Agni Purana· Agni Purāṇa
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अध्याय 250 / 381

Adhyaya 251

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अध्याय २५०

श्लोक 1

धनुर्वेदकथनं अग्निर् उवाच भ्रान्तमुद्भ्रान्तमाविद्धमाप्लुतं विप्लुतं सृतं ।सम्पातं समुदीशञ्च श्येनपातमथाकुलं

dhanurvedakathanaṃ agnir uvāca bhrāntamudbhrāntamāviddhamāplutaṃ viplutaṃ sṛtaṃ / sampātaṃ samudīśañca śyenapātamathākulaṃ

हिन्दी अर्थ

पुत्र मुझ अमुकने यह लेखा लिखा।' साक्षियोंके न होनेपर भी ऋणीके हाथका लिखा हुआ लेखा पूर्ण प्रमाण माना जाता है, किंतु बह लेखा बल अथवा छलके प्रयोगसे लिखवाया गया न हो। लेखा लिखकर लिया हुआ ऋण तीन पीढ़ियोंतक ही देय होता है, परंतु बन्धककी वस्तु तबतक धनीके उपभोगमें आती है, जबतक कि लिया

English

The breadth of the clenched fist.

अध्याय २५०

श्लोक 2

उद्धूतमवधूतञ्च सव्यं दक्षिणमेव च ।अनालक्षितविस्फोटौ करालेन्द्रमहासखौ(१)

uddhūtamavadhūtañca savyaṃ dakṣiṇameva ca / anālakṣitavisphoṭau karālendramahāsakhau(1)

हिन्दी अर्थ

साक्षियोंका उल्लेख 'क्रिया' है।

English

Uddhuta and avadhuta, left and right, analakshita and visphota, karala, indra and mahasakha,

अध्याय २५०

श्लोक 3

विकरालनिपातौ च विभीषणभयानकौ ।समग्रार्धतृतीयांशपादपादर्धवारिजाः

vikarālanipātau ca vibhīṣaṇabhayānakau / samagrārdhatṛtīyāṃśapādapādardhavārijāḥ

हिन्दी अर्थ

हुआ ऋण चुका नहीं दिया जाता है। यदि लेखापत्र देशान्तरमें हो, उसकी लिखावट दोषपूर्ण अथवा गया हो, तब धनी ऋणीकी अनुमतिसे दूसरा लेखा तैयार करवावे। संदिग्ध लेखकी शुद्धि स्वहस्तलिखित आदिसे होती है, अर्थात् लेखक अपने हाथसे दूसरा लेखा लिखकर दिखावे। जब

English

vikaralanipata, vibhishana and bhayanaka, samagra, ardha, tritiyamsha, pada, padardha, varija,

अध्याय २५०

श्लोक 4

प्रत्यालीढमथालीढं वराहं लुलितन्तथा ।इति द्वात्रिंशतो ज्ञेयाः खड्गचर्मविधौ रणे

pratyālīḍhamathālīḍhaṃ varāhaṃ lulitantathā / iti dvātriṃśato jñeyāḥ khaḍgacarmavidhau raṇe

हिन्दी अर्थ

दोनोंके अक्षर समान हों, तब संदेह दूर हो जाता है। 'आदि' पदसे यह सूचित किया गया है कि साक्षी और लेखकसे दूसरा कुछ लिखवाकर यह देखा जाय कि दोनों लेखोंके अक्षर मिलते हैं या

English

pratyalidha, alidha, varaha and lulita — thus thirty-two are to be known in sword and shield rules in battle.

