Agni Purana· Agni Purāṇa
234
अध्याय 234 / 381

Adhyaya 235

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अध्याय २३४

श्लोक 1

रणदीक्षा पुष्कर उवाच यात्राविधानपूर्वन्तु वक्ष्ये साङ्ग्रामिकं विधिं ।सप्ताहेन यदा यात्रा भविष्यति महीपतेः

raṇadīkṣā puṣkara uvāca yātrāvidhānapūrvantu vakṣye sāṅgrāmikaṃ vidhiṃ / saptāhena yadā yātrā bhaviṣyati mahīpateḥ

हिन्दी अर्थ

शत्रुओंसे युक्त, जिसने अपनी सेनाको युद्धके योग्य कालमें नहीं नियुक्त किया है वह, तथा सत्य और धर्मसे भ्रष्ट-ये बीस पुरुष ऐसे हैं जिनके साथ संधि न करे, केवल विग्रह करे एक-दूसरेके अपकारसे मनुष्योंमें विग्रह (कलह या युद्ध) होता है। राजा अपने अभ्युदयकी इच्छासे अथवा शत्रुसे पीड़ित होनेपर यदि देश-कालको अनुकूलता और सैनिक-शक्तिसे सम्पन्न हो तो

English

I have already described (the political expedients of) conciliatory measures, creating dissensions, bribery (to win the enemy) and punishment. I have described the punishment (to be made by the king) in his own country. I shall (now) describe (the punishment to be meted to a person living) in a foreign country.

अध्याय २३४

श्लोक 2

पूजनीयो हरिः शम्भुर्मोदकाद्यैर् विनायकः ।द्वितीये ऽहनि दिक्पालान् सम्पूज्य शयनञ्चरेत्

pūjanīyo hariḥ śambhurmodakādyair vināyakaḥ / dvitīye 'hani dikpālān sampūjya śayanañcaret

हिन्दी अर्थ

विग्रह प्रारम्भ करे

English

A king should exhibit the four divisions of the army (such as the infantry, cavalry, men mounted on elephants and chariots) (to delude the enemy) that the gods had sent them for aid. Showers of blood should be shed on the enemy.

अध्याय २३४

श्लोक 3

शय्यायां वा तदग्रे ऽथ देवान् प्रार्च्य मनुं स्मरेत् ।नमः शम्भोः त्रिनेत्राय रुद्राय वरदाय च

śayyāyāṃ vā tadagre 'tha devān prārcya manuṃ smaret / namaḥ śambhoḥ trinetrāya rudrāya varadāya ca

हिन्दी अर्थ

असाधारण देवी), जनपदके स्थानविशेष, राष्ट्रके एक भाग, ज्ञानदाता उपाध्याय आदि और सेना इनमेंसे किसीका भी अपहरण विग्रहका कारण है (इस प्रकार छः हेतु बताये गये) । इनके सिवा मद (राजा दम्भोद्भव आदिकी भाँति शौर्यादिजनित दर्प), मान (रावण आदिकी भाँति अहंकार), जनपदको पीड़ा (जनपद-निवासियोंका सताया

English

Severed heads of the enemy should be exhibited on (the terrace of) palaces. I shall describe six expedients, among which war and peace are most excellent.

अध्याय २३४

श्लोक 4

वामनाय विरूपाय स्वप्नाधिपतये नमः ।१ संविशेदिति ज॥ :प् ३५० भगवन्देवदेवेश शूलभृद्वृषवाहन

vāmanāya virūpāya svapnādhipataye namaḥ / 1 saṃviśediti ja.. :p 350 bhagavandevadeveśa śūlabhṛdvṛṣavāhana

हिन्दी अर्थ

गुरुओंका विनाश), अर्थविघात (भूमि, हिरण्य आदिको क्षति पहुँचाना), शक्तिविघात (प्रभुशक्ति,

English

Making peace, war, expedition, halt, seeking shelter and duplicity are said to be the six expedients.

अध्याय २३४

श्लोक 5

इष्टानिष्टे ममाचक्ष्व स्वप्ने सुप्तस्य शाश्वत ।यज्जाग्रतो दूरमिति पुरोधा मन्त्रमुच्चरेत्

iṣṭāniṣṭe mamācakṣva svapne suptasya śāśvata / yajjāgrato dūramiti purodhā mantramuccaret

हिन्दी अर्थ

धर्मविघात, हैव (प्रारब्धजनित दुरवस्था), सुग्रीव आदि-जैसे मित्रोंके प्रयोजनकी सिद्धि, माननीय जनोंका अपमान, बन्धुवर्गका विनाश, भूतानुग्रहविच्छेद (प्राणियोंको दिये गये अभयदानका खण्डन--जैसे एकने किसी वनमें बहाँके जन्तुओंको अभय देनेके लिये मृगयाकी मनाही कर दी, किंतु दूसरा उस नियमको तोड़कर शिकार खेलने आ गया-यही ' भूतानुग्रहविच्छेद' है), मण्डलदूषण

English

"Tell me what is desired and undesired in the dream of the one sleeping, eternal one." The priest should utter the mantra "yaj jagrato dura";

अध्याय २३४

श्लोक 6

तृतीये ऽहनि दिक्पालान् रुद्रांस्तान् दिक्पतीन्यजेत् ।ग्रहान् यजेच्चतुर्थे ऽह्नि पञ्चमे चाश्विनौ यजेत्

tṛtīye 'hani dikpālān rudrāṃstān dikpatīnyajet / grahān yajeccaturthe 'hni pañcame cāśvinau yajet

हिन्दी अर्थ

(द्वादशराजमण्डलमेंसे किसीको विजिगीषुके विरुद्ध उभाड़ना), एकार्थाभिनिवेशित्व (जो भूमि या स्त्री आदि अर्थ एकको अभीष्ट है, उसीको लेनेके लिये दूसरेका भी दुराग्रह)-ये बीस विग्रहके

English

on the third day one should worship the world-guardians, the Rudras, the lords of directions; on the fourth day one should worship the planets, on the fifth the Ashvins;

अध्याय २३४

श्लोक 7

मार्गे या देवतास्तासान्नद्यादीनाञ्च पूजनं ।दिव्यान्तरीक्षभौमस्थदेवानाञ्च तथा बलिः

mārge yā devatāstāsānnadyādīnāñca pūjanaṃ / divyāntarīkṣabhaumasthadevānāñca tathā baliḥ

हिन्दी अर्थ

कारण हैं ॥ १६-- १८ ॥ सापत्र (रावण और विभीषणकी भाँति सौतेले भाइयोंका वैमनस्य), वास्तुज (भूमि, सुवर्ण आदिके हरणसे होनेवाला अमर्ष), स्त्रीके अपहरणसे

English

worship of the deities on the road and of rivers and the like, and likewise offerings to the gods dwelling in heaven, sky and earth;

अध्याय २३४

श्लोक 8

रात्रौ भूतगणानाञ्च वासुदेवादिपूजनं ।भद्रकाल्याः श्रियः कुर्यात् प्रार्थयेत् सर्वदेवताः

rātrau bhūtagaṇānāñca vāsudevādipūjanaṃ / bhadrakālyāḥ śriyaḥ kuryāt prārthayet sarvadevatāḥ

हिन्दी अर्थ

अपराधजनित प्रतिशोधकी भावना-ये पाँच प्रकारके वैर अन्य विद्वानोंने बताये हैं'

English

at night worship of the hosts of beings, Vasudeva and the rest; one should perform for Bhadrakali and Shri; one should pray to all gods:

अध्याय २३४

श्लोक 9

वासुदेवः सङ्कर्षणः प्रद्युम्नश्चानिरुद्धकः ।नारायणो ऽब्जजो विष्णुर् नारसिंहो वराहकः

vāsudevaḥ saṅkarṣaṇaḥ pradyumnaścāniruddhakaḥ / nārāyaṇo 'bjajo viṣṇur nārasiṃho varāhakaḥ

हिन्दी अर्थ

(१) जिस विग्रहसे बहुत कम लाभ होनेवाला १. ' परस्परोपकार' ही प्रतीकार है; 'मैत्र'का ही नाम “संगत” संधि है। सम्बन्धजको ही “संतान' कहा गया है और 'उपहार'

