Agni Purana· Agni Purāṇa
240
अध्याय 240 / 381

Adhyaya 241

73 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ73 श्लोक

श्लोक पर जाएं:

अध्याय २४०

श्लोक 1

राजनीतिः राम उवाच षड्विधन्तु बलं व्यूह्य देवान् प्रार्च्य रिपुं व्रजेत् ।मौलं भूतं श्रोणिसुहृद्द्विषदाटविकं बलं

rājanītiḥ rāma uvāca ṣaḍvidhantu balaṃ vyūhya devān prārcya ripuṃ vrajet / maulaṃ bhūtaṃ śroṇisuhṛddviṣadāṭavikaṃ balaṃ

हिन्दी अर्थ

वसिष्ठपुत्रि नन्दे! सब प्रकारके बीजोंसे युक्त एवं सम्पूर्ण रत्नोंसे सम्पन्न इस मनोरम नन्दनवनमें विहार करो। प्रजापतिपुत्रि! देवि भद्रे! तुम उत्तम लक्षणों एवं श्रेष्ठ व्रतको धारण करनेवाली हो; कश्यपनन्दिनि! इस भूमिमय चतुष्कोणभवनमें निवास करो। भार्गवतनये देवि ! तुम सम्पूर्ण विश्वको ऐश्वर्य प्रदान करनेवाली हो; श्रेष्ठ आचायोँद्वारा पूजित एवं गन्ध और मालाओंसे अलंकृत मेरे

English

If the sapindikarana has to be performed for a (dead) person within a year (after death), the food for him should be given to a brahmin the whole year together with a vessel filled with water.

अध्याय २४०

श्लोक 2

पूर्वं पूर्वं गरीयस्तु बलानां व्यसनं तथा ।षडङ्गं मन्त्रकोषाभ्यां पदात्यश्वरथद्विपैः

pūrvaṃ pūrvaṃ garīyastu balānāṃ vyasanaṃ tathā / ṣaḍaṅgaṃ mantrakoṣābhyāṃ padātyaśvarathadvipaiḥ

हिन्दी अर्थ

गृहमें निवास करो । अङ्गिरा ऋषिकी पुत्रि पूर्णे! तुम भी सम्पूर्ण अज्ोंसे युक्त तथा क्षतिरहित मेरे घरमें रमण करो। इष्टके! मैं गृहप्रतिष्ठा करा रहा हूँ, तुम मुझे अभिलषित भोग प्रदान करो।

English

The ceremony should be done on the day of death for every month in a year and should be done for every year as the food (offered) every month.

अध्याय २४०

श्लोक 3

नद्यद्रवनदुर्गेषु यत्र यत्र भयं भवेत् ।सेनापतिस्तत्र तत्र गच्छेद्व्यूहीकृतैर् बलैः

nadyadravanadurgeṣu yatra yatra bhayaṃ bhavet / senāpatistatra tatra gacchedvyūhīkṛtair balaiḥ

हिन्दी अर्थ

देशस्वामी, नगरस्वामी और गृहस्वामीके संचयमें मनुष्य, धन, हाथी-घोड़े और पशुओंकी वृद्धि करो '॥ १६--२२ ३॥ गृहप्रवेशके समय भी इसी प्रकार शिलान्यास करना चाहिए। घरके उत्तरमें प्लक्ष (पाकड़) तथा पूर्वमें वटवृक्ष शुभ होता है। दक्षिणमें गूलर और पश्चिममें पीपलका वृक्ष उत्तम माना जाता

English

ApS. S. 1.9.12 a; T. Dh. 1.253.

अध्याय २४०

श्लोक 4

नायकः पुरतो यायात् प्रवीरपुरुषावृतः ।मध्ये कलत्रं स्वामी च कोषः फल्गु च यद्बलं

nāyakaḥ purato yāyāt pravīrapuruṣāvṛtaḥ / madhye kalatraṃ svāmī ca koṣaḥ phalgu ca yadbalaṃ

हिन्दी अर्थ

है। घरके वामपार्थ्में उद्यान बनावे। ऐसे घरमें निवास करना शुभ होता है। लगाये हुए वृक्षोंको ग्रीष्मकालमें प्रात:-सायं, शीतऋतुमें मध्याहके समय तथा वर्षाकालमें भूमिके सूख जानेपर सींचना

English

See p. 453. fn. 7.

अध्याय २४०

श्लोक 5

पार्श्वयोरुभयोरश्वा वाजिनां पार्श्वयो रथाः ।रथानां पार्श्वयोर्नागा नागानां चाटवीबलं

pārśvayorubhayoraśvā vājināṃ pārśvayo rathāḥ / rathānāṃ pārśvayornāgā nāgānāṃ cāṭavībalaṃ

हिन्दी अर्थ

चाहिए। वृक्षोंको बायविडंग और घृतमिश्रित शीतल जलसे सींचे। जिन वृक्षोंक फल लगने बंद हो गये हों, उनको कुलथी, उड़द, मूँग, तिल और जौ मिले हुए जलसे सींचना चाहिए। घृतयुक्त शीतल दुग्धके सेचनसे वृक्ष सदा फल-पुष्पसे

English

The rite performed to merge the soul of the dead i|son with the- ancestors.

अध्याय २४०

श्लोक 6

पश्चात् सेनापतिः सर्वं पुरस्कृत्य कृती स्वयं ।यायात्सन्नद्धसैन्यौघः खिन्नानाश्वासयञ्च्छनैः

paścāt senāpatiḥ sarvaṃ puraskṛtya kṛtī svayaṃ / yāyātsannaddhasainyaughaḥ khinnānāśvāsayañcchanaiḥ

हिन्दी अर्थ

युक्त रहते हैं। मत्स्यवाले जलके सेचनसे वृक्षोंकी वृद्धि होती है। भेड़ और बकरीकी लेंड़ीका चूर्ण, जौका चूर्ण, तिल, अन्य गोबर आदि खाद एवं जल--इन सबको सात दिनतक ढककर

English

Y.Dh. 1.299.

अध्याय २४०

श्लोक 7

यायाद्व्यूहेन महता मकरेण पुरोभये ।श्येनेनोद्धृतपक्षेण सूच्या वा वीरवक्त्रया

yāyādvyūhena mahatā makareṇa purobhaye / śyenenoddhṛtapakṣeṇa sūcyā vā vīravaktrayā

हिन्दी अर्थ

रखे। इसका सेचन सभी प्रकारके वृक्षोंके फल- पुष्प आदिकी वृद्धि करनेवाला है। आम्रवृक्षोंका शीतल जलसे सेचन उत्तम माना गया है। अशोक वृक्षे विकासके लिये कामिनियोंके चरणका प्रहार प्रशस्त है। खजूर और नारियल आदि वृक्ष लवणयुक्त जलसे वृद्धिको प्राप्त होते हैं। बायविडंग तथा जलके द्वारा सेचन सभी वृक्षोंके लिये उत्तम दोहद है

English

Y.Dh. 1.299.

अध्याय २४०

श्लोक 8

पश्चाद्भये तु शकटं पार्श्वयोर्वज्रसञ्ज्ञितं(१) ।सर्वतः सर्वतोभद्रं भये व्यूहं प्रकल्पयेत्

paścādbhaye tu śakaṭaṃ pārśvayorvajrasañjñitaṃ(1) / sarvataḥ sarvatobhadraṃ bhaye vyūhaṃ prakalpayet

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें 'वास्तुलक्षण-कथन' नामक दो सौ सैँतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

APS. S. 5.28.11.

अध्याय २४०

श्लोक 9

कन्दरे शैलगहने निम्नगावनसङ्कटे ।दीर्घाध्वनि परिश्रान्तं क्षुत्पिपासाहितक्लमं

kandare śailagahane nimnagāvanasaṅkaṭe / dīrghādhvani pariśrāntaṃ kṣutpipāsāhitaklamaṃ

हिन्दी अर्थ

विष्णु आदिके पूजनमें उपयोगी पुष्पोंका कथन अग्निदेव कहते हैं-वसिष्ठ! पुष्पोंसे पूजन करनेपर भगवान् श्रीहरि सम्पूर्ण कार्योमें सिद्धि प्रदान करते हैं। मालती, मल्लिका, यूथिका, गुलाब, कनेर, पावन्ती, अतिमुक्तक, कर्णिकार,

English

ApS. S. 3.13.1.

अध्याय २४०

श्लोक 10

व्याधिदुर्भिक्षमरकपीडितं दस्युविद्रुतं ।पङ्कांशुजलस्कन्धं व्यस्तं पुञ्जीकृतं पथि

vyādhidurbhikṣamarakapīḍitaṃ dasyuvidrutaṃ / paṅkāṃśujalaskandhaṃ vyastaṃ puñjīkṛtaṃ pathi

हिन्दी अर्थ

वनमल्लिका, अशोक, तिलक, कुन्द और तमाल इनके पुष्प पूजाके लिये उपयोगी माने गये हैं। बिल्वपत्र, शमीपत्र, भृङ्गराजके पत्र, तुलसी, कृष्णतुलसी तथा वासक (अडूसा)-के पत्र पूजनमें

English

ApS. S. 17.21.7.

