Agni Purana· Agni Purāṇa
314
अध्याय 314 / 381

Adhyaya 315

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पूर्ण अध्याय पाठ5 श्लोक

अध्याय ३१४

श्लोक 1

नानामन्त्राः अग्निर् उवाच आदौ हूंकारसंयुक्ता खेचछे पदभूषिता ।वर्गातीतविसर्गेण ह्रीं हूंक्षेपफडन्तका

nānāmantrāḥ agnir uvāca ādau hūṃkārasaṃyuktā khecache padabhūṣitā / vargātītavisargeṇa hrīṃ hūṃkṣepaphaḍantakā

हिन्दी अर्थ

६. उदीच्यवृत्तिका उदाहरण

English

Tait. Sam. 4.2.9.3a.

अध्याय ३१४

श्लोक 2

सर्वकर्मकरी विद्या विषसन्धादिमर्दनी ।ॐ क्षेचछेतिप्रयोगश् च कालदष्टस्य जीवने

sarvakarmakarī vidyā viṣasandhādimardanī / oṃ kṣecachetiprayogaś ca kāladaṣṭasya jīvane

हिन्दी अर्थ

यतिकष्टमक्रमम् । प्रसादरहितं च नेष्यते कविभिः काव्यमुदीच्यवृत्तिभिः ॥ हो, अर्थात् द्वितीय और चतुर्थ पादोंमें पञ्चम लकारके साथ चौथा मिल जाय और प्रथम एवं तृतीय चरणोंमें तृतीयके साथ द्वितीय लकार संयुक्त हो जाय तो 'प्रवृत्तिक नामक छन्द होता

English

Tait. Sam. 4. 1.4.3b.

अध्याय ३१४

श्लोक 3

ॐ हूं केक्षः प्रयोगोयं विषशत्रुप्रमर्दनः ।स्त्रीं हूं फडितियोगोयं पापरोगादिकं जयेत्

oṃ hūṃ kekṣaḥ prayogoyaṃ viṣaśatrupramardanaḥ / strīṃ hūṃ phaḍitiyogoyaṃ pāparogādikaṃ jayet

हिन्दी अर्थ

है। जिस वैतालीय छन्दके चारों चरण विषम पादोंके ही अनुसार हों, अर्थात् प्रत्येक पाद चौदह लकारोंसे युक्त हो तथा द्वितीय लकार तृतीयसे मिला हो, उसे “चारुहासिनी? कहते हैं।

English

Tait. Sam. 4. 1.4.3b.

अध्याय ३१४

श्लोक 4

खेछेति च प्रयोगो ऽयं विघ्नदुष्टादि वारयेत्(१) ।ह्रूं स्त्रीं ओमितियोगो ऽयं योषिदादिवशीकरः

khecheti ca prayogo 'yaṃ vighnaduṣṭādi vārayet(1) / hrūṃ strīṃ omitiyogo 'yaṃ yoṣidādivaśīkaraḥ

हिन्दी अर्थ

जब चारों चरण सम पादोंके लक्षणसे युक्त हों अर्थात् सबमें सोलह लकार (मात्राएँ) हों और चतुर्थ लकार पञ्चमसे मिला हो तो उसका नाम 'अपरान्तिका? है। जिसके प्रत्येक पादमें सोलह लकार हों, किंतु पादके अन्तिम अक्षर गुरु ही हों, उसे “मात्रासमक” नामक छन्द कहा गया है। साथ ही इस छन्दमें नवम लकार किसीसे मिला नहीं रहता। जिस 'मात्रासमक के चरणमें बारहवाँ लकार

English

Tait. Sam. 4. 1.4.3b.

अध्याय ३१४

श्लोक 5

खे स्त्रीं खे च प्रयोगो ऽयं वशाय विजयाय च ।ऐं ह्रीं श्रीं स्फें क्षौं भगवति अम्बिके कुब्जिके स्फें ॐ भं तं वशनमो अघोराय सुखे व्रां व्रीं किलि किलि विच्चा स्फ्रौं हे स्फ्रं श्रीं ह्रीं ऐं श्रीमिति कुब्जिकाविद्या सर्वकरा स्मृता भूयः स्कन्दाय यानाह मन्त्रानीशश् च तान् वदे

khe strīṃ khe ca prayogo 'yaṃ vaśāya vijayāya ca / aiṃ hrīṃ śrīṃ spheṃ kṣauṃ bhagavati ambike kubjike spheṃ oṃ bhaṃ taṃ vaśanamo aghorāya sukhe vrāṃ vrīṃ kili kili viccā sphrauṃ he sphraṃ śrīṃ hrīṃ aiṃ śrīmiti kubjikāvidyā sarvakarā smṛtā bhūyaḥ skandāya yānāha mantrānīśaś ca tān vade

हिन्दी अर्थ

अपने स्वरूपमें ही स्थित रहता है, किसीसे मिलता नहीं, उसका नाम 'वानवासिका" है। जिसके चारों चरणोंमें पाँचवाँ और आठवाँ लकार लघुरूपमें ही स्थित रहता है, उसका नाम ' विश्लोक”

English

Tait. Sam. 4. 1.4.3b.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 314
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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