English

Vasudeva, Sankarshana, Pradyumna and Aniruddha, Narayana, the lotus-born, Vishnu, Narasimha, Varaha,

अध्याय २३४

श्लोक 10

शिव ईशस्तत्पुरुषो(१) ह्य् अघोरो राम सत्यजः(२) ।सूर्यः सोमः कुजश्चान्द्रिजीवशुक्रशनैश् चराः

śiva īśastatpuruṣo(1) hy aghoro rāma satyajaḥ(2) / sūryaḥ somaḥ kujaścāndrijīvaśukraśanaiś carāḥ

हिन्दी अर्थ

तो पूर्वकथित 'उपहार' है ही। इन्हींमें अन्य सबका समावेश है।

English

Shiva, Isha, Tatpurusha, Aghora, Rama, Satyaja; Sun, Moon, Mars, Mercury, Jupiter, Venus, Saturn,

अध्याय २३४

श्लोक 11

राहुः केतुर्गणपतिः सेनानी चण्डिका ह्य् उमा ।लक्ष्मीः सरस्वती दुर्गा ब्रह्माणीप्रमुखा गणाः

rāhuḥ keturgaṇapatiḥ senānī caṇḍikā hy umā / lakṣmīḥ sarasvatī durgā brahmāṇīpramukhā gaṇāḥ

हिन्दी अर्थ

२. सापत्र-वैरमें पूर्वोक्त एकार्थाभिनिवेशका अन्तर्भाव हो जाता है, स्त्री और वास्तुके अपहरणजनित वैरमें पूर्वकथित स्त्रीस्थानापहारज वैरका अन्तर्भाव है । वाग्जात वैरमें पूर्वोक्त ज्ञानापहारज और अपमानजनित वैर अन्तर्भूत होते हैं और अपराधजनित बैरमें पूर्वोक्तशेष १४ कारणोंका समावेश हो जाता है।

English

Rahu, Ketu, Ganapati, the Commander, Chandika and Uma, Lakshmi, Sarasvati, Durga, the hosts headed by Brahmani,

अध्याय २३४

श्लोक 12

रुद्रा इन्द्रादयो वह्निर् नागास्तार्क्ष्यो ऽपरे सुराः ।दिव्यान्तरीक्षभूमिष्ठा विजयाय भवन्तु मे

rudrā indrādayo vahnir nāgāstārkṣyo 'pare surāḥ / divyāntarīkṣabhūmiṣṭhā vijayāya bhavantu me

हिन्दी अर्थ

हो, (२) जो निष्फल हो, (३) जिससे फलप्राप्तिमें संदेह हो, (४) जो तत्काल दोषजनक (विग्रहके समय मित्रादिके साथ विरोध पैदा करनेवाला), (५) भविष्यकालमें भी निष्फल, (६) वर्तमान

English

Rudras, Indra and the rest, Fire, nagas, Garuda, other gods — may those dwelling in heaven, sky and earth be for my victory.

अध्याय २३४

श्लोक 13

मर्दयन्तु रणे शत्रून्(३) सम्प्रगृह्योपहारकं ।सपुत्रमातृभृत्यो ऽहं(४) देवा वः शरणङ्गतः

mardayantu raṇe śatrūn(3) sampragṛhyopahārakaṃ / saputramātṛbhṛtyo 'haṃ(4) devā vaḥ śaraṇaṅgataḥ

हिन्दी अर्थ

और भविष्यमें भी दोषजनक हो, (७) जो अज्ञात बल-पराक्रमवाले शत्रुके साथ किया जाय एवं (८) दूसरोंके द्वारा उभाड़ा गया हो, (९) जो दूसरोंको स्वार्थसिद्धिके लिये किंवा, (१०) किसी साधारण स्त्रीको पानेके लिये किया जा रहा हो, (११) जिसके दीर्घकालतक चलते रहनेकी सम्भावना हो, (१२) जो श्रेष्ठ द्विजोंके साथ छेड़ा गया हो, (१३) जो वरदान आदि पाकर

English

"May they crush the enemies in battle, accepting the offering. I, with son, mother and servants, have gone to you gods for refuge.

अध्याय २३४

श्लोक 14

२ रात्रावित्यादिः, सत्यज इत्य् अन्तः पाठः ग॥ पुस्तके नास्ति ३ मर्दयन्तु च मे शत्रूनिति घ॥ , ञ॥ च ४ अवन्तु मां स्वभृत्यो ऽहमिति ज॥ , ट॥ च :प् ३५१ चामूनां पृष्ठतो गत्वा रिपुनाशा नमो ऽस्तु वः(१) ।विनिवृत्तः प्रदास्यामि(२) दत्तादभ्यधिकं बलिं

2 rātrāvityādiḥ, satyaja ity antaḥ pāṭhaḥ ga.. pustake nāsti 3 mardayantu ca me śatrūniti gha.. , ña.. ca 4 avantu māṃ svabhṛtyo 'hamiti ja.. , ṭa.. ca :p 351 cāmūnāṃ pṛṣṭhato gatvā ripunāśā namo 'stu vaḥ(1) / vinivṛttaḥ pradāsyāmi(2) dattādabhyadhikaṃ baliṃ

हिन्दी अर्थ

अकस्मात् हैवबलसे सम्पन्न हुए पुरुषके साथ छिड्नेवाला हो, (१४) जिसके अधिक बलशाली मित्र हों, ऐसे पुरुषके साथ जो छिड्नेवाला हो, (१५) जो वर्तमान कालमें फलद, किंतु भविष्यमें

English

Having gone behind the armies, homage to you, destroyers of enemies. Returning, I shall give an offering greater than what is given."

अध्याय २३४

श्लोक 15

षष्ठे ऽह्नि विजयस्नानं कर्तव्यं चाभिषेकवत् ।यात्रादिने सप्तमे च पूजयेच्च त्रिविक्रमं

ṣaṣṭhe 'hni vijayasnānaṃ kartavyaṃ cābhiṣekavat / yātrādine saptame ca pūjayecca trivikramaṃ

हिन्दी अर्थ

निष्फल हो तथा (१६) जो भविष्यमें फलद किंतु वर्तमानमें निष्फल हो-इन सोलह प्रकारके विग्रहोंमें कभी हाथ न डाले। जो वर्तमान और भविष्यमें परिशुद्ध पूर्णतः लाभदायक हो, वही विग्रह राजाको छेड्ना चाहिए

English

On the sixth day the victory bath should be done like a consecration. On the seventh day of the journey one should worship Trivikrama;

अध्याय २३४

श्लोक 16

नीराजनोक्तमन्त्रैश् च आयुधं वाहनं यजेत् ।पुण्याहजयशब्देन मन्त्रमेतन्निशामयेत्

nīrājanoktamantraiś ca āyudhaṃ vāhanaṃ yajet / puṇyāhajayaśabdena mantrametanniśāmayet

हिन्दी अर्थ

राजा जब अच्छी तरह समझ ले कि मेरी सेना हृष्ट-पुष्ट अर्थात् उत्साह और शक्तिसे सम्पन्न है तथा शत्रुको अवस्था इसके विपरीत है, तब वह उसका निग्रह करनेके लिये विग्रह आरम्भ करे।

English

with the mantras stated in the lustration one should worship weapon and vehicle; with the sound of auspicious day and victory one should listen to this mantra:

अध्याय २३४

श्लोक 17

दिव्यान्तरीक्षभूमिष्ठाः सन्त्वायुर्दाः सुराश् च ते ।देवसिद्धिं प्राप्नुहि त्वं देवयात्रास्तु(३) सा तव

divyāntarīkṣabhūmiṣṭhāḥ santvāyurdāḥ surāś ca te / devasiddhiṃ prāpnuhi tvaṃ devayātrāstu(3) sā tava

हिन्दी अर्थ

जब मित्र, आक्रन्द तथा आक्रन्दासार -इन तीनोंकी राजाके प्रति दृढ़भक्ति हो तथा शत्रुके मित्र आदि विपरीत स्थितिमें हों अर्थात् उसके प्रति भक्तिभाव न रखते हों, तब उसके साथ विग्रह आरम्भ (जिसके बल एवं पराक्रम उच्च कोटिके हों, जो विजिगीषुके गुणोंसे सम्पन्न हो और विजयकी अभिलाषा रखता हो तथा जिसकी अमात्यादि प्रकृति उसके सद्गुणोंसे उसमें अनुरक्त हो, ऐसे

English

"May the gods dwelling in heaven, sky and earth be givers of life to you; obtain success of the gods; may that be your divine journey.

