अध्याय २५२
श्लोक 1
व्यवहारकथनं अग्निर् उवाच गृहीतार्थः क्रमाद्दाप्यो धनिनामधमर्णिकः ।दत्वा तु ब्राह्मणायादौ नृपतेस्तदनन्तरम्
vyavahārakathanaṃ agnir uvāca gṛhītārthaḥ kramāddāpyo dhanināmadhamarṇikaḥ / datvā tu brāhmaṇāyādau nṛpatestadanantaram
हिन्दी अर्थ
देवी-देवताको चढ़ाकर छोड़े गये पशु, दस दिनके भीतरकी ब्यायी हुई गाय तथा अपने यूथसे बिछुड़कर दूसरे स्थानपर आया हुआ पशु-ये दूसरेको फसल चर लें तो भी दण्डनीय नहीं हैं, छोड़ देने योग्य हैं। जिसका कोई चरवाहा न हो, ऐसे देवोपहत तथा राजोपहत पशु भी छोड़ ही देने योग्य हैं। गोप (चरवाहा) प्रातःकाल गौओंके स्वामीके
English
Great men hold that the five ways of casting a noose are: extending in a straight line, long, broad, horizontal and whirling.