अध्याय २५०

श्लोक 5

परावृत्तमपावृत्तं गृहीतं लघुसञ्ज्ञितं ।ऊर्ध्वात् क्षिप्तमधः क्षिप्तं सन्धारितविधारितं

parāvṛttamapāvṛttaṃ gṛhītaṃ laghusañjñitaṃ / ūrdhvāt kṣiptamadhaḥ kṣiptaṃ sandhāritavidhāritaṃ

हिन्दी अर्थ

नहीं । यदि मिलते हों तो पूर्वलेखाके शुद्ध होनेमें कोई संदेह नहीं रह जाता है । युक्तिप्राप्ति, क्रिया, चिह्न, सम्बन्धः और आगम“-इन हेतुओंसे भी लेखाकी शुद्धि होती है। ऋणी जब-जब ऋणका धन धनीको दे, तब-तब लेखापत्रकी पीठपर लिख दिया करे। अथवा धनी जब-जब जितना धन पावे, तब-तब अपने हाथसे लेखाकी पीठपर उसको लिखकर अङ्कित कर दे। ऋणी जब ऋण

English

Paravritta, apavritta, grihita, laghu-named, urdhvakshipta, adhahkshipta, sandharita, vidharita,

अध्याय २५०

श्लोक 6

श्येनपातं गजपातं ग्राहग्राह्यन्तथैव च ।एवमेकादशविधा ज्ञेयाः पाशविधा नराः

śyenapātaṃ gajapātaṃ grāhagrāhyantathaiva ca / evamekādaśavidhā jñeyāḥ pāśavidhā narāḥ

हिन्दी अर्थ

चुका दे तो लेखाको फाड़ डाले, अथवा (लेखा किसी दुर्गम स्थानमें हो या नष्ट हो गया, तो) ऋणशुद्धिके लिये धनीसे भरपाई लिखवा ले। यदि लेखापत्रमें साक्षियोंका उल्लेख हो तो उनके

English

shyenapata, gajapata, and graha-grahya likewise — thus eleven kinds are to be known of the noose-types of men.

अध्याय २५०

श्लोक 7

ऋज्वायतं विशालञ्च तिर्यग्भ्रामितमेव च ।पञ्चकर्म विनिर्दिष्टं व्यस्ते पाशे महात्मभिः

ṛjvāyataṃ viśālañca tiryagbhrāmitameva ca / pañcakarma vinirdiṣṭaṃ vyaste pāśe mahātmabhiḥ

हिन्दी अर्थ

तुला, अग्नि, जल, विष तथा कोष--ये पाँच दिव्य प्रमाण धर्मशास्त्रमें कहे गये हैं, जो संदिग्ध अर्थके निर्णय अथवा संदेहकी निवृत्तिके लिये देने चाहिए। जब अभियोग बहुत बड़े हों और अभियोक्ता परले सिरेपर, अर्थात् व्यवहारके जय-

English

Rijvayata, vishala, and tiryagbhramita — five actions are declared by the great for the scattered noose.

अध्याय २५०

श्लोक 8

छेदनं भेदनं पातो भ्रमणं शयनं(२) तथा ।विकर्तनं कर्तनञ्च चक्रकर्मेदमेव च

chedanaṃ bhedanaṃ pāto bhramaṇaṃ śayanaṃ(2) tathā / vikartanaṃ kartanañca cakrakarmedameva ca

हिन्दी अर्थ

. इस देशमें इस कालमें इस पुरुषके पास इतने द्रव्यका होना सम्भव है-इसे 'युक्तिप्राप्ति' कहते हैं।

English

Cutting, piercing, falling, whirling, lying, splitting, severing and this wheel work;

अध्याय २५०

श्लोक 9

आस्फोटः क्षेडनं भेदस्त्रासान्दोलितकौ तथा ।१ करालेन्द्रमहारवाविति क॥ , ज॥ , ट॥ च २ शमनमिति घ॥ , ज॥ , ट॥ च :प् ४०४ शूलकर्माणि जानीहि षष्ठमाघातसञ्ज्ञितं

āsphoṭaḥ kṣeḍanaṃ bhedastrāsāndolitakau tathā / 1 karālendramahāravāviti ka.. , ja.. , ṭa.. ca 2 śamanamiti gha.. , ja.. , ṭa.. ca :p 404 śūlakarmāṇi jānīhi ṣaṣṭhamāghātasañjñitaṃ