अध्याय २३४

श्लोक 18

रक्षन्तु देवताः सर्वा इति श्रुत्वा नृपो व्रजेत् ।गृहीत्वा सशरञ्चापं धनुर्नागेति मन्त्रत

rakṣantu devatāḥ sarvā iti śrutvā nṛpo vrajet / gṛhītvā saśarañcāpaṃ dhanurnāgeti mantrata

हिन्दी अर्थ

राजाका युद्धके लिये यात्रा करना “यान' कहलाता है।) विगृह्यामन, संधायगमन, सम्भूयगमन, प्रसङ्गतः

English

May all deities protect" — hearing this the king should go. Taking the bow with arrow, with the mantra "dhanur naga,"

अध्याय २३४

श्लोक 19

तद्विष्णोरिति जप्त्वाथ दद्याद्रिपुमुखे पदं ।दक्षिणं पदं द्वात्रिंशद्दिक्षु प्राच्यादिषु क्रमात्

tadviṣṇoriti japtvātha dadyādripumukhe padaṃ / dakṣiṇaṃ padaṃ dvātriṃśaddikṣu prācyādiṣu kramāt

हिन्दी अर्थ

यानके पाँच भेद कहे गये हैं बलवान् राजा जब समस्त शत्रुओंके साथ विग्रह आरम्भ करके युद्धके लिये यात्रा करता है, तब उसकी उस यात्राको नीतिशास्त्रके विद्वान् ' विगृह्यगमन' कहते हैं; अथवा शत्रुके समस्त मित्रोंको अर्थात् उसके आगे और पीछेके शुभचिन्तकोंको अपने सामने और पीछेवाले मित्रोद्वारा छेड़े गये विग्रहमें फँसाकर शत्रुपर जो चढ़ाई की जाती है, उसे ' विगृह्ययमन' या 'विगृह्ययान' कहते हैं। जब अपनी चेष्टामें अवरोध उत्पन्न करनेवाले सभी प्रकारके शत्रुओंके साथ संधि करके जो एकमात्र किसी अन्य शत्रुपर आक्रमण

English

having recited "tad vishnoh," he should place his foot on the enemy's face; the right foot in thirty-two directions in order beginning with the east;

अध्याय २३४

श्लोक 20

नागं रथं हयञ्चैव धुर्यांश् चैवारुहेत् क्रमात् ।आरुह्य वाद्यैर् गच्छेत् पृष्थतो नावलोकयेत्

nāgaṃ rathaṃ hayañcaiva dhuryāṃś caivāruhet kramāt / āruhya vādyair gacchet pṛṣthato nāvalokayet

हिन्दी अर्थ

किया जाता है, वह 'संधायगमन' कहा जाता है। अथवा आपने पार्ष्णिग्राह संज्ञावाले पृष्ठवर्ती शत्रुके साथ संधि करके जो अन्यत्र -- अपने सामनेवाले शत्रुपर आक्रमणके लिये यात्रा की जाती है, विजिगीषुकी उस यात्राको भी 'संधायगमन' कहते हैं। सामूहिक लाभमें समानरूपसे भागी होनेवाले सामन्तोंके साथ, जो शक्ति और शुद्धभावसे युक्त हों, एकीभूत होकर मिलकर जो किसी एक ही शत्रुपर चढ़ाई की जाती है, उसका नाम 'सम्भूयगमन' है। अथवा जो विजिगीषु और उसके शत्रु दोनोंकी प्रकृतियोंका विनाश करनेके कारण

English

he should mount in order elephant, chariot, horse and draught animals. Having mounted, he should go with music, not looking behind;

अध्याय २३४

श्लोक 21

क्रोशमात्रं गतस्तिष्ठेत् पूजयेद्देवता द्विजान् ।परदेशं व्रजेत् पश्चादात्मसैन्यं हि पालयन्

krośamātraṃ gatastiṣṭhet pūjayeddevatā dvijān / paradeśaṃ vrajet paścādātmasainyaṃ hi pālayan

हिन्दी अर्थ

दोनोंका शत्रु हो, उसके प्रति विजिगीषु तथा शत्रु दोनोंका मिलकर युद्धके लिये यात्रा करना ' सम्भूयगमन' है। इसके उदाहरण हैं-सूर्य और हनुमान्। हनुमान् बाल्यावस्थामें लोहित सूर्यमण्डलको उदित हुआ देख, “यह क्या है'-इस बातको जाननेके लिये बालोचित चपलतावश उछलकर उसे पकड्नेके लिये आगे बढ़े। निकट पहुँचनेपर उन्होंने देखा कि भानुको ग्रहण करनेके लिये स्वर्भानु (राहु) आया है। फिर तो उसे ही अपना प्रतिद्वद्वी जान हनुमानजी उसपर टूट पड़े। उस समय सूर्यने भी अपने प्रमुख शत्रु राहुको दबानेके लिये अपने भोले-भाले शत्रु हनुमानजीका ही साथ दिया। एकपर आक्रमण करनेके लिये प्रस्थित हुआ राजा यदि प्रसङ्गवश उसके विरोधी दूसरे पक्षको अपने आक्रमणका लक्ष्य बना लेता है तो उसकी उस यात्राको ' प्रसङ्गतःगमन' या 'प्रसङ्गयान' कहते हैं। इसके दृष्टान्त हैं राजा शल्य। वे दुर्योधनपर पाण्डवपक्षसे आक्रमणके लिये चले थे, किंतु मार्गमें दुर्योधनके अति सत्कारसे प्रसन्न हो उसे वर माँगनेके लिये कहकर उसको प्रार्थनासे उसीके सेनापति हो गये और अपने भानजे युधिष्ठिरको ही अपने आक्रमणका लक्ष्य बनाया।

English

having gone a krosha he should stop and worship the deities and Brahmins. Afterward he should go to the enemy country protecting his own army.

अध्याय २३४

श्लोक 22

राजा प्राप्य देवेशन्तु(४) देशपालन्तु पालयेत्(५) ।देवानां पूजनं कुर्यान्न छिन्द्यादायमत्र तु

rājā prāpya deveśantu(4) deśapālantu pālayet(5) / devānāṃ pūjanaṃ kuryānna chindyādāyamatra tu

हिन्दी अर्थ

शत्रुके प्रति आक्रमण करनेवाले विजिगीषुको रोकनेके लिये यदि उस शत्रुके बलवान् मित्र आ पहुँचे तो उस शत्रुकी उपेक्षा करके उसके उन मित्रोंपर ही चढ़ाई करना “उपेक्षायान' कहलाता है-जैसे इन्द्रकी आज्ञासे निवातकवचोंका वध करनेके लिये प्रस्थित हुए अर्जुनको रोकनेके निमित्त जब हिरण्यपुरवासी 'कालकंज' नामक असुर आ पहुँचे, तब अर्जुन उन निवातकवचोंकी उपेक्षा करके कालकंजोंपर ही टूट पड़े और उनको परास्त करनेके बाद ही उन्होंने निवातकवचोंका वध किया।

English

The king, having reached the lord of gods, should protect the country-guardian; he should worship the gods and not cut the revenue there;

