Agni Purana· Agni Purāṇa
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अध्याय 248 / 381

Adhyaya 249

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अध्याय २४८

श्लोक 1

धनुर्वेदकथनं अग्निर् उवाच पूर्णायतं द्विजः कृत्वा ततो मांसैर् गदायुधान् ।सुनिर्धौतं धनुः कृत्वा यज्ञभूमौ विधापयेत्

dhanurvedakathanaṃ agnir uvāca pūrṇāyataṃ dvijaḥ kṛtvā tato māṃsair gadāyudhān / sunirdhautaṃ dhanuḥ kṛtvā yajñabhūmau vidhāpayet

हिन्दी अर्थ

लौटानेको शर्त हो गयी हो, तब बन्धकको नहीं बेचा या नष्ट किया जा सकता है)। जब किया जैसे धनीके सदाचारसे प्रभावित हो ऋणग्राही बहुत अधिक मूल्यकी वस्तु उसके यहाँ बन्धक रखकर स्वल्प ही ऋण लेता है, उसे यह विश्वास है कि धनी मेरी बहुमूल्य वस्तु नष्ट नहीं करेगा; इसी प्रकार ऋणग्राहीके सद्भावपर विश्वास रखकर धनी स्वल्प मूल्यकी वस्तु बन्धकके तौरपर लेकर अधिक धन ऋणमें दे देता है, अथवा कुछ भी बन्धक न रखकर पर्याप्त ऋण दे देता है, ये

English

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अध्याय २४८

श्लोक 2

ततो वाणं समागृह्य दंशितः सुसमाहितः ।तूर्णमासाद्य बध्नीयादृढां कक्षाञ्च दक्षिणाम्

tato vāṇaṃ samāgṛhya daṃśitaḥ susamāhitaḥ / tūrṇamāsādya badhnīyādṛḍhāṃ kakṣāñca dakṣiṇām

हिन्दी अर्थ

सब 'चरित्रबन्धककृत' धनकी श्रेणीमें आते हैं।

English

A quarter less (of the above expiation) should be ob¬ served if (the cow or ox) dies on account of taming (goading) or cliaining or conhning or yoking to a cart or (while being tied) to the pillar, chain or rope.

अध्याय २४८

श्लोक 3

विलक्ष्यमपि तद्वाणं तत्र चैव सुसंस्थितं ।ततः समुद्धरेद्वाणं तूणाद्दक्षिणपाणिना

vilakṣyamapi tadvāṇaṃ tatra caiva susaṃsthitaṃ / tataḥ samuddharedvāṇaṃ tūṇāddakṣiṇapāṇinā

हिन्दी अर्थ

हुआ ऋण अपनी वृद्धिके क्रमसे दूना होकर आधिपर चढ़ जाय और धनिकको आधिसे दूना धन प्राप्त हो गया हो तो वह आधिको छोड़ दे। (ऋणग्राहीको लौटा दे) ॥ २१--२४॥ “उपनिधि-प्रकरण'-यदि निक्षेप-द्रव्यके आधारभूत वासन या पेटी आदिमें धरोहरको वस्तु रखकर उसे सील-मोहरसहित बन्द करके वस्तुका स्वरूप या संख्या बताये बिना ही विश्वास

English

A vedic hymn to be repeated while observing an expiation for hgvihg killed a cow.

अध्याय २४८

श्लोक 4

तेनैव सहितं मध्ये शरं सङ्गृह्य धारयेत् ।वामहस्तेन वै कक्षां धनुस्तस्मात्समुद्धरेत्

tenaiva sahitaṃ madhye śaraṃ saṅgṛhya dhārayet / vāmahastena vai kakṣāṃ dhanustasmātsamuddharet

हिन्दी अर्थ

करके किसी दूसरेके हाथमें रक्षाके लिये उसे दिया जाता है तो उसे “उपनिधि-द्र॒व्य' कहते हैं। उसे स्थापकके माँगनेपर ज्यों-का-त्यों लौटा देना चाहिएः। यदि उपनिधिको वस्तु राजाने बलपूर्वक

English

Having drunk wine, through ignorance, a brahmin should drink wine of the colour of fire, or cow's urine of the colour of fire or water alone.

