Agni Purana· Agni Purāṇa
245
अध्याय 245 / 381

Adhyaya 246

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पूर्ण अध्याय पाठ31 श्लोक

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अध्याय २४५

श्लोक 1

वास्तुलक्षणं अग्निर् उवाच वास्तुलक्ष्म प्रवक्ष्यामि विप्रादीनां च भूरिह ।श्वेता रक्ता तथा पीता कृष्णा चैव यथाक्रमम्

vāstulakṣaṇaṃ agnir uvāca vāstulakṣma pravakṣyāmi viprādīnāṃ ca bhūriha / śvetā raktā tathā pītā kṛṣṇā caiva yathākramam

हिन्दी अर्थ

न्यायको बलवान् समझना चाहिए। एक वाक्य उत्सर्ग या सामान्य है और दूसरा अपवाद अथवा विशेष है, अतः अपवाद उत्सर्गका बाधक हो जाता है। उस न्यायको प्रतीति कैसे होगी? व्यवहारसे । अन्वय-व्यतिरिक-लक्षण जो वृद्धव्यवहार है, उससे उक्त न्यायका अवगमन हो जायगा। इस कथनका भी अपवाद है। अर्थशास्त्र और धर्मशास्त्रके वचनोंमें विरोध होनेपर अर्थशास्त्रसे धर्मशास्त्र ही

English

(O Iron) On account of (the fact that) all deeds as well as weapons such as the plough are always subject to your control, you get me tranquillity.

अध्याय २४५

श्लोक 2

घृतरक्तान्नमद्यानां गन्धाढ्या वसतश् च भूः ।मधुरा च कषाया च अम्लाद्युपरसा क्रमात्

ghṛtaraktānnamadyānāṃ gandhāḍhyā vasataś ca bhūḥ / madhurā ca kaṣāyā ca amlādyuparasā kramāt

हिन्दी अर्थ

बलवान् है; यह ऋषि-मुनियोंकी बाँधी मर्यादा है

English

On account of (the fact that) you are always the origin of fire and remain as a constituent of all sacrifices, you get me tranquillity.

अध्याय २४५

श्लोक 3

कुशैः शरैस् तथाकाशैर् दूर्वाभिर्या च संश्रिता ।प्रार्च्य विप्रांश् च शिःशल्पां खातपूर्वन्तु कल्पयेत्

kuśaiḥ śarais tathākāśair dūrvābhiryā ca saṃśritā / prārcya viprāṃś ca śiḥśalpāṃ khātapūrvantu kalpayet

हिन्दी अर्थ

पत्र उपस्थित करे, यह बात पहले कही गयी है। प्रमाण दो प्रकारका होता है-'मानुष-प्रमाण' और 'हैविक-प्रमाण'। 'मानुष-प्रमाण' तीन प्रकारका होता है, वही यहाँ बताया जाता है--) प्रमाण' कहे गये हैं। (लिखितके दो भेद हैं- 'शासन' और 'चीरक '। 'शासन का लक्षण पहले कहा गया है और “चीरक' का आगे बताया जायगा।) ' भुक्ति'का अर्थ है--उपभोग (कब्जा) ।

English

Because the fourteen worlds remain in the limbs of the cow, let me have good in this world as well as in the next.

अध्याय २४५

श्लोक 4

चतुःषष्टिपदं कृत्वा मध्ये ब्रह्मा चतुष्पदः ।प्राक् तेषां वै गृहस्वामी कथितस्तु तथार्यमा

catuḥṣaṣṭipadaṃ kṛtvā madhye brahmā catuṣpadaḥ / prāk teṣāṃ vai gṛhasvāmī kathitastu tathāryamā

हिन्दी अर्थ

(साक्षियोंके स्वरूप-प्रकार आगे बताये जायेगे ।) यदि मानुष-प्रमाणके इन तीनों भेदोंमेंसे एकको

English

On account of the fact that the beds of Keiava and Siva are not empty let my bed also be not empty in every birth being given (now).