अध्याय २४०

श्लोक 11

प्रसुप्तं भोजनव्यग्रमभूमिष्ठमसुस्थितं ।चौराग्निभयवित्रस्तं वृष्टिवातसमाहतं

prasuptaṃ bhojanavyagramabhūmiṣṭhamasusthitaṃ / caurāgnibhayavitrastaṃ vṛṣṭivātasamāhataṃ

हिन्दी अर्थ

ग्राह्य माने गये हैं। केतकीके पत्र और पुष्प, पद्म एवं रक्तकमल -ये भी पूजामें ग्रहण किये जाते हैं । मदार, धत्तूर, गुञ्जा, पर्वतीय मल्लिका, कुटज, शाल्मलि और कटेरीके फूलोंका पूजामें प्रयोग नहीं करना चाहिए। प्रस्थमात्र घृतसे भगवान् विष्णुका अभिषेक करनेपर करोड़ गौओंके दान करनेका फल मिलता है। एक आढक घृतसे अभिषेक करनेवाला राज्य तथा घृतमिश्रित दुग्धसे अभिषेक

English

V. Saifa. 19.75a.

अध्याय २४०

श्लोक 12

इत्यादौ स्वचमूं रक्षेत् प्रसैन्यं च घतयेत् ।विशिष्टो देशकालाभ्यां भिन्नविप्रकृतिर्बली

ityādau svacamūṃ rakṣet prasainyaṃ ca ghatayet / viśiṣṭo deśakālābhyāṃ bhinnaviprakṛtirbalī

हिन्दी अर्थ

करनेवाला स्वर्गको प्राप्त करता है

English

Y.Dh. 1.300. RV. 10.9.4a...

अध्याय २४०

श्लोक 13

कुर्यात् प्रकाशयुद्धं हि कूटयुद्धं विपर्यये ।तेष्ववस्कन्दकालेषु परं हन्यात्समाकुलं

kuryāt prakāśayuddhaṃ hi kūṭayuddhaṃ viparyaye / teṣvavaskandakāleṣu paraṃ hanyātsamākulaṃ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्रेय महापृराणमें “पुष्पादिसे पूजनके फलका कथन” नामक दो सौ अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ धनुर्वेदका' वर्णन--युद्ध और अस्त्रके भेद, आठ प्रकारके स्थान, धनुष, बाणको ग्रहण करने और छोड़नेकी विधि आदिका कथन

English

APS. S. 16.24.1.

अध्याय २४०

श्लोक 14

१ वज्रसङ्कटमिति ख॥ , छ॥ च :प् ३७७ अभूमिष्ठं स्वभूमिष्ठं स्वभूमौ चोपजायतः ।प्रकृतिप्रग्रहाकृष्टं पाशैर् वनचरादिभिः

1 vajrasaṅkaṭamiti kha.. , cha.. ca :p 377 abhūmiṣṭhaṃ svabhūmiṣṭhaṃ svabhūmau copajāyataḥ / prakṛtipragrahākṛṣṭaṃ pāśair vanacarādibhiḥ

हिन्दी अर्थ

अग्निदेव कहते हैं-- वसिष्ठ! अब मैं चारु मुक्तसंधारित, अमुक्त और बाहुयुद्ध-ये ही पादोंसे युक्त धनुर्वेदका वर्णन करता हूँ। धनुर्वेद धनुर्वेदके पाँच' प्रकार कहे गये हैं। उसमें भी पाँच प्रकारका होता है। रथ, हाथी, घोड़े और शस्त्र-सम्पत्ति और अस्त्र-सम्पत्तिके भेदसे युद्ध पैदल-सम्बन्धी योद्धाओंका आश्रय लेकर इसका दो प्रकारका बताया गया है। ऋजुयुद्ध और

English

ApS. S. 20.16.3. iiV. 1.6.3a.

अध्याय २४०

श्लोक 15

हन्यात् प्रवीरपुरुषैर् भङ्गदानापकर्षणैः ।पुरस्ताद्दर्शनं दत्वा तल्लक्षकृतनिश् चयात्

hanyāt pravīrapuruṣair bhaṅgadānāpakarṣaṇaiḥ / purastāddarśanaṃ datvā tallakṣakṛtaniś cayāt

हिन्दी अर्थ

वर्णन किया गया है। यन्त्रमुक्त, पाणिमुक्त, मायायुद्धके भेदसे उसके पुनः दो भेद हो जाते १. 'धनुर्वेद' यजुर्वेदका उपवेद है । प्राचीनकालमें प्रायः सभी सभ्य देशोंमें इस विद्याका प्रचार था। भारतवर्षमें इस विद्याके बड़े-बड़े ग्रन्थ थे, जिन्हें क्षत्रियकुमार अभ्यासपूर्वक पढ़ते थे। आजकल वे ग्रन्थ प्रायः लुप्त हो गये हैं। कुछ थोड़े-से ग्रन्थोमे इस विद्याका संक्षिप्त वर्णन मिलता है। जैसे शुक्रनीति, कामन्दकीय नीतिसार, अग्निपुराण, वीरचिन्तामणि, वृद्ध शार्ङ्गधर, युद्धजयार्णव, युक्तिकल्पतरु तथा नीतिमयूख आदि । ' धनुर्वेद-संहिता' नामक एक अलग भी पुस्तक मिलती है। नेपाल (काठमाण्डू) गोरखनाथ

English

One should contemplate the soul, the lord that remains in the heart like a lamp, having his mind, intellect, memory and the senses not resting on any other object.

अध्याय २४०

श्लोक 16

हन्यात्पश्चात् प्रवीरेण बलेनोपेत्य वेगिना ।पश्चाद्वा सङ्कुलीकृत्य हन्याच्छूरेण पूर्वतः

hanyātpaścāt pravīreṇa balenopetya veginā / paścādvā saṅkulīkṛtya hanyācchūreṇa pūrvataḥ

हिन्दी अर्थ

मठके महन्थ योगी नरहरिनाथने भी धनुर्वेदकी एक प्राचीन पुस्तक उपलब्ध की है। कुछ विद्वान् ब्रह्मा और महेश्वरसे इस उपवेदका प्रादुर्भाव मानते हैं, परन्तु मधुसूदन सरस्वतीका कथन है कि 'विश्वामित्रने जिस धनुर्वेदका प्रकाश किया था, यजुर्वेदका उपवेद वही है।' “बीरचिन्तामणि'में धनुर्वेदकी बड़ी प्रशंसा की गयी है। ' धनुर्वेद-संहिता'में लिखा है कि (दुष्टों, दस्युओं और चोर आदिसे साधुपुरुषोंका संरक्षण और धर्मानुसार प्रजापालन ' धनुर्वेद 'का प्रयोजन है'। अग्निपुराणके इन चार अध्यायोंमें धनुर्वेद-विषयक महत्त्वपूर्ण

English

One should give things got from a cow, curd, ghee, and milk. Saffron, mas Ur a (a kind of pulse), vdrtaku (egg-plant) and kodrava (a species of grain) should not (be given).

अध्याय २४०

श्लोक 17

आभ्यां पार्श्वाभिघातौ तु व्याख्यातौ कूटयोधने ।पुरस्ताद्विषमे देशे पश्चाद्धन्यात्तु वेगवान्

ābhyāṃ pārśvābhighātau tu vyākhyātau kūṭayodhane / purastādviṣame deśe paścāddhanyāttu vegavān

हिन्दी अर्थ

बातोंपर संक्षेपसे ही प्रकाश डाला गया है। धनुर्वेदपर इस समय जो ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं, उनसे अग्निपुराणगत धनुर्वेदका पाठ नहीं मिलता। विश्वकोषमें ' धनुर्वेद शब्दपर अग्निपुराणके ये ही चार अध्याय उद्धृत किये गये हैं। कतिपय हस्तलिखित प्रतियोंके अनुसार जो पाठ-भेद उपलब्ध हुए हैं, उन्हें दष्टिमें रखते हुए इन अध्यायोंका अविकल अनुवाद करनेको चेष्टा की गयी है। साङ्गवेद विद्यालय, काशीके नैयायिक विद्वान् श्रीहेबूबर शास्त्री काश्मीर-पुस्तकालयसे अग्निपुराणके धनुर्वेद-प्रकरणपर कुछ पाठभेद संग्रह करके लाये थे, उससे भी इस प्रकरणको लगानेमें सहयोग मिला है । तथापि कुछ शब्द अस्पष्ट रह गये हैं । माननीय विद्वानोंको धनुर्वेदके विषयमें विशेष ध्यान देकर अनुसंधान करना-कराना चाहिए, जिससे भारतकी इस प्राचीन विद्याका पुनरुद्धार हो सके। (अनुवादक)

English

When the son of Sirfthikd (Ketu) swallows the Sun (that is, there is an eclipse of the Sun due to the descending node of the Moon) at the junctions of the lunar fortnights, it is known to be hasticchdyd. The ceremony and gift made then (yield) undiminishing (benefits).

