Agni Purana· Agni Purāṇa
328
अध्याय 328 / 381

Adhyaya 329

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अध्याय ३२८

श्लोक 1

छन्दःसारः अग्निर् उवाच पाद आपदपूरणे गायत्र्यो वसवः स्मृताः ।जगत्या आदित्याः पादो विराजो दिश ईरिताः

chandaḥsāraḥ agnir uvāca pāda āpadapūraṇe gāyatryo vasavaḥ smṛtāḥ / jagatyā ādityāḥ pādo virājo diśa īritāḥ

हिन्दी अर्थ

सर्गबद्ध रचनाको, जो संस्कृत भाषामें अथवा विशुद्ध एवं परिमार्जित भाषामें लिखी गयी हो, 'महाकाव्य'' कहते हैं। महाकाव्यके स्वरूपका त्याग न करते हुए उसके समान अन्य रचना भी

English

Could not be traced.

अध्याय ३२८

श्लोक 2

विष्णुतो रुद्राः पादः स्याच्छन्द एकादिपादकं ।आद्यं चतुष्पाच्चतुर्भिस्त्रिपात् सप्ताक्षरैः क्वचित्

viṣṇuto rudrāḥ pādaḥ syācchanda ekādipādakaṃ / ādyaṃ catuṣpāccaturbhistripāt saptākṣaraiḥ kvacit

हिन्दी अर्थ

हो तो वह दूषित नहीं मानी जाती। “महाकाव्य! इतिहासकी कथाको लेकर निर्मित होता है अथवा उसके अतिरिक्त किसी उत्तम आधारको लेकर भी उसकी अवतारणा की जाती है। उसमें युद्ध आदिके वर्णनका समावेश होता है। वह अधिक विस्तृत नहीं होता। शक्वरी, अतिजगती,

English

Gould not be traced.

अध्याय ३२८

श्लोक 3

सा गायत्री पदे नीवृत् तत्प्रतिष्ठादि षट् त्रिपात् ।बर्धमाना षडष्टाष्टा त्रिपात् षड्वसुभूधरैः

sā gāyatrī pade nīvṛt tatpratiṣṭhādi ṣaṭ tripāt / bardhamānā ṣaḍaṣṭāṣṭā tripāt ṣaḍvasubhūdharaiḥ

हिन्दी अर्थ

वक्त्र आदि मनोहर एवं समवृत्तवाले छन्दोंमें महाकाव्यकी रचना की जाती है। प्रत्येक सर्गके

English

RV. 1.91.22a.

अध्याय ३२८

श्लोक 4

गायत्री त्रिपदा नीवृत् नागी नवनवर्तुभिः ।वाराही रसद्विरसा छन्दश्चाथ तृतीयकम्

gāyatrī tripadā nīvṛt nāgī navanavartubhiḥ / vārāhī rasadvirasā chandaścātha tṛtīyakam

हिन्दी अर्थ

अन्तमें छन्द बदल देना उचित है। सर्ग अत्यन्त संक्षिप्त नहीं होना चाहिए। 'अतिशक्वरी' और ' अष्टि'—इन दो छन्दोंसे एक सर्ग संकीर्ण होना चाहिए तथा दूसरा सर्ग मात्रिक छन्दोंसे संकीर्ण होना चाहिए। अगला सर्ग पूर्वसर्गको अपेक्षा अधिकाधिक उत्तम होना चाहिए। 'कल्प' अत्यन्त निन्दित माना गया है। उसमें सत्पुरुषोंका विशेष आदर नहीं होता। नगर, समुद्र, पर्वत, ऋतु,

English

O Rama! Collyrium applied to the eyes (with the hymn) bhago na citra* will increase fortune. There need be no doubt.