हिन्दी अर्थ

असाधारण लिङ्ग-जैसे ' श्री', ' ओम्? आदिका उल्लेख 'चिहू' कहलाता है। अर्थी और प्रत्यर्थी-दोनोंमें पहले भी परस्पर विश्वासपूर्वक देन-लेनका व्यवहार होना 'सम्बन्ध' है। . इस व्यक्तिको इतने धनकी प्राप्तिका उपाय सम्भावनासे परे नहीं है, यह निर्णय 'आगम' कहलाता है। पराजय-लक्षण चतुर्थपादमें पहुँच गया हो, तभी इन दिव्य-प्रमाणोंका आश्रय लेना चाहिए। वादी और प्रतिवादी--दोनोंमेंसे कोई एक परस्पर बातचीत करके, स्वीकृति देकर अपनी रुचिके अनुसार

English

asphota, kshedana, bheda, trasa and andolitaka — know these as spear actions; the sixth is called aghata.

अध्याय २५०

श्लोक 10

दृष्टिघातं भुजाघातं पार्श्वघातं द्विजोत्तम ।ऋजुपक्षेषुणा पातं तोमरस्य प्रकीर्तितं

dṛṣṭighātaṃ bhujāghātaṃ pārśvaghātaṃ dvijottama / ṛjupakṣeṣuṇā pātaṃ tomarasya prakīrtitaṃ

हिन्दी अर्थ

दिव्य-प्रमाणके लिये प्रस्तुत हो और दूसरा सम्भावित शारीरिक या आर्थिक दण्डके लिये तैयार रहे । राजद्रोह या महापातकका संदेह होनेपर शीर्षक स्थितिमें आये बिना भी तुला आदि

English

Eye-blow, arm-blow, side-blow, best of twice-born; the fall by straight-winged arrow is declared of the javelin (tomara);

अध्याय २५०

श्लोक 11

आहतं विप्र गोमूत्रप्रभूतङ्कमलासनं ।ततोर्ध्वगात्रं नमितं वामदक्षिणमेव च

āhataṃ vipra gomūtraprabhūtaṅkamalāsanaṃ / tatordhvagātraṃ namitaṃ vāmadakṣiṇameva ca

हिन्दी अर्थ

दिव्य-प्रमाणोंको स्वीकार करे। एक हजार पणसे कमके अभियोगमें अग्नि, विष और तुला-इन दिव्य प्रमाणोंको ग्रहण न करावे; किंतु राजद्रोह और महापातकके अभियोगमें सत्पुरुष सदा इन्हीं प्रमाणोंका वहन करे। सहस्र पणके अभियोगमें तुला आदि तीन दिव्य-प्रमाणोंको प्रस्तुत करे, किंतु अल्प अभियोगमें भी कोश कराये। शपथ ग्रहण करनेवालेके शुद्ध प्रमाणित होनेपर उसे

English

ahata, Brahmin, gomutra, prabhutanka, kamalasana; then urdhvagatra, namita, left and right,

अध्याय २५०

श्लोक 12

आवृत्तञ्च परावृत्तं पादोद्धूतमप्लुतं ।हंसमर्दं विमर्दञ्च(१) गदाकर्म प्रकीर्तितं

āvṛttañca parāvṛttaṃ pādoddhūtamaplutaṃ / haṃsamardaṃ vimardañca(1) gadākarma prakīrtitaṃ

हिन्दी अर्थ

वादीसे पचास पण दिलावे और दोषी प्रमाणित होनेपर उसे दण्ड दे। न्यायाधिकारी दिव्य-प्रमाणके लिये प्रस्तुत मनुष्यको पहले दिन उपवास करवाये तथा दूसरे दिन सूर्योदयके समय वस्त्रसहित

English

avritta and paravritta, padoddhuta, aplvuta, hamsamarda and vimarda — mace work is declared.