अध्याय २४०

श्लोक 18

पुरः पश्चात्तु विषमे एवमेव तु पार्श्वयोः ।प्रथमं योधयित्वा तु दूष्यामित्राटवीबलौ

puraḥ paścāttu viṣame evameva tu pārśvayoḥ / prathamaṃ yodhayitvā tu dūṣyāmitrāṭavībalau

हिन्दी अर्थ

२. महाभारत, आदिपर्व, अध्याय २२०, श्लोक ७२ में लिखा है कि “शत्रुदमन बालक अभिमन्युने वेदोंका ज्ञान प्राप्त करके अपने पिता अर्जुनसे चार पादों और दशविध अङ्गोंसे युक्त दिव्य एवं मानुष-सब प्रकारके धनुर्वेदका ज्ञान प्राप्त कर लिया।' इन चार पादोंको स्पष्ट करते हुए आचार्य नीलकण्ठने 'मन्त्रमुक्त', ' पाणिमुक्त ', ' मुक्तामुक्त' और ' अमुक्त'-इन चार नामोंका निर्देश किया है। परंतु मधुसूदन सरस्वतीने अपने 'प्रस्थानभेद'में धनुर्वेदका जो संक्षिप्त विवरण दिया है, उसमें चार पादोंका उल्लेख इस प्रकार

English

The remnant of that offered unto the fire should not be given in the (rite of) vaiivadeva. The fees should be paid on the hand of the brahmin in the absence of fire.

अध्याय २४०

श्लोक 19

श्रान्तं मन्दन्निराक्रन्दं हन्यादश्रान्तवाहनं ।दूष्यामित्रबलैर् वापि भङ्गन्दत्वा प्रयत्नवान्

śrāntaṃ mandannirākrandaṃ hanyādaśrāntavāhanaṃ / dūṣyāmitrabalair vāpi bhaṅgandatvā prayatnavān

हिन्दी अर्थ

हुआ है-दीक्षापाद, संग्रहपाद, सिद्धिपाद और प्रयोगपाद। पूर्वोक्त मन्त्रमुक्त आदि भेद आयुधोंके हैं, वे पादोंके नाम नहीं हैं। “मुक्तसंधारित'। इन चारोंके साथ बाहुयुद्धको भी जोड़कर अग्निपुराणमें धनुर्वेद, अस्त्र या युद्धके पाँच प्रकार ही निर्दिष्ट किये गये हैं। अतः धनुर्वेदके चार पाद उपर्युक्त दीक्षा आदि ही ठीक जान पड़ते हैं।

English

All those (the senses) which look externally should be made (to look) inward. The collection of senses (should lie) in the mind. The mind should be united in the soul.

अध्याय २४०

श्लोक 20

जितमित्येव विश्वस्तं हन्यान्मन्त्रव्यपाश्रयः ।स्कन्धावारपुरग्रामशस्यस्वामिप्रजादिषु

jitamityeva viśvastaṃ hanyānmantravyapāśrayaḥ / skandhāvārapuragrāmaśasyasvāmiprajādiṣu

हिन्दी अर्थ

३. महाभारतमें ' चतुष्पादं दशविधम्' कहकर धनुर्वेदके दस प्रकार कहे गये हैं। परंतु अग्निपुराणसे उसका कोई विरोध नहीं है।

English

That matter which (one thinks) as non-existent in all the worlds is spoken to be as present. That which is spoken (as being present) does not remain in the heart of another (other than a yogi).

अध्याय २४०

श्लोक 21

विश्रभ्यन्तं परानीकमप्रमत्तो विनाशयेत् ।अथवा गोग्रहाकृष्टं तल्लक्ष्यं मार्गबन्धनात्

viśrabhyantaṃ parānīkamapramatto vināśayet / athavā gograhākṛṣṭaṃ tallakṣyaṃ mārgabandhanāt

हिन्दी अर्थ

ही दस भेदोंका कथन हुआ है। उन दस अङ्गोंके नाम नीलकण्ठने इस प्रकार लिखे हैं-आदान, संधान, मोक्षण, निवर्तन, स्थान, मुष्टि, प्रयोग, प्रायश्चित्त, मण्डल तथा रहस्य। इन सबका परिचय इस प्रकार है-तरकससे बाणको निकालना ' आदान' है। उसे धनुषकी प्रत्यज्ञापर रखना 'संधान' है। लक्ष्यपर छोड़ना “मोक्षण' कहा गया है। यदि बाण छोड़ देनेके बाद यह मालूम हो जाय कि हमारा विपक्षी निर्बल या शस्त्रहीन है, तो वीर पुरुष मन्त्रशक्तिसे उस बाणको लौटा लेते हैं । इस प्रकार छोड़े हुए अस्त्रको लौटा लेना ' निवर्तन ' कहलाता है। धनुष या उसकी प्रत्यञ्चाके धारण अथवा शरसंधानकालमें धनुष और प्रत्यञ्चाके मध्यदेशको 'स्थान' कहा गया है। तीन या चार अँगुलियोंका सहयोग ही 'मुष्टि' है। तर्जनी और मध्यमा अँगुलीसे अथवा मध्यमा और अङ्गु्ठसे बाणका संधान करना 'प्रयोग' कहलाता है। स्वतः या दूसरेसे प्राप्त होनेवाले ज्याघात (प्रत्यञ्चाके आघात) और बाणके आघातको रोकनेके लिये जो दस्ताने आदिका प्रयोग किया जाता है, उसका नाम 'प्रायक्चित्त' है। चक्राकार घूमते हुए रथके साथ-साथ घूमनेवाले लक्ष्यका वेध 'मण्डल' कहलाता

English

As a virgin (does not know) the happiness of a woman so also that brahman is really unknowable. One who is not a yogin never knows it just as a born-blind person (does not know) the pot.

अध्याय २४०

श्लोक 22

अवस्कन्दभयाद्रात्रिपूजागरकृतश्रमः ।दिवासुप्तं समाहन्यान्निद्राव्याकुलसैनिकं

avaskandabhayādrātripūjāgarakṛtaśramaḥ / divāsuptaṃ samāhanyānnidrāvyākulasainikaṃ

हिन्दी अर्थ

है। शब्दके आधारपर लक्ष्य बींधना अथवा एक ही समय अनेक लक्ष्योंको बींध डालना-ये सब 'रहस्य'के अन्तर्गत हैं।

English

Having seen a renouncing brahmin, the Sun moves from his position (thinking that) "This person would pierce my orb and reach the Supreme Brahman".

अध्याय २४०

श्लोक 23

निशि विश्रब्धसंसुप्तं नागैर् वा खड्गपाणिभिः ।प्रयाने पूर्वयायित्वं वनदुर्गप्रवेशनं

niśi viśrabdhasaṃsuptaṃ nāgair vā khaḍgapāṇibhiḥ / prayāne pūrvayāyitvaṃ vanadurgapraveśanaṃ

हिन्दी अर्थ

हैं। क्षेपणी (गोफन आदि), धनुष एवं यन्त्र आदिके द्वारा जो अस्त्र फेंका जाता है, उसे “यन्त्रमुक्त' कहते हैं। (यन्त्रमुक्त अस्त्रका जहाँ अधिक प्रयोग हो, वह युद्ध भी 'यन्त्रमुक्त' ही कहलाता है।) प्रस्तरखण्ड और तोमर-यन्त्र आदिको “पाणिमुक्त' कहा गया है। भाला आदि जो अस्त्र शत्रुपर छोड़ा जाय और फिर उसे हाथमें ले लिया जाय, उसे “मुक्तसंधारित' समझना चाहिए।

English

(One would get as) a fruit of that what one would get by fasting, vow, bathing, sacred spots, the fruit of penance and the gaining of a brahmin.