अध्याय ३२८

श्लोक 5

द्विपाद् द्द्वादशवस्वन्तैः त्रिपात्तु त्रैष्टुभैः स्मृतम् ।उष्णिक् छन्दो ऽष्टवसुकैः पादैर् वेदे प्रकीर्तितः

dvipād ddvādaśavasvantaiḥ tripāttu traiṣṭubhaiḥ smṛtam / uṣṇik chando 'ṣṭavasukaiḥ pādair vede prakīrtitaḥ

हिन्दी अर्थ

कुलटाके चरित्र आदि अद्भुत वर्णनोंसे महाकाव्य पूर्ण होता है। अन्धकार, वायु तथा रतिको व्यक्त करनेवाले अन्य उद्दीपन-विभावोंसे भी वह अलंकृत होता है। उसमें सब प्रकारको वृत्तियोंकी

English

A child should be fed with the powder of vacd soaked in ghee daily with the repetition of (the hymn) indramidgdlhino. It will give him good memory.

अध्याय ३२८

श्लोक 6

ककुबुष्णिगष्टसूर्यवस्वर्णां त्रिभिरेव सः ।पुनरुष्णिक् सूर्यवसुवस्वर्णैश् च त्रिपाद्भवेत्

kakubuṣṇigaṣṭasūryavasvarṇāṃ tribhireva saḥ / punaruṣṇik sūryavasuvasvarṇaiś ca tripādbhavet

हिन्दी अर्थ

प्रवृत्ति होती है। वह सब प्रकारके भावोंसे प्रभावित होता है तथा सब प्रकारकी रीतियों तथा सभी रसोंसे उसका संस्पर्श होता है। सभी गुणों और अलंकारोंसे भी महाकाव्यको परिपुष्ट किया जाता है। इन सब विशेषताओंके कारण ही उस रचनाको 'महाकाव्य' कहते हैं तथा उसका निर्माता 'महाकवि' कहलाता है

English

The repetition of the eight vairUpya (hymns) daily confers fortune. One will get all the desires fulfilled by repeating the saptdffaka (hymns).

अध्याय ३२८

श्लोक 7

परोष्णिक् परतस्तस्माच्चतुष्पादात् त्रिभिर्भवेत् ।साष्टाक्षरैर् अनुष्टुप् स्यात् चतुष्पाच्च त्रिपात् क्वचित्

paroṣṇik paratastasmāccatuṣpādāt tribhirbhavet / sāṣṭākṣarair anuṣṭup syāt catuṣpācca tripāt kvacit

हिन्दी अर्थ

महाकाव्यमें उक्ति-वैचित्र्यकी प्रधानता होते हुए भी रस ही उसका जीवन है। उसको स्वरूप-सिद्धि अपृथग्यत्नसे (अर्थात् सहजभावसे)

English

One who worships cows daily morning and evening (with the repetition of the hymn) gavyofuijo unweariedly will always have cows in his house.

अध्याय ३२८

श्लोक 8

अष्टार्कसूर्यवर्णैः स्यात् मध्ये ऽन्ते च क्वचिद्भवेत् ।वृहतीजगत्यस्त्रयो गायत्र्याः पूर्वको यदि

aṣṭārkasūryavarṇaiḥ syāt madhye 'nte ca kvacidbhavet / vṛhatījagatyastrayo gāyatryāḥ pūrvako yadi

हिन्दी अर्थ

चारों पुरुषार्थोकी प्राप्ति । वह नायकके नामसे ही सर्वत्र विख्यात होता है। प्रायः समान छन्दों अथवा वृत्तियोंमें महाकाव्यका निर्वाह किया जाता है। कौशिकी वृत्तिकी प्रधानता होनेसे काव्य-प्रबन्धमें कोमलता आती है। जिसमें प्रवासका

English

With eight, sun, and sun-colors (twelve), it may be in the middle and at the end sometimes; the Brihati and Jagati — three, if Gayatri is the earlier;

अध्याय ३२८

श्लोक 9

तृतीयः पथ्या भवति द्वितीयान्यं कुसारिणी ।स्कन्धौ ग्रीवा क्रौष्टुके स्याद् यक्षे स्यद्वो वृहत्यपि

tṛtīyaḥ pathyā bhavati dvitīyānyaṃ kusāriṇī / skandhau grīvā krauṣṭuke syād yakṣe syadvo vṛhatyapi