अध्याय २५०

श्लोक 13

करालमवघातञ्च दशोपप्लुतमेव च ।क्षिप्तहस्तं स्थितं शून्यं पराशोस्तु विनिर्दिशेत्

karālamavaghātañca daśopaplutameva ca / kṣiptahastaṃ sthitaṃ śūnyaṃ parāśostu vinirdiśet

हिन्दी अर्थ

स्नान कर लेनेपर बुलाये । फिर राजा और ब्राह्मणोंके सम्मुख उससे सभी दिव्य-प्रमाण ग्रहण करावे। किसी भी जाति अथवा वयको स्त्री, किसी भी जातिका सोलह वर्षको अवस्थासे कमका बालक, कम-से-कम अस्सी वर्षको अवस्थाका बूढ़ा, अन्ध (नेत्रहीन), पङ्गु (पादरहित), जातिमात्रका ब्राह्मण तथा रोगी-इन सबकी शुद्धिके लिये, अर्थात् इनपर लगे हुए अपराधविषयक संदेहका निवारण

English

Karala, avaghata and dashopaplutaka, kshiptahasta, sthita, shunya — one should declare for the parashu (axe).

अध्याय २५०

श्लोक 14

ताडनं छेदनं विप्र तथा चूर्णनमेव च ।मुद्गरस्य तु कर्माणि तथा प्लवनघातनं

tāḍanaṃ chedanaṃ vipra tathā cūrṇanameva ca / mudgarasya tu karmāṇi tathā plavanaghātanaṃ

हिन्दी अर्थ

करनेके लिये तुला' नामक दिव्य-प्रमाण ही ग्राह्य है । क्षत्रिये लिये अग्नि (गरम किया हुआ फाल और तपाया हुआ माष), वैश्यके लिये जलमात्र तथा शूद्रके लिये सात जौ विष-इनकी शुद्धिके

English

Striking, cutting, Brahmin, and crushing, likewise leaping and killing — these are the actions of the mudgara (mallet);

अध्याय २५०

श्लोक 15

संश्रान्तमथ विश्रान्तं गोविसर्गं सुदुर्धरं ।भिन्दिपालस्य कर्माणि लगुडस्य च तान्यपि

saṃśrāntamatha viśrāntaṃ govisargaṃ sudurdharaṃ / bhindipālasya karmāṇi laguḍasya ca tānyapi

हिन्दी अर्थ

लिये आवश्यक बताये गये हैं जो तराजू उठाना या तौलना जानते हों, ऐसे

English

sanshranta, vishranta, govisarga, sudurdhara — these are the actions of the bhindipala and of the club.

अध्याय २५०

श्लोक 16

अन्त्यं मध्यं परावृत्तं निदेशान्तं द्विजोत्तम ।वज्रस्येतानि कर्माणि पट्टिशस्य च तान्यपि

antyaṃ madhyaṃ parāvṛttaṃ nideśāntaṃ dvijottama / vajrasyetāni karmāṇi paṭṭiśasya ca tānyapi

हिन्दी अर्थ

लोगोंसे अभियुक्तको तुलाके एक पलड़ेमें बैठाकर

English

Antya, madhya, paravritta, nideshanta, best of twice-born — these are the actions of the vajra and of the pattisha.

अध्याय २५०

श्लोक 17

हरणं छेदनं घातो बलोद्धारणमायतं ।कृपाणकर्म निर्दिष्टं पातनं स्फोटनं तथा

haraṇaṃ chedanaṃ ghāto baloddhāraṇamāyataṃ / kṛpāṇakarma nirdiṣṭaṃ pātanaṃ sphoṭanaṃ tathā

हिन्दी अर्थ

दूसरे पलड़ेमें कोई मिट्टी या प्रस्तरका उतने ही वजनका टुकड़ा रखकर उससे उसको ठीक- ठीक तौले। फिर जिस सँनिवेशमें वह बराबर तौला गया है, उसमें सफेद खड़ियासे रेखा करके उस व्यक्तिको उतार लिया जाय। उतरनेपर वह निम्नाङ्कित प्रार्थना-वाक्य पढ़कर तुलाको अभिमन्त्रित करे--' सूर्य, चन्द्र, वायु, अग्नि, आकाश, भूमि, जल, हृदय, यम, दिन, रात्रि, दोनों संध्याकाल