अध्याय २४५

श्लोक 5

दक्षिणेन विवस्वांश् च मित्रः पश्चिमतस् तथा ।उदङ्महीधरश् चैव आपवत्सौ च वह्निगे

dakṣiṇena vivasvāṃś ca mitraḥ paścimatas tathā / udaṅmahīdharaś caiva āpavatsau ca vahnige

हिन्दी अर्थ

दिव्य प्रमाणोंमेंसे किसी एकको ग्रहण करना आवश्यक बताया जाता है ऋण आदि समस्त विवादोंमें उत्तर क्रिया बलवती मानी गयी है। यदि उत्तर क्रिया सिद्ध कर दी गयी तो उत्तरवादी विजयी होता है और पूर्ववादी अपना पक्ष सिद्ध कर चुका हो तो भी वह हार

English

Just as the celestials are established in all gems so also let the celestials get me tranquillity by my gift of gems.

अध्याय २४५

श्लोक 6

सावित्रश् चैव सविता जयेन्द्रौ नैरृते ऽम्बुधौ ।१ भ्राजते स्थितमिति छ॥ , ज॥ च २ भवेदिति ग॥ , घ॥ च :प् ३९२ रुद्रव्याधी च वायव्ये पूर्वादौ कोणगाद्वहिः

sāvitraś caiva savitā jayendrau nairṛte 'mbudhau / 1 bhrājate sthitamiti cha.. , ja.. ca 2 bhavediti ga.. , gha.. ca :p 392 rudravyādhī ca vāyavye pūrvādau koṇagādvahiḥ

हिन्दी अर्थ

जाता है। जैसे किसीने सिद्ध कर दिया कि ' अमुकने मुझसे सौ रुपये लिये हैं; अतः वह

English

Just as the other gifts are not equal to one-sixteenth (of the merit) of making a gift of land, may I have peace by the gift of the land.

अध्याय २४५

श्लोक 7

महेन्द्रश् च रविः सत्यो भृशः(१) पूर्वे ऽथ दक्षिणे ।गृहक्षतो ऽर्यमधृती गन्धर्वाश्चाथ वारुणे

mahendraś ca raviḥ satyo bhṛśaḥ(1) pūrve 'tha dakṣiṇe / gṛhakṣato 'ryamadhṛtī gandharvāścātha vāruṇe

हिन्दी अर्थ

उतने रुपयोंका देनदार है '; तथापि लेनेवाला यदि यह जवाब लगा दे कि “मैंने लिया अवश्य था, किंतु अमुक तिथिको सारे रुपये लौटा दिये थे' और यदि उत्तरदाता प्रमाणसे अपना यह कथन सिद्ध कर दे, तो अर्थी या पूर्ववादी पराजित हो जाता है; परंतु “आधि' (किसी वस्तुको गिरवी रखने), प्रतिग्रह लेने अथवा खरीदनेमें पूर्वक्रिया ही प्रबल होती है। जैसे किसी खेतको उसके

English

See p, 468 fn, 1,

अध्याय २४५

श्लोक 8

पुष्पदन्तो ऽसुराश् चैव वरुणो यक्ष एव च ।सौम्ये भल्लाटसोमौ च अदितिर्धनदस् तथा

puṣpadanto 'surāś caiva varuṇo yakṣa eva ca / saumye bhallāṭasomau ca aditirdhanadas tathā

हिन्दी अर्थ

मालिकने किसी धनीके यहाँ गिरवी रखकर उससे कुछ रुपये ले लिये। फिर उसी खेतको दूसरेसे भी रुपये लेकर उसने उसके यहाँ गिरवी रख दिया, ऐसे मामलोंमें जहाँ पहले खेतको गिरवी

English

The king should punish the men who do not perform atonement (for their own misdeeds). One should perform atonement (irrespective of the fact that the misdeed was done) with one's wilful desire or not.

अध्याय २४५

श्लोक 9

नागः करग्रहश् चैशे अष्टौ दिशि दिशि स्मृताः ।आद्यन्तौ तु तयोर्देवौ प्रोक्तावत्र गृहेश्वरौ

nāgaḥ karagrahaś caiśe aṣṭau diśi diśi smṛtāḥ / ādyantau tu tayordevau proktāvatra gṛheśvarau

हिन्दी अर्थ

रखा है, उसीका स्वत्व प्रबल माना जायगा, दूसरेका नहीं यदि भूमिस्वामीके देखते हुए कोई दूसरा

English

One should never eat (food) from intoxicated, angry and sick men. (One should not eat food) touched by great sinners and that touched by a woman in her courses.

