अध्याय ३०४
श्लोक 1
नारसिंहादिमन्त्राः अग्निर् उवाच स्तम्भो विद्वेषणोच्चाट उत्सादो भ्रममारणे ।व्याधिश्चेति स्मृतं क्षुत्रं तन्मोक्षो वक्ष्यते शृणु
nārasiṃhādimantrāḥ agnir uvāca stambho vidveṣaṇoccāṭa utsādo bhramamāraṇe / vyādhiśceti smṛtaṃ kṣutraṃ tanmokṣo vakṣyate śṛṇu
हिन्दी अर्थ
आदिके लिये महामारी आ जाय तो तिलमिश्रित घीसे अर्धलक्ष आहुति देनी चाहिए। इससे दोषोंका शमन होता है। यदि हाथीके लिये महामारी उपस्थित हो, हथिनीके दाँत बढ़ जाये अथवा हथिनीके गण्डस्थलसे मद फूटकर बहने लगे तो इन सब दोषोंकी शान्तिके लिये दस हजार आहुतियाँ देनी चाहिए। इससे अवश्य शान्ति होती है॥ ३-१२ ३॥
English
*Me$ahLy Sarhjhdy visarfiy sdjyarh, astiy dirghodakarhy rasa** This is the mantra sacred to (Lord) 8iva that confers good.