Agni Purana· Agni Purāṇa
329
अध्याय 329 / 381

Adhyaya 330

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अध्याय ३२९

श्लोक 1

छन्दोजातिनिरूपणम् अग्निर् उवाच चतुःशतमुत्कृतिः स्यादुकृतेश् चतुरस्त्यजेत् ।अभिसंव्या प्रत्यकृतिस्तानि छन्दांशि वै पृथक्

chandojātinirūpaṇam agnir uvāca catuḥśatamutkṛtiḥ syādukṛteś caturastyajet / abhisaṃvyā pratyakṛtistāni chandāṃśi vai pṛthak

हिन्दी अर्थ

वीथी, प्रहसन, डिम और ईहामृग। अग्निपुराणमें ये दस भेद तो मिलते ही हैं, सत्रह भेद और उपलब्ध होते हैं। इन्हींमें 'विलासिका' नामक एक भेद और जोड़कर विश्वनाथने सब भेदोंकी सम्मिलित संख्या अट्राईस कर दी है। उन्होंने प्रथम दस भेदोंको 'रूपक' और शेष अठारह भेदोंको “उपरूपक' बताया है। अग्निपुराणोक्त 'कर्णा' नामक भेद 'साहित्यदर्पण'में “प्रकरणी 'के नामसे और ' भाणी' नामक भेद “संलापक' नामसे लिखा गया है।

English

One who offers a droa (a measure) of barley soaked in

अध्याय ३२९

श्लोक 2

कृतिश्चातिघृतिवृत्तो(१) अत्यष्टिश्चाष्टिरित्यतः ।अतिशर्करी शक्करीति अतिजगती जगत्यपि

kṛtiścātighṛtivṛtto(1) atyaṣṭiścāṣṭirityataḥ / atiśarkarī śakkarīti atijagatī jagatyapi

हिन्दी अर्थ

२. ' रङ्ग' कहते हैं-- ' रङ्गशाला' या ' नृत्यस्थान'को। वहाँ जो सम्भावित विघ्न या उपद्रव हों, उनकी शान्तिके लिये सूत्रधार और नट आदि जो 'नान्दीपाठ' और 'स्तुति' आदि करते हैं, उसका नाम :पूर्वरङ्ग' है। ३. नाट्यशास्त्रके पाँचवें अध्याय (९-१७ तकके श्लोकों) -में प्रत्याहार, अवतरण, आरम्भ, आश्रावणा, वक्त्रपाणि, परिघट्टना, संघोटना, मार्गासारित, ज्येष्ठासारित, मध्यासारित, कनिष्ठासारित-ये ग्यारह ' बहिर्गीत' कहे गये हैं, जो परदेके भीतर ही रहकर अभिनेता या प्रयोगकर्ता प्रयोगमें लाते हैं । तदनन्तर परदा उठाकर सब लोग एक साथ गीतकी योजना करते हैं। उसके गीतक, वर्द्धमान, ताण्डव, उत्थापन, परिवर्तन, नान्दी, शुष्कावकृष्टा, रङ्गद्वार, चारी, महाचारी और प्ररोचना-ये ग्यारह अङ्ग हैं। इन बाईस अङ्गोंका पूर्वरङ्गमें

English

Could not be traced.

अध्याय ३२९

श्लोक 3

छन्दो ऽत्र लौकिकं स्याच्च आर्षमात्रैष्टुभात् स्मृतम् ।त्रिषुप्पङ्क्तिवृहती अनुष्टुवुष्णिगीरितम्

chando 'tra laukikaṃ syācca ārṣamātraiṣṭubhāt smṛtam / triṣuppaṅktivṛhatī anuṣṭuvuṣṇigīritam

हिन्दी अर्थ

लिखा जाता है कि 'नान्ह्यन्ते सूत्रधारः ' (नान्दीपाठके अनन्तर सूत्रधारका प्रवेश) । इसमें कविकी पूर्व गुरुपरम्पराका, वंशप्रशंसा, पौरुष तथा काव्यके सम्बन्ध और प्रयोजन--इन पाँच विषयोंका

English

The meter here would be popular; the Vedic seers' is remembered as Trishtubh-measure only; Trishtubh, Pankti, Brihati, Anushtubh, Ushnih are told.