अध्याय २४५

श्लोक 10

पर्जन्यः प्रथमो देवो द्वितीयश् च करग्रहः ।महेन्द्ररविसत्याश् च भृशो ऽथ गगनन्तथा

parjanyaḥ prathamo devo dvitīyaś ca karagrahaḥ / mahendraravisatyāś ca bhṛśo 'tha gaganantathā

हिन्दी अर्थ

नहीं बोलता तो बीस वर्षोतक ऐसा होनेपर वह भूमि उसके हाथसे निकल जाती है। इसी प्रकार हाथी, घोड़े आदि धनका कोई दस वर्षतक उपभोग करे और स्वामी कुछ न बोले तो वह

English

A simple expiation of fasting etc.

अध्याय २४५

श्लोक 11

पवनः पूर्वतश् चैव अन्तरीक्षधनेश्वरौ ।आग्नेये चाथ नैरृत्ये मृगसुग्रीवकौ सुरौ

pavanaḥ pūrvataś caiva antarīkṣadhaneśvarau / āgneye cātha nairṛtye mṛgasugrīvakau surau

हिन्दी अर्थ

उपभोक्ता ही उस धनका स्वामी हो जाता है, पहलेके स्वामीको उस धनसे हाथ धोना पड़ता है आधि, सीमा और निक्षेप-सम्बन्धी धनको, जड़ और बालकोंके धनको तथा उपनिधि, राजा, स्त्री एवं श्रोत्रिय ब्राह्मणोंके धनको छोड़कर ही पूर्वोक्त नियम लागू होता है, अर्थात् इनके धनका

English

Pavana in the east; Antariksha and Dhaneshvara; in the southeast and southwest the gods Mriga and Sugriva;

अध्याय २४५

श्लोक 12

रोगो मुख्यश् च वायव्ये दक्षिणे पुष्पवित्तदौ ।गृहक्षतो यमभृशौ गन्धर्वो नागपैतृकः

rogo mukhyaś ca vāyavye dakṣiṇe puṣpavittadau / gṛhakṣato yamabhṛśau gandharvo nāgapaitṛkaḥ

हिन्दी अर्थ

उपभोग करनेपर भी कोई उस धनका स्वामी नहीं हो सकता। आधिसे लेकर श्रत्रिय-पर्यन्त धनका चिरकालसे उपभोगके बलपर अपहरण करनेवाले पुरुषसे उस विवादास्पद धनको लेकर

English

Roga and Mukhya in the northwest; in the south Pushpa and Vittada; Grihakshata, Yama and Bhrisha, Gandharva, Naga and Pitrika;

अध्याय २४५

श्लोक 13

आप्ये दौवारिकसुग्रीवौ पुष्पदन्तो ऽसुरो जलं ।यक्ष्मा रोगश् च शोषश् च उत्तरे नागराजकः

āpye dauvārikasugrīvau puṣpadanto 'suro jalaṃ / yakṣmā rogaś ca śoṣaś ca uttare nāgarājakaḥ

हिन्दी अर्थ

राजा धनके असली स्वामीको दिलवा दे और अपहरण करनेवालेसे उस धनके बराबर ही दण्डस्वरूप धन राजाको दिलवाया जाय। अथवा अपहरणकर्ताको शक्तिके अनुसार अधिक या कम धन भी दण्डके रूपमें लिया जाय। स्वत्वका हेतुभूत जो प्रतिग्रह और क्रय आदि है, उसको ' आगम' कहते हैं। वह 'आगम' भोगकी अपेक्षा भी अधिक प्रबल माना गया है। स्वत्वका बोध

English

in the west Dauvarika and Sugriva, Pushpadanta, Asura, Jala; Yakshma, Roga and Shosha in the north; Nagaraja;

