Agni Purana· Agni Purāṇa
247
अध्याय 247 / 381

Adhyaya 248

37 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ37 श्लोक

श्लोक पर जाएं:

अध्याय २४७

श्लोक 1

धनुर्वेदः अग्निर् उवाच चतुष्पादं धनुर्वेदं वेदे पञ्चविधं द्विज ।रथनागाश्वपत्तीनां योधांश्चाश्रित्य कीर्तितं

dhanurvedaḥ agnir uvāca catuṣpādaṃ dhanurvedaṃ vede pañcavidhaṃ dvija / rathanāgāśvapattīnāṃ yodhāṃścāśritya kīrtitaṃ

हिन्दी अर्थ

यदि ऋण लेनेवाला पुरुष ऋणदाताको अपेक्षा हीन जातिका हो और निर्धन होनेके कारण ऋणकी अदायगी न कर सके, तब ऋणदाता उससे उसके अनुरूप कोई काम करा ले और

English

Yama and Bhmgara in other texts.

अध्याय २४७

श्लोक 2

यन्मुक्तं पाणिमुक्तं मुक्तसन्धारितं तथा ।अमुक्तं बाहुयुद्धञ्च पञ्चधा त्यत् प्रकीर्तितं

yanmuktaṃ pāṇimuktaṃ muktasandhāritaṃ tathā / amuktaṃ bāhuyuddhañca pañcadhā tyat prakīrtitaṃ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार उस ऋणका भुगतान कर ले। यदि ऋण लेनेवाला ब्राह्मण हो और वह भी निर्धन हो गया हो तो उससे कोई काम न लेकर उसे अवसर देना चाहिए और धीरे-धीरे जैसे-जैसे उसके पास आय हो, वैसे-वैसे (उसके कुटुम्बको कष्ट दिये बिना) ऋणको वसूली करे। जो वृद्धिके लिये ऋणके रूपमें दिये हुए अपने धनको लोभवश ऋणग्राहीके लौटानेपर भी नहीं लेता है, उसके

English

Seya in other texts.

अध्याय २४७

श्लोक 3

तत्र शस्त्रास्त्रसम्पत्त्या द्विविधं परिकीर्तितं ।ऋजुमायाविभेदेन भूयो द्विविधमुच्यते

tatra śastrāstrasampattyā dvividhaṃ parikīrtitaṃ / ṛjumāyāvibhedena bhūyo dvividhamucyate

हिन्दी अर्थ

देय-धनको यदि किसी मध्यस्थके यहाँ रख दिया जाय तो उस दिनसे उसपर वृद्धि नहीं होती ब्याज नहीं बढ़ता; परन्तु उस रखे हुए धनको भी ऋणदाताके माँगनेपर न दिया जाय तो उसपर

English

Garaka, in other texts.

अध्याय २४७

श्लोक 4

क्षेपिणी चापयन्त्राद्यैर् यन्त्रमुक्तं प्रकीर्तितं ।शिलातोमरयन्त्राद्यं पाणिमुक्तं प्रकीर्तितं

kṣepiṇī cāpayantrādyair yantramuktaṃ prakīrtitaṃ / śilātomarayantrādyaṃ pāṇimuktaṃ prakīrtitaṃ

हिन्दी अर्थ

पूर्ववत् ब्याज बढ़ता ही रहता है दूसरेका द्रव्य जब खरीद आदिके बिना ही अपने अधिकारमें आता है तो उसे 'रिक्थ' कहते हैं। विभागद्वारा जो उस रिक्थको ग्रहण करता है, वह ' रिक्थग्राह? कहलाता है । जो जिसके द्रव्यको

English

What is thrown by a machine, such as a bow-machine, is called yantra-mukta; stone, javelin machines and the like are called pani-mukta;

अध्याय २४७

श्लोक 5

मुक्तसन्धारितं ज्ञेयं प्रासाद्यमपि यद्भवेत् ।खड्गादिकममुक्तञ्च नियुद्धं विगतायुधं

muktasandhāritaṃ jñeyaṃ prāsādyamapi yadbhavet / khaḍgādikamamuktañca niyuddhaṃ vigatāyudhaṃ

हिन्दी अर्थ

रिक्थके रूपमें ग्रहण करता है, उसीसे उसके ऋणको भी दिलवाया जाना चाहिए। उसी तरह जो जिसकी स्त्रीको ग्रहण करता है, वही उसका ऋण भी दे। रिक्थ-धनका स्वामी यदि पुत्रहीन

English

"mukta-sandharita" is to be known, also what would be a lance and the like; sword and the like is amukta; wrestling is weaponless.