हिन्दी अर्थ

१. “पद्यं चतुष्पदी तच्च वृत्तं जातिरिति द्विधा।'--यह पद्यांश दण्डीने अपने ' काव्यादर्श 'में ज्यों-का-त्यों ले लिया है।

English

the third becomes Pathya; the second the other, Kusarini. Skandhas, griva in the Krostuka; in Yaksha the Brihati also;

अध्याय ३२८

श्लोक 10

उपरिष्टाद्वृहत्यन्ते पुरस्ताद्वृहती पुनः ।क्वचिन्नवकाश् चत्वारो दिग्विदिक्ष्वष्टवर्णिकाः

upariṣṭādvṛhatyante purastādvṛhatī punaḥ / kvacinnavakāś catvāro digvidikṣvaṣṭavarṇikāḥ

हिन्दी अर्थ

२. भामहने अग्निपुराणके ' सर्गबन्धो महाकाव्यम्'--इस उक्तिको अविकलरूपसे उद्धूत करके ही महाकाव्यके लक्षणका विस्तार किया है। ३. भामहने भी 'मन्त्रदूतप्रयाणादि'-इस आनृपूर्वीका अपने महाकाव्य-लक्षणमें उपयोग किया है। ४. 'चतुर्वर्गफलप्राप्ति: इस अंशको परवर्ती साहित्यालोचकोंने अग्निपुराणके इस कथनसे ही लिया है।

English

Brihati at the end above, Brihati in front again; sometimes four nines; in directions and corners eight-syllabled ones;

अध्याय ३२८

श्लोक 11

महावृहती जागतैः स्यात् त्रिभिः सतो वृहत्यपि ।भण्डिलः पङ्क्रिच्छन्दः स्यात्सूर्यार्काष्टाष्टवर्णकैः

mahāvṛhatī jāgataiḥ syāt tribhiḥ sato vṛhatyapi / bhaṇḍilaḥ paṅkricchandaḥ syātsūryārkāṣṭāṣṭavarṇakaiḥ

हिन्दी अर्थ

वर्णन हो, उस रचनाको 'कलाप' कहते हैं।

English

the Mahabrihati from three Jagatas, with Brihati; the Bhandila would be Pankti meter with twelve, twelve, eight, eight syllables;

अध्याय ३२८

श्लोक 12

पूर्वौ वेदयुजौ सतः पङ्क्तिश् च विपरीतकौ ।प्रस्तारपङ्क्तिः पुरतः पवादास्तारपङ्क्तिका

pūrvau vedayujau sataḥ paṅktiś ca viparītakau / prastārapaṅktiḥ purataḥ pavādāstārapaṅktikā

हिन्दी अर्थ

उसमें 'पूर्वानुराग' नामक भृङ्गाररसको प्रधानता होती है। संस्कृत अथवा प्राकृतके द्वारा प्राप्ति

English

the first two Veda-joined (four) and the Pankti reversed; Prastara-pankti in front; Pavada-Tara-panktika;

अध्याय ३२८

श्लोक 13

अक्षरपङ्क्तिः पञ्चकाश् चत्वारश्चाल्पशो द्वयं ।पदपङ्क्तिः पञ्च भवेच्चतुष्कं षट्ककत्रयम्

akṣarapaṅktiḥ pañcakāś catvāraścālpaśo dvayaṃ / padapaṅktiḥ pañca bhaveccatuṣkaṃ ṣaṭkakatrayam

हिन्दी अर्थ

आदिका वर्णन विशेषक' कहलाता है। जहाँ

English

Akshara-pankti is five and four, two in small; Pada-pankti would be five; four, six, three —

अध्याय ३२८

श्लोक 14

षट्कपञ्चभिर्गायत्रैः षड्भिश् च जगती भवेत् ।एकेन त्रिष्टुव्ज्योतिष्मती तथैव जगतीरिता

