Agni Purana· Agni Purāṇa
312
अध्याय 312 / 381

Adhyaya 313

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पूर्ण अध्याय पाठ23 श्लोक

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अध्याय ३१२

श्लोक 1

त्वरिताज्ञानम् अग्निर् उवाच ओम् ह्रीं हूं खे छे क्षः स्त्रीं ह्रूं क्षे ह्रीं फट् त्वरितायैनमः त्वरितां पूजयेन्न्यस्य द्विभुजाञ्चाष्टवाहुकां ।आधारशक्तिं पद्मञ्च सिंहे देवीं हृदादिकम्

tvaritājñānam agnir uvāca om hrīṃ hūṃ khe che kṣaḥ strīṃ hrūṃ kṣe hrīṃ phaṭ tvaritāyainamaḥ tvaritāṃ pūjayennyasya dvibhujāñcāṣṭavāhukāṃ / ādhāraśaktiṃ padmañca siṃhe devīṃ hṛdādikam

हिन्दी अर्थ

१२. रूपान्तरेण देवीं तामेव स्तौमि सपदि किल महिषः । पादस्पर्शसुखादिव मीलितनयनोऽभवद् यस्याः॥ यहाँ “मि सपदि’ यही छठा गण है, इसमें द्वितीय अक्षरसे पदका आरम्भ है। १३. ब्रह्मक्षत्रकुलीनः

English

Tait. Sam. 5.7.2.3c.

अध्याय ३१२

श्लोक 2

पूर्वादौ गायत्रीं यजेन्मण्डले वै प्रणीतया ।हुंकारां खेचरीं चण्डां छेदनीं क्षेपणींस्त्रियाः

pūrvādau gāyatrīṃ yajenmaṇḍale vai praṇītayā / huṃkārāṃ khecarīṃ caṇḍāṃ chedanīṃ kṣepaṇīṃstriyāḥ

हिन्दी अर्थ

तीन-तीन गणोंके बाद पहले पादका विराम होता है, उसे “पथ्या' माना गया है।'

English

RV. 10.97.3a; Vaj. Sam. 12. 77a.

अध्याय ३१२

श्लोक 3

हुंकारां क्षेमकारीञ्च फट्कारीं मध्यतो यजेत् ।जयाञ्च विजयां द्वारि किङ्करञ्च तदग्रतः

huṃkārāṃ kṣemakārīñca phaṭkārīṃ madhyato yajet / jayāñca vijayāṃ dvāri kiṅkarañca tadagrataḥ

हिन्दी अर्थ

जिस आर्याके पूर्वार्धमें या उत्तरार्धमें अथवा दोनोंमें तीन गणोंपर पादविराम नहीं होता, उसका नाम 'विपुला' होता है। इस प्रकार इसके तीन भेद होते हैं-१-आदिविपुला, २- अन्त्यविपुला तथा ३-उभयविपुला । इनमें पहलीका नाम 'मुख-विपुला' दूसरीका 'जघनविपुला' तथा तीसरीका “महाविपुला' है। इनके उदाहरण क्रमशः इस प्रकार हैं-

English

RV. 9.63. 18b; Vaj. Sam. 8. 63b..

अध्याय ३१२

श्लोक 4

लिलैहीमैश् च सर्वाप्त्यै नामव्याहृतिभिस् तथा ।अनन्ताय नमः स्वाहा कुलिकाय नमः स्वधा

lilaihīmaiś ca sarvāptyai nāmavyāhṛtibhis tathā / anantāya namaḥ svāhā kulikāya namaḥ svadhā

हिन्दी अर्थ

“पहले पद्यमें पूर्वार्धमें, दूसरेमें उत्तरार्धमें तथा तीसरेमें दोनों जगह पाद-विराम तीन गणोंसे आगे होता है।' जिस आर्या-छन्दमें द्वितीय तथा चतुर्थ गण गुरु अक्षरोंके बीचमें होनेके साथ ही

English

One will be released from bondage by (the repetition of) the sacred formula tasmi. One will get excellent dress by (repeating the hymn) yuvi suvdsd,