अध्याय २४७

श्लोक 6

कुर्याद्योग्यानि प्रात्राणि योद्धुमिच्छुर्जितश्रमः ।धनुःश्रेष्ठानि युद्धानि प्रासमध्यानि तानि च

kuryādyogyāni prātrāṇi yoddhumicchurjitaśramaḥ / dhanuḥśreṣṭhāni yuddhāni prāsamadhyāni tāni ca

हिन्दी अर्थ

है तो उसका ऋण वह कृत्रिम पुत्र चुकावे, जो एकमात्र उसीके धनपर जीवन-निर्वाह करता है। संयुक्त परिवारमें समूचे कुटुम्बके भरण-पोषणके लिये एक साथ रहनेवाले बहुत-से लोगोंने या उस कुटुम्बके एक-एक व्यक्तिने जो ऋण लिया हो, उसे उस कुटुम्बका मालिक दे। यदि वह मर गया या परदेश चला गया तो उसके धनके भागीदार सभी लोग मिलकर वह ऋण चुकावें ।

English

One wishing to fight, having conquered fatigue, should make suitable vessels. Bow-wars are best, spear-wars middling;

अध्याय २४७

श्लोक 7

तानि खड्गजघन्यानि बाहुप्रत्यवराणि च ।धनुर्वेदे गुरुर्विप्रः प्रोक्तो वर्णद्वयस्य च

tāni khaḍgajaghanyāni bāhupratyavarāṇi ca / dhanurvede gururvipraḥ prokto varṇadvayasya ca

हिन्दी अर्थ

पतिके किये हुए ऋणको स्त्री न दे, पुत्रके किये हुए ऋणको माता न दे, पिता भी न दे तथा स्त्रीके द्वारा किये गये ऋणको पति न दे; किंतु यह नियम समूचे कुटुम्बके भरण-पोषणके लिये

English

sword-wars lowest, and arm-wars the least. In the science of archery the teacher is a Brahmin, said for two castes;

अध्याय २४७

श्लोक 8

युद्धाधिकारः शूद्रस्य स्वयं व्यापादि शिक्षया ।देशस्थैः शङ्करै राज्ञः कार्या युद्धे सहायता

yuddhādhikāraḥ śūdrasya svayaṃ vyāpādi śikṣayā / deśasthaiḥ śaṅkarai rājñaḥ kāryā yuddhe sahāyatā

हिन्दी अर्थ

किये गये ऋणपर लागू नहीं होता है। ग्वाले, शराब बनानेवाले, नट, धोबी तथा व्याधको स्त्रियोंने जो ऋण लिया हो, उसे उनके पति अवश्य दें; क्योंकि उनको वृत्ति (जीविका) उन स्त्रियोंके ही अधीन होती है। यदि पति मुमूर्षु हो या परदेश जानेवाला हो, उसके द्वारा नियुक्त स्त्रीने

English

the Shudra's right to fight is by himself, by training. The king's help in battle should be made by the mixed castes living in the country.

अध्याय २४७

श्लोक 9

अङ्गुष्ठगुल्फपाण्यङ्घ्यः श्लिष्टाः स्युः सहिता यदि ।दृष्टं समपदं स्थानमेतल्लक्षणतस् तथा

aṅguṣṭhagulphapāṇyaṅghyaḥ śliṣṭāḥ syuḥ sahitā yadi / dṛṣṭaṃ samapadaṃ sthānametallakṣaṇatas tathā

हिन्दी अर्थ

जो ऋण लिया हो, वह भी यद्यपि पतिका ही किया हुआ ऋण है, तथापि उसे पत्नीको चुकाना होगा; अथवा पतिके साथ रहकर भार्याने जो ऋण किया हो, वह भी पति और पुत्रके अभावमें

English

If thumb, ankle, hand and foot are joined together, that is the "samapada" stance, seen thus by marks;

अध्याय २४७

श्लोक 11

हंसपङ्क्त्याकृतिसमे दृश्येते यत्र जानुनी ।चतुर्वितस्तिविच्छिन्ने तदेतन्मण्डलं स्मृतं

haṃsapaṅktyākṛtisame dṛśyete yatra jānunī / caturvitastivicchinne tadetanmaṇḍalaṃ smṛtaṃ