अध्याय २४०

श्लोक 24

अभिन्नानामनीकानां भेदनं भिन्नसङ्ग्रहः ।विभीषकाद्वारघातं कोषरक्षेभकर्म च

abhinnānāmanīkānāṃ bhedanaṃ bhinnasaṅgrahaḥ / vibhīṣakādvāraghātaṃ koṣarakṣebhakarma ca

हिन्दी अर्थ

खड्ग (तलवार आदि)-को “अमुक्त' कहते हैं और जिसमें अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोग न करके मल्लोंकी भाँति लड़ा जाय, उस युद्धको 'नियुद्ध' या 'बाहुयुद्ध ' कहते हैं॥ १--५॥

English

Breaking of unbroken forces and gathering of the broken, frightening, striking at the gate, protecting the treasury, elephant work,

अध्याय २४०

श्लोक 25

अभिन्नभेदनं मित्रसन्धानं रथकर्म च ।वनदिङ्मार्गविचये वीवधासारलक्षणं

abhinnabhedanaṃ mitrasandhānaṃ rathakarma ca / vanadiṅmārgavicaye vīvadhāsāralakṣaṇaṃ

हिन्दी अर्थ

युद्धकी इच्छा रखनेवाला पुरुष श्रमको जीते और योग्य पात्रोंका संग्रह करे। जिनमें धनुष- बाणका प्रयोग हो, वे युद्ध श्रेष्ठ कहे गये हैं; जिनमें भालोंकी मार हो, वे मध्यम कोटिके हैं। जिनमें खड्गोंसे प्रहार किया जाय, वे निम्नश्रेणीके युद्ध हैं और बाहुयुद्ध सबसे निकृष्ट कोटिके अन्तर्गत हैं। धनुर्वेदमें क्षत्रिय और वैश्य--इन दो वर्णोका भी गुरु' ब्राह्मण ही बताया गया है।

English

breaking the unbroken, joining friends, chariot work; scouting forest, direction and paths, marking provisions and rear-support,

अध्याय २४०

श्लोक 26

अनुयानापसरणे शीघ्रकार्योपपादनं ।दीनानुसरणं घातः कोटीनां जघनस्य च

anuyānāpasaraṇe śīghrakāryopapādanaṃ / dīnānusaraṇaṃ ghātaḥ koṭīnāṃ jaghanasya ca

हिन्दी अर्थ

आपत्तिकालमें स्वयं शिक्षा लेकर शूद्रको भी युद्धका अधिकार प्राप्त है। देश या राष्ट्रमें रहनेवाले वर्णसंकरोंको भी युद्धमें राजाकी सहायता करनी चाहिए! ॥ ६--८ ॥

English

following and retreating, accomplishing quick tasks, following the wretched, striking at the tips and the rear;

अध्याय २४०

श्लोक 27

अश्वकर्माथ पत्तेश् च सर्वदा शस्त्रधारणं ।शिविरस्य च मार्गादेः शोधनं वस्तिकर्म च

aśvakarmātha patteś ca sarvadā śastradhāraṇaṃ / śivirasya ca mārgādeḥ śodhanaṃ vastikarma ca

हिन्दी अर्थ

पैर--ये एक साथ रहकर परस्पर सटे हुए हों तो लक्षणके अनुसार इसे 'समपद' नामक स्थानः कहते हैं। दोनों पैर बाह्य अङ्गलियोंके बलपर पैरोंके बीचका फैसला तीन बित्ता हो, तो यह “वैशाख'नामक स्थान कहलाता है। जिसमें दोनों घुटने हंसपंक्तिके आकारकी भाँति दिखायी देते हों और दोनोंमें चार बित्तेका अन्तर हो, वह

English

horse work and the infantry's constant bearing of weapons, clearing the camp, roads and the like, and settling work.

अध्याय २४०

श्लोक 28

संस्थूलस्थाणुवल्मीकवृक्षगुल्मापकण्टकं ।सापसारा पदातीनां भूर्नातिविषमा मता

saṃsthūlasthāṇuvalmīkavṛkṣagulmāpakaṇṭakaṃ / sāpasārā padātīnāṃ bhūrnātiviṣamā matā

हिन्दी अर्थ

'मण्डल' स्थान माना गया है। जिसमें दाहिनी जाँघ और घुटना स्तब्ध (तना हुआ) हो और दोनों पैरोंके बीचका विस्तार पाँच बित्तेका हो, उसे 'आलीढ़'नामक स्थान कहा गया है। इसके

English

Ground for infantry free of thick stumps, anthills, trees, bushes and thorns, with space to retreat, not too uneven, is held good;

अध्याय २४०

श्लोक 29

स्वल्पवृक्षोपला क्षिप्रलङ्घनीयनगा स्थिरा ।निःशर्करा विपङ्का च सापसारा च वाजिभूः

svalpavṛkṣopalā kṣipralaṅghanīyanagā sthirā / niḥśarkarā vipaṅkā ca sāpasārā ca vājibhūḥ

हिन्दी अर्थ

तथा दोनों पैरोंके बीचका विस्तार पाँच बित्ता हो, वह “प्रत्यालीढ़'नामक स्थान है। जहाँ बायाँ पैर और पार्ष्णिभाग पाँच अङ्गुलके अन्तरपर स्थित हों तो यह बारह अङ्गुल बड़ा 'स्थानक' कहा गया है। यदि बायें पैरका घुटना सीधा हो और

English

for horses ground with few trees and stones, with hills easily crossed, firm, free of gravel and mud and with room to retreat;

अध्याय २४०

श्लोक 30

निस्थाणुवृक्षकेदारा रथभूमिरकर्दमा ।मर्दनीयतरुच्छेद्यव्रततीपङ्कवर्जिता

nisthāṇuvṛkṣakedārā rathabhūmirakardamā / mardanīyatarucchedyavratatīpaṅkavarjitā

हिन्दी अर्थ

दाहिना घुटना कुन्जाकार एवं निश्चल हो या घुटनेके साथ ही दायाँ चरण दण्डाकार विशाल दिखायी दे तो ऐसी स्थितिमें 'विकट'नामक स्थान कहा गया है। इसमें दोनों पैरोंका अन्तर

English

for chariots ground without stumps, trees or ditches, free of mud, free of trees to be crushed or cut, and creepers and mud;

अध्याय २४०

श्लोक 31

निर्झरागम्यशैला(१) च विषमा गजमेदिनी ।उरस्यादीनि भिन्नानि प्रतिगृह्णन् बलानि हि

nirjharāgamyaśailā(1) ca viṣamā gajamedinī / urasyādīni bhinnāni pratigṛhṇan balāni hi

हिन्दी अर्थ

दो हाथ बड़ा होता है। जिसमें दोनों घुटने दुहरे १. 'गुरु' शब्दका अर्थ है-धनुर्वेदकी शिक्षा देनेवाला आचार्य । ' धनुर्वेदसंहिता'में सात प्रकारके युद्धोंका उल्लेख करके उन सातोंके ज्ञाताको ' आचार्य' कहा गया है-- आचार्य: सप्तयुद्धः स्यात्।' धनुष, चक्र, कुन्त, खङ्ग, क्षुरिका, गदा और बाहु -इन सातोंसे

English

for elephants uneven ground, with streams and hills not easily approached. Receiving the broken forces from the chest and the like

अध्याय २४०

श्लोक 32

प्रतिग्रह इति ख्यातो राजकार्यान्तरक्षमः ।तेन शून्यस्तु यो व्यूहः स भिन्न इव लक्ष्यते

pratigraha iti khyāto rājakāryāntarakṣamaḥ / tena śūnyastu yo vyūhaḥ sa bhinna iva lakṣyate

हिन्दी अर्थ

किये जानेवाले युद्धको ही “सात प्रकारका युद्ध' कहते हैं।

English

is called the reserve (pratigraha), capable of the king's other works; a formation empty of it appears as if broken.

अध्याय २४०

श्लोक 33

जयार्थी न च युद्ध्येत मतिमानप्रतिग्रहः ।यत्र राजा तत्र कोषः कोषाधीना हि राजता

jayārthī na ca yuddhyeta matimānapratigrahaḥ / yatra rājā tatra koṣaḥ koṣādhīnā hi rājatā

हिन्दी अर्थ

२. “वीरचिन्तामणि' के ६-७ श्लोकोंमें कहा गया है कि ' आचार्य ब्राह्मण शिष्यको धनुष, क्षत्रियको खड्ग, वैश्यको कुन्त (भाला) और शूद्रको गदाकी शिक्षा प्रदान करे।' इससे भी सूचित होता है कि अस्त्र-विद्या और युद्धकी शिक्षा सभी वर्णके लोगोंको दी जाती थी। अग्निपुराणके अनुसार वर्णसंकर भी इसकी शिक्षा पाते थे और युद्धमेंराष्ट्रकी रक्षाके लिये राजाकी सहायता करते थे।

English

The wise one desiring victory should not fight without a reserve. Where the king is, there is the treasury; kingship depends on the treasury;

अध्याय २४०

श्लोक 34

योधेभ्यस्तु ततो दद्यात् किञ्चिद्दातुं(२) न युज्यते ।द्रव्यलक्षं राजघाते तदर्धं तत्सुतार्दने

yodhebhyastu tato dadyāt kiñciddātuṃ(2) na yujyate / dravyalakṣaṃ rājaghāte tadardhaṃ tatsutārdane

हिन्दी अर्थ

३. “वीरचिन्तामणि' आदि ग्रन्थोंमें आठ प्रकारके 'स्थानों', पाँच प्रकारकी 'मुष्टियों' तथा पाँच तरहके ' व्याम' का वर्णन उपलब्ध होता है। अग्निपुराणमें 'मुष्टि' और 'व्याम'के भेद नहीं हैं। अगले अध्यायके पाँचवें श्लोकमें 'सिंहकर्ण' नामक मुष्टिको चर्चा अवश्य की गयी है। परंतु स्थानके आठों भेदोंका लक्षणसहित वर्णन उपलब्ध होता है। इस वर्णनको देखते हुए 'स्थान' शब्दका अभिप्राय योद्धाओंके युद्धस्थलमें खड़े होनेका ढंग जान पड़ता है। योद्धाओंको किस-किस ढंगसे खड़ा होना चाहिए और कौन-सा ढंग कब

