अध्याय २४८
श्लोक 1
धनुर्वेदकथनं अग्निर् उवाच पूर्णायतं द्विजः कृत्वा ततो मांसैर् गदायुधान् ।सुनिर्धौतं धनुः कृत्वा यज्ञभूमौ विधापयेत्
dhanurvedakathanaṃ agnir uvāca pūrṇāyataṃ dvijaḥ kṛtvā tato māṃsair gadāyudhān / sunirdhautaṃ dhanuḥ kṛtvā yajñabhūmau vidhāpayet
हिन्दी अर्थ
लौटानेको शर्त हो गयी हो, तब बन्धकको नहीं बेचा या नष्ट किया जा सकता है)। जब किया जैसे धनीके सदाचारसे प्रभावित हो ऋणग्राही बहुत अधिक मूल्यकी वस्तु उसके यहाँ बन्धक रखकर स्वल्प ही ऋण लेता है, उसे यह विश्वास है कि धनी मेरी बहुमूल्य वस्तु नष्ट नहीं करेगा; इसी प्रकार ऋणग्राहीके सद्भावपर विश्वास रखकर धनी स्वल्प मूल्यकी वस्तु बन्धकके तौरपर लेकर अधिक धन ऋणमें दे देता है, अथवा कुछ भी बन्धक न रखकर पर्याप्त ऋण दे देता है, ये
English
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