Agni Purana· Agni Purāṇa
243
अध्याय 243 / 381

Adhyaya 244

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पूर्ण अध्याय पाठ27 श्लोक

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अध्याय २४३

श्लोक 1

चामरादिलक्षणम् अग्निर् उवाच चामरो रुक्मादण्डो ऽग्र्यः छत्रं राज्ञः प्रशस्यते ।हंसपक्षैर् विरचितं मयूरस्य शुकस्य च

cāmarādilakṣaṇam agnir uvāca cāmaro rukmādaṇḍo 'gryaḥ chatraṃ rājñaḥ praśasyate / haṃsapakṣair viracitaṃ mayūrasya śukasya ca

हिन्दी अर्थ

अभियोक्ता, साक्षी, सभासद और राजा-इनमें एक-एक चरणसे उसकी स्थिति है-इसलिये उसे “चतुर्व्यापी' माना गया है। वह धर्म, अर्थ, यश और लोकप्रियता-इन चारोंकी वृद्धि करनेवाला होनेसे “चतुष्कारी ' कहा जाता है । राजपुरुष, सभासद,

English

O King! Ethics were described by me to Rama. 1 shall now describe the characteristics of men and women as described by Samudra to sage Garga fonnerly.

अध्याय २४३

श्लोक 2

पक्षैर् वाथ बलाकाया न कार्यं मिश्रपक्षकैः ।२ जठरमित्यादिः, ततो गुणा इत्य् अन्तः पाठः घ॥ , ञ॥ , पुस्तकद्वये नास्ति :प् ३८७ चतुरस्यं ब्राह्मणस्य वृत्तं राज्ञश् च शुक्लकं

pakṣair vātha balākāyā na kāryaṃ miśrapakṣakaiḥ / 2 jaṭharamityādiḥ, tato guṇā ity antaḥ pāṭhaḥ gha.. , ña.. , pustakadvaye nāsti :p 387 caturasyaṃ brāhmaṇasya vṛttaṃ rājñaś ca śuklakaṃ

हिन्दी अर्थ

इन आठ अड्ोंसे युक्त होनेके कारण वह ' अष्टाङ्ग ' है। काम, क्रोध और लोभ-इन तीन कारणोंसे मनुष्यकी इसमें प्रवृत्ति होती है, इसीलिये व्यवहारको 'त्रियोनि' कहा जाता है; क्योंकि ये तीनों ही

English

One the mnniiettations clord Vlnu.

अध्याय २४३

श्लोक 3

त्रिचतुःपञ्चषट्सप्ताष्टपर्वश् च दण्डकः ।भद्रासनं क्षीरवृक्षैः पञ्चाशदङ्गुलोच्छ्रयैः(१)

tricatuḥpañcaṣaṭsaptāṣṭaparvaś ca daṇḍakaḥ / bhadrāsanaṃ kṣīravṛkṣaiḥ pañcāśadaṅgulocchrayaiḥ(1)

हिन्दी अर्थ

विवाद करानेवाले हैं। अभियोगके दो भेद हैं- (१) शङ्काभियोग और (२) तत्त्वाभियोग। इसी दृष्टिसे वह दो अभियोगवाला है। ' शङ्का' असत् पुरुषोंके संसर्गसे होती है और 'तत्त्वाभियोग' होढा (चिह्न या प्रमाण) देखनेसे होता है। यह दो पक्षोंसे सम्बन्धित होनेके कारण दो द्वारोंबाला' कहा जाता है। इनमें पूर्ववाद' ' पक्ष' और उत्तरवाद'

English

These terms are esrlained below in verses 7 ff.