हिन्दी अर्थ

उस भार्याको ही चुकाना होगा; जो ऋण स्त्रीने स्वयं किया हो, उसकी देनदार तो जह है ही, इसके सिवा दूसरे किसी प्रकारके पतिकृत ऋणको चुकानेका भार स्त्रीपर नहीं है यदि पिता ऋण करके बहुत दूर परदेशमें

English

where both knees are seen shaped like a row of swans, separated by four spans, that is remembered as "mandala";

अध्याय २४७

श्लोक 12

हलाकृतिमयं यच्च स्तब्धजानूरुदक्षिणं ।वितस्त्यः पञ्च विस्तारे तदालीढं प्रकीर्तितं

halākṛtimayaṃ yacca stabdhajānūrudakṣiṇaṃ / vitastyaḥ pañca vistāre tadālīḍhaṃ prakīrtitaṃ

हिन्दी अर्थ

संकटमें फँस गया तो उसके ऋणको पुत्र और पौत्र चुकावें। (पिताके अभावमें पुत्र और पुत्रके अभावमें पौत्र उस ऋणकी अदायगी करे।) यदि वे अस्वीकार करें तो अर्थी न्यायालयमें अभियोग

English

shaped like a plough, with the right knee and thigh stiff, five spans in breadth, that is called "alidha";

अध्याय २४७

श्लोक 13

एतदेव विपर्यस्तं प्रत्यालीढमिति स्मृतं(१) ।तिर्यग्भूतो भवेद्वामो दक्षिणो ऽपि भवेदृजुः

etadeva viparyastaṃ pratyālīḍhamiti smṛtaṃ(1) / tiryagbhūto bhavedvāmo dakṣiṇo 'pi bhavedṛjuḥ

हिन्दी अर्थ

उपस्थित करके साक्षी आदिके द्वारा उस ऋणको यथार्थता प्रमाणित कर दे। उस दशामें तो पुत्र- पौत्रोंको वह ऋण देना ही पड़ेगा। जो ऋण शराब पीनेके लिये लिया गया हो, परस्त्री- लम्पटताके कारण कामभोगके लिये किया गया हो, जूएमें हारनेपर जो ऋण लिया गया हो, जो धन दण्ड और शुल्कका शेष रह गया हो तथा जो व्यर्थका दान हो, अर्थात् धूर्तो और नट

English

the very reverse is remembered as "pratyalidha." The left should be oblique and the right straight;

अध्याय २४७

श्लोक 14

गुल्फौ पार्ष्णिग्रहौ चैव स्थितौ पञ्चाङ्गुलान्तरौ ।१ प्रत्यालीढं प्रकीर्तितमिति ज॥ :प् ३९७ स्थानं जातं भवेदेतद् द्वादशाङ्गुलमायतं

gulphau pārṣṇigrahau caiva sthitau pañcāṅgulāntarau / 1 pratyālīḍhaṃ prakīrtitamiti ja.. :p 397 sthānaṃ jātaṃ bhavedetad dvādaśāṅgulamāyataṃ

हिन्दी अर्थ

आदिको देनेके लिये किया गया हो, इस तरहके पैतृक ऋणको पुत्र कदापि न दे। भाइयोंके, पति- पल्ीके तथा पिता-पुत्रके अविभक्त धनमें “प्रातिभाव्य' ऋण और साक्ष्य नहीं माना गया

English

ankles and heels set five fingers apart — this arisen stance is twelve fingers long;

अध्याय २४७

श्लोक 15

ऋजुजानुर्भवेद्वामो दक्षिणः सुप्रसारितः ।अथवा दक्षिणञ्जानु कुब्जं भवति निश् चलं

ṛjujānurbhavedvāmo dakṣiṇaḥ suprasāritaḥ / athavā dakṣiṇañjānu kubjaṃ bhavati niś calaṃ

हिन्दी अर्थ

विश्वासके लिये किसी दूसरे पुरुषके साथ जो समय-शर्त या मर्यादा निश्चित की जाती है, उसका नाम है--प्रातिभाव्य'। वह विषय-भेदसे तीन प्रकारका होता है। जैसे--( १) दर्शनविषयक प्रातिभाव्य। अर्थात् कोई दूसरा पुरुष यह उत्तरदायित्व

English

the left knee straight and the right well extended; or the right knee bent and motionless;

