाना चाहिए और शूद्र यदि क्षत्रियको गाली दे तो उसको जीभको सजा देनी चाहिए। ब्राह्मणोंको उपदेश करनेवाला शूद्र भी दण्डका भागी होता है। जो अपने शास्त्रज्ञान और देश आदिका झूठा परिचय दे, उसे दूने साहसका दण्ड देना उचित है। जो श्रेष्ठ पुरुषोंको पापाचारी कहकर उनके

English

(The king) who takes away the articles (dedicated to) the god would dwell in hell for a kalpa (period). The king being devoted to the worship of gods should erect temples.

अध्याय २२२

श्लोक 5

दुष्टान्याचरते(४) या तु नाबिनन्दति तत्कथां ।ऐक्यं द्विषद्भिर्व्रजति गर्वं वहति चोद्धता

duṣṭānyācarate(4) yā tu nābinandati tatkathāṃ / aikyaṃ dviṣadbhirvrajati garvaṃ vahati coddhatā

हिन्दी अर्थ

ऊपर आक्षेप करे, वह उत्तम साहसका दण्ड पानेके योग्य है। यदि वह यह कहकर कि 'मेरे मुँहसे प्रमादवश ऐसी बात निकल गयी है”, अपना प्रेम प्रकट करे तो उसके लिये दण्ड

English

One who donates paintings, musical instruments and (arranges for) dramatic performances to be seen and who anoints the deity with oil, clarified butter, honey, milk and other things would go to heaven.

अध्याय २२२

श्लोक 6

चुम्बिता मार्ष्टि वदनं दत्तन्न बहु मन्यते ।स्वपित्यादौ प्रसुप्तापि तथा पश्चाद्विबुध्यते

cumbitā mārṣṭi vadanaṃ dattanna bahu manyate / svapityādau prasuptāpi tathā paścādvibudhyate

हिन्दी अर्थ

घटाकर आधा कर देना चाहिए। माता, पिता, ज्येष्ठ भ्राता, श्वशुर तथा गुरुपर आक्षेप करनेवाला और गुरुजनोंको रास्ता न देनेवाला पुरुष भी सौका दण्ड पानेके योग्य है। जो मनुष्य अपने जिस अंगसे दूसरे ऊँचे लोगोंका अपराध करे, उसके उसी अंगको बिना विचारे शीघ्र ही काट डालना चाहिए। जो घमंडमें आकर किसी उच्च पुरुषको ओर थूके, राजाको उसके ओठ काट

English

One who wipes her face when kissed, does not value what is given, who sleeps first even though asleep and wakes later,

अध्याय २२२

श्लोक 7

स्पृष्टा धुनोति गात्राणि गात्रञ्च विरुणद्धि या ।ईषच्छृणोति वाक्यानि प्रियाण्यपि पराङ्मुखी

spṛṣṭā dhunoti gātrāṇi gātrañca viruṇaddhi yā / īṣacchṛṇoti vākyāni priyāṇyapi parāṅmukhī

हिन्दी अर्थ

लेना उचित है। इसी प्रकार यदि वह उसकी ओर मुँह करके पेशाब करे तो उसका लिङ्ग और उधर पीठ करके अपशब्द करे तो उसकी गुदा काट लेनेके योग्य है। इतना ही नहीं, यदि

English

who shakes her limbs when touched and holds back her body, who hears even pleasing words slightly, turning away,

अध्याय २२२

श्लोक 8

न पश्यत्यग्रदत्तन्तु जघनञ्च निगूहति ।दृष्टे विवर्णवदना मित्रेष्वथ पराङ्मुखी(५)

na paśyatyagradattantu jaghanañca nigūhati / dṛṣṭe vivarṇavadanā mitreṣvatha parāṅmukhī(5)

हिन्दी अर्थ

वह ऊँचे आसनपर बैठा हो तो उस नीचके शरीरके निचले भागको दण्ड देना उचित है। जो मनुष्य दूसरेके जिस-किसी अंगको घायल करे, उसके भी उसी अंगको कुतर डालना चाहिए। गौ, हाथी, घोड़े और ऊँटको हानि पहुँचानेवाले मनुष्योंक आधे हाथ और पैर काट लेने चाहिए। जो किसी (पराये) वृक्षके फल तोड़े, उसपर सुवर्णका दण्ड लगाना उचित है। जो रास्ता,

English

who does not look at what is offered in front, and hides her hips, whose face goes pale when seen, who turns away from his friends,

अध्याय २२२

श्लोक 9

तत्कामितासु च स्त्रीसु मध्यस्थेव च लक्ष्यते ।ज्ञातमण्डनकालापि न करोति च मण्डनं

tatkāmitāsu ca strīsu madhyastheva ca lakṣyate / jñātamaṇḍanakālāpi na karoti ca maṇḍanaṃ