अध्याय ३२९

श्लोक 4

गायत्री स्यात् सुप्रतिष्टा प्रतिष्ठा मध्यया सह ।अत्युक्तात्युक्त आदिश् च एकैकाक्षरवर्जितम्

gāyatrī syāt supratiṣṭā pratiṣṭhā madhyayā saha / atyuktātyukta ādiś ca ekaikākṣaravarjitam

हिन्दी अर्थ

निर्देश करे। नटी, विदूषक और पारिपार्श्वक -ये सूत्रधारके साथ जहाँ अपने कार्यसे सम्बद्ध, प्रस्तुत विषयको उपस्थित करनेवाले विचित्र वाक्योंद्वारा परस्पर संलाप करते हैं, पण्डितजन उसको 'आमुख' जानें। उसको 'प्रस्तावना' भी कहा जाता है

English

SV.1.449ab.

अध्याय ३२९

श्लोक 5

चतुर्भागो भवेत् पादो गणच्छन्दः प्रदर्श्यते ।तावन्तः समुद्रा गणा ह्य् आदिमध्यान्तसर्वगाः

caturbhāgo bhavet pādo gaṇacchandaḥ pradarśyate / tāvantaḥ samudrā gaṇā hy ādimadhyāntasarvagāḥ

हिन्दी अर्थ

'आमुख'के तीन भेद होते हैं-प्रवृत्तक,

English

Could not be traced.

अध्याय ३२९

श्लोक 6

१ कृतिश्चानिघृतिर्वृत्तीति ञ॥ , ट॥ च :प् १८८ चतुर्णः पञ्च च गणा आर्यालक्षनमुच्यते ।स्वरार्धञ्चार्यार्धं स्यादार्यायां विषमेन जः

1 kṛtiścānighṛtirvṛttīti ña.. , ṭa.. ca :p 188 caturṇaḥ pañca ca gaṇā āryālakṣanamucyate / svarārdhañcāryārdhaṃ syādāryāyāṃ viṣamena jaḥ

हिन्दी अर्थ

काल (ऋतु आदि)-का वर्णन करता है, तब उसका आश्रयभूत पात्र-प्रवेश 'प्रवृत्तक' कहलाता है। इसका बीजांशोंमें ही प्रादुर्भाव होता है । जब पात्र सूत्रधारके वाक्य अथवा वाक्यार्थको ग्रहण करके प्रवेश करता है, तब उसको 'कथोद्धात' कहा जाता है। जिस समय सूत्रधार एक प्रयोगमें दूसरे प्रयोगका वर्णन करे, उस समय यदि पात्र वहाँ प्रवेश करे, तो वह 'प्रयोगातिशय' होता है।

English

SV. 1.476a; 2.285a.

अध्याय ३२९

श्लोक 7

षष्ठो जो नलपूर्वा स्याद्द्वितीयादिपदं नले ।सप्तमे ऽन्ते प्रथमा च द्वितीये पञ्चमे नले

ṣaṣṭho jo nalapūrvā syāddvitīyādipadaṃ nale / saptame 'nte prathamā ca dvitīye pañcame nale

हिन्दी अर्थ

'इतिवृत्त' (इतिहास) -को नाटक आदिका शरीर कहा जाता है। उसके दो भेद माने गये हैं--' सिद्ध ' और 'उत्परेक्षित'। शास्त्रोंमें वर्णित इतिवृत्त 'सिद्ध और कविकी कल्पनासे निर्मित 'उत्प्रेक्षित' कहा

English

The sixth is "jo" preceded by nala; of the second and so on the foot in nala; in the seventh at the end the first, in the second and fifth in nala;

अध्याय ३२९

श्लोक 8

आर्धे पदं प्रथमादि षष्ठ एको लघुर्भवेत् ।त्रिषु गणेषु पादः स्यादार्या पञ्चार्धके स्मृता

ārdhe padaṃ prathamādi ṣaṣṭha eko laghurbhavet / triṣu gaṇeṣu pādaḥ syādāryā pañcārdhake smṛtā

हिन्दी अर्थ

जाता है। बीज, बिन्दु, पताका, प्रकरी और कार्यये पाँच अर्थप्रकृतियाँ (प्रयोजनसिद्धिकी हेतुभूता) हैं? । चेष्टा (कार्यावस्थाएँ) भी पाँच ही मानी गयी हैं। इनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं- प्रारम्भ, प्रयत्न, प्रासि-सद्भाव, नियतफलप्राप्ति और पाँचवाँ फलयोग। रूपकमें मुख, प्रतिमुख,

English

in the half the foot from the first; the sixth becomes a single short; a foot has three feet (gana) — Arya is remembered in five and a half;

अध्याय ३२९

श्लोक 9

विपुलान्याथ चपला गुरुमध्यगतौ च जौ ।द्वितीयचतुर्थौ पूर्वे च चपला मुखपूर्विका

vipulānyātha capalā gurumadhyagatau ca jau / dvitīyacaturthau pūrve ca capalā mukhapūrvikā