अध्याय २४७

श्लोक 16

दण्डायतो भवेदेष चरणः सह जानुना ।एवं विकटमुद्दिष्टं द्विहस्तान्तरमायतं

daṇḍāyato bhavedeṣa caraṇaḥ saha jānunā / evaṃ vikaṭamuddiṣṭaṃ dvihastāntaramāyataṃ

हिन्दी अर्थ

इस व्यक्तिको मैं न्यायालयके सामने उपस्थित कर दूँगा अर्थात् दिखाउँगा --हाजिर कर दूँगा।

English

this foot together with the knee should be staff-long: thus "vikata" is taught, two hands apart in length;

अध्याय २४७

श्लोक 17

जानुनी द्विगुणे स्यातामुत्तानौ चरणावुभौ ।अनेन विधियोगेन सम्पुटं परिकीर्तितं

jānunī dviguṇe syātāmuttānau caraṇāvubhau / anena vidhiyogena sampuṭaṃ parikīrtitaṃ

हिन्दी अर्थ

(“दर्शन-प्रतिभू" को आजकलको भाषामें ' हाजिर- जामिन' कहते हैं।) (२) प्रत्ययविषयक प्रातिभाव्य । “प्रत्यय' कहते हैं विश्वासको 'विश्वास-प्रतिभू' को “विश्वास-जामिन' कहा जाता है। जैसे कोई कहे कि “आप मेरे विश्वासपर इसको धन दीजिये, यह आपको ठगेगा नहीं; क्योंकि यह अमुकका बेटा है। इसके पास उपजाऊ भूमि है और इसके अधिकारमें एक बड़ा-सा गाँव भी है' इत्यादि।

English

the knees doubled and both feet supine: by this method "samputa" is declared;

अध्याय २४७

श्लोक 18

किञ्चिद्विवर्तितौ पादौ समदण्डायतौ स्थिरौ ।दृष्टमेव यथान्यायं षोडशाङ्गुलमायतं

kiñcidvivartitau pādau samadaṇḍāyatau sthirau / dṛṣṭameva yathānyāyaṃ ṣoḍaśāṅgulamāyataṃ

हिन्दी अर्थ

(३) दानविषयक प्रातिभाव्य। ' दान-प्रतिभू'को “माल-जामिन' कहते हैं। 'दान-प्रतिभू' यह जिम्मेदारी लेता है कि “यदि यह लिया हुआ धन नहीं देगा तो मैं स्वयं ही अपने पाससे दूँगा'--

English

feet slightly turned, equal, staff-long, steady; seen as it should be, sixteen fingers long.

अध्याय २४७

श्लोक 19

स्वस्तिकेनात्र कुर्वीत प्रणामं प्रथमं द्विज ।कामुकं गृह्य वामेन वाणं दक्षिणकेन तु

svastikenātra kurvīta praṇāmaṃ prathamaṃ dvija / kāmukaṃ gṛhya vāmena vāṇaṃ dakṣiṇakena tu

हिन्दी अर्थ

इत्यादि। इस प्रकार दर्शन (उपस्थिति), प्रत्यय (विश्वास) तथा दान (वसूली)- के लिये प्रातिभाव्य किया जाता है--जामिन देनेकी आवश्यकता पड़ती है। इनमेंसे प्रथम दो, अर्थात् ' दर्शन-प्रतिभू' और “विश्वास-प्रतिभू'--इनकी बात झूठी होनेपर, स्वयं धनी ऋण चुकानेके लिये विवश है, अर्थात् राजा उनसे धनीको वह धन अवश्य दिलवावे; परंतु जो तीसरा 'दान-प्रतिभू' है, उसको बात झूठी

English

Here, twice-born, one should first make the salutation in the "svastika" posture, taking the bow in the left hand and the arrow in the right.