हिन्दी अर्थ

खेतको सीमा अथवा जलाशय आदिको काटकर नष्ट करे, उससे नुकसानका दूना दण्ड दिलाना चाहिए। जो जान-बूझकर या अनजानमें जिसके धनका अपहरण करे, वह पहले उसके धनको

English

and appears indifferent among the women who desire him, who knowing the time for adornment does not adorn herself —

अध्याय २२२

श्लोक 10

या सा विरक्ता तान्त्यक्त्वा सानुरागां स्त्रियम्भजेत्(६) ।दृष्ट्वैव हृष्टा भवति वीक्षिते च पराङ्मुखी

yā sā viraktā tāntyaktvā sānurāgāṃ striyambhajet(6) / dṛṣṭvaiva hṛṣṭā bhavati vīkṣite ca parāṅmukhī

हिन्दी अर्थ

लौटाकर उसे संतुष्ट करे। उसके बाद राजाको भी जुर्माना दे। जो कुएँपरसे दूसरेकी रस्सी और घड़ा चुरा लेता तथा पौंसले नष्ट कर देता है, उसे एक मासतक कैदकी सजा देनी चाहिए। प्राणियोंको मारनेपर भी यही दण्ड देना उचित है। जो दस

English

such a woman is disaffected; leaving her one should approach an affectionate woman. One who is glad at the sight, who turns away when looked at,

अध्याय २२२

श्लोक 11

१ कामाधरा इति घ॥ , ञ॥ च २ लज्जाधिकारे इति ख॥ , छ॥ च ३ सुवासिका इति क॥ ४ द्विष्टान्याचक्षते इति ञ॥ ५ न पश्यत्यग्रदत्तन्त्वित्यादिः, मित्रेष्वथ पराङ्मुखीत्यन्तः पाठः ज॥ पुस्तके नास्ति ६ स्त्रियं व्रजेदिति घ॥ , ञ॥ च :प् ३१३ दृश्यमना तथान्यत्र दृष्टिं क्षिपति चञ्चलां ।तथाप्युपावर्तयितुं नैव शक्नोत्यशेषतः

1 kāmādharā iti gha.. , ña.. ca 2 lajjādhikāre iti kha.. , cha.. ca 3 suvāsikā iti ka.. 4 dviṣṭānyācakṣate iti ña.. 5 na paśyatyagradattantvityādiḥ, mitreṣvatha parāṅmukhītyantaḥ pāṭhaḥ ja.. pustake nāsti 6 striyaṃ vrajediti gha.. , ña.. ca :p 313 dṛśyamanā tathānyatra dṛṣṭiṃ kṣipati cañcalāṃ / tathāpyupāvartayituṃ naiva śaknotyaśeṣataḥ

हिन्दी अर्थ

घड़ेसे अधिक अनाजकी चोरी करता है, वह प्राणदण्ड देनेके योग्य है। बाकीमें भी अर्थात् दस घड़ेसे कम अनाजकी चोरी करनेपर भी, जितने घड़े अन्नकी चोरी करे, उससे ग्यारह गुना

English

who when watched casts a restless glance elsewhere, yet cannot altogether turn away,

अध्याय २२२

श्लोक 12

विवृणीति तथाङ्गानि स्वस्या गुह्यानि भार्गव ।गर्हितञ्च तथैवाङ्गं प्रयत्नेन निगूहति

vivṛṇīti tathāṅgāni svasyā guhyāni bhārgava / garhitañca tathaivāṅgaṃ prayatnena nigūhati

हिन्दी अर्थ

अधिक उस चोरपर दण्ड लगाना चाहिए। सोने- चाँदी आदि द्रव्यों, पुरुषों तथा स्त्रियोंका अपहरण करनेपर अपराधीको वधका दण्ड देना चाहिए। चोर जिस-जिस अंगसे जिस प्रकार मनुष्योंके प्रतिकूल चेष्टा करता है, उसके उसी-उसी अंगको वैसी ही निष्टुरताके साथ कटवा डालना राजाका कर्तव्य है। इससे चोरोंको चेतावनी मिलती है। यदि ब्राह्मण बहुत थोड़ी मात्रामें

English

who reveals her own private limbs, Bhargava, and carefully hides a blameworthy limb,

अध्याय २२२

श्लोक 13

तद्दर्शने च कुरुते बालालिङ्गनचुम्बनं ।आभाष्यमाणा भवति सत्यवाक्या तथैव च

taddarśane ca kurute bālāliṅganacumbanaṃ / ābhāṣyamāṇā bhavati satyavākyā tathaiva ca

हिन्दी अर्थ

शाक और धान्य आदि ग्रहण करता है तो वह दोषका भागी नहीं होता। गो-सेवा तथा देव- पूजाके लिये भी कोई वस्तु लेनेवाला ब्राह्मण दण्डके योग्य नहीं है। जो दुष्ट पुरुष किसीका