English

Seizing, cutting, striking, lifting the force, extension — the work of the sword (kripana) is declared; felling and bursting likewise;

अध्याय २५०

श्लोक 18

त्रासनं रक्षणं घातो बलोद्धरणमायतम् ।क्षेपणीकर्म निर्दिष्टं यन्त्रकर्मैतदेव तु

trāsanaṃ rakṣaṇaṃ ghāto baloddharaṇamāyatam / kṣepaṇīkarma nirdiṣṭaṃ yantrakarmaitadeva tu

हिन्दी अर्थ

और धर्म-ये सब मनुष्यके वृत्तान्तको जानते हैं । तुले! तुम सत्यका धाम (स्थान) हो, पूर्वकालमें

English

frightening, guarding, striking, lifting the force, extension — the work of the kshepani is declared; this is also the work of machines.

अध्याय २५०

श्लोक 19

सन्त्यागमवदंशश् च वराहोद्धूतकं तथा ।हस्तावहस्तमालीनमेकहस्तस्तावहस्तके

santyāgamavadaṃśaś ca varāhoddhūtakaṃ tathā / hastāvahastamālīnamekahastastāvahastake

हिन्दी अर्थ

तुम सत्यको प्रकट करो और मुझे संशयसे मुक्त कर दो। मातः! यदि मैं पापी या अपराधी हूँ तो मेरा पलड़ा नीचे कर दो और यदि मैं दोषरहित हुँ तो मुझे ऊपर उठा दो' अग्नि-दिव्यप्रमाण

English

Santyaga, avadamsha, varahoddhutaka, hastavahasta, alina, ekahasta, tavahasta,

अध्याय २५०

श्लोक 20

द्विहस्तवाहुपाशे च कटिरेचितकोद्गते ।१ हंसमार्गं विमार्गञ्चेति घ॥ , ञ॥ च ।समार्गञ्च विमार्गञ्चेति ट॥ :प् ४०५ उरोललाटघाते च भुजाविधमनन्तथा

dvihastavāhupāśe ca kaṭirecitakodgate / 1 haṃsamārgaṃ vimārgañceti gha.. , ña.. ca / samārgañca vimārgañceti ṭa.. :p 405 urolalāṭaghāte ca bhujāvidhamanantathā

हिन्दी अर्थ

अग्निका दिव्य ग्रहण करनेवालेके हाथोंमें धान मसलकर, हाथोंके काले तिल आदि चिह्नोंको देखकर उन्हें महावर आदिसे रँग दे। फिर उसके हाथोंकी अञ्जलिमें पीपलके सात पत्ते रखे। हाथसहित

English

dvihasta, bahupasha, katirechitaka, udgata, chest-and-forehead blow, and bhujavidhamana;

अध्याय २५०

श्लोक 21

करोद्धूतं विमानञ्च पादाहति विपादिकं ।गात्रसंश्लेषणं शान्तं तथा गात्रविपर्ययः

karoddhūtaṃ vimānañca pādāhati vipādikaṃ / gātrasaṃśleṣaṇaṃ śāntaṃ tathā gātraviparyayaḥ

हिन्दी अर्थ

उन पत्तोंको धागेसे आवेष्टित कर दे। इसके बाद दिव्य ग्रहण करनेवाला अग्निको प्रार्थना करे-- 'अग्निदेव! आप सम्पूर्ण भूत-प्राणियोंके अन्तःकरणमें विचरते हैं। आप सबको पवित्र करनेवाले और सब कुछ जाननेवाले हैं। आप साक्षीकी भाँति मेरे पुण्य और पापका निरीक्षण करके सत्यको प्रकट कीजिये'

English

karoddhuta, vimana, padahati, vipadika, gatrasamshleshana, shanta, and gatraviparyaya,

अध्याय २५०

श्लोक 22

ऊर्ध्वप्रहारं घातञ्च गोमूत्रं सव्यदक्षिणे ।पारन्तारकं दण्डं(१) करवीरन्धमाकुलं

ūrdhvaprahāraṃ ghātañca gomūtraṃ savyadakṣiṇe / pārantārakaṃ daṇḍaṃ(1) karavīrandhamākulaṃ