English

therefore he should give to the warriors; it is not proper to give little. A lakh of wealth for killing a king; half that for harassing his son;

अध्याय २४०

श्लोक 35

सेनापतिबधे तद्वद्दद्याद्धस्त्यादिमर्दने ।अथवा खलु युध्येरन् प्रत्यश्वरथदन्तिनः

senāpatibadhe tadvaddadyāddhastyādimardane / athavā khalu yudhyeran pratyaśvarathadantinaḥ

हिन्दी अर्थ

उपयोगी होता है--इसीकी ओर इस प्रसङ्गमें संकेत किया गया है। और दोनों पैर उत्तान हो जायँ, इस विधानके योगसे जो 'स्थान' बनता है, उसका नाम ' सम्पुट' है। जहाँ कुछ घूमे हुए दोनों पैर समभावसे दण्डके समान विशाल एवं स्थिर दिखायी दें,

English

likewise for killing a commander, for crushing elephants and the like. Or warriors should fight horse against horse, chariot, elephant:

अध्याय २४०

श्लोक 36

१ निःशर्करा गम्यशैलेति ज॥ २ किं हि दातुमिति घ॥ , ञ॥ च :प् ३७९ यथा भवेदसंबाधो व्यायामविनिवर्तने ।असङ्करेण युद्धेरन् सङ्करः सङ्कुलावहः

1 niḥśarkarā gamyaśaileti ja.. 2 kiṃ hi dātumiti gha.. , ña.. ca :p 379 yathā bhavedasaṃbādho vyāyāmavinivartane / asaṅkareṇa yuddheran saṅkaraḥ saṅkulāvahaḥ

हिन्दी अर्थ

वहाँ दोनोंके बीचकी लंबाई सोलह अङ्गुलकी ही देखी गयी है। यह स्थानका यथोचित स्वरूप है

English

so that there is no obstruction in the turning back of exercise; they should fight without mixing; mixing brings confusion.

अध्याय २४०

श्लोक 37

महासङ्कुलयुद्धेषु संश्रयेरन्मतङ्गजं ।अश्वस्य प्रतियोद्धारो भवेयुः पुरुषास्त्रयः

mahāsaṅkulayuddheṣu saṃśrayeranmataṅgajaṃ / aśvasya pratiyoddhāro bhaveyuḥ puruṣāstrayaḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मन्! योद्धाओंको चाहिए कि पहले बायें हाथमें धनुष और दायें हाथमें बाण लेकर उसे चलायें और उन छोड़े हुए बाणोंको स्वस्तिकाकार करके उनके द्वारा गुरुजनोंको प्रणाम करें। धनुषका प्रेमी योद्धा “वैशाख? स्थानके सिद्ध हो जानेपर “स्थिति' (वर्तमान) या 'आयति' (भविष्य) -में जब आवश्यकता हो, धनुषपर डोरीको फैलाकर धनुषकी निचली कोटि और बाणके फलदेशको

English

In great confused fights they should take refuge with an elephant. Three men should be opponents for a horse;

अध्याय २४०

श्लोक 38

इति कल्प्यास्त्रयश्चाश्वा विधेयाः कुञ्जरस्य तु ।पादगोपा भवेयुश् च पुरुषा दश पञ्च च

iti kalpyāstrayaścāśvā vidheyāḥ kuñjarasya tu / pādagopā bhaveyuś ca puruṣā daśa pañca ca

हिन्दी अर्थ

धरतीपर टिकाकर रखे और उसी अवस्थामें मुड़ी

English

thus three horses should be arranged for an elephant; and fifteen men should be foot-guards;

अध्याय २४०

श्लोक 39

विधानमिति नागस्य विहितं स्यन्दनस्य च ।अनीकमिति विज्ञेयमिति कल्प्या नव द्विपाः

vidhānamiti nāgasya vihitaṃ syandanasya ca / anīkamiti vijñeyamiti kalpyā nava dvipāḥ

हिन्दी अर्थ

व्रतका पालन करनेवाले वसिष्ठ! उस योद्धाके बाणसे धनुष सर्वथा बड़ा होना चाहिए और मुष्टिके सामने बाणके पुङ्ख तथा धनुषके डंडेमें बारह अङ्गुलका अन्तर होना चाहिए। ऐसी स्थिति हो तो धनुर्दण्डको प्रत्यञ्चासे संयुक्त कर देना चाहिए। वह अधिक छोटा या बड़ा नहीं होना चाहिए

English

thus the arrangement for an elephant and for a chariot is prescribed. An "anika" is to be known: nine elephants are to be arranged;

अध्याय २४०

श्लोक 40

तथानीकस्य रन्ध्रन्तु पञ्चधा च प्रचक्षते ।इत्यनीकविभगेन स्थापयेद् व्यूहसम्पदः

tathānīkasya randhrantu pañcadhā ca pracakṣate / ityanīkavibhagena sthāpayed vyūhasampadaḥ

हिन्दी अर्थ

धनुषको नाभिस्थानमें और बाण-संचयको नितम्बपर रखकर उठे हुए हाथको आँख और कानके बीचमें कर ले तथा उस अवस्थामें बाणको फेंके। पहले बाणको मुट्ठीमें पकड़े और उसे

English

and the gap of the anika is said to be fivefold; so by division of the anika one should establish the riches of formations.

अध्याय २४०

श्लोक 41

उरस्यकक्षपक्षांस्तु कल्प्यानेतान् प्रचक्षते ।उरःकक्षौ च पक्षौ च मध्यं पृष्ठं प्रतिग्रहः

urasyakakṣapakṣāṃstu kalpyānetān pracakṣate / uraḥkakṣau ca pakṣau ca madhyaṃ pṛṣṭhaṃ pratigrahaḥ

हिन्दी अर्थ

दाहिने स्तनाग्रको सीधमें रखे। तदनन्तर उसे प्रत्यज्ञापर ले जाकर उस मौवी (डोरी या प्रत्यञ्चा)- को खींचकर पूर्णरूपसे फैलावे। प्रत्यञ्चा न तो आवेष्टित। वह सम, स्थिरतासे युक्त और दण्डको भाँति सीधी होनी चाहिए। इस प्रकार पहले इस

English

The chest, flanks and wings are these arrangements: chest, flanks and wings, middle, back, reserve,

अध्याय २४०

श्लोक 42

कोटी च व्यूहशास्त्रज्ञैः सप्ताङ्गो व्यूह उच्यते ।उरस्यकक्षपक्षास्तु व्यूहो ऽयं सप्रतिग्रहः

koṭī ca vyūhaśāstrajñaiḥ saptāṅgo vyūha ucyate / urasyakakṣapakṣāstu vyūho 'yaṃ sapratigrahaḥ

हिन्दी अर्थ

मुष्टिके द्वारा लक्ष्यको आच्छादित करके बाणको छोड़ना चाहिए॥ २४--२७॥

English

and the tips — by those who know the science of formations a formation is called seven-limbed. Chest, flanks and wings are this formation with reserve;

अध्याय २४०

श्लोक 43

गुरोरेष च शुक्रस्य कक्षाभ्यां परिवर्जितः ।तिष्ठेयुः सेनापतयः प्रवीरैः पुरुषैर् वृताः

guroreṣa ca śukrasya kakṣābhyāṃ parivarjitaḥ / tiṣṭheyuḥ senāpatayaḥ pravīraiḥ puruṣair vṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

धनुर्धर योद्धाको यत्रपूर्वक अपनी छाती ऊँची रखनी चाहिए और इस तरह झुककर खड़ा होना चाहिए, जिससे शरीर त्रिकोणाकार जान पड़े। कंधा ढीला, ग्रीवा निश्चल और मस्तक मयूरकी भाँति शोभित हो। ललाट, नासिका, मुख, बाहुमूल और कोहनी-ये सम अवस्थामें रहें। ठोढ़ी और कंधेमें तीन अङ्गुलका अन्तर समझना चाहिए।

English

this is of the teacher and of Shukra, avoided with the flanks. The commanders should stand surrounded by heroic men;

अध्याय २४०

श्लोक 44

अभेदेन च युध्येरन् रक्षेयुश् च परस्परं ।मध्यव्यूहे फल्गु सैन्यं युद्धवस्तु जघन्यतः

abhedena ca yudhyeran rakṣeyuś ca parasparaṃ / madhyavyūhe phalgu sainyaṃ yuddhavastu jaghanyataḥ

हिन्दी अर्थ

और तीसरी बार ठोढ़ी तथा कंधेका अन्तर एक ही अङ्गुलका बताया गया है

English

they should fight without division and protect each other. In the middle formation the army is thin; the fighting material is at the rear.