अध्याय २४३

श्लोक 4

विस्तारेण त्रिहस्तं(२) स्यात् सुवर्णाद्यैश् च चित्रितं ।धनुर्द्रव्यत्रयं लोहं शृङ्गं दारु द्विजोत्तम

vistāreṇa trihastaṃ(2) syāt suvarṇādyaiś ca citritaṃ / dhanurdravyatrayaṃ lohaṃ śṛṅgaṃ dāru dvijottama

हिन्दी अर्थ

प्रतिपक्ष! कहलाता है। ' भूत' और 'छल'- इनका अनुसरण करनेसे यह दो गतियोंसे युक्त माना जाता है

English

It should be three cubits in breadth, painted with gold and the like. A bow has three materials: iron, horn, wood, best of twice-born;

अध्याय २४३

श्लोक 5

ज्याद्रव्यत्रितयञ्चैव वंशभङ्गत्वचस् तथा ।दारुचापप्रमाणन्तु श्रेष्ठं हस्तचतुष्टयं

jyādravyatritayañcaiva vaṃśabhaṅgatvacas tathā / dārucāpapramāṇantu śreṣṭhaṃ hastacatuṣṭayaṃ

हिन्दी अर्थ

कैसा ऋण देय है, कैसा ऋण अदेय है -- कौन दे, किस समय दे, किस प्रकारसे दे, ऋण देनेकी विधि या पद्धति क्या है तथा उसे लेने या वसूल करनेका विधान क्या है ? इन सब बातोंका विचारः “ऋणादान' कहा गया है। जब कोई मनुष्य किसीपर विश्वास करके शङ्कारहित होकर उसके पास अपना कोई द्रव्य धरोहरके तौरपर देता है, तब उसे विद्वान् लोग ' निक्षेप? नामक

English

the bow-string has three materials: bamboo-fiber, bark and the like. The best wooden bow is four cubits in measure;

अध्याय २४३

श्लोक 6

तदेव समहीनन्तु प्रोक्तं मध्यकनीयसि ।मुष्टिग्राहनिमित्तानि मध्ये द्रव्याणि कारयेत्

tadeva samahīnantu proktaṃ madhyakanīyasi / muṣṭigrāhanimittāni madhye dravyāṇi kārayet

हिन्दी अर्थ

व्यवहारपद कहते हैं। जब वणिक् आदि अनेक मनुष्य मिलकर सहकारिता या साझेदारीके तौरपर कोई कार्य करते हैं तो उसको 'सम्भूयसमुत्थान' संज्ञक विवादपद बतलाते हैं। यदि कोई मनुष्य

English

that same measure reduced is told for the middling and lowest. One should make in the middle the materials for the grip of the fist;

अध्याय २४३

श्लोक 7

स्वल्पकोटिस्त्वचा शृङ्गं शार्ङ्गलोहमये द्विज ।कामिनीभ्रूलताकारा कोटिः कार्या सुसंयुता

svalpakoṭistvacā śṛṅgaṃ śārṅgalohamaye dvija / kāminībhrūlatākārā koṭiḥ kāryā susaṃyutā

हिन्दी अर्थ

पहले विधिपूर्वक किसी द्रव्यका दान देकर पुनः उसे रख लेनेकी इच्छा करे, तो वह ' दत्ताप्रदानिक' नामक विवादपद कहा जाता है । जो सेवा स्वीकार करके भी उसका सम्पादन नहीं करता या उपस्थित नहीं होता, उसका यह व्यवहार ' अभ्युपेत्य आशुश्रूषा' नामक विवादपद होता है। भृत्योंको वेतन देने-न-देनेसे सम्बन्ध रखनेवाला विवाद

English

with a small tip, of bark, horn, or of shārnga-iron, twice-born; the tip should be made well joined, like a woman's brow-vine.

अध्याय २४३

श्लोक 8

पृथग्वा विप्र मिश्रं वा लौहं शार्ङ्गन्तु कारयेत् ।शार्ङ्गं समुचितं कार्यं रुक्मविन्दुविभूषितं

pṛthagvā vipra miśraṃ vā lauhaṃ śārṅgantu kārayet / śārṅgaṃ samucitaṃ kāryaṃ rukmavinduvibhūṣitaṃ

हिन्दी अर्थ

“बेतनानपाक्रम' माना गया है। धरोहरमें रखे हुए या खोये हुए पराये द्रव्यको पाकर अथवा चुराकर स्वामीके परोक्षमें बेचा जाय तो यह ' अस्वामिविक्रय’ नामक विवादपद है। यदि कोई

English

Separately or mixed, Brahmin, one should make the iron shārnga; the shārnga should be made suitably, adorned with gold dots.