English

who at seeing him embraces and kisses a girl, who when spoken to becomes truthful in speech,

अध्याय २२२

श्लोक 14

स्पृष्टा पुलकितैर् अङ्गैः स्वेदेनैव च भुज्यते ।करोति च तथा राम सुलभद्रव्ययाचनं

spṛṣṭā pulakitair aṅgaiḥ svedenaiva ca bhujyate / karoti ca tathā rāma sulabhadravyayācanaṃ

हिन्दी अर्थ

प्राण लेनेके लिये उद्यत हो, उसका वध कर डालना चाहिए। दूसरोंके घर और क्षेत्रका अपहरण करनेवाले, परस्त्रीके साथ व्यभिचार करनेवाले, आग लगानेवाले, जहर देनेवाले तथा हथियार उठाकर मारनेको उद्यत हुए पुरुषको प्राणदण्ड देना ही उचित है

English

who when touched has her limbs thrilled and is enjoyed with sweat, and who, Rama, asks for easily obtained things,

अध्याय २२२

श्लोक 15

ततः स्वल्पमपि प्राप्य करोति परमां मुदं ।नामसङ्कीर्तनादेव मुदिता बहु मन्यते

tataḥ svalpamapi prāpya karoti paramāṃ mudaṃ / nāmasaṅkīrtanādeva muditā bahu manyate

हिन्दी अर्थ

राजा गौओंको मारनेवाले तथा आततायी पुरुषोंका वध करे। परायी स्त्रीसे बातचीत न करे और मना करनेपर किसीके घरमें न घुसे। स्वेच्छासे पतिका वरण करनेवाली स्त्री राजाके

English

then having obtained even a little is greatly glad, who rejoices at hearing his name recited and values it much,

अध्याय २२२

श्लोक 16

करजाङ्काङ्कितान्यस्य फलानि प्रेषयत्यपि ।तत्प्रेषितञ्च हृदये विन्यसत्यपि चादरात्

karajāṅkāṅkitānyasya phalāni preṣayatyapi / tatpreṣitañca hṛdaye vinyasatyapi cādarāt

हिन्दी अर्थ

द्वारा दण्ड पानेके योग्य नहीं है, किंतु यदि नीच वर्णका पुरुष ऊँचे वर्णकी स्त्रीक साथ समागम करे तो वह वधके योग्य है। जो स्त्री अपने स्वामीका उल्लंघन (करके दूसरेके साथ व्यभिचार) करे, उसको कृत्तोंसे नोचवा देना चाहिए। जो सजातीय परपुरुषके सम्पर्कसे दूषित हो चुकी हो, उसे (सम्पत्तिके अधिकारसे वञ्चित करके) शरीर-निर्वाहमात्रके लिये अन्न देना चाहिए।

English

who sends him fruits marked with nail-marks, and places what he sent in her heart with respect,

अध्याय २२२

श्लोक 17

आलिङ्गनैश् च गात्राणि लिम्पतीवामृतेन या ।सुप्ते स्वपित्यथादौ च तथा तस्य विबुध्यते

āliṅganaiś ca gātrāṇi limpatīvāmṛtena yā / supte svapityathādau ca tathā tasya vibudhyate

हिन्दी अर्थ

पतिके ज्येष्ठ भ्रातासे व्यभिचार करके दूषित हुई नारीके मस्तकका बाल मुँडवा देना चाहिए। यदि ब्राह्मण वैश्यजातिकी स्त्रीसे और क्षत्रिय नीच जातिकी स्त्रीके साथ समागम करें तो उनके लिये

English

who with embraces anoints her limbs as if with nectar, who sleeps when he sleeps first and wakes with him,

अध्याय २२२

श्लोक 18

उरू स्पृशति चात्यर्थं सुप्तञ्चैनं विबुध्यते ।कपित्थचूर्णयोगेन तथा दघ्नः स्रजा तथा

urū spṛśati cātyarthaṃ suptañcainaṃ vibudhyate / kapitthacūrṇayogena tathā daghnaḥ srajā tathā

हिन्दी अर्थ

भी यही दण्ड है। शूद्राक साथ व्यभिचार करनेवाले क्षत्रिय और वैश्यको प्रथम साहस (ढाई सौ पण)-का दण्ड देना उचित है। यदि वेश्या एक पुरुषसे वेतन लेकर लोभवश दूसरेके पास चली जाय तो वह दूना वेतन वापस करे

English

who touches the thighs excessively and wakes the sleeping man — [now perfumes:] with powder of kapittha and a garland of curds,