अध्याय २४५

श्लोक 14

मुख्यो भल्लाटशशिनौ अदितिश् च कुवेरकः ।नागो हुताशः श्रेष्ठो वै(२) शक्रसूर्यौ च पूर्वतः

mukhyo bhallāṭaśaśinau aditiś ca kuverakaḥ / nāgo hutāśaḥ śreṣṭho vai(2) śakrasūryau ca pūrvataḥ

हिन्दी अर्थ

करानेके लिये आगमसापेक्ष भोग ही प्रमाण है। परंतु पिता, पितामह आदिके क्रमसे जिस धनका उपभोग चला आ रहा है, उसको छोड़कर अन्य प्रकारके उपभोगमें ही आगमकी प्रबलता है;

English

Mukhya, Bhallata and Shashin, Aditi and Kubera; Naga, Hutasha the best, and Shakra and Surya in the east;

अध्याय २४५

श्लोक 15

दक्षे गृहक्षतः पुष्प आप्ये सुग्रीव उत्तमः ।पुष्पदन्तो ह्य् उदग्द्वारि भल्लाटः पुष्पदन्तकः

dakṣe gṛhakṣataḥ puṣpa āpye sugrīva uttamaḥ / puṣpadanto hy udagdvāri bhallāṭaḥ puṣpadantakaḥ

हिन्दी अर्थ

पूर्व-परम्परा-प्राप्त भोग तो आगमसे भी प्रबल है; परंतु जहाँ थोड़ा-सा भी उपभोग नहीं है, उस आगममें भी कोई बल नहीं है॥ ५३-५५ ३॥ विशुद्ध आगमसे भोग प्रमाणित होता है। जहाँ विशुद्ध आगम नहीं है, वह भोग प्रमाणभूत नहीं होता है। जिस पुरुषने भूमि आदिका आगम (अर्जन) किया है, वही ' कहाँसे तुम्हें क्षेत्र आदिकी

English

in the south Grihakshata, Pushpa; in the west Sugriva best; Pushpadanta in the north door; Bhallata, Pushpadanta.

अध्याय २४५

श्लोक 16

शिलेष्टकादिविन्यासं मन्त्रैः प्रार्च्य सुरांश् चरेत् ।नन्दे नन्दय वासिष्ठे वसुभिः प्रजया सह

śileṣṭakādivinyāsaṃ mantraiḥ prārcya surāṃś caret / nande nandaya vāsiṣṭhe vasubhiḥ prajayā saha

हिन्दी अर्थ

प्राप्ति हुई'--यह पूछे जानेपर लिखितादि प्रमाणोंद्वारा आगम (प्रतिग्रह आदि जनित अर्जन) -का उद्धार (साधन) करे। (अन्यथा वह दण्डका भागी होता है।) उसके पुत्र अथवा पौत्रको आगमके उद्धारकी

English

Having worshipped the gods with mantras one should perform the setting of stones, bricks and the like: "O Nanda, delight, daughter of Vasishtha, with wealth and offspring;

अध्याय २४५

श्लोक 17

१ भृगुरिति ज॥ २ नागो हुताशनः श्रेष्ठ इति ख॥ , छ॥ च :प् ३९३ जये भार्गववदायादे प्रजानाञ्जयमाहवे(१) ।पूर्णे ऽङ्गिरसदायादे पूर्णकामं कुरुध्व मां

1 bhṛguriti ja.. 2 nāgo hutāśanaḥ śreṣṭha iti kha.. , cha.. ca :p 393 jaye bhārgavavadāyāde prajānāñjayamāhave(1) / pūrṇe 'ṅgirasadāyāde pūrṇakāmaṃ kurudhva māṃ

हिन्दी अर्थ

आवश्यकता नहीं है। बह केवल भोग प्रमाणित करे। उसके स्वत्वको सिद्धिके लिये परम्परागत भोग ही प्रमाण है जो अभियुक्त व्यवहारका निर्णय होनेसे पहले ही परलोकवासी हो जाय, उसके धनके उत्तराधिकारी पुत्र आदि ही लिखितादि प्रमाणोंद्वारा उसके धनागमका उद्धार (साधन) करें; क्योंकि

English

Jaya, daughter of Bhargava, victory for the subjects in battle; Purna, daughter of Angiras, fulfil my desire;