अध्याय २४३

श्लोक 9

कुटिलं स्फुटितञ्चापं सच्छिद्रञ्च न शस्यते ।सुवर्णं रजतं ताम्रं कृष्णायो धनुषि स्मृतं

kuṭilaṃ sphuṭitañcāpaṃ sacchidrañca na śasyate / suvarṇaṃ rajataṃ tāmraṃ kṛṣṇāyo dhanuṣi smṛtaṃ

हिन्दी अर्थ

व्यापारी किसी पण्य-द्रव्यका मूल्य लेकर विक्रय कर देनेके बाद भी खरीददारको वह द्रव्य नहीं देता है तो उसको 'विक्रीयासम्प्रदान' नामक विवादपद कहा जाता है। यदि ग्राहक किसी वस्तुका मूल्य देकर खरीदनेके बाद उस वस्तुको ठीक नहीं समझता, तो उसका यह आचरण “क्रीतानुशय' नामक विवादपद कहलाता है । यदि ग्राहक या खरीददार मूल्य देकर वस्तुको खरीद

English

A crooked, cracked or holed bow is not praised. Gold, silver, copper and black iron are remembered for a bow;

अध्याय २४३

श्लोक 10

माहिषं शारभं शार्ङ्गं रौहिषं वा धनुःशुभं ।चन्दनं वेतसं सालं धावलङ्ककुभन्तरुः

māhiṣaṃ śārabhaṃ śārṅgaṃ rauhiṣaṃ vā dhanuḥśubhaṃ / candanaṃ vetasaṃ sālaṃ dhāvalaṅkakubhantaruḥ

हिन्दी अर्थ

लेनेके बाद यह समझता है कि यह खरीददारी ठीक नहीं है, (अतः वह वस्तु लौटाकर दाम वापस लेना चाहता है) तो उसी दिन यदि वह लौटा दे तो विक्रेता उसका मूल्य पूरा-पूरा लौटा

English

a bow of buffalo horn, sharabha horn, shārnga or rohisha is auspicious; sandal, cane, sala, dhava, arjuna wood;

अध्याय २४३

श्लोक 11

सर्वश्रेष्ठं धनुर्वंशैर् गृहीतैः शरदि श्रितैः ।पूजयेत्तु धनुः(३) खड्गमन्त्रैस्त्रैलोक्यमोहनैः

sarvaśreṣṭhaṃ dhanurvaṃśair gṛhītaiḥ śaradi śritaiḥ / pūjayettu dhanuḥ(3) khaḍgamantraistrailokyamohanaiḥ

हिन्दी अर्थ

दे, उसमें काट-छाट न करे'॥ १३ --२१॥ पाखण्डी और नैगम आदिकी स्थितिको “समय' कहते हैं। इससे सम्बद्ध विवादपदको 'समयानपा-कर्म' कहा जाता है। (याज्ञवल्क्यने इसे 'संविद्-व्यतिक्रम' नाम दिया है।) क्षेत्रके अधिकारको लेकर सेतु, केदार (मेड़) और क्षेत्र

English

the best of all is a bow of bamboos taken and settled in autumn. One should worship bow and sword with the mantras that bewilder the three worlds.

अध्याय २४३

श्लोक 12

अयसश्चाथ वंशस्य शरस्याप्यशरस्य च ।ऋत्विजो हेमवार्णाभाः स्नायुश्लिष्टाः सुपत्रकाः

ayasaścātha vaṃśasya śarasyāpyaśarasya ca / ṛtvijo hemavārṇābhāḥ snāyuśliṣṭāḥ supatrakāḥ

हिन्दी अर्थ

१. ऋणादानके सात प्रकार हैं- १-अमुक प्रकारका ऋण 'देय' है, २-अमुक प्रकारका ऋण ' अदेय' है, ३-अमुक अधिकारीको

English

Of iron or bamboo, arrow or non-arrow, the priests of the golden hue, bound with sinew, with good feathers,

अध्याय २४३

श्लोक 13

१ चतुरस्रमित्यादिः, पञ्चाशदङ्गुलोच्छ्रयैर् इत्यन्तः पाठः ज॥पुस्तके नास्ति २ द्विहस्तमिति ट॥ ३ पूजयेत्तद्धनुरिति ग॥ , घ॥ , ञ॥ च :प् ३८८ रुक्मपुङ्खाः सुपङ्कास्ते तैलधौताः सुवर्णकाः ।यात्रायामभिषेकादौ यजेद्वाणधनुर्मुखान्