हिन्दी अर्थ

गर्भ, विमर्श और निर्वहण-ये क्रमशः पाँच संधियाँ हैं£। जो अल्पमात्र वर्णित होनेपर भी बहुधा विसर्पण-अनेक अवान्तर कार्यको उत्पन्न करता है, फलकी हेतुभूत उस अर्थप्रकृतिको

English

Vipula, then Chapala, the "jau" in the middle of a heavy; the second and fourth, and in the first Chapala Mukhapurvika;

अध्याय ३२९

श्लोक 10

द्वितीये जघनपूर्वा चपलार्या प्रकीर्तिता ।उभयोर्महाचपला गीतवाद्यार्धतुल्यका

dvitīye jaghanapūrvā capalāryā prakīrtitā / ubhayormahācapalā gītavādyārdhatulyakā

हिन्दी अर्थ

“बीज' कहा जाता है। जिसमें विविध वृत्तान्तों और रससे बीजकी उत्पत्ति होती है, काव्यके शरीरमें अनुगत उस संधिको मुख' कहते हैं। अभीष्ट अर्थकी रचना, कथावस्तुको अखण्डता, प्रयोगमें अनुराग, गोपनीय विषयोंका गोपन, अद्भुत वर्णन, प्रकाश्य विषयोंका प्रकाशन-ये काव्याङ्गोंके छः फल हैं। जैसे अङ्गहीन मनुष्य किसी कार्यमें समर्थ नहीं होता, उसी प्रकार

English

in the second Jaghanapurva; Chapalarya is declared. Of both, Mahachapala, equal to half of song and instrument;

अध्याय ३२९

श्लोक 11

अन्त्येनार्धेनोपगीतिरुद्गीतिश्चोत्क्रमात् स्मृता ।अर्धे रक्षगणा आर्या गीटच्छन्दो ऽथ मात्रया

antyenārdhenopagītirudgītiścotkramāt smṛtā / ardhe rakṣagaṇā āryā gīṭacchando 'tha mātrayā

हिन्दी अर्थ

अङ्गहीन काव्य भी प्रयोगके योग्य नहीं माना जाता। देश-कालके बिना किसी भी इतिवृत्तकी प्रवृत्ति नहीं होती, अतः नियमपूर्वक उन दोनोंका उपादान 'पद' कहलाता है। देशोंमें भारतवर्ष

English

Upagiti with the last half; Udgiti in reverse is remembered. In the half, "rakshagana" — Arya; Gitichhanda by the measure (matra);

अध्याय ३२९

श्लोक 12

वैतालीयं द्विस्वरा स्यादयुष्पादे समे नलः ।वसवो ऽन्ते वनगाश् च गोपुच्छन्दशकं भवेत्

vaitālīyaṃ dvisvarā syādayuṣpāde same nalaḥ / vasavo 'nte vanagāś ca gopucchandaśakaṃ bhavet

हिन्दी अर्थ

और कालमें सत्ययुग, त्रेता और द्वापरयुगको ग्रहण करना चाहिए। देश-कालके बिना कहीं भी प्राणियोंके सुख-दुःखका उदय नहीं होता। सृष्टिके आदिकालकी वार्ता अथवा सृष्टिपालन आदिकी वार्ता प्राप्त हो तो वह वर्णनीय है। ऐसा करनेमें कोई दोष नहीं है”

English

Vaitaliya is two-voweled; in the equal feet of an odd foot "nala"; Vasus at the end and Vanagas; Gopuchchha ten;

अध्याय ३२९

श्लोक 13

भगणान्ता पाटलिका शेषे परे च पूर्ववत्(१) ।साकं षड्वा मिश्रायुक् प्राच्यवृत्तिः प्रदर्श्यते

bhagaṇāntā pāṭalikā śeṣe pare ca pūrvavat(1) / sākaṃ ṣaḍvā miśrāyuk prācyavṛttiḥ pradarśyate

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें नाटकका निरूपण' नामक तीन सौ अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

ending in a "bhagana" is Patalika; in the rest and other as before; with the six or mixed joined, Prachya-vritti is shown;

अध्याय ३२९

श्लोक 14

पञ्चमेन पूर्वसाकं तृतीयेन सहस्रयुक् ।उदीच्यवृत्तिर्वाच्यां स्याद् युगपच्च प्रवर्तकं

pañcamena pūrvasākaṃ tṛtīyena sahasrayuk / udīcyavṛttirvācyāṃ syād yugapacca pravartakaṃ