ṣaṭkapañcabhirgāyatraiḥ ṣaḍbhiś ca jagatī bhavet / ekena triṣṭuvjyotiṣmatī tathaiva jagatīritā

हिन्दी अर्थ

अनेक श्लोकोंका एक साथ अन्वय हो, उसे “कुलक' कहते हैं। उसीका नाम 'संदानितक' भी है। एक-एक श्लोककी स्वतन्त्र रचनाको 'मुक्तक' कहते हैं। उसे सहृदयोंके हृदयमें चमत्कार उत्पन्न करनेमें समर्थ होना चाहिए। श्रेष्ठ

English

with six and five Gayatras and six it would be Jagati; with one, Trishtubh-jyotishmati; thus Jagati is told;

अध्याय ३२८

श्लोक 15

पुरस्ताज्योतिः प्रथमे मध्ये ज्योतिश् च मध्यतः ।उपरिष्टाज्योतिरन्त्यादेकस्मिन् पञ्चके तथा

purastājyotiḥ prathame madhye jyotiś ca madhyataḥ / upariṣṭājyotirantyādekasmin pañcake tathā

हिन्दी अर्थ

कवियोंकी सुन्दर उक्तियोंसे सम्पन्न ग्रन्थको “कोष' कहा गया है। वह ब्रह्मकी भाँति अपरिच्छिन्न रससे युक्त होता है तथा सहृदय पुरुषोंको रुचिकर प्रतीत होता है। सर्गमें जो भिन्न-भिन्न

English

in front Jyoti, in the first; in the middle Jyoti in the middle; above Jyoti from the last of one in a five;

अध्याय ३२८

श्लोक 16

भवेच्छन्दः शङ्कुमती षट्के छन्दःककुद्मती ।त्रिपादशिशुमध्या स्यात् सा पिपीलिकमध्यमा(१)

bhavecchandaḥ śaṅkumatī ṣaṭke chandaḥkakudmatī / tripādaśiśumadhyā syāt sā pipīlikamadhyamā(1)

हिन्दी अर्थ

है। उसके दो भेद हैं-'मिश्र' तथा “प्रकीर्ण'। जिसमें ' श्रव्य' और ' अभिनेय'—दोनोंके लक्षण हों, वह 'मिश्र' और सकल. उक्तियोंसे युक्त काव्य 'प्रकीर्ण' कहलाता है॥ ३३--३९॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणे “काव्य आदिके लक्षण” नामक तीन सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

the meter Shankumati in a six, the meter Kakudmati; Tripada-shishumadhya, that Pipilikamadhya;

अध्याय ३२८

श्लोक 17

विपरीता यवमध्या त्रिवृदेकेन वर्जिता ।भूमिजैकेनाधिकेन द्विहीना च चिराद्भवेत्

viparītā yavamadhyā trivṛdekena varjitā / bhūmijaikenādhikena dvihīnā ca cirādbhavet

हिन्दी अर्थ

अग्निदेव कहते हैं-वसिष्ठ! 'रूपक'के सत्ताईस भेद माने गये हैं'-नाटक, प्रकरण, डिम, ईहामृग, समवकार, प्रहसन, व्यायोग, भाण, वीथी, अङ्क, त्रोटक, नाटिका, सट्टक,

English

Yavamadhya the reverse; Trivrit lacking one; Bhumija with one more, lacking two, after long;

अध्याय ३२८

श्लोक 18

अवराट्स्याद्द्वाभ्यामधिकं सन्दिग्धो दैवतादितः ।आदिपादान्निश् चयः स्याच्छन्दसं देवता क्रमात्

avarāṭsyāddvābhyāmadhikaṃ sandigdho daivatāditaḥ / ādipādānniś cayaḥ syācchandasaṃ devatā kramāt

हिन्दी अर्थ

शिल्पक, कर्णा, दुर्मल्लिका, प्रस्थान, भाणिका, भाणी, गोष्ठी, हल्लीशक, काव्य, श्रीगदित, दो प्रकारके होते हैं-सामान्य और विशेष। सामान्य लक्षण रूपकके सभी भेदोंमें व्याप्त होते हैं और विशेष लक्षण किसी-किसीमें दृष्टिगोचर होते हैं। रूपकके सभी भेदोंमें पूर्वरङ्गके' निवृत्त