1 caturasramityādiḥ, pañcāśadaṅgulocchrayair ityantaḥ pāṭhaḥ ja..pustake nāsti 2 dvihastamiti ṭa.. 3 pūjayettaddhanuriti ga.. , gha.. , ña.. ca :p 388 rukmapuṅkhāḥ supaṅkāste tailadhautāḥ suvarṇakāḥ / yātrāyāmabhiṣekādau yajedvāṇadhanurmukhān

हिन्दी अर्थ

ऋण देनेका अधिकार है, ४-अमुक समयमें ऋण देना चाहिए, ५-इस प्रकारसे ऋण दिया जाना चाहिए-ये पाँच अधमर्ण (ऋण लेनेबाले) व्यक्तिको लक्ष्य करके विचारणीय हैं और शेष दो बातें साहूकारके लिये विचारणीय हैं -६-साहूकार किस विधानसे ऋण दे तथा ७-किस विधानसे उसको वसूल करे। इन्हीं सातों बातोंको इस श्लोकमें स्पष्ट किया गया है। 'नारद-स्मृति' में भी इसका इसी रूपमें उल्लेख हुआ है। इन सब बातोंके विचारपूर्वक जो ऋणका आदान-प्रदान होता है, उसे “क्रणादान' नामक व्यवहारपद समझना चाहिए। २. 'नारदस्मृति'में भी इन श्लोकोंका ठीक ऐसा ही पाठ है। वहाँ इस विषयमें कुछ अधिक बातें बतायी गयी हैं, जो इस प्रकार हैं-

English

with golden shafts, well-muddled, oil-washed, golden — at a journey, consecration and the like the king should worship arrows and bows,

अध्याय २४३

श्लोक 14

सपताकास्त्रसङ्ग्राहसांवत्सरकरान्नृपः ।ब्रह्मा वै मेरुशिखरे स्वर्गगङ्गातटे ऽयजत्

sapatākāstrasaṅgrāhasāṃvatsarakarānnṛpaḥ / brahmā vai meruśikhare svargagaṅgātaṭe 'yajat

हिन्दी अर्थ

“यदि ग्राहक नापसंद माल (पहले ही दिन न लौटाकर) दूसरे दिन लौटावे तो वह वस्तुके पूरे मूल्यका र अर्थात् ३ प्रतिशत हरजानाके तौरपर विक्रेताको दे। यदि वह तीसरे दिन लौटाये तो इससे दूनी रकम हर्जानेके तौरपर दे। इसके बाद ' अनुशय'का अधिकार समाप्त हो जाता है। फिर तो ग्राहकको माल लेना ही पडेगा।'

English

with banners, the weapon-takers and the astrologers. Brahma once sacrificed on the peak of Meru on the bank of the heavenly Ganga;

अध्याय २४३

श्लोक 15

लौहदैत्यं स ददृशे विध्नं यज्ञे तु चिन्तयन् ।तस्य चिन्तयतो वह्नेः पुरुषो ऽभूद्वली महान्

lauhadaityaṃ sa dadṛśe vidhnaṃ yajñe tu cintayan / tasya cintayato vahneḥ puruṣo 'bhūdvalī mahān

हिन्दी अर्थ

याज्ञवल्क्य और मिताक्षराकारकी दृष्टिमें यह नियम बीज आदिसे भिन्न वस्तुओंपर लागू होता है । बीज, लोहा, बैल-घोड़े आदि वाहन, मोती-मूँगा आदि रत्न, दासी, दूध देनेवाली भैंस आदि तथा दास--इनके परीक्षणका काल अधिक है । यथा--बीजके परीक्षणका समय दस दिन, लोहेके एक दिन, बैल आदिके पाँच दिन, रलके एक सप्ताह, दासीके एक मास, दूध देनेवाली भैंस आदिके तीन दिन तथा दासके परीक्षणका समय पंद्रह दिनतक है। इस समयके भीतर ही ये ठीक न जँचें तो इनको लौटाया जा सकता है; अन्यथा नहीं । मनुने गृह, क्षेत्र आदि वस्तुओंको दस दिनके अंदर ही लौटानेका आदेश दिया है। इसके बाद लौटानेका अधिकार नहीं रह जाता है।

English

thinking of an obstacle in the sacrifice he saw an iron demon; as he thought, from the fire a great strong person arose.