अध्याय २४५

श्लोक 18

भद्रे काश्यपदायादे कुरु भद्रां मतिं मम ।सर्ववीजसमायुक्ते सर्वरत्नौषधैर् वृते

bhadre kāśyapadāyāde kuru bhadrāṃ matiṃ mama / sarvavījasamāyukte sarvaratnauṣadhair vṛte

हिन्दी अर्थ

उस व्यवहार (मामले) -में आगमके बिना केवल भोग प्रमाण नहीं हो सकता

English

Bhadra, daughter of Kashyapa, make my mind auspicious; joined with all seeds, surrounded by all jewels and herbs,

अध्याय २४५

श्लोक 19

रुचिरे नन्दने नन्दे वासिष्ठे रम्यतामिह ।प्रजापतिसुते देवि चतुरस्रे महीमये

rucire nandane nande vāsiṣṭhe ramyatāmiha / prajāpatisute devi caturasre mahīmaye

हिन्दी अर्थ

जो मामले बलात्कारसे अथवा भय आदि उपाधिके कारण चलाये गये हों, उन्हें लौटा दे। इसी प्रकार जिसे केवल स्त्रीने चलाया हो, जो रातमें प्रस्तुत किया गया हो, घरके भीतर घटित घटनासे सम्बद्ध हो अथवा गाँव आदिके बाहर निर्जन स्थानमें किया गया हो तथा किसी शत्रुने अपने द्वेषपात्रपर कोई अभियोग लगाया हो-इस

English

lovely, delighting Nanda, daughter of Vasishtha, be pleased here; daughter of Prajapati, goddess, four-cornered, made of earth,

अध्याय २४५

श्लोक 20

सुभगे सुव्रते भद्रे गृहे कश्यपि रम्यतां ।पूजिते परमाचार्यैर् गन्धमाल्यैर् अलङ्कृते(२)

subhage suvrate bhadre gṛhe kaśyapi ramyatāṃ / pūjite paramācāryair gandhamālyair alaṅkṛte(2)

हिन्दी अर्थ

तरहके व्यवहारोंको न्यायालयमें विचारके लिये न ले-लौटा दे

English

fortunate, well-vowed Bhadra, daughter of Kashyapa, be pleased in the house; worshipped by great teachers, adorned with scents and garlands,

अध्याय २४५

श्लोक 21

भवभूतिकरे देवि गृहे भार्गवि रम्यतां ।अव्यङ्ग्ये चाक्षते पूर्णे मुनेरङ्गिरसः सुते

bhavabhūtikare devi gṛhe bhārgavi ramyatāṃ / avyaṅgye cākṣate pūrṇe muneraṅgirasaḥ sute

हिन्दी अर्थ

(अब यह बताते हैं कि किनका चलाया हुआ अभियोग सिद्ध नहीं होता-)जो मादक द्रव्य पीकर मत्त हो गया हो, वात, पित्त, कफ, सन्निपात अथवा ग्रहावेशके कारण उन्मत्त हो, रोग आदिसे पीड़ित हो, इष्टके वियोग अथवा अनिष्टकी प्राप्तिसे दुःखमग्न हो, नाबालिग हो और शत्रु आदिसे डरा हुआ हो, ऐसे लोगोंद्वारा चलाया हुआ व्यवहार ' असिद्ध' माना गया है।

English

making prosperity, goddess, Bhargavi, be pleased in the house; unbroken, unspoiled, full, daughter of the sage Angiras,

अध्याय २४५

श्लोक 22

इष्टके त्वं प्रयच्छेष्टं प्रतिष्टाङ्कारयम्यहं ।देशस्वामिपुरस्वामिगृहस्वामिपरिग्रहे

iṣṭake tvaṃ prayaccheṣṭaṃ pratiṣṭāṅkārayamyahaṃ / deśasvāmipurasvāmigṛhasvāmiparigrahe

हिन्दी अर्थ

जिनका अभियुक्त-वस्तुसे कोई सम्बन्ध न हो, ऐसे लोगोंका चलाया हुआ व्यवहार भी सिद्ध नहीं होता (विचारणीय नहीं समझा जाता) ॥ ६० ३॥

