Agni Purana· Agni Purāṇa
330
अध्याय 330 / 381

Adhyaya 331

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अध्याय ३३०

श्लोक 1

विषमकथनम् अग्निर् उवाच वृत्तं समञ्चार्धसमं विषमञ्च त्रिधा वदे ।समन्तावत् कृत्वकृतमर्धसमञ्च कारयेत्

viṣamakathanam agnir uvāca vṛttaṃ samañcārdhasamaṃ viṣamañca tridhā vade / samantāvat kṛtvakṛtamardhasamañca kārayet

हिन्दी अर्थ

व्यापक परब्रह्म परमेश्वरको अद्वितीय, चैतन्यस्वरूप और ज्योतिर्मय कहते हैं, उसका सहज (स्वरूपभूत) आनन्द कभी-कभी व्यञ्जित होता है, उस आनन्दकी अभिव्यक्तिका ही “चैतन्य ', “चमत्कार' और 'रस के नामसे वर्णन किया जाता है'। आनन्दका जो प्रथम विकार है, उसे ' अहंकार' कहा गया है। अहंकारसे ' अभिमान'का प्रादुर्भाव हुआ। इस अभिमानमें ही तीनों लोकोंकी समाप्ति हुई है॥ १--३॥

English

Tait. Sam. 1.8.13.1.

अध्याय ३३०

श्लोक 2

विषमञ्चैव वास्यूनमतिवृत्तं समान्यपि ।ग्लौचतुःप्रमाणी स्यादाभ्यामन्यद्वितानकं

viṣamañcaiva vāsyūnamativṛttaṃ samānyapi / glaucatuḥpramāṇī syādābhyāmanyadvitānakaṃ

हिन्दी अर्थ

अभिमानसे रतिकी उत्पत्ति हुई और वह व्यभिचारी आदि भाव-सामान्यके सहकारसे पुष्ट होकर ' श्रुद्धार 'के नामसे गायी जाती है। शृङ्खारके

English

MS. 4.9.11:132.10.

अध्याय ३३०

श्लोक 3

पादस्याद्यन्तु वक्रं स्यात् शनौ न प्रथ्मास्मृतौ ।वाल्यमुश् चतुर्थाद्वर्णात् पथ्या वर्णं युजोयतः

pādasyādyantu vakraṃ syāt śanau na prathmāsmṛtau / vālyamuś caturthādvarṇāt pathyā varṇaṃ yujoyataḥ

हिन्दी अर्थ

हुए हैं'। उनके अपने-अपने विशेष स्थायी भाव होते हैं, जिनका परिपोष (अभिव्यक्ति) ही उन- उन रसोंका लक्षण है वे रस परमात्माके सत्त्वादि गुणोंके विस्तारसे प्रकट होते हैं । अनुरागसे शृङ्गार, तीक्ष्णतासे रौद्र, उत्साहसे वीर और संकोचसे बीभत्स रसका

English

SV. 1.198a.

अध्याय ३३०

श्लोक 4

विपरीतपथ्यान्यासाच्चपला वा युजस्वनः ।विपुलायुग्नसप्तमः सर्वं तस्यैव तस्य च

viparītapathyānyāsāccapalā vā yujasvanaḥ / vipulāyugnasaptamaḥ sarvaṃ tasyaiva tasya ca

हिन्दी अर्थ

उदय होता है। शृङ्गार रससे हास्य, रौद्र रससे करुण रस, वीर रससे अद्भुत रस तथा बीभत्स रससे भयानक रसकी निष्पत्ति होती है। शृङ्गार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स,

English

By the reversed placing of the Pathya, a Chapala, or the even sound; a Vipula with the seventh (foot) even — all of that same and of it;

अध्याय ३३०

श्लोक 5

१ नः पूर्व इति ख॥ २ ह्य् अ तियेकनुरुमिति ञ॥ :प् १९० तौन्तौ वा विपुलानेका चक्रजातिः समीरिता ।भवेत् पदचतुरूद्ध्वं चतुर्वृद्ध्या पदेषु च

1 naḥ pūrva iti kha.. 2 hy a tiyekanurumiti ña.. :p 190 tauntau vā vipulānekā cakrajātiḥ samīritā / bhavet padacaturūddhvaṃ caturvṛddhyā padeṣu ca

हिन्दी अर्थ

अद्भुत और शान्त-ये नौ रस माने गये हैं। वैसे बीभत्स) ही हैं। जैसे बिना त्यागके धनको शोभा नहीं होती, वैसे ही रसहीन वाणीको भी शोभा नहीं होती। अपार काव्यसंसारमें कवि ही प्रजापति है। उसको संसारका जैसा स्वरूप रुचिकर जान

English

or the Vipula in those two; the Chakra class is declared; there would be four feet and above, with increase by four in the feet;

अध्याय ३३०

श्लोक 6

गुरुद्वयान्त आपीडः प्रत्यापीडो गणादिकः ।प्रथमस्य विपर्यासे मञ्जरी लवणी क्रमात्

gurudvayānta āpīḍaḥ pratyāpīḍo gaṇādikaḥ / prathamasya viparyāse mañjarī lavaṇī kramāt