अध्याय २४०

श्लोक 45

युद्धं हि नायकप्राणं हन्यते तदनायकं ।उरसि स्थापयेन्नागान् प्रचण्डान् कक्षयो रथान्

yuddhaṃ hi nāyakaprāṇaṃ hanyate tadanāyakaṃ / urasi sthāpayennāgān pracaṇḍān kakṣayo rathān

हिन्दी अर्थ

बाणको पुछुकी ओरसे तर्जनी एवं अँगूठेसे पकड़े। फिर मध्यमा एवं अनामिकासे भी पकड़ उपक्रम करके विधिपूर्वक बाणको छोड़ना चाहिए

English

Battle has the leader as its life; when the leader is struck, it is struck. In the chest one should station fierce elephants, chariots on the flanks,

अध्याय २४०

श्लोक 46

हयांश् च पक्षयोर्व्यूहो मध्यभेदी प्रकीर्तितः ।मध्यदेशे हयानीकं रथानीकञ्च कक्षयोः

hayāṃś ca pakṣayorvyūho madhyabhedī prakīrtitaḥ / madhyadeśe hayānīkaṃ rathānīkañca kakṣayoḥ

हिन्दी अर्थ

सुब्रत! पहले दृष्टि और मुष्टिसे आहत हुए लक्ष्यको ही बाणसे विदीर्ण करे। बाणको छोड़कर पिछला हाथ बड़े वेगसे पीठको ओर ले जाय; क्योंकि ब्रह्मन्! यह ज्ञात होना चाहिए कि शत्रु

English

and horses on the wings; the formation is declared a middle-breaker. In the middle a horse-force, chariot-force on the flanks,

अध्याय २४०

श्लोक 47

पक्षयोश् च गजानीकं व्यूहोन्तर्भेद्ययं स्मृतः ।रथस्थाने हयान् दद्यात् पदातींश् च हयश्राये

pakṣayoś ca gajānīkaṃ vyūhontarbhedyayaṃ smṛtaḥ / rathasthāne hayān dadyāt padātīṃś ca hayaśrāye

हिन्दी अर्थ

इस हाथको काट डालनेको इच्छा करते हैं। अतः धनुर्धर पुरुषको चाहिए, धनुषको खींचकर कोहनीके नीचे कर ले और बाण छोड़ते समय उसके ऊपर करे। धनुःशास्त्र-विशारद पुरुषोंको यह विशेष- रूपसे जानना चाहिए। कोहनीका आँखसे सटाना मध्यम श्रेणीका बचाव है और शत्रुके लक्ष्यसे दूर रखना उत्तम है॥ ३३--३५॥

English

and elephant-force on the wings — this is remembered as the inner-breaker. In place of chariots one should give horses, infantry in place of horses;

अध्याय २४०

श्लोक 48

रथाभावे तु द्विरदान् व्यूहे सर्वत्र दापयेत् ।यदि स्याद्दण्डबाहुल्यमाबाधः सम्प्रकीर्तितः

rathābhāve tu dviradān vyūhe sarvatra dāpayet / yadi syāddaṇḍabāhulyamābādhaḥ samprakīrtitaḥ

हिन्दी अर्थ

उत्तम श्रेणीका बाण बारह मुष्टियोंके मापका होना चाहिए। ग्यारह मुष्टियोंका ' मध्यम' और दस मुष्टियोंका 'कनिष्ठ' माना गया है।

English

in absence of chariots one should give elephants everywhere in the formation. If there is a preponderance of the staff, it is called "abadha";

अध्याय २४०

श्लोक 49

मण्डलांसंहतो भोगो दण्डास्ते बहुधा शृणु ।तिर्यग्वृत्तिस्तु दण्डः स्याद् भोगो ऽन्यावृत्तिरेव च

maṇḍalāṃsaṃhato bhogo daṇḍāste bahudhā śṛṇu / tiryagvṛttistu daṇḍaḥ syād bhogo 'nyāvṛttireva ca

हिन्दी अर्थ

हाथका हो तो 'मध्यम' और तीन हाथका हो तो “कनिष्ठ' कहा गया है। पैदल योद्धाके लिये ४८४ अग्निपुराण

English

the circle, the uncompact "bhoga," those "danda" in many ways — hear: a staff is a transverse movement; the bhoga is another movement;

अध्याय २४०

श्लोक 50

मण्डलः सर्वतोवृत्तिः पृथग्वृत्तिरसंहतः ।प्रदरो दृढको ऽसह्यः चापो वै कुक्षिरेव च

maṇḍalaḥ sarvatovṛttiḥ pṛthagvṛttirasaṃhataḥ / pradaro dṛḍhako 'sahyaḥ cāpo vai kukṣireva ca

हिन्दी अर्थ

सदा तीन हाथके ही धनुषको ग्रहण करनेका धनुषका ही प्रयोग करनेका विधान किया गया विधान है। घोड़े, रथ और हाथीपर श्रेष्ठ है

English

the mandala is all-round movement; the asamhata is separate movement; pradara, dridhaka, asahya, chapa and kukshi;

अध्याय २४०

श्लोक 51

प्रतिष्ठः सुप्रतिष्ठश् च श्येनो विजयसञ्जयौ ।विशालो विजयः शूची स्थूणाकर्णचमूमुखौ

pratiṣṭhaḥ supratiṣṭhaś ca śyeno vijayasañjayau / viśālo vijayaḥ śūcī sthūṇākarṇacamūmukhau

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें 'धनुर्वेदका वर्णन” नामक दो सौ उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ लक्ष्यवेधके लिये धनुष-बाण लेने और उनके समुचित प्रयोग करनेकी शिक्षा तथा वेध्यके विविध भेदोंका वर्णन

English

pratishtha and supratishtha, shyena, vijaya and sanjaya; vishala, vijaya, suchi, sthuna, karna and chamumukha;

अध्याय २४०

श्लोक 52

सर्पास्यो वलयश् चैव दण्ड दण्डभेदाश् च दुर्जयाः ।अतिक्रान्तः प्रतिक्रान्तः कक्षाभ्याञ्चैकक्षपक्षतः

sarpāsyo valayaś caiva daṇḍa daṇḍabhedāś ca durjayāḥ / atikrāntaḥ pratikrāntaḥ kakṣābhyāñcaikakṣapakṣataḥ

हिन्दी अर्थ

अग्निदेव कहते हैं-- ब्रह्मन्! द्विजको चाहिए कि पूरी लम्बाईवाले धनुषका निर्माण कराकर, उसे अच्छी तरह धो-पोंछकर यज्ञभूमिमें स्थापित करे तथा गदा आदि आयुधोंको भलीभाँति साफ

English

sarpasya and valaya — staff and divisions of staff are hard to conquer. Atikranta and pratikranta by the flanks and one flank or wing;

अध्याय २४०

श्लोक 53

अतिक्रान्तस्तु पक्षाभ्यां त्रयो ऽन्ये तद्विपर्यये ।पक्षोरस्यैर् अतिक्रान्तः प्रतिष्ठो ऽन्यो विपर्ययः

atikrāntastu pakṣābhyāṃ trayo 'nye tadviparyaye / pakṣorasyair atikrāntaḥ pratiṣṭho 'nyo viparyayaḥ

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात् बाणोंका संग्रह करके, कवच- धारणपूर्वक एकाग्रचित्त हो, तूणीर ले, उसे पीठकी ओर दाहिनी काँखके पास दृढ़ताके साथ बाँधे । ऐसा करनेसे विलक्ष्य बाण भी उस तूणीरमें सुस्थिर रहता है। फिर दाहिने हाथसे तूणीरके भीतरसे बाणको निकाले। उसके साथ ही बायें हाथसे धनुषको वहाँसे उठा ले और उसके मध्यभागमें बाणका संधान' करे॥ २--४॥

English

atikranta by two wings; three others are the reverse of that. By wings and chest, atikranta; pratishtha is another reversal;

अध्याय २४०

श्लोक 54

स्थूणापक्षो धनुःपक्षो द्विस्थूणो दण्ड ऊर्ध्वगः ।द्विगुणोन्तस्त्वतिक्रान्तपक्षो ऽन्यस्य विपर्ययः

sthūṇāpakṣo dhanuḥpakṣo dvisthūṇo daṇḍa ūrdhvagaḥ / dviguṇontastvatikrāntapakṣo 'nyasya viparyayaḥ

हिन्दी अर्थ

चित्तमें विषादको न आने दे-उत्साह-सम्पन्न हो, धनुषकी डोरीपर बाणका पुङ्खभाग रखे, फिर “सिंहकर्ण' नामक मुष्टिद्वारा डोरीको पुङ्खके साथ ही दृढतापूर्वक दबाकर समभावसे संधान करे

English

sthunapaksha, dhanuhpaksha, dvisthuna, upward-moving staff, dviguna; atikrantapaksha is another reversal;

अध्याय २४०

श्लोक 55

द्विचतुर्दण्ड इत्य् एते ज्ञेया लक्षणतः क्रमात् ।गोमूत्रिकाहिसञ्चारीशकटो मकरस् तथा

dvicaturdaṇḍa ity ete jñeyā lakṣaṇataḥ kramāt / gomūtrikāhisañcārīśakaṭo makaras tathā