अध्याय २४७

श्लोक 20

वैशाखे यदि वा जाते स्थितौ वाप्यथवायतौ ।गुणान्तन्तु ततः कृत्वा कार्मुके प्रियकार्मुकः

vaiśākhe yadi vā jāte sthitau vāpyathavāyatau / guṇāntantu tataḥ kṛtvā kārmuke priyakārmukaḥ

हिन्दी अर्थ

होनेपर वह स्वयं तो उस धनको लौटानेका अधिकारी है ही, किंतु यदि वह बिना लौटाये ही विलुप्त हो जाय तो उसके पुत्रोंसे भी उस धनकी वसूली की जा सकती है। जहाँ ' दर्शन-

English

In the Vaishakha stance, whether standing or extended, having set the string on the bow, the lover of the bow —

अध्याय २४७

श्लोक 21

अधःकटिन्तु धनुषः फलदेशन्तु पत्रिणः ।धरण्यां स्थापयित्वा तु तोलयित्वा तथैव च

adhaḥkaṭintu dhanuṣaḥ phaladeśantu patriṇaḥ / dharaṇyāṃ sthāpayitvā tu tolayitvā tathaiva ca

हिन्दी अर्थ

प्रतिभू' अथवा 'विश्वास-प्रतिभू' परलोकवासी हो जायँ, वहाँ उनके पुत्र उनके दिलाये हुए ऋणको न दें; परंतु जो स्वयं लौटा देनेके लिये जिम्मेदारी ले चुका है, वह 'दान-प्रतिभू' यदि मर जाय तो उसके पुत्र अवश्य उसके दिलाये हुए ऋणको दें। यदि एक ही धनको दिलानेके लिये बहुत-से प्रतिभू (जामिनदार) बन गये हों, तो उस धनके न मिलनेपर वे सभी उस ऋणको

English

having set the lower middle of the bow and the point of the arrow on the ground and having weighed it likewise,

अध्याय २४७

श्लोक 22

भुजाभ्यामत्र कुञ्जाभ्यां प्रकोष्ठाभ्यां शुभव्रत ।यस्य वाणं धनुः श्रेष्ठं पुङ्गदेशे च पत्रिणः

bhujābhyāmatra kuñjābhyāṃ prakoṣṭhābhyāṃ śubhavrata / yasya vāṇaṃ dhanuḥ śreṣṭhaṃ puṅgadeśe ca patriṇaḥ

हिन्दी अर्थ

बाँटकर अपने-अपने अंशसे चुकावें। यदि सभी प्रतिभू एक-से ही हों, अर्थात् जैसे ऋणग्राही

English

with the arms, elbows and forearms, of good vow: he whose arrow and bow are best, and at the notch of the arrow,

अध्याय २४७

श्लोक 23

विन्यासो धनुश् चैव द्वादशाङ्गुलमन्तरं ।ज्यया विशिष्टः कर्तव्यो नातिहीनो न चाधिकः

vinyāso dhanuś caiva dvādaśāṅgulamantaraṃ / jyayā viśiṣṭaḥ kartavyo nātihīno na cādhikaḥ

हिन्दी अर्थ

सम्पूर्ण धन लौटानेको उद्यत रहा है, उसी प्रकार प्रत्येक प्रतिभू यदि सम्पूर्ण धन लौटानेके लिये प्रतिज्ञाबद्ध हो तो धनी पुरुष अपनी रुचिके अनुसार उनमेंसे किसी एकसे ही अपना सारा धन वसूल कर सकता है। ऋण देनेवाले धनीके द्वारा दबाये जानेपर प्रतिभू राजाके आदेशसे सबके सामने उस धनीको जो धन देता है, उससे दूना धन ऋण लेनेवाले लोग उस प्रतिभूको

English

the placing and the bow have twelve fingers' interval; it should be made distinguished by the string, not too little nor too much.

अध्याय २४७

श्लोक 24

निवेश्य कार्मुकं नभ्यां नितम्बे शरसङ्करं ।उत्क्षिपेदुत्थितं हस्तमन्तरेणाक्षिकर्णयोः

niveśya kārmukaṃ nabhyāṃ nitambe śarasaṅkaraṃ / utkṣipedutthitaṃ hastamantareṇākṣikarṇayoḥ

हिन्दी अर्थ

मादा पशुओंको यदि ऋणके रूपमें दिया गया हो तो उस धनकी वृद्धिके रूपमें केवल उनकी संतति ली जा सकती है। धान्यकी अधिक- से-अधिक वृद्धि तीनगुनेतक मानी गयी है। वस्त्र

English

Having placed the bow at the navel and the bundle of arrows on the hip, one should raise the lifted hand between eye and ear;

अध्याय २४७

श्लोक 25

पूर्वेण मुष्टिना ग्राह्यस्तनाग्रे दक्षिणे शरः ।हरणन्तु ततः कृत्वा शीघ्रं पूर्वं प्रसारयेत्

pūrveṇa muṣṭinā grāhyastanāgre dakṣiṇe śaraḥ / haraṇantu tataḥ kṛtvā śīghraṃ pūrvaṃ prasārayet