अध्याय २२२

श्लोक 19

घृतं सुगन्धि भवति दुग्धैः क्षिप्तैस् तथा यवैः ।भोज्यस्य कल्पनैवं स्याद्गन्धमुक्तिः प्रदर्श्यते

ghṛtaṃ sugandhi bhavati dugdhaiḥ kṣiptais tathā yavaiḥ / bhojyasya kalpanaivaṃ syādgandhamuktiḥ pradarśyate

हिन्दी अर्थ

तथा सहोदर भाई यदि अपराध करें तो उन्हें रस्सी अथवा बाँसकी छड़ीसे पीट देना चाहिए। प्रहार पीठपर ही करना उचित है, मस्तकपर नहीं । मस्तकपर प्रहार करनेवालेको चोरका दण्ड

English

ghee becomes fragrant, with milk added and barley. The preparation of food thus; the release of scent is shown.

अध्याय २२२

श्लोक 20

शौचमाचमनं राम तथैव च विरेचनं ।भावना चैव पाकश् च बोधनं धूपनन्तथा

śaucamācamanaṃ rāma tathaiva ca virecanaṃ / bhāvanā caiva pākaś ca bodhanaṃ dhūpanantathā

हिन्दी अर्थ

जो रक्षाके कामपर नियुक्त होकर प्रजासे रुपये ऐंठते हों, उनका सर्वस्व छीनकर राजा उन्हें अपने राज्यसे बाहर कर दे। जो लोग किसी कार्यार्थीके द्वारा उसके निजी कार्यमें नियुक्त होकर वह कार्य चौपट कर डालते हैं, राजाको उचित है कि उन क्रूर और निर्दयी पुरुषोंका सारा धन छीन ले। यदि कोई मन्त्री अथवा प्राइविवाक (न्यायाधीश) विपरीत कार्य करे तो

English

Cleansing, rinsing, Rama, and likewise purging, steeping and cooking, awakening, fumigating,

अध्याय २२२

श्लोक 21

वासनञ्चैव निर्दिष्टं कर्माष्टकमिदं स्मृतं ।कपित्थबिल्वजम्वाम्रकरवीरकपल्लवैः

vāsanañcaiva nirdiṣṭaṃ karmāṣṭakamidaṃ smṛtaṃ / kapitthabilvajamvāmrakaravīrakapallavaiḥ

हिन्दी अर्थ

राजा उसका सर्वस्व लेकर उसे अपने राज्यसे बाहर निकाल दे। गुरुपत्नीगामीके शरीरपर भगका चिह्न अंकित करा दे। सुरापान करनेवाले महापातकीके ऊपर शराबखानेके झंडेका चिह्न

English

and perfuming are directed: this is remembered as the eightfold set of operations. With leaves of kapittha, bilva, jambu, mango and oleander,

अध्याय २२२

श्लोक 22

कृत्वोदकन्तु यद्द्रव्यं शौचितं शौचनन्तु तत् ।तेषामभावे शौचन्तु मृगदर्पाम्भसा भवेत्

kṛtvodakantu yaddravyaṃ śaucitaṃ śaucanantu tat / teṣāmabhāve śaucantu mṛgadarpāmbhasā bhavet

हिन्दी अर्थ

दगवा दे। चोरी करनेवालेपर कुत्तेका नाखून गोदवा दे और ब्रह्महत्या करनेवालेके भालपर नरमुण्डका चिह्न अंकित कराना चाहिए । पापाचारी नीचोंको राजा मरवा डाले और ब्राह्मणोंको देश- निकाला दे दे तथा महापातकी पुरुषोंका धन वरुण देवताके अर्पण कर दे (जलमें डाल दे)। गाँवमें भी जो लोग चोरोंको भोजन देते हों तथा

English

making water, the substance cleansed is the cleansing; in their absence cleansing is by musk-water.

अध्याय २२२

श्लोक 23

नखं कुष्ठं घनं मांसी स्पृक्कशैलेयजं जलं ।तथैव कुङ्कुमं लाक्षा चन्दनागुरुनीरदं(१)

nakhaṃ kuṣṭhaṃ ghanaṃ māṃsī spṛkkaśaileyajaṃ jalaṃ / tathaiva kuṅkumaṃ lākṣā candanāgurunīradaṃ(1)

हिन्दी अर्थ

चोरीका माल रखनेके लिये घर और खजानेका प्रबन्ध करते हों, उन सबका भी वध करा देना उचित है। अपने राज्यके भीतर अधिकारके कार्यपर नियुक्त हुए सामन्त नरेश भी यदि

English

Nail-perfume, kushtha, ghana, mamsi, sprikka, shaileya-born water, likewise saffron, lac, sandal, agaru, nirada,