अध्याय ३१२

श्लोक 5

स्वाहा वासुकिराजाय शङ्खपालाय वौषट् ।तक्षकाय वषन्नित्यं महापद्माय वै नमः

svāhā vāsukirājāya śaṅkhapālāya vauṣaṭ / takṣakāya vaṣannityaṃ mahāpadmāya vai namaḥ

हिन्दी अर्थ

जगण अर्थात् मध्यगुरु ( । 5।) हों, उसका नाम “चपला' है। तात्पर्य यह है कि 'चपला' नामक आर्यामें प्रथम गण अन्त्यगुरु ( ।। 5), तृतीय गण होता है। शेष गण पूर्ववत् रहते हैं। पूर्वॉर्धमें 'चपला'का लक्षण हो तो उस आर्याका नाम

English

(The recitation of the hymn) rmheantu md Sapathydt is

अध्याय ३१२

श्लोक 6

स्वाहा कर्कोटनागाय फट् पद्माय च वै नमः ।लिखेन्निग्रहचक्रन्तु एकाशीतिपदैर् नरः

svāhā karkoṭanāgāya phaṭ padmāya ca vai namaḥ / likhennigrahacakrantu ekāśītipadair naraḥ

हिन्दी अर्थ

'मुखचपला' होता है। परार्धमें चपलाका लक्षण २- चित्तं हरन्ति हरिणीदीर्घदृशः कामिनां कलालापैः। होनेपर उसे “जघनचपला' कहते हैं । पूर्वार्ध और

English

Cf. RV. 1 0.9.3a; Taitt. Sam. 4.1.5.1a.

अध्याय ३१२

श्लोक 7

वस्ते पटे तरौ भूर्जे शिलायां यष्टिकासु च ।मध्ये कोष्ठे साध्यनाम पूर्वादौ पट्टिकासु च

vaste paṭe tarau bhūrje śilāyāṃ yaṣṭikāsu ca / madhye koṣṭhe sādhyanāma pūrvādau paṭṭikāsu ca

हिन्दी अर्थ

नीवीविमोचनव्याजकथितजघना जघनविपुला॥ परार्ध दोनोंमें चपलाका लक्षण संघटित होता ३- या स्त्री कुचकलशनितम्बमण्डले जायते महाविपुला। हो तो उसका नाम 'महाचपला'“ है। जहाँ २. 'पथ्या' और 'विपुला'में सहानवस्थारूप विरोध है; अतः ये दोनों छन्द एक साथ नहीं रह सकते। यदि एक अंशमें भी “विपुला' का लक्षण संघटित हुआ तो उसका पथ्यात्व नष्ट हो जाता है; क्योंकि “विपुला' छन्द उभयाश्रय है; वह पूर्वार्धमें, उत्तरार्धमें तथा दोनोंमें भी रह सकता है। अब विपुला' का जहाँ अंश भी हो, वहाँ “पथ्या'का प्रवेश नहीं हो सकता। 'पथ्या' छन्द एक अंशसे भी विकल हो जाय तो वहीं 'विपुला' का विषय होता है; अतः वहाँ “विपुला' की प्राप्ति अनिवार्य है। ' पथ्या' और 'चपला 'में कोई विरोध

English

RV. 3.8.4a; MS. 4. IS.lar 199.13.

अध्याय ३१२

श्लोक 8

ॐ ह्रीं क्षूं छन्द छन्द चतुरः कण्ठकान् कालरात्रिकां ऐशादावम्बुपादौ च यमराज्यञ्च वाह्यतः ।कालीनारवमाली कालीनामाक्षमालिनी

oṃ hrīṃ kṣūṃ chanda chanda caturaḥ kaṇṭhakān kālarātrikāṃ aiśādāvambupādau ca yamarājyañca vāhyataḥ / kālīnāravamālī kālīnāmākṣamālinī

हिन्दी अर्थ

नहीं है; अतः इनमें बाध्य-बाधकभाव नहीं होता। इस विषयका संक्षिप्त संग्रह नीचे लिखे श्लोकोंमें है --

English

"Om hrim kshum chhinda chhinda" — the four thorns, Kalaratrika, in the northeast and so on and at the water-feet; Yamarajya from outside. Kali, Naravali, Kalinamakshamalini (names; mantra syllables garbled).