अध्याय २४८

श्लोक 5

अविषण्णमतिर्भूत्वा गुणे पुङ्खं निवेशयेत् ।सम्पीड्य सिंहकर्णेन पुङ्खेनापि समे दृढं

aviṣaṇṇamatirbhūtvā guṇe puṅkhaṃ niveśayet / sampīḍya siṃhakarṇena puṅkhenāpi same dṛḍhaṃ

हिन्दी अर्थ

ले ली हो या हैवी बाधा (आग लगने आदि)- से नष्ट हुई हो, अथवा उसे चोर चुरा ले गये हों तो जिसके यहाँ वह वस्तु रखी गयी थी, उसको वह वस्तु देने या लौटानेके लिये बाध्य नहीं किया जा सकता। यदि स्वामीने उस वस्तुको माँगा हो और धरोहर रखनेवालेने नहीं दिया हो, उस दशामें यदि राजा आदिको बाधासे उस वस्तुका नाश हुआ हो तो रखनेवाला उस वस्तुके

English

The five products got from a cow are the purification

अध्याय २४८

श्लोक 6

वामकर्णोपविष्तञ्च फलं वामस्य धारयेत् ।वर्णान् मध्यमया तत्र वामाङ्गुल्या च धारयेत्

vāmakarṇopaviṣtañca phalaṃ vāmasya dhārayet / varṇān madhyamayā tatra vāmāṅgulyā ca dhārayet

हिन्दी अर्थ

अनुरूप मूल्य मालधनीको देनेके लिये विवश किया जा सकता है और राजाको उससे उतना ही दण्ड दिलाया जाय। जो मालधनीकी अनुमति लिये बिना स्वेच्छासे उपनिधिकी वस्तुको भोगता

English

The expiation in which cow's urine, co%vdung, milk, curd, clarified butter or water with hUa is taken and fasting is observed for oi| ni|t.

अध्याय २४८

श्लोक 7

मनो लक्ष्यगतं कृत्वा मुष्टिना च विधानवित् ।दक्षिणे गात्रभागे तु कृत्वा वर्णं विमोक्षयेत्

mano lakṣyagataṃ kṛtvā muṣṭinā ca vidhānavit / dakṣiṇe gātrabhāge tu kṛtvā varṇaṃ vimokṣayet

हिन्दी अर्थ

या उससे व्यापार करता है, वह दण्डनीय है। यदि उसने उस वस्तुका उपभोग किया है तो वह सूदसहित उस वस्तुको लौटाये और यदि व्यापारमें लगाकर लाभ उठाया है तो लाभसहित वह वस्तु मालधनीको लौटाये और उतना ही दण्ड राजाको

English

Having fixed the mind on the target with the fist, the knower of rule, on the right part of the body, should release the arrow, coloring it.

अध्याय २४८

श्लोक 8

ललाटपुटसंस्थानं दण्डं लक्ष्ये निवेशयेत् ।आकृष्य ताडयेत्तत्र चन्द्रकं षोडशाङ्गुलम्

lalāṭapuṭasaṃsthānaṃ daṇḍaṃ lakṣye niveśayet / ākṛṣya tāḍayettatra candrakaṃ ṣoḍaśāṅgulam

हिन्दी अर्थ

आदिमें यह उपनिधि-सम्बन्धी विधान ही लागू होता है

English

One should place the staff on the target in the position of the forehead-hollow; having drawn it, he should strike there the "chandraka" of sixteen fingers;

अध्याय २४८

श्लोक 9

मुक्त्वा वाणं ततः पश्चादुल्काशिक्षस्तदा तया ।निगृह्णीयान् मध्यमया ततो ऽङ्गुल्या पुनः पुनः

muktvā vāṇaṃ tataḥ paścādulkāśikṣastadā tayā / nigṛhṇīyān madhyamayā tato 'ṅgulyā punaḥ punaḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें “व्यवहारका कथन” नामक दो सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ साक्षी, लेखा तथा दिव्यप्रमाणोंके विषयमें विवेचन

English

then, having released the arrow, one trained in the "ulka" should hold repeatedly with the middle finger,

अध्याय २४८

श्लोक 10

अक्षिलक्ष्यं क्षिपेत्तूणाच्चतुरस्रञ्च दक्षिणम् ।चतुरस्रगतं वेध्यमभ्यसेच्चादितः स्थितः

akṣilakṣyaṃ kṣipettūṇāccaturasrañca dakṣiṇam / caturasragataṃ vedhyamabhyaseccāditaḥ sthitaḥ

हिन्दी अर्थ

साक्षी -प्रकरण ' अग्निदेव कहते हैं-- वसिष्ठ! तपस्वी, कुलीन, दानशील, सत्यवादी, कोमलहृदय, धर्मात्मा, पुत्रयुक्त, धनी, पञ्चयज्ञ आदि वैदिक क्रियाओंसे युक्त अपनी

English

should shoot the eye-target from the quiver and the right four-sided; one should practice piercing the four-sided one, standing from the beginning;