अध्याय २२२

श्लोक 24

सरलं देवकाष्ठञ्च(२) कर्पूरं कान्तया सह ।बालः कुन्दुरुकश् चैव गुग्गुलुः श्रीनिवासकः

saralaṃ devakāṣṭhañca(2) karpūraṃ kāntayā saha / bālaḥ kundurukaś caiva gugguluḥ śrīnivāsakaḥ

हिन्दी अर्थ

पापमें प्रवृत्त हों तो उनका अधिकार छीन लेना चाहिए। जो चोर रातमें सेंध लगाकर चोरी करते हैं, राजाको उचित है कि उनके दोनों हाथ काटकर उन्हें तीखी शूलीपर चढ़ा दे। इसी प्रकार पोखरा तथा देवमन्दिर नष्ट करनेवाले पुरुषोंको भी प्राणदण्ड दे। जो बिना किसी आपत्तिके

English

sarala, devakashtha, camphor with kanta, bala, kundurukka, guggulu, Shrinivasaka,

अध्याय २२२

श्लोक 25

सह सर्जरसेनैवं धूपद्रव्यैकविंशतिः ।धूपद्रव्यगणादस्मादेकविंशाद्यथेच्छया

saha sarjarasenaivaṃ dhūpadravyaikaviṃśatiḥ / dhūpadravyagaṇādasmādekaviṃśādyathecchayā

हिन्दी अर्थ

छोड़ता है, उसपर कार्षापणोंका दण्ड लगाना चाहिए तथा उसीसे वह अपवित्र वस्तु फॅंकवाकर वह जगह साफ करानी चाहिए। प्रतिमा तथा सीढ़ीको तोड्नेवाले मनुष्योंपर पाँच सौ कर्षका

English

with sarjarasa — thus twenty-one incense substances. From this group of twenty-one incense substances, at will,

अध्याय २२२

श्लोक 26

द्वे द्वे द्रव्ये समादाय सर्जभागैर् नियोजयेत् ।नखपिण्याकमलयैः संयोज्य मधुना तथा

dve dve dravye samādāya sarjabhāgair niyojayet / nakhapiṇyākamalayaiḥ saṃyojya madhunā tathā

हिन्दी अर्थ

दण्ड लगाना चाहिए। जो अपने प्रति समान बर्ताव करनेवालोंके साथ विषमताका बर्ताव करता है, अथवा किसी वस्तुकी कीमत लगानेमें बेईमानी करता है, उसपर मध्यम साहस (पाँच सौ कर्ष)-का दण्ड लगाना चाहिए। जो लोग बनियोंसे बहुमूल्य पदार्थ लेकर उसकी कीमत रोक लें, राजा उनपर पृथक्-पृथक् उत्तम साहस (एक हजार कर्ष)-का दण्ड लगावे। जो वैश्य

English

taking two substances each one should join them with portions of sarja; joined with nakha, pinyaka, malaya and honey,

अध्याय २२२

श्लोक 27

धूपयोगा भवन्तीह यथावत् स्वेच्छया कृताः ।त्वचन्नाडीं फलन्तैलं कुङ्कुमं ग्रन्थि प्रवर्तकं(३)

dhūpayogā bhavantīha yathāvat svecchayā kṛtāḥ / tvacannāḍīṃ phalantailaṃ kuṅkumaṃ granthi pravartakaṃ(3)

हिन्दी अर्थ

अपने सामानोंको खराब करके, अर्थात् चीजोंमें घटिया चीजें मिलाकर उन्हें मनमाने दामपर बेचे, वह मध्यम साहस (पाँच सौ कर्ष)-का दण्ड पानेके योग्य है। जालसाजको

English

incense compounds are made here as desired. Bark, nadi, fruit, oil, saffron, granthi, pravartaka,

अध्याय २२२

श्लोक 28

शैलेयन्तगरं क्रान्तां चोलङ्कर्पूरमेव च(४) ।मांसीं सुराञ्च कुष्ठञ्च स्नानद्रव्याणि निर्दिशेत्

śaileyantagaraṃ krāntāṃ colaṅkarpūrameva ca(4) / māṃsīṃ surāñca kuṣṭhañca snānadravyāṇi nirdiśet

हिन्दी अर्थ

उत्तम साहस (एक हजार कर्ष)-का और कलहपूर्वक अपकार करनेवालेको उससे दूना दण्ड देना उचित है। अभक्ष्य-भक्षण करनेवाले ब्राह्मण अथवा शूद्रपर कृष्णलका दण्ड लगाना चाहिए। जो तराजूपर शासन करता है, अर्थात् डंडी मारकर कम तौल देता है, जालसाजी करता है तथा ग्राहकोंको हानि पहुँचाता है-इन सबको--और जो इनके साथ व्यवहार करता है,

English

shaileya, tagara, kranta, chola, camphor, mamsi, spirit and kushtha — one should direct as bath substances.