English

Avarat with two more; doubtful from the deity and the rest. From the first foot is determination; meter and deity in order:

अध्याय ३२८

श्लोक 19

अग्निः सूर्यः शशी जीवो वरुणश् चन्द्र एव च ।विश्वेदेवाश् च षड्जाद्याः स्वराः षड्जो वृषःक्रमात्

agniḥ sūryaḥ śaśī jīvo varuṇaś candra eva ca / viśvedevāś ca ṣaḍjādyāḥ svarāḥ ṣaḍjo vṛṣaḥkramāt

हिन्दी अर्थ

हो जानेपर देश-काल, रस, भाव, विभाव,

English

Agni, Sun, Moon, Jupiter, Varuna, Chandra and Vishvedevas — the notes beginning with Shadja; Shadja is the bull in order;

अध्याय ३२८

श्लोक 20

गान्धारो मध्यमश् चैव पञ्चमो धैवतस् तथा ।निषादवर्णाः श्वेतश् च सारङ्गश् च पिसङ्गकः

gāndhāro madhyamaś caiva pañcamo dhaivatas tathā / niṣādavarṇāḥ śvetaś ca sāraṅgaś ca pisaṅgakaḥ

हिन्दी अर्थ

अनुभाव, अभिनय, अङ्क और स्थिति-ये उनके सामान्य लक्षण हैं; क्योंकि इनका सर्वत्र उपसर्पण देखा जाता है। विशेष लक्षण यथावसर बताया जायगा। यहाँ पहले सामान्य लक्षण कहा जाता है; “नाटक 'को धर्म, अर्थ और कामका साधन माना गया है; क्योंकि वह करण है। उसकी इतिकर्तव्यता (कार्यारम्भको विधि) यह है कि 'पूर्वरङ्ग'का विधिवत् सम्पादन किया जाय। 'पूर्वरङ्ग'के

English

Gandhara, Madhyama, Panchama, Dhaivata and Nishada; colors: white, Sarangaka, tawny;

अध्याय ३२८

श्लोक 21

१ सपिपीलिकमध्यगेति ख॥ :प् १८७ कृष्णो नीलो लोहितश् च गौरी गायत्रिमुख्यके ।गौरीचनाभाः कृतयो ज्योतिश्छन्दो हि श्यामलं

1 sapipīlikamadhyageti kha.. :p 187 kṛṣṇo nīlo lohitaś ca gaurī gāyatrimukhyake / gaurīcanābhāḥ kṛtayo jyotiśchando hi śyāmalaṃ

हिन्दी अर्थ

नान्दी आदि बाईस अङ्ग होते हैं'

English

black, blue, red; Gauri among the chief Gayatri; the Kritis resembling Gauri; the meter Jyoti is dark;

अध्याय ३२८

श्लोक 22

अग्निर्वैश्यः काश्यपश् च गौतमाङ्गिरसौ क्रमात् ।भार्गवः कौशिकश् चैव वाशिष्टो गोत्रमीरितं

agnirvaiśyaḥ kāśyapaś ca gautamāṅgirasau kramāt / bhārgavaḥ kauśikaś caiva vāśiṣṭo gotramīritaṃ

हिन्दी अर्थ

गौ, ब्राह्मण और राजा आदिके आशीर्वाद ' नान्दी' कहलाते हैं। रूपकोंमें “नान्दीपाठ'के पश्चात् यह १. भरतमुनिके नाट्यशास्त्र (१८। २)-में 'रूपक' के दस भेद बताये गये हैं-नाटक, प्रकरण, अङ्क, व्यायोग, भाण, समवकार,

English

Agni is Vaishya, Kashyapa; Gautama and Angirasa in order; Bhargava, Kaushika, Vashishtha — the gotras are told.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 328
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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