Agni Purana· Agni Purāṇa
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अध्याय 246 / 381

Adhyaya 247

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अध्याय २४६

श्लोक 1

पुष्पादिपूजाफलं अग्निर् उवाच पुष्पैस्तु पूजनाद्विष्णुः सर्वकार्येषु सिद्धिदः ।मालती मल्लिका यूथी पाटला करवीरकं

puṣpādipūjāphalaṃ agnir uvāca puṣpaistu pūjanādviṣṇuḥ sarvakāryeṣu siddhidaḥ / mālatī mallikā yūthī pāṭalā karavīrakaṃ

हिन्दी अर्थ

ऋण लेनेवाले पुरुषने पहले जो धन लिया है और जो साक्षी आदिके द्वारा प्रमाणित है, उसको वसूल करनेवाला धनी राजाके लिये वाच्य (निवारणीय) नहीं होता; अर्थात् राजा उस न्यायसंगत

English

Fast regulated according to the phases of the moon.

अध्याय २४६

श्लोक 2

पावान्तिरतिमुक्तश् च(२) कर्णिकारः कुराण्टकः ।१ सेकः उच्यते इति ख॥ २ पावन्तिकातिमुक्तश्चेति ग॥ :प् ३९५ कुब्जकस्तगरो नीपो वाणो वर्वरमल्लिका

pāvāntiratimuktaś ca(2) karṇikāraḥ kurāṇṭakaḥ / 1 sekaḥ ucyate iti kha.. 2 pāvantikātimuktaśceti ga.. :p 395 kubjakastagaro nīpo vāṇo varvaramallikā

हिन्दी अर्थ

धनको वसूल करनेसे उस ऋणदाताको न रोके। (यदि वह अप्रमाणित या अदत्त धनकी वसूली करता है तो वह अवश्य राजाके द्वारा निवारणीय है।) जो पूर्वोक्त रूपसे न्यायसंगत धनको वसूली करनेपर भी ऋणदाताके विरुद्ध शिकायत लेकर राजाके पास जाय, वह राजाके द्वारा दण्ड पानेके योग्य है। राजा उससे वह धन अवश्य दिलवावे

English

An excellent brahmin who had drunk water from a well into which a five-nailed dead animal (had fallen) fir con¬ taining feces, should observe fast for three days.

अध्याय २४६

श्लोक 3

अशोकस्तिलकः कुन्दः पूजायै स्यात्तमालजं ।बिल्वपत्रं शमीपत्रं पत्रं भृङ्गरजस्य तु

aśokastilakaḥ kundaḥ pūjāyai syāttamālajaṃ / bilvapatraṃ śamīpatraṃ patraṃ bhṛṅgarajasya tu

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें “व्यवहारकथन' नामक दो सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

Ashoka, tilaka, kunda are for worship; the tamala-born; bilva leaf, shami leaf, and the leaf of bhringaraja;

अध्याय २४६

श्लोक 4

तुलसीकालतुलसीपत्रं वासकमर्चने ।केतकीपत्रपुष्पं च पद्मं रक्तोत्पलादिकं

tulasīkālatulasīpatraṃ vāsakamarcane / ketakīpatrapuṣpaṃ ca padmaṃ raktotpalādikaṃ

हिन्दी अर्थ

अग्निदेव कहते हैं-- वसिष्ठ! यदि ऋण लेनेवाले पुरुषके अनेक ऋणदाता साहु हों और वे सब- के-सब एक ही जातिके हों तो राजा उन्हें ग्रहणक्रमके अनुसार ऋण लेनेवालेसे धन दिलवावे। अर्थात् जिस धनीने पहले ऋण दिया हो, उसे पहले और जिसने बादमें दिया हो, उसे बादमें ऋणग्राही

English

tulasi and black tulasi leaf, vasaka in worship; leaf and flower of ketaki, and lotus, red lotus and the like;

अध्याय २४६

श्लोक 5

नार्कन्नोन्मत्तकङ्काञ्ची पूजने गिरिमल्लिका ।कौटजं शाल्मलीपुष्पं कण्टकारीभवन्नहि

nārkannonmattakaṅkāñcī pūjane girimallikā / kauṭajaṃ śālmalīpuṣpaṃ kaṇṭakārībhavannahi

हिन्दी अर्थ

जातिके हों तो ऋणग्राही पुरुष सबसे पहले ब्राह्मण- धनीको धन देकर उसके बाद क्षत्रिय आदिको देय-धन अर्पित करे। राजाको चाहिए कि वह ऋण लेनेवालेसे उसके द्वारा गृहीत धनके प्रमाणद्वारा

English

not arka, not unmatta, not kankanchi in worship; girimallika; kutaja and shalmali flowers; not what is born of kantakari.

अध्याय २४६

श्लोक 6

घृतप्रस्थेन विष्णोश् च स्नानङ्गोकोटिसत्फलं ।आढकेन तु राजा स्यात् घृतक्षीरैर् दिवं व्रजेत्

ghṛtaprasthena viṣṇoś ca snānaṅgokoṭisatphalaṃ / āḍhakena tu rājā syāt ghṛtakṣīrair divaṃ vrajet

हिन्दी अर्थ

सिद्ध हो जानेपर दस प्रतिशत धन दण्डके रूपमें वसूल करे तथा जिसने अपना धन वसूल कर लिया है, उस ऋणदाता पुरुषसे पाँच प्रतिशत धन ग्रहण कर ले और उस धनको न्यायालयके कर्मचारियोंके भरण-पोषणमें लगावे

English

Bathing Vishnu with a prastha of ghee has the fine fruit of a crore of cows; with an adhaka one becomes a king; by ghee and milk one goes to heaven.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 246
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.