Agni Purana· Agni Purāṇa
336
अध्याय 336 / 381

Adhyaya 337

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अध्याय ३३६

श्लोक 1

नाटकनिरूपणम् अग्निर् उवाच नाटकं सप्रकरणं डिम ईहामृगो ऽपि वा ।ज्ञेयः समवकारश् च भवेत् प्रहसनन्तथा

nāṭakanirūpaṇam agnir uvāca nāṭakaṃ saprakaraṇaṃ ḍima īhāmṛgo 'pi vā / jñeyaḥ samavakāraś ca bhavet prahasanantathā

हिन्दी अर्थ

अथाद्भुतो नाम विस्मयस्थायिभावात्मकः। स च दिव्यजनदर्शनेप्सितमनोरम्भावाप्त्युपवनदेवकुलादिगमनसम्भाव्यमानमायेन्द्रजाल- सम्भावनादिभिर्विभावैरुत्पद्यते। तस्य नयविस्तारानिमेषप्रक्षेपणरोमाञ्चाश्रुस्वेदहर्षसाधुवाददानप्रबन्धहाहाकार बाहुवदनखेलाङ्गुलि-

English

(The hymn) yathd rnTgamati increases the good fortune of women. (The hymn) yena cehadiiarh is advantageous for conception.

अध्याय ३३६

श्लोक 2

व्यायोगभाणवीथ्यङ्कत्रोटकान्यथ नाटिका ।सट्टकं शिल्पकः कर्णा एको दुर्मल्लिका तथा

vyāyogabhāṇavīthyaṅkatroṭakānyatha nāṭikā / saṭṭakaṃ śilpakaḥ karṇā eko durmallikā tathā

हिन्दी अर्थ

यत्त्वतिशयार्थयुक्तं वाक्यं शिल्पं च कर्मरूपं वा । तत्सर्वमद्भुतरसे विभावरूपं साधुवाहैश्च । वेपथुगदृदवचनैः स्पर्शग्रहोत्कहसनैर्हाहाकारैश्च

English

(The hymn) ayarh teyonih is favourable for progeny. (The hymn) iivah Siv&bhi increases good fortune.

अध्याय ३३६

श्लोक 3

प्रस्थानं भाणिका भाणी गोष्ठी हल्लीशकानि च ।काव्यं श्रीगदितं नाट्यरासकं रासकं तथा

prasthānaṃ bhāṇikā bhāṇī goṣṭhī hallīśakāni ca / kāvyaṃ śrīgaditaṃ nāṭyarāsakaṃ rāsakaṃ tathā

हिन्दी अर्थ

७१४ अग्निपुराण वाचक-दोनोंकी योजनाके लिये जो समर्थ हो, और उत्तर) दोनों हों, उसे 'वाकोवाक्य' कहते मनीषीजन उसे 'उक्ति' कहते हैं। युक्तिके विषय हैं। उसके भी दो भेद हैं-ऋजूक्ति' और छः हैं पद, पदार्थ, वाक्य, वाक्यार्थ, प्रकरण और ' वक्रोक्ति'। इनमें पहली जो “ऋजूक्ति' है, वह

English

(The repetition of the hymn) brhospatima paripdtu secures safety on the journey. ( The hymn) munedmi tvd* is said to ward off untimely death.

अध्याय ३३६

श्लोक 4

उल्लाप्यकं प्रेङ्क्षणञ्च सप्तविंशतिरेव तत् ।सामान्यञ्च विशेषश् च लक्षणस्य द्वयी गतिः

ullāpyakaṃ preṅkṣaṇañca saptaviṃśatireva tat / sāmānyañca viśeṣaś ca lakṣaṇasya dvayī gatiḥ

हिन्दी अर्थ

प्रपञ्च। 'गुम्फना' कहते हैं-रचनाचर्याको। वह स्वाभाविक कथनरूपा है। ऋजूक्तिके भी दो भेद 'शब्दार्थक्रमगोचरा', “शब्दानुकारा' तथा ' अर्थानु- हैं--' अप्रश्नपूर्विका’ और ' प्रश्नपूर्विका '। वक्रोक्तिके पूर्व्वार्था' -इन तीन भेदोंसे युक्त है ॥ २६-३१॥ भी दो भेद हैं--' भङ्ग-वक्रोक्ति' और "काकु- जिस वाक्यमें “उक्ति' और 'प्रत्युक्ति' (प्रश्न वक्रोक्ति' इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें "अभिनय और अलकारोंका निरूपण" नामक तीन सौ बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

Could not be traced.

