अध्याय २४५
श्लोक 1
वास्तुलक्षणं अग्निर् उवाच वास्तुलक्ष्म प्रवक्ष्यामि विप्रादीनां च भूरिह ।श्वेता रक्ता तथा पीता कृष्णा चैव यथाक्रमम्
vāstulakṣaṇaṃ agnir uvāca vāstulakṣma pravakṣyāmi viprādīnāṃ ca bhūriha / śvetā raktā tathā pītā kṛṣṇā caiva yathākramam
हिन्दी अर्थ
न्यायको बलवान् समझना चाहिए। एक वाक्य उत्सर्ग या सामान्य है और दूसरा अपवाद अथवा विशेष है, अतः अपवाद उत्सर्गका बाधक हो जाता है। उस न्यायको प्रतीति कैसे होगी? व्यवहारसे । अन्वय-व्यतिरिक-लक्षण जो वृद्धव्यवहार है, उससे उक्त न्यायका अवगमन हो जायगा। इस कथनका भी अपवाद है। अर्थशास्त्र और धर्मशास्त्रके वचनोंमें विरोध होनेपर अर्थशास्त्रसे धर्मशास्त्र ही
English
(O Iron) On account of (the fact that) all deeds as well as weapons such as the plough are always subject to your control, you get me tranquillity.