हिन्दी अर्थ

वृद्धिके क्रमसे बढ़ता हुआ चौगुना तथा रस (घी, तेल आदि) अधिक-से-अधिक आठगुनातक हो सकता है। यदि कोई वस्तु बन्धक रखकर ऋण लिया गया हो और उस ऋणकी रकम ब्याजके द्वारा बढ़ते-बढ़ते दूनी हो गयी हो, उस दशामें भी ऋणग्राही यदि सारा धन लौटाकर उस वस्तुको छुडा नहीं लेता है, तो वह वस्तु नष्ट हो जाती है--उसके हाथसे निकलकर ऋणदाताकी

English

the arrow on the right at the breast-tip should be held by the former fist; then having taken it, one should quickly extend it forward;

अध्याय २४७

श्लोक 26

नाभ्यन्तरा नैव वाह्या नोर्ध्वका नाधरा तथा ।न च कुब्जा न चोत्ताना न चला नातिवेष्टिता

nābhyantarā naiva vāhyā nordhvakā nādharā tathā / na ca kubjā na cottānā na calā nātiveṣṭitā

हिन्दी अर्थ

अपनी वस्तु हो जाती है। जो धन समय-विशेषपर लौटानेकी शर्तपर लिया जाता है और उसके लिये कोई जेवर आदि बन्धक रखा जाता है, वह समय बीत जानेपर वह बन्धक नष्ट हो जाता है,

English

not inside, nor outside, not up, nor down, not bent, not supine, not moving, not too wrapped,

अध्याय २४७

श्लोक 27

समा स्थैर्यगुणोपेता पूर्वदण्डमिव स्थिता ।छादयित्वा ततो लक्ष्यं पूर्वेणानेन मुष्टिना

samā sthairyaguṇopetā pūrvadaṇḍamiva sthitā / chādayitvā tato lakṣyaṃ pūrveṇānena muṣṭinā

हिन्दी अर्थ

फिर वापस नहीं मिलता। परंतु जिसका फलमात्र भोगनेके योग्य होता है, वह बगीचा या खेत आदि बन्धकके रूपमें रखा गया हो तो वह कभी नष्ट नहीं होता; उसपर मालिकका स्वत्व यदि कोई गोपनीय आधि (बन्धकमें रखी हुई वस्तु--ताँबेकी कराही आदि) ऋणदाताके उपभोगमें आये तो उसपर दिये हुए धनके लिये ब्याज नहीं लगाया जा सकता। यदि बन्धकमें

English

even, endowed with steadiness, standing like the former staff; then, having covered the target with this former fist,

अध्याय २४७

श्लोक 28

उरसा तूत्थितो यन्ता त्रिकोणविनतस्थितः ।स्रस्तांशे निश् चलग्रीवो मयूराञ्चितमस्तकः

urasā tūtthito yantā trikoṇavinatasthitaḥ / srastāṃśe niś calagrīvo mayūrāñcitamastakaḥ

हिन्दी अर्थ

कोई उपकारी प्राणी (बैल आदि) रखा गया हो और उसके काम लेकर उसकी शक्ति क्षीण कर दी गयी हो तो उसपर दिये गये ऋणके ऊपर वृद्धि नहीं जोड़ी जा सकती। यदि बन्धककी

English

the archer risen with chest, standing bent in a triangle, with loosened shoulder and unmoving neck, head peacock-curved,

अध्याय २४७

श्लोक 29

ललाटनासावक्त्रांसाः कुर्युरश्वसमम्भवेत् ।अन्तरं त्र्यङ्गुलं ज्ञेयं चिवुकस्यांसकस्य च

lalāṭanāsāvaktrāṃsāḥ kuryuraśvasamambhavet / antaraṃ tryaṅgulaṃ jñeyaṃ civukasyāṃsakasya ca

हिन्दी अर्थ

वस्तु नष्ट हो जाय--टूट-फूट जाय तो उसे ठीक कराकर लौटाना चाहिए और यदि वह सर्वथा विलुप्त (नष्ट) हो जाय तो उसके लिये भी उचित मूल्य आदि देना चाहिए। यदि हैव अथवा राजाके प्रकोपसे वह वस्तु नष्ट हुई हो तो उसपर उक्त नियम लागू नहीं होता। उस दशामें ऋणग्राही धनीको वृद्धिसहित धन लौटाये अथवा वृद्धि रोकनेके लिये दूसरी कोई वस्तु बन्धक रखे।