अध्याय ३३६

श्लोक 5

सामान्यं सर्वविषयं शेषः क्वापि प्रवर्तते ।पूर्वरङ्गे निवृत्ते द्वौ देशकालावुभावपि

sāmānyaṃ sarvaviṣayaṃ śeṣaḥ kvāpi pravartate / pūrvaraṅge nivṛtte dvau deśakālāvubhāvapi

हिन्दी अर्थ

शब्दालंकारोंका विवरण

English

Gould not be traced.

अध्याय ३३६

श्लोक 6

रसभावविभावानुभावा अभिनयास् तथा ।अङ्कः स्थितिश् च सामान्यं सर्वत्रैवोपसर्पणात्

rasabhāvavibhāvānubhāvā abhinayās tathā / aṅkaḥ sthitiś ca sāmānyaṃ sarvatraivopasarpaṇāt

हिन्दी अर्थ

अग्निदेव कहते हैं- वसिष्ठ! पद एवं वाक्यमें नीचे उसी वर्गके अक्षर तथा 'र ण म न'-ये वर्णोकी आवृत्तिको 'अनृप्रास'' कहते हैं। वर्ण हस्व स्वरसे अन्तरित होकर प्रयुक्त होते हैं वत्त्यनृप्रासके वर्णसमुदाय दो प्रकारके होते हैं- तथा दो नकारोंका संयोग भी रहा करता है एकवर्ण और अनेकवर्ण'॥ १॥ वर्ग्य वर्णोंकी आवृत्ति पाँचसे अधिक बार

English

AV. 2.28.1a.

अध्याय ३३६

श्लोक 7

विशेषो ऽवसरे वाच्यः सामान्यं पूर्वमुच्यते ।त्रिवर्गसाधनन्नाट्यमित्याहुः करणञ्च यत्

viśeṣo 'vasare vācyaḥ sāmānyaṃ pūrvamucyate / trivargasādhanannāṭyamityāhuḥ karaṇañca yat

हिन्दी अर्थ

एकवर्णगत आवृत्तिसे पाँच वृत्तियाँ निर्मित नहीं करनी चाहिए। महाप्राण (वर्गके दूसरे और होती हैं-मधुरा, ललिता, प्रौढ़ा, भद्रा तथा चौथे अक्षर) और ऊष्मा (श ष स ह) इनके परुषाः॥ २॥ संयोगसे युक्त उत्तरोत्तर लघु अक्षरवाली रचना

English

Tait. Sam. 2.4.5.1a.

अध्याय ३३६

श्लोक 8

इतिकर्तव्यता तस्य पूर्वरङ्गो यथाविधि ।नान्दीमुखानि द्वात्रिंशदङ्गानि पूर्वरङ्गके

itikartavyatā tasya pūrvaraṅgo yathāvidhi / nāndīmukhāni dvātriṃśadaṅgāni pūrvaraṅgake

हिन्दी अर्थ

मधुरावृत्तिकी रचनामें वर्गान्त पञ्चम वर्णके मधुरा“ कही गयी है १. अनृप्रासका लक्षण अग्निदेवने 'स्यादावृत्तिरनृप्रासो वर्णानां पदवाक्ययोः ।'--इस प्रकार कहा है। इसीका आधार लेकर आचार्य मम्मटने लिखा है कि ' सरूपवर्णविन्यासमनृप्रासं प्रचक्षते।' (पूर्वे विद्वांस इति शेषः ।) ' वर्णसाम्यमनृप्रासः ।' (का०प्र० ९। ७९), ' अनृप्रासः शब्दसाम्यम्।' (सा० द० १०। ३)-ये मम्मट और विश्वनाथकथित लक्षण भी उक्त अभिप्रायके ही पोषक हैं।

English

AV. 6.87.3b; 7.94.1a.