English

brick, grant what is wished; I establish you; in the possession of the lord of the country, of the city and of the house,

अध्याय २४५

श्लोक 23

मनुष्यधनहस्त्यश्वपशुवृद्धिकरी भव ।गृहप्रवेशे ऽपि तथा शिलान्यासं समाचरेत्

manuṣyadhanahastyaśvapaśuvṛddhikarī bhava / gṛhapraveśe 'pi tathā śilānyāsaṃ samācaret

हिन्दी अर्थ

यदि किसीका चोरोंद्वारा अपहत सुवर्ण आदि आदि राजकर्मचारियोंको प्राप्त हो जाय और राजाको समर्पित किया जाय तो राजा उसके स्वामी-धनाधिकारीको वह धन लौटा दे। यह तभी करना चाहिए, जब धनका स्वामी खोयी

English

be the increaser of people, wealth, elephants, horses and cattle." Also at house-entry one should perform the laying of the stone.

अध्याय २४५

श्लोक 24

उत्तरेण शुभः प्लक्षो वटः प्राक् स्याद् गृहादितः ।उदुम्वरश् च याम्येन पश्चिमे ऽश्वत्थ उत्तमः

uttareṇa śubhaḥ plakṣo vaṭaḥ prāk syād gṛhāditaḥ / udumvaraś ca yāmyena paścime 'śvattha uttamaḥ

हिन्दी अर्थ

हुई वस्तुके रूप, रंग और संख्या आदि चिह्न बताकर उसपर अपना स्वत्व सिद्ध कर सके। यदि वह चिह्रोंद्वारा उस धनको अपना सिद्ध न कर सके तो मिथ्यावादी होनेके कारण उससे

English

To the north a plaksha is auspicious; a banyan to the east of the house; an udumbara to the south; in the west a pipal is best;

अध्याय २४५

श्लोक 25

वामभागे तथोद्यानं कुर्याद्वासं गृहे शुभं ।सायं प्रातस्तु घर्माप्तौ शीतकाले दिनान्तरे

vāmabhāge tathodyānaṃ kuryādvāsaṃ gṛhe śubhaṃ / sāyaṃ prātastu gharmāptau śītakāle dināntare

हिन्दी अर्थ

उतना ही धन दण्डके रूपमें वसूल करना चाहिए॥ ६१ ३॥ राजाको चाहिए कि वह चोरोंद्वारा चुराया हुआ द्रव्य उसके अधिकारी राज्यके नागरिकको लौटा दे। यदि वह नहीं लौटाता है तो जिसका वह धन है, उसका सारा पाप राजा अपने ऊपर

English

on the left a garden should be made; dwelling is good in the house. Planted trees should be watered evening and morning in heat, in cold season by day's end,

अध्याय २४५

श्लोक 26

वर्षारात्रे भुयः शोषे सेक्तव्या रोपितद्रुमाः ।विडङ्गघृटसंयुक्तान् सेचयेच्छीतवारिणा

varṣārātre bhuyaḥ śoṣe sektavyā ropitadrumāḥ / viḍaṅgaghṛṭasaṃyuktān secayecchītavāriṇā

हिन्दी अर्थ

(अब ऋणादान-सम्बन्धी व्यवहारपर विचार करते हैं) यदि कोई वस्तु बन्धक रखकर ऋण लिया जाय तो ऋणमें लिये हुए धनका 7, भाग प्रतिमास ब्याज धर्मसंगत होता है; अन्यथा

English

in rainy nights and especially in drought; one should water them with cold water mixed with vidanga and ghee.