हिन्दी अर्थ

पड़ता है, उसके काव्यमें यह जगत् वैसे ही रूपमें परिवर्तित होता है। यदि कवि शृङ्गाररसका प्रेमी है, तो उसके काव्यमें रसमय जगतका प्राकट्य होता है। यदि कवि भृङ्गारी न हो तो

English

ending with two longs, Apida; Pratyapida, Ganadika; by reversal of the first, Manjari, Lavani in order;

अध्याय ३३०

श्लोक 7

भवेदमृतधाराख्या उद्धताद्युच्यते ऽधुना ।एकतः समजसानःस्युर्न सौ जो गो ऽथ भौनजौ

bhavedamṛtadhārākhyā uddhatādyucyate 'dhunā / ekataḥ samajasānaḥsyurna sau jo go 'tha bhaunajau

हिन्दी अर्थ

निश्चय ही काव्य नीरस होगा। 'रस' भावहीन नहीं है और 'भाव' भी रससे रहित नहीं है; क्योंकि इन भावोंसे रसको भावना (अभिव्यक्ति) होती है। “ भाव्यन्ते रसा एभिः।' (भावित होते हैं रस इनके द्वारा)--इस व्युत्पत्तिके अनुसार वे “भाव' कहे गये हैं?

English

the one called Amritadhara; now Uddhata and the rest are told: on one side Samajasana would be, not "sau jo go", then "bha nau na jau";

अध्याय ३३०

श्लोक 8

नोगो ऽथ सजसा गोगस्तृतीयचरणस्य च ।सौरभे केचनभगा ललितञ्च नमौ जसौ

nogo 'tha sajasā gogastṛtīyacaraṇasya ca / saurabhe kecanabhagā lalitañca namau jasau

हिन्दी अर्थ

१. भरतमुनिने रसनिष्पत्तिपर विचार किया, भावोंका भी विशद विवेचन किया, किंतु रसको ब्रह्मचैतन्यसे अभिन्न नहीं कहा; इस

English

"no go", then "sa ja sa", "go ga" of the third foot; in Saurabha some "na bha ga"; Lalita "na ma jau sa";

अध्याय ३३०

श्लोक 9

उपस्थितं प्रचुपितं प्रथमाद्यं समौ जसौ ।गोगथो मलजा रोगः समो नगरजयाः पदे

upasthitaṃ pracupitaṃ prathamādyaṃ samau jasau / gogatho malajā rogaḥ samo nagarajayāḥ pade

हिन्दी अर्थ

तथा 'रस' नाम दिया है। वेदान्त-सूत्रकार वेदव्यासके समक्ष अवश्य ही 'रसो वै सः ।'--यह औपनिषद वाणी भी रही है। भरतसूत्रके व्याख्याकार आचार्य अभिनवगुप्तपादने, जिनके मतका विशद विवेचन आचार्य मम्मटने अपनी पीयूषवर्षिणी वाणीद्वारा ' काव्यप्रकाश ' में किया है, यह वेदान्तदृष्टि ही अपनायी है, तथा “रसो वै सः' का प्रमाणरूपमें उल्लेख करके चिदावरणभङ्ग' या ' भग्रावरणा चित्'को ही 'रस' माना है । भामहने महाकाव्यके लक्षणमें ' युक्त लोकस्वभावेन रसैश्च सकलैः पृथक् । यों लिखकर रसका योग तो स्वीकार किया है, किंतु रसके भव्य स्वरूपका कोई विवेचन नहीं किया है। अभिनवगुप्त, मम्मट तथा विश्वनाथने भी व्यासद्वारा निर्दिष्ट स्वरूपको ही स्वीकार किया है । ध्वनिवादी या व्यञ्जनावादी सहृदयोंने रसके उक्त महामहिम स्वरूपको ही आदर दिया तथा 'ब्रह्मास्वादसहोदर' कहकर उसकी प्रतिष्ठा बढ़ायी है।

English

Upasthita, Prachupita — the first and so on "sama jau sa"; "go ga" then "ma la ja", Roga; Sama "na ga ra ja yah" in the foot;

अध्याय ३३०

श्लोक 10

वर्धमानं मलौ स्वौ नसौ अथो भोजोव इरिता ।शुद्धविराडार्षभाख्यं वक्ष्ये चार्धसमन्ततः

vardhamānaṃ malau svau nasau atho bhojova iritā / śuddhavirāḍārṣabhākhyaṃ vakṣye cārdhasamantataḥ

हिन्दी अर्थ

२. इस कथनके उपजीव्य हैं-भरतमुनि। उन्होंने शृंगार, रौद्र, वीर और बीभत्स रसोंसे क्रमशः हास्य, करुण, अद्भुत तथा भयानक रसकी उत्पत्ति मानी है। यथा--

English

Vardhamana "ma lau sva na sau"; then Bhoja and the rest are told; I shall tell the pure Virad, called Arshabha, and the half-equal...

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 330
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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