हिन्दी अर्थ

शपथ ग्रहण करनेवालेके ऐसा कहनेपर उसके दोनों हाथोंमें पचास पलका जलता हुआ लौहपिण्ड रख दे। दिव्य ग्रहण करनेवाला मनुष्य उसे लेकर धीरे-धीरे सात मण्डलोंतक चले । मण्डलको लम्बाई

English

urdhvaprahara and ghata, gomutra, savya and dakshina, parantaraka, danda, karaviradha, akula,

अध्याय २५०

श्लोक 23

तिर्यग्बन्धमपामार्गं(२) भीमवेगं सुदर्शनं ।सिंहाक्रान्तं गजाक्रान्तं गर्दभाक्रान्तमेव च

tiryagbandhamapāmārgaṃ(2) bhīmavegaṃ sudarśanaṃ / siṃhākrāntaṃ gajākrāntaṃ gardabhākrāntameva ca

हिन्दी अर्थ

और चौड़ाई सोलह-सोलह छ्य ग्लकी हो तथा एक मण्डलसे दूसरे मण्डलकी दूरी भी उतनी ही हो। तदनन्तर शपथ करनेवाला अग्निपिण्डको गिराकर हाथोंमें पुनः धान मसले। यदि हाथ न जले हों तो शपथ करनेवाला मनुष्य शुद्ध माना

English

tiryagbandha, apamarga, bhimavega, sudarshana, simhakranta, gajakranta and gardabhakranta —

अध्याय २५०

श्लोक 24

गदाकर्माणि जानीयान्नियुद्धस्याथ कर्म च ।आकर्षणं विकर्षणञ्च बाहूनां मूलमेव च

gadākarmāṇi jānīyānniyuddhasyātha karma ca / ākarṣaṇaṃ vikarṣaṇañca bāhūnāṃ mūlameva ca

हिन्दी अर्थ

जाता है। यदि लौहपिण्ड बीचमें ही गिर पड़े या कोई संदेह हो तो शपथकर्ता पूर्ववत् लौहपिण्ड लेकर चले ॥ ४०--४२॥

English

know these as mace actions, and now the action of wrestling: drawing, drawing away, the roots of the arms,

अध्याय २५०

श्लोक 25

ग्रीवाविपरिवर्तञ्च पृष्ठभङ्गं सुदारुणं ।पर्यासनविपर्यासौ पशुमारमजाविकं

grīvāviparivartañca pṛṣṭhabhaṅgaṃ sudāruṇaṃ / paryāsanaviparyāsau paśumāramajāvikaṃ

हिन्दी अर्थ

जलका दिव्य ग्रहण करनेवालेको निम्नाङ्कित रूपसे वरुणदेवकी प्रार्थना करनी चाहिए-- वरुण! आप पवित्रॉमें भी पवित्र हैं और सबको पवित्र करनेवाले हैं। मैं शुद्धिके योग्य हूँ। मेरी शुद्धि कीजिये। सत्यके बलसे मेरी रक्षा कीजिये।'-- इस प्रार्थना-मन्त्रसे जलको अभिमन्त्रित करके वह मनुष्य नाभिपर्यन्त जलमें खड़े हुए पुरुषकी जङ्घा पकड़कर जलमें डूबे। उसी समय कोई

English

neck-turning, the terrible back-breaking, paryasana and viparyasa, pashumara, ajavika,

अध्याय २५०

श्लोक 26

पादप्रहारमास्फोटं कटिरेचितकन्तथा ।गात्राश्लेषं स्कन्धगतं महीव्याजनमेव च

pādaprahāramāsphoṭaṃ kaṭirecitakantathā / gātrāśleṣaṃ skandhagataṃ mahīvyājanameva ca

हिन्दी अर्थ

उस छूटे हुए बाणको ले आवे, तबतक यदि शपथकर्ता जलमें डूबा रहे तो वह शुद्ध होता है॥ ४३-४४ ३॥