English

forehead, nose, mouth and shoulders should make it horse-like. The interval between chin and shoulder is to be known as three fingers;

अध्याय २४७

श्लोक 30

प्रथमन्त्र्यङ्गुलं ज्ञेयं द्वितीये द्व्यङ्गुलं स्मृतं ।तृतीये ऽङ्गुलमुदिष्टमायतञ्चिवुकांसयोः

prathamantryaṅgulaṃ jñeyaṃ dvitīye dvyaṅgulaṃ smṛtaṃ / tṛtīye 'ṅgulamudiṣṭamāyatañcivukāṃsayoḥ

हिन्दी अर्थ

'आधि' चाहे गोप्य हो या भोग्य, उसके स्वीकार (उपभोग) -मात्रसे आधि-ग्रहणको सिद्धि हो जाती है। उस आधिकी प्रयन्नपूर्वक रक्षा करनेपर भी यदि वह कालवश निस्सार हो जाय-

English

the first is to be known as three fingers, the second two fingers, the third is declared one finger — the stretch between chin and shoulders.

अध्याय २४७

श्लोक 31

गृहीत्वा सायकं पुङ्खात्तर्जन्याङ्गुष्ठकेन तु ।अनामया पुनर्गृह्य तथा मध्यमयापि च

gṛhītvā sāyakaṃ puṅkhāttarjanyāṅguṣṭhakena tu / anāmayā punargṛhya tathā madhyamayāpi ca

हिन्दी अर्थ

वृद्धिसहित मूलधनके लिये पर्याप्त रह जाय तो ऋणग्राहीको दूसरी कोई वस्तु आधिके रूपमें रखनी चाहिए अथवा धनीको उसका धन लौटा देना चाहिए सदाचारको ही बन्धक मानकर उसके द्वारा जो द्रव्य अपने या दूसरेके अधीन किया जाता है, उसको “चरित्र-बन्धककुत' धन कहते हैं । ऐसे धनको ऋणग्राही वृद्धिसहित धनीको लौटावे

English

Having taken the arrow by the feather end with forefinger and thumb, then again with ring finger and likewise the middle,

अध्याय २४७

श्लोक 32

तावदाकर्षयेद्वेगाद्यावद्वाणः सुपूरितः ।एवं विधमुपक्रम्य मोक्तव्यं विधिवत् खगं

tāvadākarṣayedvegādyāvadvāṇaḥ supūritaḥ / evaṃ vidhamupakramya moktavyaṃ vidhivat khagaṃ

हिन्दी अर्थ

या राजा ऋणग्राहीसे धनीको वृद्धिसहित वह धन दिलवाये। यदि 'सत्यङ्कारकृत' द्रव्य बन्धक रखा गया हो तो धनीको द्विगुण धन लौटाना चाहिए। तात्पर्यं यह कि यदि बन्धक रखते समय ही यह

English

one should draw with speed until the arrow is well filled; having thus begun, the bird (arrow) should be released by rule.

अध्याय २४७

श्लोक 33

दृष्टिमुष्टिहतं लक्ष्यं भिन्द्याद्वाणेन सुव्रतः ।मुक्त्वा तु(१) पश्चिमं हस्तं क्षिपेद्वेगेन पृष्ठतः

dṛṣṭimuṣṭihataṃ lakṣyaṃ bhindyādvāṇena suvrataḥ / muktvā tu(1) paścimaṃ hastaṃ kṣipedvegena pṛṣṭhataḥ

हिन्दी अर्थ

बात कह दी गयी हो कि 'ऋणकी रकम बढ़ते- मेरी बन्धक रखी हुई वस्तुपर धनीका अधिकार

English

The one of good vow should pierce with the arrow the target struck by gaze and fist; having released, the rear hand should be flung quickly behind.