अध्याय २२२

श्लोक 29

एतेभ्यस्तु समादाय द्रव्यत्रयमथेच्छया ।मृगदर्पयुतं स्नानं कार्यं कन्दर्पवर्धनं

etebhyastu samādāya dravyatrayamathecchayā / mṛgadarpayutaṃ snānaṃ kāryaṃ kandarpavardhanaṃ

हिन्दी अर्थ

उसको भी उत्तम साहसका दण्ड दिलाना चाहिए।

English

Taking three substances from these at will, a bath with musk is to be made, increasing desire.

अध्याय २२२

श्लोक 30

त्वङ्मुरानलदैस्तुल्यैर् वालकार्धसमायुतैः ।स्नानमुत्पलगन्धि स्यात् सतैलं कुङ्कुमायते

tvaṅmurānaladaistulyair vālakārdhasamāyutaiḥ / snānamutpalagandhi syāt satailaṃ kuṅkumāyate

हिन्दी अर्थ

पति, गुरु, ब्राह्मण और संतानकी हत्या करनेवाली हो, उसके हाथ, कान, नाक और ओठ कटवाकर, बैलकी पीठपर चढ़ाकर उसे राज्यसे बाहर निकाल देना चाहिए। खेत, घर, गाँव और जंगल नष्ट करनेवाले तथा राजाकी पल्रीसे समागम करनेवाले मनुष्य घास-फूसकी आगमें जला देने योग्य हैं। जो राजाकी आज्ञाको घटा-बढ़ाकर लिखता है तथा परस्त्रीगामी पुरुषों और चोरोंको

English

With bark, mura, anala and nada in equal parts, with half of bala, the bath would be lotus-scented; with oil it resembles saffron;

अध्याय २२२

श्लोक 31

जातीपुषसुगन्धि स्यात् तगरार्धेन योजितं ।सद्ध्यामकं स्याद्वकुलैस्तुल्यगन्धि मनोहरं

jātīpuṣasugandhi syāt tagarārdhena yojitaṃ / saddhyāmakaṃ syādvakulaistulyagandhi manoharaṃ

हिन्दी अर्थ

बिना दण्ड दिये ही छोड़ देता है, वह उत्तम साहसके दण्डका अधिकारी है। राजाकी सवारी और आसनपर बैठनेवालेको भी उत्तम साहसका ही दण्ड देना चाहिए। जो न्यायानुसार पराजित

English

joined with half of tagara it would be jasmine-fragrant; with sadhyamaka, like vakula in scent, charming;

अध्याय २२२

श्लोक 32

१ चन्दनागुरुशैलजमिति ख॥ , छ॥ च २ देवदारुश्चेति घ॥ , ञ॥ च ३ ग्रन्थिपर्णकमिति ग॥ , घ॥ , ञ॥ च ४ सह सर्जरसेनेत्यादिः चोलं कर्पूरमेव चेत्यन्तः पाठः ट॥ पुस्तके नास्ति :प् ३१५ मञ्जिष्ठातगरं चोलं त्वचं व्यघ्रनखं नक्खं ।गन्धपत्रञ्च विन्यस्य गन्धतैलं भवेच्छुभं

1 candanāguruśailajamiti kha.. , cha.. ca 2 devadāruśceti gha.. , ña.. ca 3 granthiparṇakamiti ga.. , gha.. , ña.. ca 4 saha sarjarasenetyādiḥ colaṃ karpūrameva cetyantaḥ pāṭhaḥ ṭa.. pustake nāsti :p 315 mañjiṣṭhātagaraṃ colaṃ tvacaṃ vyaghranakhaṃ nakkhaṃ / gandhapatrañca vinyasya gandhatailaṃ bhavecchubhaṃ

हिन्दी अर्थ

होकर भी अपनेको अपराजित मानता है, उसे दण्ड लगावे। जो आमन्त्रित नहीं है, उसको बुलाकर लानेवाला पुरुष वधके योग्य है। जो अपराधी दण्ड देनेवाले पुरुषके हाथसे छूटकर भाग जाता है, वह पुरुषार्थसे हीन है।

English

having placed manjishtha, tagara, chola, bark, tiger-claw, nakkha and gandhapatra, a good scented oil would result.

अध्याय २२२

श्लोक 33

तैलं निपीडितं राम तिलैः पुष्पाधिवासितैः ।वासनात् पुष्पसदृशं गन्धेन तु भवेद् ध्रुवं

tailaṃ nipīḍitaṃ rāma tilaiḥ puṣpādhivāsitaiḥ / vāsanāt puṣpasadṛśaṃ gandhena tu bhaved dhruvaṃ

हिन्दी अर्थ

दण्डकर्ताको उचित है कि ऐसे भीरु मनुष्यको शारीरिक दण्ड न देकर उसपर धनका दण्ड

English

Oil pressed, Rama, from sesame scented with flowers becomes by perfuming surely like the flower in scent.