English

foot-blow, asphota, and katirechitaka, body-embrace, skandhagata, mahivyajana,

अध्याय २५०

श्लोक 27

उरोललाटघातञ्च विस्पष्टकरणन्तथा ।उद्धूतमवधूतञ्च तिर्यङ्मार्गगतं तथा

urolalāṭaghātañca vispaṣṭakaraṇantathā / uddhūtamavadhūtañca tiryaṅmārgagataṃ tathā

हिन्दी अर्थ

विषका दिव्य-प्रमाण ग्रहण करनेवाला इस प्रकार विषकी प्रार्थना करे-- विष! तुम ब्रह्माके पुत्र हो और सत्यधर्ममें अधिष्ठित हो; इस कलङ्कसे मेरी रक्षा एवं सत्यके प्रभावसे मेरे लिये अमृतरूप हो जाओ।'-एऐसा कहकर शपथकर्ता हिमालयपर

English

chest-and-forehead blow, and vispashtakarana; uddhuta and avadhuta, tiryanmargagata,

अध्याय २५०

श्लोक 28

गजस्कन्धमवक्षेपमपराङ्मुखमेव च ।देवमार्गमधोमार्गममार्गगमनाकुलं

gajaskandhamavakṣepamaparāṅmukhameva ca / devamārgamadhomārgamamārgagamanākulaṃ

हिन्दी अर्थ

उत्पन्न शार्ङ्ग विषका भक्षण करे। यदि विष बिना वेगके पच जाय, तो न्यायाधिकारी उसको शुद्धिका निर्देश करें ॥ ४५-४६ ३ ॥

English

gajaskandha, avakshepa, aparangmukha, devamarga, adhomarga, and amargagamanakula,

अध्याय २५०

श्लोक 29

यष्टिघातमवक्षेपो वसुधादारणन्तथा ।जानुबन्धं भुजाबन्धं सुदारुणं

yaṣṭighātamavakṣepo vasudhādāraṇantathā / jānubandhaṃ bhujābandhaṃ sudāruṇaṃ

हिन्दी अर्थ

कोश-दिव्य लेनेवालेके लिये न्यायाधिकारी उग्र देवताओंका पूजन करके उनके अभिषेकका जल ले आवे। फिर शपथकर्ताको यह बतलाकर उसमेंसे तीन पसर जल पिला दे। यदि चौदहवें दिनतक राजा अथवा देवतासे घोर पीडा न प्राप्त हो, तो वह निःसंदेह शुद्ध होता है॥ ४७-४८ ३॥

English

yashtighata, avakshepa, vasudhadarana, janubandha, bhujabandha, the very terrible,

अध्याय २५०

श्लोक 30

विपृष्ठं सोदकं शुभ्रं भुजावेष्टितमेव च ।सन्नद्धैः संयुगे भाव्यं सशस्त्रैस्तैर् गजादिभिः

vipṛṣṭhaṃ sodakaṃ śubhraṃ bhujāveṣṭitameva ca / sannaddhaiḥ saṃyuge bhāvyaṃ saśastraistair gajādibhiḥ

हिन्दी अर्थ

अल्प मूल्यवाली वस्तुके अभियोगमें संदेह

English

viprishtha, sodaka, shubhra and bhujaveshtita. Armed men must be ready in battle with weapons, on elephants and the rest.

अध्याय २५०

श्लोक 31

वराङ्कुशधरौ चोभौ एको ग्रीवागतो ऽपरः ।१ पारकं तारकं गण्डमिति ख॥ , घ॥ च २ तिर्यगूर्ध्वमपामार्गमिति घ॥ , ञ॥ च :प् ४०६ स्कन्धौ द्वौ च धानुष्कौ द्वौ च खड्गधरौ गजे

varāṅkuśadharau cobhau eko grīvāgato 'paraḥ / 1 pārakaṃ tārakaṃ gaṇḍamiti kha.. , gha.. ca 2 tiryagūrdhvamapāmārgamiti gha.. , ña.. ca :p 406 skandhau dvau ca dhānuṣkau dvau ca khaḍgadharau gaje