हिन्दी अर्थ

१. नाटकोंमें सबसे प्रथम ' नान्दीपाठ'का विधान भरतमुनिने किया है। जैसा कि नाट्यशास्त्रके प्रथम अध्यायमें उल्लेख है- नान्दी कृता मया पूर्वमाशीर्वचनसंयुता। अष्टाङ्गपदसंयुक्ता विचित्रा देवसम्मता॥

English

with the fifth along with the earlier, with the third joined with a thousand: Udichya-vritti in speech and Pravartaka at once;

अध्याय ३२९

श्लोक 15

अयुक्चारुहासिनी स्याद्युगपच्चान्तिका भवेत्

ayukcāruhāsinī syādyugapaccāntikā bhavet //

हिन्दी अर्थ

२. विश्वनाथने अग्निपुराणके ' सहिताः सूत्रधारेण’ इत्यादिसे लेकर ' प्रस्तावनापि सा' तककी पङ्कियोंको अपने ग्रन्थमें अविकलरूपसे उद्धृत किया है। अग्निपुराणमें प्रस्तावनाके 'प्रवृत्तक', ' कथोद्वात' और 'प्रयोगातिशय'-ये तीन भेद माने गये हैं। परंतु विश्वनाथने 'उद्धातक' और 'अवलगित'-ये दो भेद और जोड़कर पाँच भेद स्वीकार किये हैं।

English

Charuhasini and Antika at once, unjoined.

अध्याय ३२९

श्लोक 16

सप्तार्चिर्वसवश् चैव मात्रासमकमीरितम् ।भवेन्नलवमौ लश् च द्वादशो वा नवासिका

saptārcirvasavaś caiva mātrāsamakamīritam / bhavennalavamau laś ca dvādaśo vā navāsikā

हिन्दी अर्थ

३. इन पाँचों अर्थप्रकृतियोंको विश्वनाथने अपने ग्रन्थमें ज्यों-का-त्यों ग्रहण किया है। ४, विश्वनाथने ' निर्वहण 'के स्थानमें "उपसंहृति 'का उल्लेख किया है।

English

Saptarchi and Vasus; Matrasamaka is told; Nalavama and la, or the twelfth; Navasika;

अध्याय ३२९

श्लोक 17

विश्वोकः पञ्चमाष्टौ मो चित्रा लवमकश् चलः ।१ पुच्छलमिति ख॥ :प् १८९ परयुक्तेनोपचित्रा पादाकुलकमित्यतः

viśvokaḥ pañcamāṣṭau mo citrā lavamakaś calaḥ / 1 pucchalamiti kha.. :p 189 parayuktenopacitrā pādākulakamityataḥ

हिन्दी अर्थ

५. इस प्रसङ्गके अनुशीलनसे यह स्पष्ट जान पड़ता है कि व्यासदेवपर भरतमुनिका प्रभाव पड़ा है और परवर्ती आलोचकोंके ग्रन्थ

English

Vishvoka the fifth and eighth, "mo"; Chitra, Lavamaka, Chala; Upachitra with the following joined; Padakulaka thus;

अध्याय ३२९

श्लोक 18

गीतार्या लोपश्चेत् सौम्या लः पूर्वः(१) ज्योतिरीरिता ।स्याच्छिखा विपर्यास्तार्धा तूलिका समुदाहृता

gītāryā lopaścet saumyā laḥ pūrvaḥ(1) jyotirīritā / syācchikhā viparyāstārdhā tūlikā samudāhṛtā

हिन्दी अर्थ

भरतमुनि एवं व्यासदेवसे भी प्रभावित हैं। शृङ्गारादि रस, भाव तथा नायक आदिका निरूपण

English

if there is omission in Gitarya, Saumya, "la" the first; Jyoti is declared; Shikha reversed, half; Tulika is declared.

अध्याय ३२९

श्लोक 19

एकोनत्रिंशदन्ते गः स्याज्ज्ञेजनसमावला ।गु इत्य् एकगुरुं(२) संख्यावर्णाद्दशविपर्ययात्

ekonatriṃśadante gaḥ syājjñejanasamāvalā / gu ity ekaguruṃ(2) saṃkhyāvarṇāddaśaviparyayāt

हिन्दी अर्थ

अग्निदेव कहते हैं--वसिष्ठ ! वेदान्तशास्त्रमें

English

At the end of twenty-nine, "ga" would be (the measure); "gu" is a single long, by the count of syllables reversed from ten.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 329
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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