अध्याय ३३६

श्लोक 9

देवतानां नमस्कारो गुरूणामपि च स्तुतिः ।गोब्राह्मणनृपादीनामाशीर्वादादि गीयते

devatānāṃ namaskāro gurūṇāmapi ca stutiḥ / gobrāhmaṇanṛpādīnāmāśīrvādādi gīyate

हिन्दी अर्थ

२. 'नाट्यशास्त्र' १६। ४० में भरतने उपमा, दीपक, रूपक और यमक--ये चार ही अलंकार माने हैं। व्यासजीने अनृप्रासका उल्लेख किया है। भामहने अपनेसे पूर्व अनृप्रासकी मान्यता स्वीकार की है। 'वृत्त्यनृप्रास'के अग्निपुराणोक्त लक्षणका भाव लेकर भोजराजने 'सरस्वतीकण्ठाभरण'में इस प्रकार लिखा है--

English

Salutation to gods and praise of teachers, and blessings of cows, Brahmins, kings and the like are sung;

अध्याय ३३६

श्लोक 10

नान्द्यन्ते सूत्रधारो ऽसौ रूपकेषु निबध्यते ।गुरुपूर्वक्रमं वंशप्रशंसा पौरुषं कवेः

nāndyante sūtradhāro 'sau rūpakeṣu nibadhyate / gurupūrvakramaṃ vaṃśapraśaṃsā pauruṣaṃ kaveḥ

हिन्दी अर्थ

मुहुरावर्त्यमानेषु यः स्ववर्ग्येषु वर्तते । काव्यव्यापी स संदर्भो वृत्तिरित्यभिधीयते॥ (२।७८) आचार्य मम्मटने ' एकस्याप्यसकृत्परः '--इस सूत्रभूत वाक्यके द्वारा अग्निपुराणोक्त लक्षणकी ओर ही संकेत किया है। इसी भावको

English

at the end of the Nandi, the stage-manager (sutradhara) is bound in the plays. The order of teachers, praise of lineage, the poet's manhood,

अध्याय ३३६

श्लोक 11

सम्बन्धार्थौ च काव्यस्य पञ्चैतानेष निर्दिशेत् ।नटी विदूषको वापि पारिपार्श्विक एव वा

sambandhārthau ca kāvyasya pañcaitāneṣa nirdiśet / naṭī vidūṣako vāpi pāripārśvika eva vā

हिन्दी अर्थ

कविराज विश्वनाथने निम्नाङ्कित शब्दोंमें विशद किया है--

English

and relation and meaning of the poem — he should declare these five. The actress, jester, or attendant

अध्याय ३३६

श्लोक 12

सहिताः सूत्रधारेण संलापं यत्र कुर्वते ।चित्रैर् वाक्यैः स्वकार्योत्थैः प्रस्तुताक्षेपिभिर्मिथः

sahitāḥ sūtradhāreṇa saṃlāpaṃ yatra kurvate / citrair vākyaiḥ svakāryotthaiḥ prastutākṣepibhirmithaḥ

हिन्दी अर्थ

३. अग्निपुराणमें जहाँ पाँच वृत्तियोंका उल्लेख है, वहीं परवर्ती आलोचकोंने अन्यान्य वृत्तियोंका भी उत्प्रेक्षण किया है। भोजराजने 'वृत्तिके तीन गुण बताये हैं-सौकुमार्य, प्रौढ़ि और मध्यमत्व। साथ ही वृत्तिके बारह भेदोंका उल्लेख किया है, जिनके नाम इस प्रकार हैं-गम्भीरा, ओजस्विनी, प्रौढ़ा, मधुरा, निष्ठुरा, श्लथा, कठोरा, कोमला, मिश्रा, परुषा, ललिता और अमिता। अग्निपुराणकथित पाँचों वृत्तियाँ भी इनके अन्तर्गत हैं। भद्राके स्थानमें कोमला वृत्ति समझनी चाहिए। ४. भोजराजने 'मधुरा वृत्ति' के उदाहरणके रूपमें निम्नाङ्कित श्लोक प्रस्तुत किया है --