हिन्दी अर्थ

और बाणको लक्ष्यकी ओर छोड़े। यदि बायें हाथसे बाणको चलाना हो तो बायें हाथमें बाण ले और दाहिने हाथसे धनुषकी मुट्ठी पकड़े। फिर प्रत्यञ्चापर बाणको इस तरह रखे कि खींचनेपर उसका फल या पुङ्ख बायें कानके समीप आ जाय। उस समय बाणको बायें हाथकी (तर्जनी और अङ्गुष्ठके अतिरिक्त) मध्यमा अङ्गलीसे

English

dvi-chatur-danda — these are to be known by their marks in order. Gomutrika, ahisancari, shakata and makara likewise

अध्याय २४०

श्लोक 56

भोगभेदाः समाख्यातास् तथा परिप्लवङ्गकः ।दण्डपक्षौ युगारस्यः शकटस्तद्विपर्यये

bhogabhedāḥ samākhyātās tathā pariplavaṅgakaḥ / daṇḍapakṣau yugārasyaḥ śakaṭastadviparyaye

हिन्दी अर्थ

भी धारण किये रहे। बाण चलानेकी विधिको जाननेवाला पुरुष उपर्युक्त मुष्टिके द्वारा धनुषको दृढतापूर्वक पकड़कर, मनको दृष्टिके साथ ही लक्ष्यगत करके बाणको शरीरके दाहिने भागकी

English

are declared the divisions of bhoga; so too pariplavanga; the staff and wings: yugarasya; shakata is the reverse;

अध्याय २४०

श्लोक 57

मकरो व्यतिकीर्णश् च शेषः कुञ्जरराजिभिः ।मण्डलव्यूहभेदौ तु सर्वतोभद्रदुर्जयौ

makaro vyatikīrṇaś ca śeṣaḥ kuñjararājibhiḥ / maṇḍalavyūhabhedau tu sarvatobhadradurjayau

हिन्दी अर्थ

ओर रखते हुए लक्ष्यकी ओर छोड़े॥ ५--७॥ धनुषका दण्ड इतना बड़ा हो कि भूमिपर खड़ा करनेपर उसकी ऊँचाई ललाटतक आ जाय। उसपर लक्ष्यवेधके लिये सोलह अङ्गुल लंबे चन्द्रक (बाणविशेष)-का संधान करे और उसे भलीभाँति

English

makara is the mixed; the rest by rows of elephants. The two divisions of the mandala formation are sarvatobhadra and durjaya;

अध्याय २४०

श्लोक 58

अष्टानीको द्वितीयस्तु प्रथमः सर्वतोमुखः ।अर्धचन्द्रक ऊर्ध्वाङ्गो वज्रभेदास्तु संहतेः

aṣṭānīko dvitīyastu prathamaḥ sarvatomukhaḥ / ardhacandraka ūrdhvāṅgo vajrabhedāstu saṃhateḥ

हिन्दी अर्थ

खींचकर लक्ष्यपर प्रहार करे। इस तरह एक बाणका प्रहार करके फिर तत्काल ही तूणीरसे अङ्नुष्ठ एवं तर्जनी अङ्गुलिद्वारा बारंबार बाण निकाले। उसे मध्यमा अङ्गुलिसे भी दबाकर काबूमें करे

English

the second is eight-forced, the first all-faced; ardhachandraka, urdhvanga, and varieties of vajra from the compact;

अध्याय २४०

श्लोक 59

तथा कर्कटशृङ्गी च काकपादौ च गोधिका ।त्रिचतुःसैन्यानां ज्ञेया आकारभेदतः

tathā karkaṭaśṛṅgī ca kākapādau ca godhikā / tricatuḥsainyānāṃ jñeyā ākārabhedataḥ

हिन्दी अर्थ

और शीघ्र ही दृष्टिगत लक्ष्यको ओर चलावे। चारों ओर तथा दक्षिण ओर लक्ष्यवेधका क्रम जारी रखे। योद्धा पहलेसे ही चारों ओर बाण १. ' वासिष्ठ-धनुर्वेद'के अनुसार 'संधान' तीन प्रकारके हैं-अध, ऊर्ध्व और सम । इनका क्रमशः तीन कारयामें ही उपयोग करना चाहिए। दूरके लक्ष्यको मार गिराना हो तो 'अधःसंधान' उपयोगी होता है। लक्ष्य निश्चल हो तो 'समसंधान'से उसका वेध करना चाहिए तथा चञ्चल लक्ष्यका वेध करनेके लिये 'ऊर्ध्वसंधान'से काम लेना चाहिए।

English

and karkata-shringi, kakapada and godhika are to be known for three- and four-fold armies by difference of shape.

अध्याय २४०

श्लोक 60

दण्डस्य स्युः सप्तदश व्यूहा द्वौ मण्डलस्य च ।असङ्घातस्य षट् पञ्च भोगस्यैव तु सङ्गरे

daṇḍasya syuḥ saptadaśa vyūhā dvau maṇḍalasya ca / asaṅghātasya ṣaṭ pañca bhogasyaiva tu saṅgare

हिन्दी अर्थ

२. महर्षि वसिष्ठकृत ' धनुर्वेद-संहिता में ' मुष्टि 'के पाँच भेद बताये गये हैं-पताका, वज्रमुष्टि, सिंहकर्ण, मत्सरी तथा काकतुण्डी ।

English

For the staff there are seventeen formations, two for the circle, six for the uncompact, five for the bhoga in battle.

अध्याय २४०

श्लोक 61

पक्षादीनामथैकेन हत्वा शेषैः परिक्षिपेत् ।उरसा वा समाहत्य कोटिभ्यां परिवेष्टयेत्(१)

pakṣādīnāmathaikena hatvā śeṣaiḥ parikṣipet / urasā vā samāhatya koṭibhyāṃ pariveṣṭayet(1)

हिन्दी अर्थ

वहीं 'सिंहकर्ण नामक मुष्टिका लक्षण इस प्रकार दिया गया है-- 'अङ्गष्ठमध्यदेशे तु तर्जन्यग्रं शुभं स्थितम्। सिंहकर्णः स विज्ञेयो

English

Having struck with one of wings and the rest, one should surround with the rest; or having struck with the chest, one should enclose with the two tips;

अध्याय २४०

श्लोक 62

परे कोटी समाक्रम्य पक्षाभ्यामप्रतिग्रहात् ।कोटिभ्याञ्जघनं हन्यादुरसा च प्रपीडयेत्

pare koṭī samākramya pakṣābhyāmapratigrahāt / koṭibhyāñjaghanaṃ hanyādurasā ca prapīḍayet

हिन्दी अर्थ

दृढलक्ष्यस्य वेधने ॥' अर्थात् “ धनुष पकड़ते समय अङ्गष्ठके मध्यदेशमें तर्जनीके अग्रभागको भलीभाँति टिकाकर जो मुष्टि बाँधी जाती है, उसका नाम 'सिंहकर्ण' जानना चाहिए। वह दूढ्लक्ष्यके वेधके लिये उपयोगी है।''

English

having assailed the enemy's tips with the wings, because of lack of reserve, one should strike the rear with the tips and press with the chest.

अध्याय २४०

श्लोक 63

यतः फल्गु यतो भिन्नं यतश्चान्यैर् अधिष्ठितं ।ततश्चारिबलं हन्यादात्मनश्चोपवृंहयेत्

yataḥ phalgu yato bhinnaṃ yataścānyair adhiṣṭhitaṃ / tataścāribalaṃ hanyādātmanaścopavṛṃhayet

हिन्दी अर्थ

मारकर सब ओरके लक्ष्यको वेधनेका अभ्यास तदनन्तर वह तीक्ष्ण, परावृत्त, गत, निम्न, उन्नत तथा क्षिप्र वेधका अभ्यास बढावे ।' वेध्य लक्ष्यके ये जो उपर्युक्त स्थान हैं, इनमें सत्त्व (बल एवं धैर्य)-का पुट देते हुए विचित्र एवं

English

Where the force is thin, where broken, and where occupied by others, there one should strike the enemy's force and reinforce one's own;

अध्याय २४०

श्लोक 64

सारं द्विगुणसारेण फल्गुसारेण पीडयेत् ।संहतञ्च गजानीकैः प्रचण्डैर् दारयेद्बलं

sāraṃ dviguṇasāreṇa phalgusāreṇa pīḍayet / saṃhatañca gajānīkaiḥ pracaṇḍair dārayedbalaṃ

हिन्दी अर्थ

दुस्तर रीतिसे सैकड़ों बार हाथसे बाणोंके निकालने एवं छोड्नेको क्रियाद्वारा धनुषका तर्जन करे उसपर टङ्कारः दे

English

one should press the strong by a double-strong and the thin by a strong; one should split the compact force with fierce elephant-forces.