अध्याय २३४

श्लोक 23

नावमानयेत्तद्देश्यानागत्य स्वपुरं पुनः ।२ जित्वा शत्रुं प्रदास्यामीति ट॥ ३ जैत्रा यात्रास्त्विति ट॥ ४ प्राप्तविदेशस्तु इति ग॥ , घ॥ , ञ॥ च ५ देशाचारन्तु पालयेदिति ख॥ ।देशाचारणेण पालयेदिति ग॥ , घ॥ , छ॥ , ज॥ , ञ॥ च :प् ३५२ जयं प्राप्यार्चयेद्देवान् दद्याद्दानानि पार्थिवः

nāvamānayettaddeśyānāgatya svapuraṃ punaḥ / 2 jitvā śatruṃ pradāsyāmīti ṭa.. 3 jaitrā yātrāstviti ṭa.. 4 prāptavideśastu iti ga.. , gha.. , ña.. ca 5 deśācārantu pālayediti kha.. / deśācāraṇeṇa pālayediti ga.. , gha.. , cha.. , ja.. , ña.. ca :p 352 jayaṃ prāpyārcayeddevān dadyāddānāni pārthivaḥ

हिन्दी अर्थ

जब विजिगीषु और शत्रु-दोनों एक-दूसरेको शक्तिका विधात न कर सकनेके कारण आक्रमण न करके बैठ रहें तो इसे 'आसन' कहा जाता है; इसके भी 'यान'की ही भाँति पाँच भेद होते हैं-१. विगृह्य आसन, २. संधाय

English

he should not insult the people of that country; having come again to his own city, having obtained victory, the king should worship the gods and give gifts.

अध्याय २३४

श्लोक 24

द्वितीये अहनि सङ्ग्रामो भविष्यति यदा तदा ।स्नपयेद्गजमश्वादि यजेद्देवं नृपसिंहकं

dvitīye ahani saṅgrāmo bhaviṣyati yadā tadā / snapayedgajamaśvādi yajeddevaṃ nṛpasiṃhakaṃ

हिन्दी अर्थ

दो बलवान् शत्रुओंके बीचमें पड़कर वाणीद्वारा दोनोंको ही आत्मसमर्पण करे-'मैं और मेरा! राज्य दोनोंके ही हैं', यह संदेश दोनोंके ही पास गुप्तरूपसे भेजे और स्वयं दुर्गमें छिपा रहे। यह

English

When on the second day a battle will take place, then one should bathe elephant, horse and the rest, and worship the god Nripasimha;

अध्याय २३४

श्लोक 25

छत्रादिराजलिङ्गानि शस्त्राणि निशि वै गणान् ।प्रातर्नृसिंहकं पूज्य वाहनाद्यमशेषतः

chatrādirājaliṅgāni śastrāṇi niśi vai gaṇān / prātarnṛsiṃhakaṃ pūjya vāhanādyamaśeṣataḥ

हिन्दी अर्थ

'द्रेघीभाव'की नीति है । जब उक्त दोनों शत्रु पहलेसे ही संगठित होकर आक्रमण करते हों, तब जो उनमें अधिक बलशाली हो, उसकी शरण ले। यदि वे दोनों शत्रु परस्पर मन्त्रणा करके उसके साथ किसी भी शर्तपर संधि न करना चाहते हों, तब विजिगीषु उन दोनोंके ही किसी शत्रुका आश्रय ले अथवा किसी भी अधिक शक्तिशाली राजाकी शरण लेकर आत्मरक्षा करे

English

the umbrella and other royal insignia, weapons at night, and the hosts; in the morning having worshipped Narasimha, vehicles and the rest entirely,

अध्याय २३४

श्लोक 26

पुरोधसा हुतं पश्येद्वह्निं हुत्वा द्विजान्यजेत् ।गृहीत्वा सशरञ्चापं गजाद्यारुह्य वै व्रजेत्

purodhasā hutaṃ paśyedvahniṃ hutvā dvijānyajet / gṛhītvā saśarañcāpaṃ gajādyāruhya vai vrajet

हिन्दी अर्थ

यदि विजिगीषुपर किसी बलवान् शत्रुका आक्रमण हो और वह उच्छिन्न होने लगे तथा किसी उपायसे उस संकटका निवारण करना उसके लिये असम्भव हो जाय, तब वह किसी

English

he should see the fire oblation done by the priest; having offered, worship Brahmins; taking bow with arrows, mounting an elephant and the rest, he should go.

अध्याय २३४

श्लोक 27

देशे त्वदृश्यः शत्रूणां कुर्यात् प्रकृतिकल्पनां ।संहतान् योधयेदल्पान् कामं विस्तारयेद्बहून्

deśe tvadṛśyaḥ śatrūṇāṃ kuryāt prakṛtikalpanāṃ / saṃhatān yodhayedalpān kāmaṃ vistārayedbahūn

हिन्दी अर्थ

कुलीन, सत्यवादी, सदाचारी तथा शत्रुकी अपेक्षा अधिक बलशाली राजाकी शरण ले। उस आश्रयदाताके दर्शनके लिये उसको आराधना करना, सदा उसके अभिप्रायके अनुकूल चलना, उसीके लिये कार्य करना और सदा उसके प्रति आदरका भाव रखना-यह आश्रय लेनेवालेका व्यवहार बतलाया गया है

English

In the country, unseen by enemies, he should arrange the constituents; he should make a few fight in a compact body, spread the many as desired.

अध्याय २३४

श्लोक 28

सूचीमुखमनीकं स्यादल्पानां बहुभिः सह ।व्यूहाः प्राण्यङ्गरूपाश् च द्रव्यरूपाश् च कीर्तिताः

sūcīmukhamanīkaṃ syādalpānāṃ bahubhiḥ saha / vyūhāḥ prāṇyaṅgarūpāś ca dravyarūpāś ca kīrtitāḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें “बाड्गुण्यकथन' नामक दो सौ चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

An army for a few with many would be needle-faced. Formations are declared in the form of animal limbs and of objects:

अध्याय २३४

श्लोक 29

गरुडो मकरव्यूहश् चक्रः श्येनस्तथैव च ।अर्धचन्द्रश् च वज्रश् च शकटव्यूह एव च

garuḍo makaravyūhaś cakraḥ śyenastathaiva ca / ardhacandraś ca vajraś ca śakaṭavyūha eva ca

हिन्दी अर्थ

जब शत्रु और विजिगीषु परस्पर आक्रमण करके कारणवशात् युद्ध बंद करके बैठ जायँ तो इसे “विगृह्यासन' कहते हैं। यह एक प्रकार है। विजिगीषु शत्रुके किसी प्रदेशको क्षति पहुँचाकर जब स्वतः युद्धसे विरत होकर बैठ जाता है, तब यह भी 'विगृह्यासन' कहलाता है।

English

Garuda, Makara formation, Wheel, Hawk likewise, Half-moon, Thunderbolt, and Cart formation,

अध्याय २३४

श्लोक 30

मण्डलः सर्वतोभद्रः सूचीव्यूहश् च ते नराः ।व्यूहानामथ सर्वेषां पञ्चधा सैन्यकल्पना

maṇḍalaḥ sarvatobhadraḥ sūcīvyūhaś ca te narāḥ / vyūhānāmatha sarveṣāṃ pañcadhā sainyakalpanā

हिन्दी अर्थ

यदि शत्रु दुर्गके भीतर स्थित होनेके कारण पकड़ा न जा सके, तो उसके आसार ( मित्रवर्ग) तथा बीज (अनाजको फसल

English

Circle, All-auspicious, and Needle formation — those men. For all formations the army arrangement is fivefold:

अध्याय २३४

श्लोक 31

द्वौ पक्षावनुपक्षौ द्वावश्यं पञ्चमं भवेत् ।एकेन यदि वा द्वाभ्यां भागाभ्यां युद्धमाचरेत्

dvau pakṣāvanupakṣau dvāvaśyaṃ pañcamaṃ bhavet / ekena yadi vā dvābhyāṃ bhāgābhyāṃ yuddhamācaret