English

together with the stage-manager hold a conversation, with various speeches arising from their own business, mutually involving the matter in hand —

अध्याय ३३६

श्लोक 13

आमुखं तत्तु विज्ञेयं बुधैः प्रस्तावनापि सा ।प्रवृत्तकं कथोद्घातः प्रयोगातिशयस् तथा

āmukhaṃ tattu vijñeyaṃ budhaiḥ prastāvanāpi sā / pravṛttakaṃ kathodghātaḥ prayogātiśayas tathā

हिन्दी अर्थ

ललितामें वकार और लकारका अधिक प्रयोग होता है। (वकारसे दन्त्योष्ठय वर्ण और लकारसे दन्त्यवर्ण समझने चाहिए'।) जिसमें ऊर्ध्वगत रेफसे संयुक्त पकार, णकार एवं वर्ग्य

English

that is to be known by the wise as Amukha; it is also the prelude (prastavana). Pravrittaka, Kathodghata and Prayogatishaya;

अध्याय ३३६

श्लोक 14

आमुखस्य त्रयो भेदा वीजांशेषूपजायते ।कालं प्रवृत्तमाश्रित्य सूत्रधृग्यत्र वर्णयेत्

āmukhasya trayo bhedā vījāṃśeṣūpajāyate / kālaṃ pravṛttamāśritya sūtradhṛgyatra varṇayet

हिन्दी अर्थ

वर्ण प्रयुक्त होते हैं, किंतु टवर्ग और पञ्चम वर्ण नहीं रहते, वह “प्रौढा' वृत्ति कही जाती है। जिसमें अवशिष्ट, असंयुक्त, रेफ. णकार आदि कोमल वर्ण प्रयुक्त होते हैं, वह ' भद्रा' अथवा “कोमला वृत्ति मानी जाती है। जिसमें ऊष्मा वर्ण (श ष स ह) विभिन्न अक्षरोंसे संयुक्त होकर प्रयुक्त होते हैं, उसको 'परुषा ” कहते हैं। परुषावृत्तिमें अकारके सिवा अन्य स्वरोंको

English

Amukha has three kinds, arising in the seed-parts; relying on the time begun, the stage-manager would describe...

अध्याय ३३६

श्लोक 15

तदाश्रयश् च पात्रस्य प्रवेशस्तत् प्रवृत्तकं ।सूत्रधारस्य वाक्यं वा यत्र वाक्यार्थमेव वा

tadāśrayaś ca pātrasya praveśastat pravṛttakaṃ / sūtradhārasya vākyaṃ vā yatra vākyārthameva vā

हिन्दी अर्थ

अत्यधिक आवृत्ति होती है। अनुस्वार, विसर्ग निरन्तर प्रयुक्त होनेपर परुषता प्रकट करते हैं। रेफसंयुक्त श, ष, स का प्रयोग, अधिक अकारका प्रयोग, अन्तःस्थ वर्णोका अधिक निवेश तथा

English

Pravrittaka is the entry of a character depending on that, or the stage-manager's speech where it is exactly the meaning of the line;

अध्याय ३३६

श्लोक 16

गृहीत्वा प्रविशेत् पात्रं कथोद्घातः स उच्यते ।प्रयोगेषु प्रयोगन्तु सूत्रधृग्यत्र वर्णयेत्

gṛhītvā praviśet pātraṃ kathodghātaḥ sa ucyate / prayogeṣu prayogantu sūtradhṛgyatra varṇayet

हिन्दी अर्थ

रेफ और अन्तःस्थसे भेदित एवं संयुक्त 'हकार' भी परुषताका कारण होता है। और प्रकारसे भी जो गुरु वर्ण है, वह यदि माधुर्यविरोधी वर्णसे संयुक्त हो, तो परुषता लानेवाला होता है। उस परुष-रचनामें वर्गका आदि अक्षर ही संयुक्त एवं गुरु हो तो श्रेष्ठ माना गया है। पञ्चम वर्ण यदि संयुक्त हो तो परुष-रचनामें उसे प्रशस्त नहीं माना गया है। किसीपर आक्षेप करना हो या

