Agni Purana· Agni Purāṇa
327
अध्याय 327 / 381

Adhyaya 328

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पूर्ण अध्याय पाठ5 श्लोक

अध्याय ३२७

श्लोक 1

छन्दःसारः अग्निर् उवाच छन्दोधिकारे गायत्री देवी चैकाक्षरी भवेत् ।पञ्चदशाक्षरी सा स्यात् प्राजापत्याष्टविर्णिका

chandaḥsāraḥ agnir uvāca chandodhikāre gāyatrī devī caikākṣarī bhavet / pañcadaśākṣarī sā syāt prājāpatyāṣṭavirṇikā

हिन्दी अर्थ

साहित्यदर्पणकारने भी ' वृत्तभागयुतम्' कहकर इसी भावकी पुष्टि की है। वामन और विश्वनाथ-दोनों ही स्पष्टतः अग्निपुराणके छायाग्राही हैं। ५. विश्वनाथने ' साहित्यदर्पण' के छठे परिच्छेदमें 'कथा' और आख्यायिका' की चर्चा की है । उन्होंने गद्य-पद्यमय काव्योंके तीन भेद माने हैं-चम्पू, विरुद और करम्भक।

English

Cr. Ve die Concordance b.

अध्याय ३२७

श्लोक 2

यजुषां षडर्णा गायत्री साम्नां स्याद्द्वादशाक्षरा ।ऋचामष्टादशार्णा स्यात्साम्नां वर्धेत च द्वयं

yajuṣāṃ ṣaḍarṇā gāyatrī sāmnāṃ syāddvādaśākṣarā / ṛcāmaṣṭādaśārṇā syātsāmnāṃ vardheta ca dvayaṃ

हिन्दी अर्थ

श्रेणीका काव्य नहीं माना गया है

English

Could not be traced.

अध्याय ३२७

श्लोक 3

ऋचां तुर्यञ्च वर्धेत प्राजापत्याचतुष्टयं ।वर्धेदेकैककं शेषे आतुर्यादेक्रमुत्सृजेत्

ṛcāṃ turyañca vardheta prājāpatyācatuṣṭayaṃ / vardhedekaikakaṃ śeṣe āturyādekramutsṛjet

हिन्दी अर्थ

चतुष्पदी नाम है-पद्यका चार पादोंसे युक्त होनेसे उसे “चतुष्पदी' कहते हैं। उसके दो भेद हैं, 'वृत्त' और 'जाति। जो अक्षरोंकी गणनासे जाना जाय, उसे 'वृत्त' कहते हैं। यह भी दो प्रकारका है--'उक्थ' (वैदिकस्तोत्र आदि) और

English

The fourth of the verses should increase, the Prajapatya four; one should increase by one each in the rest; up to the fourth one should discard one.

अध्याय ३२७

श्लोक 4

उष्णिगनुष्टुब् वृहती पङ्क्तिस्त्रिष्टुब्जगत्यपि ।तानि ज्ञेयानि क्रमशो गायत्र्यो ब्रह्म एव ताः

uṣṇiganuṣṭub vṛhatī paṅktistriṣṭubjagatyapi / tāni jñeyāni kramaśo gāyatryo brahma eva tāḥ

हिन्दी अर्थ

हो, वह पद्य 'जाति' कहलाता है। यह काश्यपका मत है। वर्णोकी गणनाके अनुसार व्यवस्थित

English

Ushnih, Anushtubh, Brihati, Pankti, Trishtubh, Jagati — these are to be known in order; the Gayatris are Brahman itself.

अध्याय ३२७

श्लोक 5

तिस्रस्तिस्रः समान्यः स्युरेकैका आर्य एव च ।ऋग्यजुषां संज्ञाः स्युश् चतुःषष्टिपदे लिखेत्

tisrastisraḥ samānyaḥ syurekaikā ārya eva ca / ṛgyajuṣāṃ saṃjñāḥ syuś catuḥṣaṣṭipade likhet

हिन्दी अर्थ

तीन भेद माने हैं,-सम, अर्धसम तथा विषम। जो लोग गम्भीर काव्य-समुद्रके पार जाना चाहते हैं, उनके लिये छन्दोविद्या नौकाके समान है। महाकाव्य, कलाप, पर्यायबन्ध, विशेषक, कुलक, मुक्तक तथा कोष-ये सभी पद्योंके समुदाय हैं। अनेक सर्गोमें रचा हुआ संस्कृतभाषाद्वारा निर्मित काव्य 'महाकाव्य' कहलाता है

English

Three by three are the "samani," and each one is Arya; names of Rik and Yajus; one should write in sixty-four places.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 327
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.