हिन्दी अर्थ

आदि)-को नष्ट करके उसके साथ विग्रह छोड़कर बैठ रहे दीर्घकालतक ऐसा करनेसे प्रजा आदि प्रकृतियाँ उस शत्रु राजासे विरक्त हो जाती हैं। अतः समयानुसार वह वशीभूत हो जाता है। शत्रु और विजिगीषु समान बलशाली होनेके कारण युद्ध छिड्नेपर जब समानरूपसे क्षीण होने लगें, तब परस्पर संधि करके बैठ जायँ। यह “संधाय आसन' कहलाता है । पूर्वकालमें निवातकवचोंके साथ जब दिग्विजयी रावणका युद्ध होने लगा, तब दोनों पक्ष ब्रह्माजीके वरदानसे शक्तिशाली होनेके कारण एक-दूसरेको परास्त न कर सके। उस दशामें ब्रह्माजीको ही बीचमें डालकर रावण संधि करके बैठ रहा। यह 'संधाय आसन' का उदाहरण है।

English

two wings, two supporting wings, and a fifth, the reserve; one should fight with one or two parts;

अध्याय २३४

श्लोक 32

भागत्रयं स्थापयेत्तु तेषां रक्षार्थमेव च ।न व्यूहकल्पना कार्या राज्ञो भवति कर्हिचित्

bhāgatrayaṃ sthāpayettu teṣāṃ rakṣārthameva ca / na vyūhakalpanā kāryā rājño bhavati karhicit

हिन्दी अर्थ

विजिगीषु और उसके शत्रुको उदासीन और मध्यमसे आक्रमणकी समानरूपसे शङ्का हो, तब उन दोनोंको मिल जाना चाहिए। इस प्रकार मिलकर बैठना ' सम्भूय आसन' कहलाता है। जब मध्यम और उदासीनमेंसे कोई-सा भी विजिगीषु और उसके शत्रु -- दोनोंका विनाश करना चाहता हो, तब वह उन दोनोंका शत्रु समझा जाता है; उस दशामें विजिगीषु अपने शत्रुके साथ मिलकर दोनोंके ही अधिक बलवान् शत्रुभूत उस मध्यम या उदासीनका सामना करें। यही “सम्भूय आसन' है।

English

three parts one should station for their protection. The king should never be made part of the formation;

अध्याय २३४

श्लोक 33

मूलच्छेदे विनाशः स्यान्न युध्येच्च स्वयन्नृपः ।सैन्यस्य पश्चात्तिष्ठेत्तु क्रोशमात्रे महीपतिः

mūlacchede vināśaḥ syānna yudhyecca svayannṛpaḥ / sainyasya paścāttiṣṭhettu krośamātre mahīpatiḥ

हिन्दी अर्थ

यदि विजिगीषु किसी अन्य शत्रुपर आक्रमणकी इच्छा रखता हो; किंतु कार्यान्तर (अर्थलाभ या अनर्थ-प्रतिकार)-के प्रसङ्ग से अन्यत्र बैठे रहे तो इसे “प्रसङ्गासन' कहते हैं। अधिक शक्तिशाली शत्रुकी उपेक्षा करके अपने स्थानपर बैठे रहना 'उपेक्षासन' कहलाता है। भगवान् श्रीकृष्णने जब पारिजातहरण किया था, उस समय उन्हें अधिक शक्तिशाली जानकर इन्द्रदेव उपेक्षा करके बैठ रहे, यह उपेक्षासनका उदाहरण है। इसका एक दूसरा उदाहरण रुक्मी है। महाभारत-युद्धमें वह क्रथ और क्रैशिकोंकी सेना लेकर बारी-बारीसे कौरवों और पाण्डवोंके पास गया और बोला, 'यदि तुम डरे हुए हो तो हम तुम्हारी सहायता करके तुम्हें विजय दिलायें।' उसकी इस बातपर दोनोंने उसको

English

if the root is cut, destruction results; the king should not fight himself. The king should stay a krosha behind the army;

अध्याय २३४

श्लोक 34

भग्नसन्धारणं तत्र योधानां परिकीर्तितं ।प्रधानभङ्गे सैन्यस्य नाशस्थानं विधीयते

bhagnasandhāraṇaṃ tatra yodhānāṃ parikīrtitaṃ / pradhānabhaṅge sainyasya nāśasthānaṃ vidhīyate

हिन्दी अर्थ

उपेक्षा कर दी। अतः वह किसी ओरसे युद्ध न करके अपने घरपर ही बैठा रहा।

English

there the rallying of the broken warriors is declared; when the chief is broken the army meets its place of destruction.

अध्याय २३४

श्लोक 35

न संहतान्न विरलान्योधान् व्यूहे प्रकल्पयेत् ।आयुधानान्तु सम्मर्दो यथा न स्यात् परस्परं

na saṃhatānna viralānyodhān vyūhe prakalpayet / āyudhānāntu sammardo yathā na syāt parasparaṃ

हिन्दी अर्थ

श्रीराम कहते हैं-- ' लक्ष्मण! प्रभावशक्ति और उत्साह-शक्तिसे मन्त्रशक्ति श्रेष्ठ बतायी गयी है। प्रभाव और उत्साहसे सम्पन्न शुक्राचार्यको देवपुरोहित बृहस्पतिने मन्त्र-बलसे जीत लिया जो विश्वसनीय होनेके साथ-ही-साथ नीतिशास्त्रका विद्वान् हो, उसीके साथ राजा अपने कर्तव्यके विषयमें मन्त्रणा करे। (जो विश्वसनीय

English

One should not arrange warriors in a formation too close or too sparse, so that weapons do not crowd one another;

अध्याय २३४

श्लोक 36

भेत्तुकामः परानीकं संहतैर् एव भेदयेत् ।भेदरक्ष्याः परेणापि कर्तव्याः संहतास् तथा

bhettukāmaḥ parānīkaṃ saṃhatair eva bhedayet / bhedarakṣyāḥ pareṇāpi kartavyāḥ saṃhatās tathā

हिन्दी अर्थ

अविश्वसनीय हो, ऐसे मन्त्रीको त्याग दे। कौन कार्य किया जा सकता है और कौन अशक्य है, इसका स्वच्छ बुद्धिसे विवेचन करे।) जो अशक्य कार्यका आरम्भ करते हैं, उन्हें क्लेश

English

one wishing to break the enemy's force should break with compact ones; those protected from breaking should be kept compact by the enemy too.

अध्याय २३४

श्लोक 37

व्यूहं भेदावहं कुर्यात् परव्यूहेषु चेच्छया ।गजस्य पादरक्षार्थाश् चत्वारस्तु तथा द्विज

vyūhaṃ bhedāvahaṃ kuryāt paravyūheṣu cecchayā / gajasya pādarakṣārthāś catvārastu tathā dvija

हिन्दी अर्थ

उठानेके सिवा कोई फल कैसे प्राप्त हो सकता है ? अविज्ञात (परोक्ष)-का ज्ञान, विज्ञातका निश्चय, कर्तव्यके विषयमें दुविधा उत्पन्न होनेपर संशयका

English

One should make a formation that breaks others' formations at will. Four men for protecting an elephant's feet, twice-born,

अध्याय २३४

श्लोक 38

रथस्य चाश्वाश् चत्वारः समास्तस्य च चर्मिणः ।धन्विनश् चर्मिभिस्तुल्याः पुरस्ताच्चर्मिणो रणे

rathasya cāśvāś catvāraḥ samāstasya ca carmiṇaḥ / dhanvinaś carmibhistulyāḥ purastāccarmiṇo raṇe

हिन्दी अर्थ

कर्तव्य)-की उपलब्धि--ये सब मन्त्रियोंके ही अधीन हैं। सहायक, कार्यसाधनके उपाय, देश और कालका विभाग, विपत्तिका निवारण तथा कर्तव्यको सिद्धि--ये मन्त्रियोंकी मन्त्रणाके पाँच

English

and four horses for a chariot; equal to it are those with shields; archers equal to shield-bearers; in battle shield-bearers in front,

अध्याय २३४

श्लोक 39

पृष्ठतो धन्विनः प्रश्चाद्धन्विनान्तुरगा रथाः ।रथानां कुञ्जराः पश्चाद्दातव्याः पृथिवीक्षिता

pṛṣṭhato dhanvinaḥ praścāddhanvinānturagā rathāḥ / rathānāṃ kuñjarāḥ paścāddātavyāḥ pṛthivīkṣitā

हिन्दी अर्थ

मनको प्रसन्नता, श्रद्धा (कार्यसिद्धिके विषयमें हढ़ विश्वास), जञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियोंकी स्वविषयक व्यापारमें क्षमता, सहाय-सम्पत्ति (सहायकोंका बाहुल्य अथवा सत्त्वादि गुणोंका योग) तथा उत्थान-सम्पत्ति (शीघ्रतापूर्वक उत्थान करनेका स्वभाव)-ये

English

archers behind, horses behind archers, chariots; behind chariots elephants should be placed by the king.