अध्याय २४०

श्लोक 65

स्यात् कक्षपक्षोरस्यश् च वर्तमानस्तु दण्डकः ।तत्र प्रयोगो डण्डस्य स्थानन्तुर्येण दर्शयेत्

syāt kakṣapakṣorasyaś ca vartamānastu daṇḍakaḥ / tatra prayogo ḍaṇḍasya sthānanturyeṇa darśayet

हिन्दी अर्थ

विप्रवर! उक्त वेध्यके अनेक भेद हैं। पहले तो दृढ़, दुष्कर तथा चित्र दुष्कर-ये वेध्यके तीन भेद हैं। ये तीनों ही भेद दो-दो प्रकारके होते हैं । “ नतनिम्न' और तीक्ष्ण'-ये 'दृढ़वेध्य ' के दो भेद हैं। 'दुष्करवेध्य'के भी “निम्न? और ऊर्ध्वगत'--ये दो भेद कहे गये हैं तथा ' चित्रदुष्कर' वेध्यके मस्तकपन' और 'मध्य'-ये दो भेद बताये गये हैं॥ १३-१४ ३॥

English

The staff formation may be with flanks, wings and chest, in operation; there the application of the staff one should show by the fourth position.

अध्याय २४०

श्लोक 66

स्याद्दण्डसमपक्षाभ्यामतिक्रान्तो दृढः स्मृतः ।भवेत्स पक्षकक्षाभ्यामतिक्रान्तः प्रदारकः

syāddaṇḍasamapakṣābhyāmatikrānto dṛḍhaḥ smṛtaḥ / bhavetsa pakṣakakṣābhyāmatikrāntaḥ pradārakaḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार इन वेध्यगणोंको सिद्ध करके वीर

English

Surpassed by staff and equal wings it is remembered as "dridha"; surpassed by wings and flanks it would be "pradaraka";

अध्याय २४०

श्लोक 67

कक्षाभ्याञ्च प्रतिक्रान्तव्यूहो ऽसह्यः स्मृतो यथा ।कक्षपक्षावधः स्थप्योरस्यैः कान्तश् च खातकः

kakṣābhyāñca pratikrāntavyūho 'sahyaḥ smṛto yathā / kakṣapakṣāvadhaḥ sthapyorasyaiḥ kāntaś ca khātakaḥ

हिन्दी अर्थ

पुरुष पहले दायें अथवा बायें पार्श्वसे शत्रुसेनापर चढ़ाई करे। इससे मनुष्यको अपने लक्ष्यपर विजय प्राप्त होती है। प्रयोक्ता पुरुषोंने वेध्यके विषयमें यही विधि देखी और बतायी है योद्धाके लिये उस वेध्यको अपेक्षा भ्रमणको अधिक उत्तम बताया गया है। वह लक्ष्यको अपने बाणके पुङ्खभागसे आच्छादित करके उसकी ओर दृढतापूर्वक शर-संधान करे । जो लक्ष्य भ्रमणशील,

English

by the flanks the formation advanced is remembered as "asahya"; with flanks and wings below, and the chest, the "kanta" and "khataka."

अध्याय २४०

श्लोक 68

द्वौ दण्डौ बलयः प्रोक्तो कान्तश् च खातकः ।दुर्जयश् चतुर्वलयः शत्रोर्बलविमर्दनः

dvau daṇḍau balayaḥ prokto kāntaś ca khātakaḥ / durjayaś caturvalayaḥ śatrorbalavimardanaḥ

हिन्दी अर्थ

ओरसे प्रहार करे। उसका भेदन और छेदन करे तथा उसे सर्वथा पीड़ा पहुँचाये

English

Two staffs are called valaya, and kanta and khataka; the four-valaya is unconquerable, crusher of the enemy's force.

अध्याय २४०

श्लोक 69

कक्षपक्षौरस्यैर् भोगो विषयं परिवर्तयन् ।१ कोटिभ्यां परिकल्पयेदिति घ॥ , ञ॥ च :प् ३८२ सर्पचारी गोमूत्रिका शर्कटः शकटाकृतिः

kakṣapakṣaurasyair bhogo viṣayaṃ parivartayan / 1 koṭibhyāṃ parikalpayediti gha.. , ña.. ca :p 382 sarpacārī gomūtrikā śarkaṭaḥ śakaṭākṛtiḥ

हिन्दी अर्थ

कर्मयोगके विधानका ज्ञाता पुरुष इस प्रकार समझ-बूझकर उचित विधिका आचरण (अनुष्ठान) करे। जिसने मन, नेत्र और दृष्टिके द्वारा लक्ष्यके साथ एकता-स्थापनकी कला सीख ली है, वह योद्धा यमराजको भी जीत सकता है । (पाठान्तरके अनुसार वह श्रमको जीत लेता है-युद्ध करते- करते थकता नहीं।)

English

With flanks, wings and chest the bhoga turns the field: serpent-moving, gomutrika, shakata with cart shape;

अध्याय २४०

श्लोक 70

विपर्ययो ऽमरः प्रोक्तः सर्वशत्रुविमर्दकः ।स्यात् कक्षपक्षोरस्यानामेकीभावस्तु मण्डलः

viparyayo 'maraḥ proktaḥ sarvaśatruvimardakaḥ / syāt kakṣapakṣorasyānāmekībhāvastu maṇḍalaḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें 'धनुर्वेदका कथन” नामक दो सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

the reverse is called "amara," crusher of all enemies. The mandala is the merging of flanks, wings and chest;

अध्याय २४०

श्लोक 71

चक्रपद्मादयो भेदा मण्डलस्य प्रभेदकाः ।एवञ्च सर्वतोभद्रो वज्राक्षवरकाकवत्

cakrapadmādayo bhedā maṇḍalasya prabhedakāḥ / evañca sarvatobhadro vajrākṣavarakākavat

हिन्दी अर्थ

१. 'वासिष्ठ-धनुर्वेद' में 'वेध' तीन प्रकारका बताया गया है-पुष्पवेध, मत्स्यवेध और मांसवेध। फलरहित बाणसे फूलको वेधना 'पुष्पवेध' है। फलयुक्त बाणसे मत्स्यका भेदन करना 'मत्स्यवेध' है। तदनन्तर मांसके प्रति लक्ष्यका स्थिरीकरण 'मांसवेध' २. “वीरचिन्तामणि'में ' श्रमकरण' (धनुष चलानेके परिश्रमपूर्वक अभ्यास)-के प्रकरणमें इस तरहकी बातें लिखी हैं। यथा-- पहले धनुषको चढ़ाकर शिखा बाँध ले, पूर्वोक्त स्थानभेदमेंसे किसी एकका आश्रय ले, खड़ा हो, बाणके ऊपर हाथ रखे। धनुषके तोलनपूर्वक उसे बायें हाथमें ले। तदनन्तर बाणका आदान करके संधान करे। एक बार धनुषकी प्रत्यञ्चा खींचकर भूमिवेधन करे। पहले भगवान् शंकर, विध्नराज गणेश, गुरुदेव तथा धनुष-बाणको नमस्कार करे। फिर बाण खींचनेके लिये गुरुसे आज्ञा माँगे।

English

wheel, lotus and the rest are the varieties of the mandala. So too sarvatobhadra, vajra-like, shreshtha-kaka-like,

अध्याय २४०

श्लोक 72

अर्धचन्द्रश् च शृङ्गाटो ह्य् अचलो नामरूपतः(१) ।व्यूहा यथासुखं कर्याः शत्रूणां बलवारणाः

ardhacandraś ca śṛṅgāṭo hy acalo nāmarūpataḥ(1) / vyūhā yathāsukhaṃ karyāḥ śatrūṇāṃ balavāraṇāḥ

हिन्दी अर्थ

प्राणवायुके प्रयत्न (पूरक प्राणायाम)-के साथ बाणसे धनुषको पूरित करे। कुम्भक प्राणायामके द्वारा उसे स्थिर करके रेचक प्राणायाम एवं हुंकारके साथ वायु एवं बाणका विसर्जन करे । सिद्धिकी इच्छावाले धनुर्धर योद्धाको यह अभ्यास-क्रिया अवश्य करनी चाहिए। छः मासमें 'मुष्टि' सिद्ध होती है और एक वर्षमें 'बाण'। 'नाराच' तो उसीके सिद्ध होते हैं, जिसपर भगवान् महेश्वरकी कृपा हो जाय। अपनी सिद्धि चाहनेवाला योद्धा बाणको फूलकी भाँति धारण करे। फिर धनुषको सर्पकी भाँति दबावे तथा लक्ष्यका बहुमूल्य

English

half-moon, shringata, and achala by name and form. Formations should be made at ease to ward off the enemies' force.

अध्याय २४०

श्लोक 73

अग्निर् उवाचरामस्तु रावणं हत्वा अयोध्यां प्राप्तवान् द्विज ।रामोक्तनीत्येन्द्रजितं हतवांल्लक्ष्मणः पुरा

agnir uvācarāmastu rāvaṇaṃ hatvā ayodhyāṃ prāptavān dvija / rāmoktanītyendrajitaṃ hatavāṃllakṣmaṇaḥ purā

हिन्दी अर्थ

धनकी भाँति चिन्तन करे, इत्यादि । पाशके निर्माण और प्रयोगकी विधि तथा तलवार और लाठीको अपने पास रखने एवं शत्रुपर चलानेकी उपयुक्त पद्धतिका निर्देश

English

Agni said: Rama, having killed Ravana, reached Ayodhya, twice-born; by the policy told by Rama Lakshmana earlier killed Indrajit.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 240
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.