हिन्दी अर्थ

सुवर्ण, देवता, गुरुचरण एवं इष्टापूर्त आदि पुण्यकर्म इनकी सहजसाध्य शपथ विहित है इस प्रकार आदि आग्रेय महापृराणमें 'दिव्य-प्रमाण-कथन' नामक दो सौ पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

Two with excellent goads, one at the neck, another; two at the shoulders, two bowmen and two sword-bearers on an elephant;

अध्याय २५०

श्लोक 32

रथे रणे गजे चैव तुरगाणां त्रयं भवेत् ।धानुष्काणान्त्रयं प्रोक्तं रक्षार्थे तुरगस्य च

rathe raṇe gaje caiva turagāṇāṃ trayaṃ bhavet / dhānuṣkāṇāntrayaṃ proktaṃ rakṣārthe turagasya ca

हिन्दी अर्थ

पैतृक धनके अधिकारी; पल्रियोंका धनाधिकार; पितामहके धनके अधिकारी; विभाज्य और अविभाज्य धन; वर्णक्रमसे पुत्रके धनाधिकार; बारह प्रकारके पुत्र और उनके अधिकार; पत्नी-पुत्री आदिके, संसृष्टीके धनका विभाग; क्लीब आदिका अनधिकार; स्त्रीधन तथा उसका विभाग

English

for chariots, for battle, for elephants and horses there should be three; three bowmen are said for the protection of a horse,

अध्याय २५०

श्लोक 33

धन्विनो रक्षणार्थाय चर्मिणन्तु(१) नियोजयेत् ।स्वमन्त्रैः शस्त्रमभ्यर्च्य शास्त्रन्त्रैलोक्यमोहनं

dhanvino rakṣaṇārthāya carmiṇantu(1) niyojayet / svamantraiḥ śastramabhyarcya śāstrantrailokyamohanaṃ

हिन्दी अर्थ

दाय-विभाग-प्रकरण स्वत्व हो जाता है। 'दाय'के दो भेद हैं- (दाय' शब्दसे वह धन समझना चाहिए, ' अप्रतिबन्ध' और “प्रतिबन्ध '। पुत्रों और पौत्रोंका जिसपर स्वामीके साथ सम्बन्धके कारण दूसरोंका पुत्रत्व और पौत्रत्वके कारण पिता और पितामहके मिताक्षरामें इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार किया गया है-तीन बाण छोड़नेपर एक वेगवान् मनुष्य मध्यम बाणके गिरनेके स्थानपर जाकर उसे लेकर वहीं खड़ा हो जाता है। दूसरा वेगवान् पुरुष जहाँसे बाण छोड़ा गया है, उस मूलस्थानपर खड़ा हो जाता है। इस प्रकार उन दोनोंके स्थित हो जानेपर तीन बार ताली बजती है। तीसरी तालीके बजते ही जिसकी शुद्धि अपेक्षित है, वह पुरुष पानीमें डूबता है। उसी समय मूलस्थानपर खड़ा हुआ पुरुष बड़े वेगसे दौड़कर मध्यम शरपातस्थानतक जाता है। उसके वहाँ

English

one should appoint a shield-bearer for the protection of the archers. Having worshipped the weapon with one's own mantras, the science that bewilders the three worlds,

अध्याय २५०

श्लोक 34

यो युद्धे याति च जयेदरीन् सम्पालयेद्भुवं

yo yuddhe yāti ca jayedarīn sampālayedbhuvaṃ //

हिन्दी अर्थ

पहुँचते ही जो बाण लेकर पहलेसे खड़ा है, वह बड़े वेगसे दौड़कर मूलस्थानपर आ जाता है। वहाँ पहुँचकर वह डूबे हुए मनुष्यको ओर देखता है। यदि उसके अङ्ग डूबे हुए ही रहें, दृष्टिमें न आवें तो उसकी शुद्धि मानी जाती है।

English

he who goes to battle conquers enemies and protects the earth.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 250
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.