अध्याय २४७

श्लोक 34

एतदुच्छेदमिच्छन्ति ज्ञातव्यं हि त्वया द्विज ।कूर्परन्तदधः कार्यमाकृष्य तु धनुष्मता

etaducchedamicchanti jñātavyaṃ hi tvayā dvija / kūrparantadadhaḥ kāryamākṛṣya tu dhanuṣmatā

हिन्दी अर्थ

नहीं होगा'-इस शर्तके साथ जो ऋण लिया गया हो वह 'सत्यङ्कारकृत' द्रव्य कहलाता है। इसका एक दूसरा स्वरूप भी है। क्रय-विक्रय आदिको व्यवस्था (मर्यादा)-के निर्वाहके लिये

English

They desire this as the uprooting; it should be known by you, twice-born. The elbow should be set below by the archer who has drawn;

अध्याय २४७

श्लोक 35

ऊर्ध्वं विमुक्तके कार्ये लक्षश्लिष्टन्तु मध्यमं ।श्रेष्ठं प्रकृष्टं विज्ञेयंधनुःशास्त्रविशारदैः

ūrdhvaṃ vimuktake kārye lakṣaśliṣṭantu madhyamaṃ / śreṣṭhaṃ prakṛṣṭaṃ vijñeyaṃdhanuḥśāstraviśāradaiḥ

हिन्दी अर्थ

जो दूसरेके हाथमें कोई आभूषण इस शर्तके साथ समर्पित किया जाता है कि व्यवस्था-भङ्ग करनेपर दुगुना धन देना होगा, उस दशामें जिसने वह भूषण अर्पित किया है, यदि वही व्यवस्था भङ्ग करे तो उसे वह भूषण सदाके लिये छोड़ देना पड़ेगा। यदि दूसरी ओरसे व्यवस्था भङ्ग को गयी तो उसे उस भूषणको द्विगुण करके लौटाना होगा। यह भी 'सत्यङ्कारकृत' ही द्रव्य है। यदि

English

in release it should be done upward; in joining the target it is middle; the best, the foremost, is to be known by those expert in archery.

अध्याय २४७

श्लोक 36

ज्येष्ठस्तु सायको ज्ञेयो भवेद्द्वादशमुष्टयः ।१ त्यक्त्वा इति ज॥ :प् ३९९ एकादश तथा कनीयान्दशमुष्टयः

jyeṣṭhastu sāyako jñeyo bhaveddvādaśamuṣṭayaḥ / 1 tyaktvā iti ja.. :p 399 ekādaśa tathā kanīyāndaśamuṣṭayaḥ

हिन्दी अर्थ

धन देकर बन्धक छुड़ानेके लिये ऋणग्राही उपस्थित हो तो धनदाताको चाहिए कि वह उसका बन्धक लौटा दे। यदि सूदके लोभसे वह बन्धक लौटानेमें आनाकानी करता या विलम्ब लगाता है तो वह

English

The best arrow is to be known as of twelve fists; likewise eleven; the least of ten fists.

अध्याय २४७

श्लोक 37

चतुर्हस्तं धनुः श्रेष्ठं त्रयः सार्धन्तु मध्यमं ।कनीयस्तु त्रयः प्रोक्तं नित्यमेव पदातिनः

caturhastaṃ dhanuḥ śreṣṭhaṃ trayaḥ sārdhantu madhyamaṃ / kanīyastu trayaḥ proktaṃ nityameva padātinaḥ

हिन्दी अर्थ

चोरकी भाँति दण्डनीय है। यदि धन देनेवाला कहीं दूर चला गया हो तो उसके कुलके किसी विश्वसनीय व्यक्तिके हाथमें वृद्धिसहित मूलधन रखकर ऋणग्राही अपना बन्धक वापस ले सकता है। अथवा उस समयतक उस बन्धकको छुडानेका जो मूल्य हो, वह निश्चित करके उस बन्धकको धनीके लौटनेतक उसीके यहाँ रहने दे, उस दशामें उस धनपर आगे कोई वृद्धि नहीं लगायी

English

A bow of four cubits is best; three and a half middling; of three cubits is declared the least, always for infantry;

अध्याय २४७

श्लोक 38

अश्वे रथे गजे श्रेष्ठे तदेव परिकीर्तितं

aśve rathe gaje śreṣṭhe tadeva parikīrtitaṃ //

हिन्दी अर्थ

और नियत समयतक न लौटे तो धनी ऋणग्राहीके विश्वसनीय पुरुषों और गवाहोंके साथ उस बन्धकको बेचकर अपना प्राप्तव्य धन ले ले (यदि पहले बताये अनुसार ऋण लेते समय ही केवल द्रव्य

English

for horse, chariot and the best elephant the same is declared.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 247
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.