अध्याय ३१२

श्लोक 9

मामोदेतत्तदोमोमा रक्षत स्वस्व भक्षवा ।यमपाटटयामय मटमो टट मोटमा

māmodetattadomomā rakṣata svasva bhakṣavā / yamapāṭaṭayāmaya maṭamo ṭaṭa moṭamā

हिन्दी अर्थ

एकैव भवति पथ्या विपुलास्तिस्रस्ततश्चत्रस्ताः । चपलाभेहैरित्रभिरपि भिन्ना इति षोडशार्याः स्युः ॥ गीतिचतुष्टयमित्थं प्रत्येक षोडशप्रकारं स्यात् । साकल्येनार्याणामशीतिरेवं विकल्पाः स्युः॥ “एक 'पथ्या', तीन 'विपुला', कुल चार भेद हुए। इनमेंसे प्रत्येक छन्द 'चपला 'के तीन भेदोंसे भिन्न होकर बाहर प्रकारका होता है। बारह ये और चार पहलेके -यों सोलह हुए। इन सोलहोंके “गीति' आदि चार भेदांद्वारा भेद होनेसे चौंसठ भेद होते हैं। पहलेके सोलह और चौंसठ -कुल अस्सी हुए। इस प्रकार ' आर्या'के अस्सी भेद हैं।'

English

(Syllable-play of garbled mantra letters "mamodetattadomoma raksata svasva bhaksava; yamapatatayamaya matamo tata motama".)

अध्याय ३१२

श्लोक 10

वामो भूरिविभूमेया टट रीश्व श्वरी टट ।यमराजाद्वाह्यतो वं तं तोयं मारणात्मकं

vāmo bhūrivibhūmeyā ṭaṭa rīśva śvarī ṭaṭa / yamarājādvāhyato vaṃ taṃ toyaṃ māraṇātmakaṃ

हिन्दी अर्थ

३. पथ्यापूर्वक मुखचपलाका उदाहरण --

English

(Garbled mantra letters "vamo bhurivibhumeya tata rishva shvari tata".) Outside Yamaraja, "vam tam" — the water of killing nature.

अध्याय ३१२

श्लोक 11

कज्जलं निम्बनिर्यासमज्जासृग्विषसंयुतम् ।काकपक्षस्य लेखन्या श्मशाने वा चतुष्पथे

kajjalaṃ nimbaniryāsamajjāsṛgviṣasaṃyutam / kākapakṣasya lekhanyā śmaśāne vā catuṣpathe

हिन्दी अर्थ

आदिविपुलापूर्वक मुखचपलाका उदाहरण -- यस्याश्च लोचने पिङ्गले भ्रुवौ संगते मुखं दीर्घम्। विपुलोन्नताश्च दन्ताः कान्तासौ भवति मुखचपला॥ उभयविपुलापूर्वक मुख-चपलाका उदाहरण -- विपुलाभिजातवंशोद्भवापि रूपातिरेकरम्यापि । निस्सार्यते गृहाद् वल्लभापि यदि भवति मुखचपला॥ ४. पथ्यापूर्वक जघनचपलाका उदाहरण -- यत्पादस्य कनिष्ठा न स्पृशति महीमनामिका वाप । सा सर्वधूर्तभोग्या भवेदवश्यं जघनचपला॥ अन्त्यविपुलापूर्वक जघनचपलाका उदाहरण --

English

Collyrium joined with neem-resin, marrow, blood and poison; with a crow's feather as pen, in a cremation ground or at a crossroads,

अध्याय ३१२

श्लोक 12

निधापयेत् कुम्भाधस्ताद्वल्मीके वाथ निक्षिपेत् ।विभीतद्रुमशास्वाधो यन्त्रं सर्वारिमर्दनम्

nidhāpayet kumbhādhastādvalmīke vātha nikṣipet / vibhītadrumaśāsvādho yantraṃ sarvārimardanam

हिन्दी अर्थ

महाविपुलापूर्वक जघनचपलाका उदाहरण -- मकरध्वजसद्मनि दृश्यते स्फुटं तिलकलाञ्छनं यस्याः । विपुलान्वयाभिजातापि जायते जघनचपलासौ ॥ ५. पथ्यापूर्वक महाचपलाका उदाहरण -

English

one should place it beneath a pot, or throw it in an anthill; under a vibhitaka branch the yantra crushes all enemies.