अध्याय २३४

श्लोक 40

पदातिकुञ्जराश्वानां धर्मकार्यं प्रयत्नतः ।शूराः प्रमुखतो देयाः स्कन्धमात्रप्रदर्शनं

padātikuñjarāśvānāṃ dharmakāryaṃ prayatnataḥ / śūrāḥ pramukhato deyāḥ skandhamātrapradarśanaṃ

हिन्दी अर्थ

कर्मोकी सिद्धिके लक्षण हैं

English

The duty of infantry, elephants and horses is to be carried out with effort. Brave ones should be placed in front, showing only shoulder;

अध्याय २३४

श्लोक 41

कर्तव्यं भीरुसङ्घेन शत्रुविद्रावकारकं(१) ।दारयन्ति पुरस्तात्तु न देया भीरवः पुरः

kartavyaṃ bhīrusaṅghena śatruvidrāvakārakaṃ(1) / dārayanti purastāttu na deyā bhīravaḥ puraḥ

हिन्दी अर्थ

मद (मदिरा आदिका नशा), प्रमाद (कार्यान्तरके प्रसङ्गसे असावधानी), काम (कामभावनासे प्रेरित होकर स््त्रियोंपर विश्वास), स्वप्नावस्थामें किये गये प्रलाप, खंभे आदिकी ओटमें लुके-छिपे लोग, पार्श्ववर्तिनी कामिनियाँ तथा उपेक्षित प्राणी (तोता, मैना, बालक, बहरे आदि) -ये मन्त्रका भेदन करनेमें कारण बनते हैं

English

the troop of the timid should do what makes the enemy flee; those who tear in front, the timid should not be placed in front;

अध्याय २३४

श्लोक 42

प्रोत्साहन्त्येव रणे भीरून् शूराः पुरस्थिताः ।प्रांशवः शकुनाशाश् च ये चाजिह्मेक्षणा(२) नराः

protsāhantyeva raṇe bhīrūn śūrāḥ purasthitāḥ / prāṃśavaḥ śakunāśāś ca ye cājihmekṣaṇā(2) narāḥ

हिन्दी अर्थ

सभामें निर्भीक बोलनेवाला, स्मरणशक्तिसे सम्पन्न, प्रवचन-कुशल, शस्त्र और शास्त्रमें परिनिष्ठित तथा दूतोचित कर्मके अभ्याससे सम्पन्न पुरुष राजदूत होनेके योग्य होता है। निसृष्टार्थ

English

the brave standing in front encourage the timid in battle. Tall men, those who see omens and those of straight gaze,

अध्याय २३४

श्लोक 43

संहतभ्रूयुगाश् चैव क्रोधना कलहप्रियाः ।नित्यहृष्टाः प्रहृष्टाश् च शूरा ज्ञेयाश् चकामिनः

saṃhatabhrūyugāś caiva krodhanā kalahapriyāḥ / nityahṛṣṭāḥ prahṛṣṭāś ca śūrā jñeyāś cakāminaḥ

हिन्दी अर्थ

(जिसपर संधि-विग्रह आदि कार्यको इच्छानुसार करनेका पूरा भार सौंपा गया हो, वह), मितार्थ (जिसे परिमित कार्य-भार दिया गया हो, यथा-- इतना ही करना या इतना ही बोलना चाहिए), तथा शासनहारक (लिखित आदेशको पहुँचानेवाला) “ये दूतके तीन भेद कहे गये हैं

English

with brows joined, angry, fond of quarrels, ever glad and exultant, are to be known as brave, and the amorous.

अध्याय २३४

श्लोक 44

संहतानां हतानां च रणापनयनक्रिया(३) ।प्रतियुद्धं गजानाञ्च तोयदानादिकञ्च यत्

saṃhatānāṃ hatānāṃ ca raṇāpanayanakriyā(3) / pratiyuddhaṃ gajānāñca toyadānādikañca yat

हिन्दी अर्थ

दूत अपने आगमनकी सूचना दिये बिना शत्रुके दुर्ग तथा संसद्में प्रवेश न करे (अन्यथा वह संदेहका पात्र बन जाता है)। वह कार्यसिद्धिके लिये समयकी प्रतीक्षा करे तथा शत्रु राजाकी

English

The act of removing the compact and the slain from the battle, counter-fighting of elephants and the giving of water and the like,

अध्याय २३४

श्लोक 45

१ शत्रुद्रावकारणमिति ख॥ , ग॥ , घ॥ , ञ॥ च २ ये च जिह्मेक्षणा इति ख॥ , ग॥ , घ॥ , ञ॥ च ३ वलापनयनक्रियेति ज॥ :प् ३५४ आयुधानयनं चैव पत्तिकर्म विधीयते ।रिपूणां भेत्तुकामानां स्वसैन्यस्य तु रक्षणं

1 śatrudrāvakāraṇamiti kha.. , ga.. , gha.. , ña.. ca 2 ye ca jihmekṣaṇā iti kha.. , ga.. , gha.. , ña.. ca 3 valāpanayanakriyeti ja.. :p 354 āyudhānayanaṃ caiva pattikarma vidhīyate / ripūṇāṃ bhettukāmānāṃ svasainyasya tu rakṣaṇaṃ

हिन्दी अर्थ

आज्ञा लेकर वहाँसे विदा हो। उसे शत्रुके छिद्र (दुर्बलता)-को जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। उसके कोष, मित्र और सेनाके विषयमें भी वह जाने तथा शत्रुको दृष्टि एवं शरीरको चेष्टाओंसे अपने प्रति राग और विरक्तिका भी अनुमान कर लेना चाहिए

English

fetching weapons, is ordained as infantry work; protecting one's own army from enemies wishing to break it,

अध्याय २३४

श्लोक 46

भेदनं संहतानाञ्च चर्मिणां कर्म कीर्तितं ।विमुखीकरणं युद्धे धन्विनां च तथोच्यते

bhedanaṃ saṃhatānāñca carmiṇāṃ karma kīrtitaṃ / vimukhīkaraṇaṃ yuddhe dhanvināṃ ca tathocyate

हिन्दी अर्थ

वह उभय पक्षोंके कुलकी (यथा--'आप उदितोदित कुलके रल हैं' आदि), नामकी (यथा-- “आपका नाम दिग्दिगन्तमें विख्यात है' इत्यादि), द्रव्यको (यथा--' आपका द्रव्य परोपकारमें लगता

English

and breaking the compact, is declared the shield-bearers' work; turning away in battle is likewise said of archers;

अध्याय २३४

श्लोक 47

दूरापसरणं यानं सुहतस्य तथोच्यते ।त्रासनं रिपुसैन्यानां रथकर्म तथोच्यते

dūrāpasaraṇaṃ yānaṃ suhatasya tathocyate / trāsanaṃ ripusainyānāṃ rathakarma tathocyate

हिन्दी अर्थ

है' इत्यादि) तथा श्रेष्ठ कर्मको (यथा--' आपके सत्कर्मको श्रेष्ठ लोग भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं' आदि कहकर) बड़ाई करे। इस तरह चतुर्विध स्तुति करनी चाहिए। तपस्वीके वेषमें रहनेवाले ४६४ अग्निपुराण

English

retreat far and transport for the well-slain is said; terrifying the enemy army is said to be chariot work;

अध्याय २३४

श्लोक 48

भेदनं संहतानाञ्च भेदानामपि संहतिः ।प्राकारतोरणाट्टालद्रुमभङ्गश् च सङ्गते

bhedanaṃ saṃhatānāñca bhedānāmapi saṃhatiḥ / prākāratoraṇāṭṭāladrumabhaṅgaś ca saṅgate

हिन्दी अर्थ

अपने चरोंके साथ संवाद करे। अर्थात् उनसे बात करके यथार्थ स्थितिको जाननेकी चेष्टा करे

English

breaking the compact and rejoining the broken; breaking ramparts, gates, watchtowers and trees in an encounter.