अध्याय २४८

श्लोक 11

तस्मादनन्तरं तीक्ष्णं परावृत्तं गतञ्च यत् ।निम्नमुन्नतवेधञ्च अभ्यसेत् क्षिप्रकन्ततः

tasmādanantaraṃ tīkṣṇaṃ parāvṛttaṃ gatañca yat / nimnamunnatavedhañca abhyaset kṣiprakantataḥ

हिन्दी अर्थ

जाति और वर्गके पाँच या तीन साक्षी होने चाहिए। अथवा सभी मनुष्य सबके साक्षी हो सकते हैं; किंतु स्त्री, बालक, वृद्ध, जुआरी, मत्त (शराब आदि पीकर मतवाला), उन्मत्त (भूत या ग्रहके आवेशसे युक्त), अभिशस्त (पातकी), रंगमञ्चपर उतरनेवाला चारण, पाखण्डी, कूटकारी

English

after that the sharp, the turned and the gone, the low and the high piercing; then one should practice quick shooting.

अध्याय २४८

श्लोक 12

वेध्यस्थानेष्वथैतेषु सत्त्वस्य पुटकाद्धनुः ।हस्तावापशतैश्चित्रैस्तर्जयेद्दुस्तरैर् अपि

vedhyasthāneṣvathaiteṣu sattvasya puṭakāddhanuḥ / hastāvāpaśataiścitraistarjayeddustarair api

हिन्दी अर्थ

१. जो वस्तु बिना गिनती या स्वरूप बताये सील-मोहर करके धरोहर रखी जाती है, उसे 'उपनिधि' समझे और जो गिनकर, दिखाकर रखी जाती है, उसे 'निक्षेप' माना जाता है। जैसा कि नारदका वचन है--

English

In these piercing-places from the pouch of the quarry, one should threaten with the bow by hundreds of varied, hard-to-cross hand-motions.

अध्याय २४८

श्लोक 13

तस्मिन्(१) वेध्यगते विप्र द्वे वेध्ये दृढसञ्ज्ञके ।द्वे वेध्ये दुष्करे वेध्ये द्वे तथा चित्रदुष्करे

tasmin(1) vedhyagate vipra dve vedhye dṛḍhasañjñake / dve vedhye duṣkare vedhye dve tathā citraduṣkare

हिन्दी अर्थ

२. विवाह आदि उत्सवोंमें मँगनीके तौरपर माँगकर लाये हुए वस्त्र और आभूषण आदिको याचित' कहते हैं। ३. एकके हाथमें रखी हुई वस्तुको वहाँसे लेकर दूसरेके हाथमें रखी जाय तो उसे 'अन्वाहित' कहते हैं। ४. घरके मालिकके परोक्षमें ही घरवालोंके हाथमें जो धरोहरकी वस्तु यह कहकर दी जाती है कि गृहस्वामीके आनेपर उन्हें यह वस्तु दे दी जाय तो उसको 'न्यास' कहते हैं।

English

Among them, Brahmin, two targets are called firm, two hard, two hard-to-pierce and two variegated-hard;

अध्याय २४८

श्लोक 14

न तु निम्नञ्च(२) तीक्ष्णञ्च दृढवेध्ये प्रकीर्तिते ।निम्नं दुष्करमुद्दिष्टं वेध्यमूर्ध्वगतञ्च यत्

na tu nimnañca(2) tīkṣṇañca dṛḍhavedhye prakīrtite / nimnaṃ duṣkaramuddiṣṭaṃ vedhyamūrdhvagatañca yat

हिन्दी अर्थ

५. सबके सामने गिनकर, दिखाकर जो वस्तु धरोहर रखी जाती है, उसका नाम 'निक्षेप' है।

English

low and sharp are not declared in the firm target; the low is declared hard, and the one going upward;

अध्याय २४८

श्लोक 15

मस्तकायनमध्ये तु चित्रदुष्करसञ्ज्ञके ।एवं वेध्यगणङ्कृत्वा दक्षिणेनेतरेण च

mastakāyanamadhye tu citraduṣkarasañjñake / evaṃ vedhyagaṇaṅkṛtvā dakṣiṇenetareṇa ca

हिन्दी अर्थ

सम्बन्धी (विवादास्पद अर्थसे सम्बन्ध रखनेवाला), सहायक, शत्रु, चोर, साहसी (दुस्साहसपूर्ण कार्य करनेवाला), दृष्टदोष (जिसका पूर्वापर-विरुद्ध बोलनेका स्वभाव देखा गया हो, वह) तथा निर्धूत (भाई-बन्धुओंसे परित्यक्त) आदि साक्षी बनानेयोग्य नहीं हैं। वादी और प्रतिवादी-दोनोंके मान लेनेपर एक भी धर्मवेत्ता पुरुष साक्षी हो सकता है। किसी स्त्रीको बलपूर्वक पकड़ लेना,