अध्याय २४३

श्लोक 16

ववन्दे ऽजञ्च तन्देवा अभ्यनन्दन्त हर्षिताः(१) ।तस्मात्स नन्दकः(२) कड्गो देवोक्तो हरिरग्रहीत्

vavande 'jañca tandevā abhyanandanta harṣitāḥ(1) / tasmātsa nandakaḥ(2) kaḍgo devokto hariragrahīt

हिन्दी अर्थ

सीमाके घटने-बढ्नेके विषयमें जो विवाद होता है, वह 'क्षेत्रज' कहा गया है। जो स्त्री और पुरुषके विवाहादिसे सम्बन्धित विवादपद है, उसे 'स्त्री-पुंस योग' कहते हैं। पुत्रगण पैतृक धनका

English

He saluted the Unborn, and the gods rejoiced and welcomed him; therefore he, named Nandaka, the sword told by the gods, Hari took.

अध्याय २४३

श्लोक 17

तं जग्राह शनैर् देवो(३) विकोषः सो ऽभ्यपद्यत ।खड्गो नीलो रत्नमुष्टिस्ततो ऽभूच्छतबाहुकः

taṃ jagrāha śanair devo(3) vikoṣaḥ so 'bhyapadyata / khaḍgo nīlo ratnamuṣṭistato 'bhūcchatabāhukaḥ

हिन्दी अर्थ

जो विभाजन करते हैं, विद्वानोंने उसको “दायभाग' नामक व्यवहारपद माना है। बलके अभिमानसे जो कर्म सहसा किया जाता है, उसे 'साहस' नामक विवादपद बतलाया गया है। किसीके देश, जाति एवं कुल आदिपर दोषारोपण करके प्रतिकूल अर्थसे युक्त व्यंग्यपूर्ण वचन कहना “वाक्-पारुष्य' माना गया है। दूसरेके शरीरपर हाथ-पैर या आयुधसे प्रहार अथवा अग्नि आदिसे आघात करना

English

The god slowly took him; he became the sword without a sheath: blue, with jewelled hilt; then he became hundred-armed.

अध्याय २४३

श्लोक 18

दैत्यः स गदया देवान् द्रावयामास वै रणे ।विष्णुना खड्गच्छिन्नानि दैत्यगात्राणि भूतले

daityaḥ sa gadayā devān drāvayāmāsa vai raṇe / viṣṇunā khaḍgacchinnāni daityagātrāṇi bhūtale

हिन्दी अर्थ

“दण्ड-पारुष्य' कहलाता है । पासे, वध्र (चमड़ेको पट्टी) और शलाका (हाथीदाँतकी गोटियों)-से जो क्रीडा होती है, उसको 'द्यूत' कहा जाता है। (घोड़े आदि) पशुओं और (बटेर आदि) पक्षियोंसे

English

That demon with a mace routed the gods in battle. By Vishnu's sword the demon's limbs were cut and fell on the ground,

अध्याय २४३

श्लोक 19

पतितानि तु संस्पर्शान्नन्दकस्य च तानि हि ।लोहभूतानि सर्वाणि हत्वा तस्मै हरिर्वरं

patitāni tu saṃsparśānnandakasya ca tāni hi / lohabhūtāni sarvāṇi hatvā tasmai harirvaraṃ

हिन्दी अर्थ

होनेवाली क्रीडाको 'प्राणिद्यूत' समझना चाहिए । राजाकी आज्ञाका उल्लङ्घन और उसका कार्य न करना यह 'प्रकीर्णक' नामक व्यवहारपद जानना चाहिए। यह विवादपद राजापर आश्रित है। इस प्रकार व्यवहार अठारह पदोंसे युक्त है। इनके भी सौ भेद माने गये हैं। मनुष्योंकी क्रियाके भेदसे यह सौ शाखाओंवाला कहा जाता है

English

and by Nandaka's touch they all became iron. Having killed him, Hari gave him a boon:

अध्याय २४३

श्लोक 20

ददौ पवित्रमङ्गन्ते आयुधाय भवेद्भुवि ।हरिप्रसादाद् ब्रह्मापि विना विघ्नं हरिं प्रभुं

dadau pavitramaṅgante āyudhāya bhavedbhuvi / hariprasādād brahmāpi vinā vighnaṃ hariṃ prabhuṃ

हिन्दी अर्थ

राजा क्रोधरहित होकर ज्ञान-सम्पन्न ब्राह्मणोंके साथ व्यवहारका विचार करे और ऐसे मनुष्योंको

English

"May your body be a pure weapon on earth." By Hari's grace Brahma, without obstacle, worshipped Hari the Lord

अध्याय २४३

श्लोक 21

पूजयामास यज्ञेन वक्ष्ये ऽथो खड्गलक्षणं ।खटीखट्टरजाता ये दशनीयास्तुते स्मृताः

pūjayāmāsa yajñena vakṣye 'tho khaḍgalakṣaṇaṃ / khaṭīkhaṭṭarajātā ye daśanīyāstute smṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

शत्रु एवं मित्रको समान दृष्टिसे देखनेवाले हों। यदि राजा कार्यवश स्वयं व्यवहारका विचार न कर सके तो सभासदोंके साथ विद्वान् ब्राह्मणको धर्मशास्त्र एवं आचारके विरुद्ध कार्य करे, तो राजा प्रत्येक सभासदपर अलग-अलग विवादसे दुगुना अर्थदण्ड करे। यदि कोई मनुष्य दूसरोंके द्वारा धर्मशास्त्र और समयाचारके विरुद्ध मार्गसे

English

with sacrifice. Now I shall tell the marks of a sword. Those born of khati and khattara are said to be to be seen;

अध्याय २४३

श्लोक 22

कायच्छिदस्त्वाषिकाः स्युर्दृढाः सूर्पारकोद्भवाः ।तीक्ष्णाश्छेदसहा वङ्गास्तीक्ष्णाःस्युश्चाङ्गदेशजाः

kāyacchidastvāṣikāḥ syurdṛḍhāḥ sūrpārakodbhavāḥ / tīkṣṇāśchedasahā vaṅgāstīkṣṇāḥsyuścāṅgadeśajāḥ

हिन्दी अर्थ

धर्षित किया गया हो और वह राजाके समीप आवेदन करे तो उसको 'व्यबहार' (पदः) कहते हैं। वादीने जो निवेदन किया हो, राजा उसको वर्ष, मास, पक्ष, दिन, नाम और जाति आदिसे

English

those of Tvashika are body-cutting, firm, those of Surparaka; sharp, enduring cutting are the Vanga ones; sharp are those born in Anga;

अध्याय २४३

श्लोक 23

शतार्धमङ्गुलानाञ्च श्रेष्ठं खद्गं प्रकीर्तितं ।१ लोहदैत्यमित्यादिः, हर्षिता इत्य् अन्तः पाठः ज॥ पुस्तके नास्ति २ तस्मात्तु नन्दक इति घ॥ , ञ॥ च ३ महादेव इति ज॥ :प् ३८९ तदर्धं मध्यमं ज्ञेयं ततो हीनं न धारयेत्

śatārdhamaṅgulānāñca śreṣṭhaṃ khadgaṃ prakīrtitaṃ / 1 lohadaityamityādiḥ, harṣitā ity antaḥ pāṭhaḥ ja.. pustake nāsti 2 tasmāttu nandaka iti gha.. , ña.. ca 3 mahādeva iti ja.. :p 389 tadardhaṃ madhyamaṃ jñeyaṃ tato hīnaṃ na dhārayet

हिन्दी अर्थ

चिह्वित करके प्रतिवादीके सामने लिख ले। (वादीके आवेदन या बयानको ' भाषा”, 'प्रतिज्ञा' अथवा “पक्ष' कहते हैं।) प्रतिवादी वादीका आवेदन सुनकर उसके सामने ही उसका उत्तर' लिखावे। तब वादी उसी समय अपने निवेदनका प्रमाण लिखावे। निवेदनके प्रमाणित हो जानेपर वादी जीतता है, अन्यथा पराजित हो जाता है

English

a sword of fifty fingers is declared the best; half of that is to be known as middling; less than that one should not bear.