अध्याय २३४

श्लोक 49

पत्तिभूर्विषमा ज्ञेया रथाश्वस्य तथा समा ।सकर्दमा च नागानां युद्धभूमिरुदाहृता

pattibhūrviṣamā jñeyā rathāśvasya tathā samā / sakardamā ca nāgānāṃ yuddhabhūmirudāhṛtā

हिन्दी अर्थ

चर दो प्रकारके होते हैं--प्रकाश (प्रकट) और अप्रकाश (गुप्त)। इनमें जो प्रकाश है, उसकी 'दूत' संज्ञा है और अप्रकाश 'चर' कहा गया है। वणिक् (वैदेहक), किसान (गृहपति), (उदास्थित), अध्यापक (छात्रवृत्तिसे रहनेवाला - कार्पटिक)-इन चारोंकी स्थितिके लिये संस्थाएँ हैं। इनके लिये वृत्ति (जीविका)-को व्यवस्था की जानी चाहिए, जिससे ये सुखसे रह

English

The ground for infantry is to be known as uneven, for chariot and horse level, and for elephants muddy: so the battlefield is declared.

अध्याय २३४

श्लोक 50

एवं विरचितव्यूहः कृतपृष्ठदिवाकरः ।तथानुलोमशुक्रार्किदिक्पालमृदुमारुताः

evaṃ viracitavyūhaḥ kṛtapṛṣṭhadivākaraḥ / tathānulomaśukrārkidikpālamṛdumārutāḥ

हिन्दी अर्थ

जब दूतकी चेष्टा विफल हो जाय तथा शत्रु व्यसनग्रस्त हो, तब उसपर चढ़ाई करे॥ १२ ३ ॥

English

Thus with the formation arranged, the sun at his back, and favorable Venus, sun, direction-guardians and gentle wind,

अध्याय २३४

श्लोक 51

योधानुत्तेजयेत्सर्वान्नामगोत्रावदानतः ।भोगप्राप्त्या च विजये स्वर्गप्राप्त्या मृतस्य च

yodhānuttejayetsarvānnāmagotrāvadānataḥ / bhogaprāptyā ca vijaye svargaprāptyā mṛtasya ca

हिन्दी अर्थ

जिससे अपनी प्रकृतियाँ व्यसनग्रस्त हो गयी हों, उस कारणको शान्त करके विजिगीषु शत्रुपर चढ़ाई करे। व्यसन दो प्रकारके होते हैं-मानुष और हैव। अनय और अपनय दोनोंके संयोगसे प्रकृति-व्यसन प्राप्त होता है । अथवा केवल हैवसे भी उसकी प्राप्ति होती है। वह श्रेय (अभीष्ट अर्थ)-को व्यस्त (क्षिप्त या नष्ट) कर देता है, इसलिये 'व्यसन' कहलाता है। अग्नि (आग लगना),

English

one should rouse all warriors by names, clans and deeds: with enjoyment obtained in victory and heaven obtained for the dead;

अध्याय २३४

श्लोक 52

जित्वारीन् भोगसम्प्राप्तिः मृतस्य च परा गतिः ।निष्कृतिः स्वामिपिण्डस्य नास्ति युद्धसमा गतिः

jitvārīn bhogasamprāptiḥ mṛtasya ca parā gatiḥ / niṣkṛtiḥ svāmipiṇḍasya nāsti yuddhasamā gatiḥ

हिन्दी अर्थ

जल (अतिवृष्टि या बाढ़), रोग, दुर्भिक्ष (अकाल पड़ना) और मरक (महामारी) -ये पाँच प्रकारके “हैव-व्यसन' हैं। शेष “मानुष-व्यसन' हैं। पुरुषार्थ अथवा अथर्ववेदोक्त शान्तिकर्मसे हैव-व्यसनका

English

having conquered enemies, enjoyment is gained; for the dead, the supreme goal. Repayment of the master's rice: there is no goal equal to battle.

अध्याय २३४

श्लोक 53

शूराणां रक्तमायाति तेन पापन्त्यजन्ति ते ।धातादिदुःखसहनं रणे तत् परमन्तपः

śūrāṇāṃ raktamāyāti tena pāpantyajanti te / dhātādiduḥkhasahanaṃ raṇe tat paramantapaḥ

हिन्दी अर्थ

निवारण करे। उत्थान-शीलता (दुर्गादि- साम आदिके प्रयोगके द्वारा मानुष-व्यसनकी शान्ति करे॥ १३-१५ ३॥

English

The blood of the brave comes forth; by it they abandon sin. Enduring the pain of wounds and the like in battle is the supreme austerity.

अध्याय २३४

श्लोक 54

वराप्सरःसहस्राणि यान्ति शूरं रणे मृतं ।स्वामी सुकृतमादत्ते भग्नानां विनिवर्तिनां

varāpsaraḥsahasrāṇi yānti śūraṃ raṇe mṛtaṃ / svāmī sukṛtamādatte bhagnānāṃ vinivartināṃ

हिन्दी अर्थ

कार्यका अनुष्ठान, भावी उन्नतिका सम्पादन, आय- व्यय, दण्डनीति, शत्रुका निवारण तथा व्यसनको टालनेका उपाय, राजा एवं राज्यकी रक्षा-ये सब अमात्यके कर्म हैं। यदि अमात्य व्यसनग्रस्त

English

Thousands of excellent Apsarases go to the brave one dead in battle; the master takes the merit of the broken who turn back.

अध्याय २३४

श्लोक 55

ब्रह्महत्याफलं तेषां तथा प्रोक्तं पदे पदे ।त्यक्त्वा सहायान् यो गच्छेद्देवास्तस्य विनष्टये

brahmahatyāphalaṃ teṣāṃ tathā proktaṃ pade pade / tyaktvā sahāyān yo gaccheddevāstasya vinaṣṭaye

हिन्दी अर्थ

हो तो वह इन सब कर्माको नष्ट कर देता है॥ १६-१७ ३ ॥ ्रव्योंका संग्रह जनपदवासिनी प्रजाके कर्म हैं। यदि प्रजा व्यसनग्रस्त हो तो वह उपर्युक्त सब कार्योंका नाश कर डालती है

English

For them the fruit of Brahmin-killing is declared at every step; the gods are for the destruction of one who goes, abandoning his companions.

अध्याय २३४

श्लोक 56

अश्वमेधफलं प्रोक्तं शूराणामनिर्वर्तिनां ।धर्मनिष्ठे जयो राज्ञि(१) योद्धव्याश् च समाः समैः

aśvamedhaphalaṃ proktaṃ śūrāṇāmanirvartināṃ / dharmaniṣṭhe jayo rājñi(1) yoddhavyāś ca samāḥ samaiḥ

हिन्दी अर्थ

आपत्तिकालमें प्रजाजनोंकी रक्षा, कोष और सेनाकी रक्षा, गुप्त या आकस्मिक युद्ध, आपत्तिग्रस्त जनोंकी रक्षा, संकटमें पड़े हुए मित्रों और अमित्रोंका संग्रह तथा सामन्तों और वनवासियोंसे प्राप्त

English

The fruit of the Ashvamedha is declared for the brave who do not turn back. Victory is with the king firm in dharma; equals should fight equals,

अध्याय २३४

श्लोक 57

गजाद्यैश् च गजाद्याश् च न हन्तव्याः पलायिनः ।न प्रेक्षकाः प्रविष्टाश् च अशस्त्राः प्रतितादयः

gajādyaiś ca gajādyāś ca na hantavyāḥ palāyinaḥ / na prekṣakāḥ praviṣṭāś ca aśastrāḥ pratitādayaḥ

हिन्दी अर्थ

होनेवाली बाधाओंका निवारण भी दुर्गका आश्रय लेनेसे होता है। नगरके नागरिक भी शरण लेनेके लिये दुर्गपतियोंका कोष आदिके द्वारा उपकार करते हैं। (यदि दुर्ग विपत्तिग्रस्त हो जाय तो ये सब कार्य विपन्न हो जाते हैं।)

English

elephants and the rest with elephants and the rest; fugitives are not to be killed, nor spectators, nor those who entered, unarmed, or struck;

अध्याय २३४

श्लोक 58

शान्ते निद्राभिभूते च अर्धोत्तीर्णे नदीवने ।दुर्दिने कूटयुद्धानि शत्रुनाशार्थमाचरेत्

śānte nidrābhibhūte ca ardhottīrṇe nadīvane / durdine kūṭayuddhāni śatrunāśārthamācaret

हिन्दी अर्थ

भृत्यों (सैनिक आदि)-का भरण-पोषण, दानकर्म, भूषण, हाथी-घोड़े आदिका खरीदना, स्थिरता, शत्रुपक्षकी लुब्ध प्रकृतियोमें धन देकर फूट डालना, दुर्गका संस्कार (मरम्मत और

English

against the peaceful, the sleep-overcome, the half-crossed in river or forest, in bad weather, one may practice deceitful warfare for destroying the enemy.