English

in the middle of the head-path are the variegated-hard ones. Having made the group of targets thus, with right and with the other,

अध्याय २४८

श्लोक 16

आरोहेत् प्रथमं वीरो जितलक्षस्ततो नरः ।एष एव विधिः प्रोक्तस्तत्र दृष्टः प्रयोक्तृभिः

ārohet prathamaṃ vīro jitalakṣastato naraḥ / eṣa eva vidhiḥ proktastatra dṛṣṭaḥ prayoktṛbhiḥ

हिन्दी अर्थ

चोरी करना, किसीको कटुबचन सुनाना या कठोर दण्ड देना तथा हत्या आदि दुःसाहसपूर्ण कार्य करना-इन अपराधोंमें सभी साक्षी बनाये जा सकते हैं

English

the hero should first ascend, then the man who has conquered the mark. This same rule is stated, seen there by practitioners;

अध्याय २४८

श्लोक 17

१ अस्मिन्निति ख॥ , छ॥ , ज॥ च २ नम्रञ्चेति घ॥ , ञ॥ च :प् ४०१ अधिकं भ्रमणं तस्य तस्माद्वेध्यात् प्रकीर्तितम् ।लक्ष्यं स योजयेत्तत्र पत्रिपत्रगतं दृढम्

1 asminniti kha.. , cha.. , ja.. ca 2 namrañceti gha.. , ña.. ca :p 401 adhikaṃ bhramaṇaṃ tasya tasmādvedhyāt prakīrtitam / lakṣyaṃ sa yojayettatra patripatragataṃ dṛḍham

हिन्दी अर्थ

जो मनुष्य साक्षी होना स्वीकार करके तीन पक्षके भीतर गवाही नहीं देता है, राजा छियालीसवें दिन उससे सारा ऋण सूदसहित वादीको दिलावे और अपना दशांश भाग भी उससे वसूल करे। जो नराधम जानते हुए भी साक्षी नहीं होता, वह कूटसाक्षी (झूठी गवाही देनेवालों)-के समान दण्ड और पापका भागी होता है। न्यायाधिकारी वादी एवं प्रतिवादीके समीप-स्थित साक्षियोंको

English

its greater turning is declared from that target. He should fix the target there, firm in the arrow's feather;

अध्याय २४८

श्लोक 18

भ्रान्तं प्रचलितञ्चैव स्थिरं यच्च भवेदिति ।समन्तात्ताडयेद् भिन्द्याच्छेदयेद्व्यथयेदपि

bhrāntaṃ pracalitañcaiva sthiraṃ yacca bhavediti / samantāttāḍayed bhindyācchedayedvyathayedapi

हिन्दी अर्थ

यह वचन सुनावे-पातकियों और महापातकियोंको तथा आग लगानेवालों और स्त्री एवं बालकोंकी हत्या करनेवालोंको जो लोक (नरक) प्राप्त होते हैं, झूठी गवाही देनेवाला

English

it may be turning, moving or steady; from all sides he should strike, pierce, cut and pain.

अध्याय २४८

श्लोक 19

कर्मयोगविधानज्ञो ज्ञात्वैवं विधिमाचरेत् ।मनसा चक्षुषा दृष्ट्या योगशिक्षुर्यमं जयेत्

karmayogavidhānajño jñātvaivaṃ vidhimācaret / manasā cakṣuṣā dṛṣṭyā yogaśikṣuryamaṃ jayet

हिन्दी अर्थ

मनुष्य उन सभी लोकों (नरकों)-को प्राप्त होता है। तुमने सैकड़ों जन्मोंमें जो कुछ भी पुण्य अर्जित किया है, वह सब उसीको प्राप्त हुआ समझो, जिसे तुम असत्यभाषणसे पराजित करोगे।' साक्षियोंकी बातोंमें द्विविधा (परस्पर विरुद्धभाव) हो तो उनमेंसे बहुसंख्यक साक्षियोंका वचन ग्राह्य होता है। यदि समान संख्यावाले साक्षियोंको बातोंमें विरोध हो, अर्थात् जहाँ दो एक तरहकी

English

The knower of the rule of yoga in action, having so known, should perform the rule. By mind, eye and sight the yoga-learner conquers Yama.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 248
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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