अध्याय ३१२

श्लोक 13

लिखेच्चानुग्रहञ्चक्रं शुक्लपत्रे ऽथ भूर्जके ।लाक्षया कुङ्कुमेनाथ स्फटिकाचन्दनेन वा

likheccānugrahañcakraṃ śuklapatre 'tha bhūrjake / lākṣayā kuṅkumenātha sphaṭikācandanena vā

हिन्दी अर्थ

विपुलापूर्वक महाचपलाका उदाहरण -- चिबुके कपोलदेशेऽपि कूपिका दूश्यते स्मिते यस्याः । विपुलान्वयप्रसूतापि जायते सा महाचपला॥ आर्याके पूर्वार्थे समान ही उत्तरार्ध भी हो, उसे यदि पूर्वार्धे आठ गण हों तो ' आर्यागीति" 'गीति नाम दिया गया है। तात्पर्यं यह कि नामक छन्द होता है। कोई विशेषता न होनेसे उसके उत्तरार्धमें भी छठा गण मध्यगुरु (। 5।) इसका उत्तरार्ध भी ऐसा ही समझना चाहिए। अथवा सर्वलघु (।।।।) करना चाहिए। इसी यहाँ भी छठे गणमें मध्यगुरु और सर्वलघु-इन

English

One should write the Anugraha wheel on a white leaf or birch bark with lac, saffron, or crystal or sandal;

अध्याय ३१२

श्लोक 14

भुवि भित्तौ पूर्वदले(१) नाम मध्यमकोष्ठके ।खण्डे तु वारिमध्यस्थं ॐ हंसो वापि पट्टिशम्

bhuvi bhittau pūrvadale(1) nāma madhyamakoṣṭhake / khaṇḍe tu vārimadhyasthaṃ oṃ haṃso vāpi paṭṭiśam

हिन्दी अर्थ

प्रकार जहाँ आर्याके उत्तरार्धके समान ही पूर्वार्ध दोनों विकल्पोंकी प्राप्ति थी, उसके स्थानमें भी हो, उसे 'उपगीति कहते हैं। आर्याके केवल एक “लघु'का विधान है॥ ९-१० ३॥ पूर्वोक्त क्रमको विपरीत कर देनेपर 'उद्गीति? अब 'मात्रा-छन्द' बतलाया जाता है। जहाँ नाम पड़ता है। सारांश यह कि उसमें पूर्वार्धको विषम, अर्थात् प्रथम और तृतीय चरणमें चौदह

English

on the ground or wall, the name on the east petal in the middle compartment; in the section standing in water "Om hamso" or the pattisha;

अध्याय ३१२

श्लोक 15

लक्ष्मीश्लोकं शिवादौ च राक्षसादिक्रमाल्लिखेत् ।श्रीःसाममोमा सा श्रीः सानौ याज्ञे ज्ञेया नौसा

lakṣmīślokaṃ śivādau ca rākṣasādikramāllikhet / śrīḥsāmamomā sā śrīḥ sānau yājñe jñeyā nausā

हिन्दी अर्थ

उत्तरार्धमें और उत्तरार्थको पूर्वार्धमें रखा जाता है । लघु (मात्राएँ) हों और सम--द्वितीय, चतुर्थ १. पथ्या-गीतिका उदाहरण -- मधुरं वीणारणितं पञ्चमसुभगश्च कोकिलालापः । गीतिः पौरवधूनामधुना कुसुमायुधं प्रबोधयति॥

English

one should write the Lakshmi verse, on Shiva and the rest, and in the order of Rakshasa and the rest (letter-squares: garbled "shri sama moma sa shri sanau yajne jneya nausa").