अध्याय २४५

श्लोक 27

फलनाशे कुलत्थैश् च माषैर् मुद्गैस्तिलैर् यवैः ।१ विप्राणां जयमावहेति ख॥ २ गन्धमाल्यैर् अलङ्कृतैर् इति ग॥ , छ॥ च :प् ३९४ घृतशीतपयःसेकः फलपुष्पाय दर्वदा

phalanāśe kulatthaiś ca māṣair mudgaistilair yavaiḥ / 1 viprāṇāṃ jayamāvaheti kha.. 2 gandhamālyair alaṅkṛtair iti ga.. , cha.. ca :p 394 ghṛtaśītapayaḥsekaḥ phalapuṣpāya darvadā

हिन्दी अर्थ

बन्धकरहित ऋण देनेपर ब्राह्मणादि वर्णोके क्रमसे प्रतिशत कुछ-कुछ अधिक ब्याज लेना भी धर्मसम्मत है । अर्थात् ब्राह्मणसे जितना ले क्षत्रियसे, वैश्यसे और शूद्रसे क्रमशः उससे कुछ-कुछ अधिक प्रतिशत सूद या वृद्धिकी रकम ली जा सकती है

English

When fruit is lost, with kulattha, masha, mudga, sesame and barley; a sprinkling of ghee and cool milk gives fruit and flowers always.

अध्याय २४५

श्लोक 28

मत्स्याम्भसा तु सेकेन वृद्धिर्भवति शाखिनः ।आविकाजसकृच्चूर्णं यवचूर्णं तिलानि च

matsyāmbhasā tu sekena vṛddhirbhavati śākhinaḥ / āvikājasakṛccūrṇaṃ yavacūrṇaṃ tilāni ca

हिन्दी अर्थ

ऋणके रूपमें प्रयुक्त मादा पशुओंके लिये वृद्धिके रूपमें उसकी संतति ही ग्राह्य है। तेल, घी आदि रसद्रव्य किसीके यहाँ चिरकालतक रह गया और बीचमें यदि उसको वृद्धि (सूद

English

By sprinkling with fish-water the tree grows. Sheep-and-goat dung powder, barley powder, sesame,

अध्याय २४५

श्लोक 29

गोमांसमुदकञ्चेति सप्तरात्रं निधापयेत् ।उत्सेकं सर्ववृक्षाणां फलपुष्पादिवृद्धिदं

gomāṃsamudakañceti saptarātraṃ nidhāpayet / utsekaṃ sarvavṛkṣāṇāṃ phalapuṣpādivṛddhidaṃ

हिन्दी अर्थ

वृद्धिकी रकम) नहीं ली गयी तो वह बढ़ते- बढ़ते आठगुनातक हो सकती है। इससे आगे उसपर वृद्धि नहीं लगायी जाती। इसी प्रकार वस्त्र, धान्य तथा सुवर्ण-इनकी क्रमशः चौगुनी, तिगुनी और दुगुनीतक वृद्धि हो सकती है, इससे आगे नहीं

English

cow-flesh and water — one should keep these for seven nights; this sprinkling for all trees increases fruit, flowers and the like.

अध्याय २४५

श्लोक 30

मत्स्योदकेन शीतेन आम्राणां सेक इष्यते(१) ।प्रशस्तं चाप्यशोकानां कामिनीपादताडनं

matsyodakena śītena āmrāṇāṃ seka iṣyate(1) / praśastaṃ cāpyaśokānāṃ kāminīpādatāḍanaṃ

हिन्दी अर्थ

व्यापारके लिये दुर्गम वनप्रदेशको लाँघकर यात्रा करनेवाले लोग ऋणदाताको दस प्रतिशत

English

For mangoes, sprinkling with cool fish-water is desired. For ashokas the stroke of a woman's foot is praised;

अध्याय २४५

श्लोक 31

खर्जूरनारिकेलादेर्लवणाद्भिर्विवर्धनं ।विडङ्गमत्स्यमांसाद्भिः सर्वेषु दोहदं शुभं

kharjūranārikelāderlavaṇādbhirvivardhanaṃ / viḍaṅgamatsyamāṃsādbhiḥ sarveṣu dohadaṃ śubhaṃ

हिन्दी अर्थ

ब्याज दें और जो समुद्रकी यात्रा करनेवाले हैं, वे बीस प्रतिशत वृद्धि प्रदान करें। अथवा सभी वर्णके लोग अबन्धक या सबन्धक ऋणमें अपने लिये धनके स्वामीद्वारा नियत को हुई वृद्धि सभी जातियोंके लिये दें

English

for date palms, coconut and the like, growth by salt water; vidanga, fish and flesh in water — a longing-wish is auspicious for all.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 245
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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