अध्याय २४३

श्लोक 24

दीर्घं सुमधुरं शब्दं युस्य खड्गस्य सत्तम ।किङ्किणीसदृशन्तस्य धारणं श्रेष्ठमुच्यते

dīrghaṃ sumadhuraṃ śabdaṃ yusya khaḍgasya sattama / kiṅkiṇīsadṛśantasya dhāraṇaṃ śreṣṭhamucyate

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार विवादमें चार पाद (अंशः)-से युक्त व्यवहार दिखाया गया है। जबतक अभियुक्तके वर्तमान अभियोगका निर्णय (फैसला) न हो जाय, तबतक उसके ऊपर दूसरे अपराधका मामला

English

A sword whose sound is long and very sweet, like a small bell — carrying it is said to be best.

अध्याय २४३

श्लोक 25

खड्गः पद्मपलाशाग्रो मण्डलाग्रश् च शस्यते ।करवीरदलाग्राभो घृतगन्धो वियत्प्रभः

khaḍgaḥ padmapalāśāgro maṇḍalāgraś ca śasyate / karavīradalāgrābho ghṛtagandho viyatprabhaḥ

हिन्दी अर्थ

न चलाये। जिसपर किसी दूसरेने अभियोग कर दिया हो, उसपर भी कोई वादी दूसरा अभियोग न चलावे। आवेदनके समय जो कुछ कहा गया हो, अपने उस कथनके विपरीत (विरुद्ध) कुछ न कहे। (हिंसा आदि)-का अपराध बन जाय तो पूर्व अभियोगका फैसला होनेके पहले ही मामला चलाया जा सकता है

English

A sword with a tip like a lotus petal and a round tip is praised; with tip like an oleander leaf, scented like ghee, shining like the sky;

अध्याय २४३

श्लोक 26

समाङ्गुलस्थाः शस्यन्ते व्रणाः खद्गेषु लिङ्गवत् ।काकोलूकसवर्णाभा विषमास्ते न शोभनाः

samāṅgulasthāḥ śasyante vraṇāḥ khadgeṣu liṅgavat / kākolūkasavarṇābhā viṣamāste na śobhanāḥ

हिन्दी अर्थ

सभासदोंसहित सभापति या प्राड्विवाकको चाहिए कि वह वादी और प्रतिवादी दोनोंके सभी विवादोंमें जो निर्णयका कार्य है, उसके

English

wounds on swords standing at equal fingers are praised, like a mark; those colored like crow or owl are uneven and not good.

अध्याय २४३

श्लोक 27

खड्गे न पश्येद्वदनमुच्छिष्टो न स्पृशेदसिं ।मूल्यं जातिं न कथयेन्निशि कुर्यान्न शीर्षके

khaḍge na paśyedvadanamucchiṣṭo na spṛśedasiṃ / mūlyaṃ jātiṃ na kathayenniśi kuryānna śīrṣake

हिन्दी अर्थ

नियुक्त करे। यदि सभासद राग, लोभ या भयसे । सम्मादनमें समर्थ पुरुषको प्रतिभू ' बनावे।' अर्थाके सम्पादनमें समर्थ पुरुषको 'प्रतिभू' बनावे । अर्थीके १. मिताक्षराकारने व्यवहारके सात अङ्ग बताये हैं। यथा --प्रतिज्ञा, उत्तर, संशय, हेतु-परामर्श, प्रमाण, निर्णय एवं प्रयोजन। २. उत्तरके चार भेद हैं --' सम्प्रतिपत्ति', ' मिथ्या', 'प्रत्यवस्कन्दन' तथा 'प्राङ्न्याय' उत्तर वह अच्छा माना गया है, जो पक्षके खण्डनमें समर्थ, न्यायसंगत, संदेहरहित, पूर्वापर-विरोधसे वर्जित तथा सुबोध हो-उसे समझनेके लिये व्याख्या अथवा टीका-टिप्पणी

English

One should not look at one's face in a sword; an unclean one should not touch a sword; one should not tell its price or origin; one should not keep it at the head at night.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 243
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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