अध्याय ३१२

श्लोक 16

माया लीला लाली यामा याज्ञे ज्ञेया नौसा माया ।यत्र ज्ञेया वहिः शीघ्रा दिक्षुरं कलसं वहिः

māyā līlā lālī yāmā yājñe jñeyā nausā māyā / yatra jñeyā vahiḥ śīghrā dikṣuraṃ kalasaṃ vahiḥ

हिन्दी अर्थ

इयमपरा विपुला गीतिरुच्यते सर्वलोकहितहेतोः । यदनिष्टमात्मनस्तत्परेषु भवतापि मा क्कचित् कारि॥ पथ्या महाचपला-गीतिका उदाहरण -- कामं चकास्ति गीतिर्मृगीदृशां सीधुपानचपलानाम्। मुखं च मुक्तलज्जं निरर्गलोल्लापमणितरमणीयम्॥ महाविपुला-महाचपला-गीतिका उदाहरण --

English

(Garbled letter-square "maya lila lali yama yajne jneya nausa maya".) Where it is to be known: outside, quickly, in the directions, the pot outside;

अध्याय ३१२

श्लोक 17

पद्मस्थं पद्मचक्रञ्च भृत्युजित् स्वर्गगन्धृतिं ।शान्तीनां परमा सान्तिः सौभाग्यादिप्रदायकम्

padmasthaṃ padmacakrañca bhṛtyujit svargagandhṛtiṃ / śāntīnāṃ paramā sāntiḥ saubhāgyādipradāyakam

हिन्दी अर्थ

पञ्चेषुवल्लभः पञ्चमध्वनिस्तत्र भवति यदि विपुलः । चपलं करोति कामाकुलं मनः कामिनामसौ गीतिः ॥ . पथ्योपगीतिका उदाहरण -- गान्धर्व मकरध्वजदेवस्यास्त्र जगद्विजयि। इति समवेक्ष्य मुमुक्षुभिरुपगीतिस्त्यज्यते देश: ॥ महाविपुलोपगीतिका उदाहरण -- विपुलोपगीतिझंकारमुखरिते भ्रमरमालानाम्। रैवतकोपवने वस्तुमस्तु सततं मम प्रीति:॥

English

seated on a lotus, the lotus-wheel, conqueror of death, heaven-bearer; supreme peace of peaces, giver of good fortune and the rest.

अध्याय ३१२

श्लोक 18

रुद्रे रुद्रसमाः कार्याः कोष्ठकास्तत्र ता लिखेत् ।ओमाद्याह्रूंफडन्ता च आदिवर्णमथानुतः

rudre rudrasamāḥ kāryāḥ koṣṭhakāstatra tā likhet / omādyāhrūṃphaḍantā ca ādivarṇamathānutaḥ

हिन्दी अर्थ

पथ्या-महाचपलोपगीतिका उदाहरण --

English

In Rudra, compartments equal to Rudra should be made; one should write them there, beginning with Om and ending with "hrum phat", the first letter and then the next;

अध्याय ३१२

श्लोक 19

विद्यावर्णक्रमेनेव संज्ञाञ्च वषडन्तिकां ।१ पूर्वपदे इति ञ॥ :प् १५१ अधस्थात् प्रत्यङ्गिरैषा सर्वकामार्थसाधिका

vidyāvarṇakrameneva saṃjñāñca vaṣaḍantikāṃ / 1 pūrvapade iti ña.. :p 151 adhasthāt pratyaṅgiraiṣā sarvakāmārthasādhikā

हिन्दी अर्थ

महाविपुला महाचपलोपगीतिका उदाहरण -- . पथ्योद्वीतिका उदाहरण -- व्याध इवोद्वीतिरवैः प्रथमं तावन्मनो हरसि । दुर्नयकर विश्राम्यसि पश्चात् प्राणेषु विप्रियः शल्यैः ॥ महाविपुलोद्गीतिका उदाहरण -- एषा तवापरोद्रीतिरत्र विपुला परिभ्रमति । तद्वल्लभापि यत्कीर्तिरखिलदिक्पालपार्श्वमुपयाति॥

English

by the order of the knowledge-letters the name ending with "vashat"; below, this Pratyangira accomplishes all desires and aims.