अध्याय २३४

श्लोक 59

बाहू प्रगृह्य विक्रोशेद्भग्ना भग्नाः परे इति ।प्राप्तं मित्रं बलं भूरि नायको ऽत्र निपातितः

bāhū pragṛhya vikrośedbhagnā bhagnāḥ pare iti / prāptaṃ mitraṃ balaṃ bhūri nāyako 'tra nipātitaḥ

हिन्दी अर्थ

सजावट), सेतुबन्ध (खेतीके लिये जलसंचय करनेके निमित्त बाँध आदिका निर्माण), वाणिज्य, प्रजा और मित्रोंका संग्रह, धर्म, अर्थ एवं कामकी सिद्धि-ये सब कार्य कोषसे सम्पादित होते हैं। कोषसम्बन्धी व्यसनसे राजा इन सबका नाश कर देता है; क्योंकि राजाका मूल है-- कोष

English

Raising arms one should cry out: "The enemies are broken, broken! Friends and great force have arrived; the leader here has fallen;

अध्याय २३४

श्लोक 60

सेनानीर्निहताश्चायं भूपतिश्चापि विप्लुतः ।विद्रुतानान्तु योधानां मुखं घातो विधीयते

senānīrnihatāścāyaṃ bhūpatiścāpi viplutaḥ / vidrutānāntu yodhānāṃ mukhaṃ ghāto vidhīyate

हिन्दी अर्थ

मित्र, अमित्र (अपकारकी इच्छावाले शत्रु),

English

the commander is killed and the king too is routed." Striking at the front of fleeing warriors is ordained.

अध्याय २३४

श्लोक 61

धूपाश् च देया धर्मज्ञ तथा च परमोहनाः ।पताकाश् चैव सम्भारो वादित्राणाम् भयावहः

dhūpāś ca deyā dharmajña tathā ca paramohanāḥ / patākāś caiva sambhāro vāditrāṇām bhayāvahaḥ

हिन्दी अर्थ

१. यहाँ कोष्ठमें दिये गये 'वैदेहक' आदि शब्द “वणिक्? आदि संस्थाओंके चरोंके नामान्तर हैं। २. इन कमाँमें मन्त्र या कार्यका निश्चय मन्त्रीके अधीन है, शत्रुओंको दूरसे ही भगाकर मन्त्रसाध्य फलको प्राप्ति दूतके अधीन है, कार्यका अनुष्ठान (दुर्गादिकर्मकी प्रवृत्ति) अध्यक्षके अधीन है, आयति अथवा भावी उन्नतिका सम्पादन अमात्योंके अधीन है, आय और व्यय अक्षपटलिक (अर्थमन्त्री)-के अधीन हैं, दण्डनीति धर्मस्थ (न्यायाधिकारी)-के हाथमें है तथा शत्रुओका निवारण मित्र-साध्य कर्म है--ऐसा विभाग जयमङ्गलाकारने किया है।

English

Incenses should be given, knower of dharma, and also great bewilderers; banners and a mass of instruments are fear-causing.

अध्याय २३४

श्लोक 62

सम्प्राप्य विजयं युद्धे देवान्विप्रांश् च संयजेत्(२) ।रत्नानि राजगामीनि अमात्येन कृते रणे

samprāpya vijayaṃ yuddhe devānviprāṃś ca saṃyajet(2) / ratnāni rājagāmīni amātyena kṛte raṇe

हिन्दी अर्थ

सुवर्ण और भूमिको अपने वशमें करना, शत्रुओंको कुचल डालना, दूरके कार्यको शीघ्र पूरा करा लेना इत्यादि कार्य दण्ड (सेना)-द्वारा साध्य हैं। उसपर संकट आनेसे ये सब कार्य बिगड़ जाते

English

Having obtained victory in battle one should worship gods and Brahmins. Jewels gained in war by a minister go to the king;

अध्याय २३४

श्लोक 63

तस्य स्त्रियो न कस्यापि रक्ष्यास्ताश् च परस्य च ।शत्रुं प्राप्य रणे मुक्तं पुत्रवत् परिपालयेत्

tasya striyo na kasyāpi rakṣyāstāś ca parasya ca / śatruṃ prāpya raṇe muktaṃ putravat paripālayet

हिन्दी अर्थ

“मित्र' विजिगीषुके विचलित होनेवाले मित्रोंको रोकता है-उनमें सुस्थिर ख्रेह पैदा करता है, उसके शत्रुओंका नाश करता है तथा धन आदिसे विजिगीषुका उपकार करता है। ये सब मित्रसे सिद्ध होनेवाले कार्य हैं। मित्रके व्यसनग्रस्त होनेपर ये कार्य नष्ट होते हैं

English

his women are not to be protected by anyone else, nor others' by him. An enemy released in battle should be protected like a son;

अध्याय २३४

श्लोक 64

पुनस्तेन न योद्धव्यं देशाचारादि पालयेत् ।ततश् च स्वपुरं प्राप्य ध्रुवे भे प्रविशेद् गृहं

punastena na yoddhavyaṃ deśācārādi pālayet / tataś ca svapuraṃ prāpya dhruve bhe praviśed gṛhaṃ

हिन्दी अर्थ

यदि राजा व्यसनी हो तो समस्त राजकायाँको नष्ट कर देता है। कठोर वचन बोलकर दूसरोंको

English

he should not be fought again; one should maintain the country's customs and the like. Then having reached his own city, he should enter the house under a fixed star,

अध्याय २३४

श्लोक 65

देवादिपूजनं कुर्याद्रक्षेद्योधकुटुम्बकं ।संविभागं प्रावाप्तैः कुर्याद् भृत्यजनस्य च

devādipūjanaṃ kuryādrakṣedyodhakuṭumbakaṃ / saṃvibhāgaṃ prāvāptaiḥ kuryād bhṛtyajanasya ca

हिन्दी अर्थ

(वाणीद्वारा पहलेकी दी हुई वस्तुको न देना, दी हुईको छीन लेना, चोरी आदिके द्वारा धनका नाश होना तथा प्राप्त हुए धनको त्याग देना), मदिरापान, स्त्रीविषयक आसक्ति, शिकार खेलनेमें अधिक तत्पर रहना और जूआ खेलना-ये राजाके व्यसन हैं

English

perform worship of the gods and the rest, protect the warriors' families; one should make a distribution to the servants from what is obtained.

अध्याय २३४

श्लोक 66

रणादीक्षा मयोक्ता ते जयाय नृपतेर्ध्रुवा

raṇādīkṣā mayoktā te jayāya nṛpaterdhruvā /

हिन्दी अर्थ

आलस्य (उद्योगशून्यता), स्तब्धता (बड़ोंके सामने उद्दण्डता या मान-प्रदर्शन), दर्प (शौर्यादिका अहंकार), प्रमाद (असावधानता), बिना कारण

English

The war-initiation has been told to you, certain for the king's victory.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 234
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.