अध्याय २२२

श्लोक 34

एलालवङ्गकक्कोलजातीफलनिशाकराः ।जातीपत्रिकया सार्धं स्वतन्त्रा मुखवासकाः

elālavaṅgakakkolajātīphalaniśākarāḥ / jātīpatrikayā sārdhaṃ svatantrā mukhavāsakāḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण्मे 'दण्ड-प्रणयनका कथन” नामक दो सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ४३४ अग्निपुराण

English

Cardamom, clove, kakkola, nutmeg, camphor, with mace — these are independent mouth-perfumes.

अध्याय २२२

श्लोक 35

कर्पूरं कुङ्कुमं कान्ता मृगदर्पं हरेणुकं ।कक्कोलैलालवङ्गञ्च जातौ कोशकमेव च

karpūraṃ kuṅkumaṃ kāntā mṛgadarpaṃ hareṇukaṃ / kakkolailālavaṅgañca jātau kośakameva ca

हिन्दी अर्थ

युद्ध-यात्राके सम्बन्धमें विचार

English

Camphor, saffron, kanta, musk, harenuka, kakkola, cardamom and clove, jati and kosha,

अध्याय २२२

श्लोक 36

त्वक्पत्रं त्रुटिमुस्तौ च लतां कस्तूरिकं तथा ।कण्टकानि लवङ्गस्य फलपत्रे च जातितः

tvakpatraṃ truṭimustau ca latāṃ kastūrikaṃ tathā / kaṇṭakāni lavaṅgasya phalapatre ca jātitaḥ

हिन्दी अर्थ

पुष्कर कहते हैं- जब राजा यह समझ ले कि किसी बलवान् आक्रन्दः (राजा)-के द्वारा मेरा पार्ण्णिग्राहः राजा पराजित कर दिया गया है तो वह सेनाको युद्धके लिये यात्रा करनेकी आज्ञा दे। पहले इस बातको समझ ले कि मेरे सैनिक खूब हृष्ट-पुष्ट हैं, भृत्योंका भलीभाँति भरण-पोषण हुआ है, मेरे पास अधिक सेना मौजूद है तथा मैं मूलकी रक्षा करनेमें पूर्ण समर्थ हूँ; इसके बाद

English

bark-leaf, truti and mustaka, lata and musk, the thorns of clove, fruit and leaf of jati,

अध्याय २२२

श्लोक 37

कटुकञ्च(१) फलं राम कार्षिकाण्युपकल्पयेत् ।तच्चूर्णे खदिरं सारं दद्यात्तुर्यं तु वासितं(२)

kaṭukañca(1) phalaṃ rāma kārṣikāṇyupakalpayet / taccūrṇe khadiraṃ sāraṃ dadyātturyaṃ tu vāsitaṃ(2)

हिन्दी अर्थ

सैनिकासे घिरकर शिविरमें जाय। जिस समय शत्रुपर कोई संकट पड़ा हो, हैवी और मानुषी आदि बाधाओंसे उसका नगर पीड़ित हो, तब युद्धके लिये यात्रा करनी चाहिए। जिस दिशामें भूकम्प आया

English

and the pungent fruit, Rama, one should prepare in karsha measures; in their powder one should add the essence of khadira, a fourth, perfumed.

अध्याय २२२

श्लोक 38

सहकाररसेनास्मात् कर्तव्या गुटिकाः शुभाः(३) ।मुख न्यस्ताः सुगन्धास्ता मुखरोगविनाशनाः

sahakārarasenāsmāt kartavyā guṭikāḥ śubhāḥ(3) / mukha nyastāḥ sugandhāstā mukharogavināśanāḥ

हिन्दी अर्थ

हो, जिसे केतुने अपने प्रभावसे दूषित किया हो, उसी ओर आक्रमण करे। जब सेनामें शत्रुको नष्ट करनेका उत्साह हो, योद्धाओंके मनमें विपक्षियोंके प्रति क्रोधका भाव प्रकट हुआ हो, शुभसूचक

English

With mango juice from this one should make good pills; placed in the mouth, those fragrant ones destroy mouth diseases.

अध्याय २२२

श्लोक 39

पूगं प्रक्षालितं सम्यक् पञ्चपल्लववारिणा ।शक्त्या तु गुटिकाद्रव्यैर् वासितं मुखवासकं

pūgaṃ prakṣālitaṃ samyak pañcapallavavāriṇā / śaktyā tu guṭikādravyair vāsitaṃ mukhavāsakaṃ

हिन्दी अर्थ

शत्रुके नगरपर चढ़ाई करनी चाहिए। यदि वर्षाकालमें यात्रा करनी हो तो जिसमें पैदल और हाथियोंकी संख्या अधिक हो, ऐसी सेनाको कूच करनेकी आज्ञा दे। हेमन्त और शिशिर-ऋतुमें ऐसी सेना

English

Areca nut well washed with water of the five leaves, perfumed with the pill substances according to ability, is a mouth-perfume.