अध्याय ३१२

श्लोक 20

एकाशीतिपदे सर्वामादिवर्णक्रमेण तु ।आदिमं यावदन्तं स्याद्वषडन्तञ्च नाम वै

ekāśītipade sarvāmādivarṇakrameṇa tu / ādimaṃ yāvadantaṃ syādvaṣaḍantañca nāma vai

हिन्दी अर्थ

पथ्यामहाचपलोद्वीतिका उदाहरण -- उद्गीतिरत्र नित्यं प्रवर्तते कामचपलानाम्। तस्मान्मुने विमुञ्च प्रदेशमेतं समेतमेताभिः॥ महाविपुला महाचपलोद्रीतिका उदाहरण -- विपुला पयोधरश्रोणिमण्डले चक्षुषोश्चपला । उद्वीतिशालिनी कामिनी च सा बर्णिनां मनो हरति॥

English

In an eighty-one-place square, all by the order of the first letters; from the first to the last, the name ending in "vashat";

अध्याय ३१२

श्लोक 21

एषा प्रत्यङ्गिरा चान्या सर्वकार्यादिसाधनी ।निग्रहानुग्रहञ्चक्रञ्चतुःषष्टिपदैर् लिखेत्

eṣā pratyaṅgirā cānyā sarvakāryādisādhanī / nigrahānugrahañcakrañcatuḥṣaṣṭipadair likhet

हिन्दी अर्थ

४. पथ्या आर्यागीतिका उदाहरण अजमजरममरमेकं प्रत्यक्कैतन्यमीश्वरं ब्रह्म परम् । आत्मानं भावयती भवमुक्तिः स्यादितीयमार्यागीतिः ॥ महाविपुला आर्यागीतिका उदाहरण -- विपुलाभिलाषमृगतृष्णिका ध्रुवं हन्ति हरिणमिव हतहृदयम् । विपुलात्ममोक्षसुखकाङ्क्षिभिस्ततस्त्यज्यते विषयरससङ्गः ॥ पथ्या जघनचपलार्यागीतिका उदाहरण --

English

this is Pratyangira, and another, accomplisher of all works. One should write the Nigraha-anugraha (suppression and favor) wheel with sixty-four places;

अध्याय ३१२

श्लोक 22

अमृती सा च विद्या च क्रीं सः हूं नामाथ मध्यतः ।फट्काराद्यां पत्रगतां त्रिह्रींकारेण वेष्टयेत्

amṛtī sā ca vidyā ca krīṃ saḥ hūṃ nāmātha madhyataḥ / phaṭkārādyāṃ patragatāṃ trihrīṃkāreṇa veṣṭayet

हिन्दी अर्थ

महाविपुला महाचपला आर्यागीतिका उदाहरण -- चपलानि चक्षुरादीनि चित्तहारी च हन्त हतविषयगणः । एकान्तशीलिनां योगिनामतो भवति परमसुखसम्प्राप्तिः ॥

English

she is the immortal and the knowledge: "krim sah hum" and the name in the middle; having placed a leaf beginning with "phat", one should enclose with three "hrim";

अध्याय ३१२

श्लोक 23

कुम्भववद्धारिता सर्वशत्रुहृत् सर्वदायिका ।विषन्नश्येत् कर्णजपादक्षराद्यैश् च दण्डकैः

kumbhavavaddhāritā sarvaśatruhṛt sarvadāyikā / viṣannaśyet karṇajapādakṣarādyaiś ca daṇḍakaiḥ

हिन्दी अर्थ

चरणोंमें सोलह लघु हों तथा इनमेंसे प्रत्येक चरणके अन्तमें रगण (5। 5), एक लघु और एक गुरु हो तो “वैतालीय” नामक छन्द होता है। रगण, लघु और गुरु मिलाकर आठ मात्राएँ होती हैं, इनके सिवा प्रथम-तृतीय पादोंमें छ:-छः मात्राएँ और द्वितीय-चतुर्थ चरणोंमें आठ-आठ मात्राएँ ही शेष रहती हैं। इन्हें जोड़कर ही चौदह-सोलह मात्राओंको व्यवस्था

English

worn on a pot, the destroyer of all enemies, giver of all. Poison perishes by reciting in the ear, with the staff-mantras beginning with syllables.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 312
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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