अध्याय २२२

श्लोक 40

कटुकं दन्तकाष्ठञ्च गोमूत्रे वासितं त्र्यहं ।कृतञ्च पूगवद्राम मुखसौगन्धिकारकं

kaṭukaṃ dantakāṣṭhañca gomūtre vāsitaṃ tryahaṃ / kṛtañca pūgavadrāma mukhasaugandhikārakaṃ

हिन्दी अर्थ

ले जाय, जिसमें रथ और घोड़ोंकी संख्या अधिक हो। वसन्त और शरद्के आरम्भमें चतुरंगिणी सेनाको युद्धके लिये नियुक्त करे। जिसमें पैदलोंकी संख्या अधिक हो, वही सेना सदा शत्रुओंपर विजय पाती है। यदि शरीरके दाहिने भागमें कोई अंग फड़क रहा हो तो उत्तम है। बायें अंग, पीठ तथा हृदयका फड़कना अच्छा नहीं है। इस प्रकार शरीरके चिहों, फोड़े-फुंसियों तथा फड़कने

English

The pungent fruit and the tooth-stick perfumed in cow-urine for three days, made like areca, Rama, make a sweet scent in the mouth.

अध्याय २२२

श्लोक 41

त्वक्पथ्ययोः समावंशौ शशिभागार्धसंयुतौ ।नागवल्लीसमो भाति मुखवासो मनोहरः

tvakpathyayoḥ samāvaṃśau śaśibhāgārdhasaṃyutau / nāgavallīsamo bhāti mukhavāso manoharaḥ

हिन्दी अर्थ

१-२. अग्निपुराणके दो सौ तैंतीसवें और दो सौ चालीसवें अध्यायोंमें, महाभारत-शान्तिपर्वमें तथा “कामन्दक-नीतिसार'के आठवें

English

Bark and pathya equal, with bamboo, joined with half a portion of camphor — a charming mouth-perfume like betel appears.

अध्याय २२२

श्लोक 42

१ कन्दुकञ्चेति ख॥ , छ॥ च २ दद्यात्तुर्थं तुलोन्मितमिति ट॥ , छ॥ च ३ कक्कोलैलेत्यादिः गुटिकाः शुभा इत्य् अन्तः पाठः घ॥ , ज॥ पुस्तकद्वये नास्ति :प् ३१६ एवं कुर्यात् सदा स्त्रीणां रक्षणं पृथिवीपतिः ।न चासां विश्वसेज्जातु पुत्रमातुर्विशेषतः

1 kandukañceti kha.. , cha.. ca 2 dadyātturthaṃ tulonmitamiti ṭa.. , cha.. ca 3 kakkolailetyādiḥ guṭikāḥ śubhā ity antaḥ pāṭhaḥ gha.. , ja.. pustakadvaye nāsti :p 316 evaṃ kuryāt sadā strīṇāṃ rakṣaṇaṃ pṛthivīpatiḥ / na cāsāṃ viśvasejjātu putramāturviśeṣataḥ

हिन्दी अर्थ

सर्गमें द्वादश राजमण्डलका वर्णन आया है। उसमें 'विजिगीषु'को बीचमें रखकर उसके सम्मुखकी दिशामें पाँच राजमण्डलोंका और पीछेकी दिशामें चार राजमण्डलोंका विचार किया गया है। अगल-बगलके दो बड़े राज्य, ' मध्यम' और “उदासीन मण्डल ' कहे गये हैं। यथा --

English

Thus the king should always guard women; he should never trust them, especially the mother of his son;

अध्याय २२२

श्लोक 43

न स्वपेत् स्त्रीगृहे रात्रौ विश्वासः कृत्रिमो भवेत्

na svapet strīgṛhe rātrau viśvāsaḥ kṛtrimo bhavet

हिन्दी अर्थ

इस चित्रमें विजिगीषुके पीछेवाला पार्ण्णग्राह राजाका मण्डल है, जो विजिगीषुका शत्रुराज्य है । आक्रन्द विजिगीषुका मित्र होता है। पुष्कर कहते हैं --जब कोई बलवान् आक्रन्द (मित्र) पार्ष्णिग्राह (शत्रु)-को उसके राज्यपर चढ़ाई करके दबा दे तो उस शत्रुके दुर्बल पड़ जानेपर विजिगीषु अपने मित्रोंके सहयोगसे तथा अपनी प्रबल सेनाद्वारा अपने सामनेवाले शत्रु-राज्यपर चढाई कर सकता है।

English

he should not sleep in the women's house at night; trust there would be artificial.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 222
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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