English

having taken it, the character enters — that is called Kathodghata. In applications, where the stage-manager describes an application,

अध्याय ३३६

श्लोक 17

ततश् च प्रविशेत् पात्रं प्रयोगातिशयो हि सः ।शरीरं नाटकादीनामितिवृत्तं प्रचक्षते

tataś ca praviśet pātraṃ prayogātiśayo hi saḥ / śarīraṃ nāṭakādīnāmitivṛttaṃ pracakṣate

हिन्दी अर्थ

किसी कठोर शब्दका अनुकरण करना हो, तो वहाँ “परुषा वृत्ति' भी प्रयोगमें लायी जाती है।

English

and then the character enters, that is Prayogatishaya. The "body" of dramas and the like they call the plot (itivritta);

अध्याय ३३६

श्लोक 18

सिद्धमुत्प्रेक्षितञ्चेति तस्य भेदाबुभौ स्मृतौ ।सिद्धमागमदृष्टञ्च सृष्टमुत्प्रेक्षितं कवेः

siddhamutprekṣitañceti tasya bhedābubhau smṛtau / siddhamāgamadṛṣṭañca sṛṣṭamutprekṣitaṃ kaveḥ

हिन्दी अर्थ

और ऊष्मा अक्षरोंके क्रमशः आवर्तनसे जो वृत्ति होती है, उसके बारह भेद हैं-कर्णाटी, कौन्तली, कौंको, कौंकणी, वाणवासिका, द्राविडी, माथुरी, मात्सी, मागधी, ताम्रलिसिका, औण्ड्री तथा अनेक वर्णोंकी जो आवृत्ति होती है, वह यदि भिन्न-भिन्न अर्थोकी प्रतिपादिका हो, तो उसे “यमक' कहते हैं। यमक दो प्रकारका होता है--

English

its two kinds are remembered as the established and the imagined. The established is seen in tradition; the imagined is created by the poet.

अध्याय ३३६

श्लोक 19

वीजं विन्दुः पताका च प्रकरी कार्यमेव च ।अर्थप्रकृतयः पञ्च पञ्च चेष्टा अपि क्रमात्

vījaṃ vinduḥ patākā ca prakarī kāryameva ca / arthaprakṛtayaḥ pañca pañca ceṣṭā api kramāt

हिन्दी अर्थ

'अव्यपेत' और व्यवधानसे आवृत्त होनेवाला 'व्यपेत' कहा जाता है। स्थान और पादके भेदसे इन दोनोंके दो-दो भेद होनेपर कुल चार भेद हुए। आदि पादके आदि, मध्य और अन्तमें

English

Seed (bija), drop (bindu), banner (pataka), episode (prakari) and the action itself — five elements of the plot, and five efforts in order:

अध्याय ३३६

श्लोक 20

प्रारम्भश् च प्रयत्नश् च प्राप्तिः सद्भाव एव च ।नियता च फलप्राप्तिः फलयोगश् च पञ्चमः

prārambhaś ca prayatnaś ca prāptiḥ sadbhāva eva ca / niyatā ca phalaprāptiḥ phalayogaś ca pañcamaḥ

हिन्दी अर्थ

१. भोजराजने इसमें तालव्य वर्णोका भी समावेश माना है। 'ललिता'का उदाहरण इस प्रकार है-- २. भोजराजके मतसे इसमें प्रायः मूर्धन्य, अन्तःस्थ तथा संयोगपूर्व गुरुवर्णोका प्रयोग होता है। यथा--

English

beginning, effort, attainment, certainty, and the attainment of fruit — union with fruit is the fifth.

अध्याय ३३६

श्लोक 21

मुखं प्रतिमुखं गर्भो विमर्षश् च तथैव च ।तथा निर्वहणञ्चेति क्रमात् पञ्चैव सन्धयः

mukhaṃ pratimukhaṃ garbho vimarṣaś ca tathaiva ca / tathā nirvahaṇañceti kramāt pañcaiva sandhayaḥ

हिन्दी अर्थ

कृत्वा पुंवत्पातमुचैर्भृगुभ्यां मूर्धि ग्राव्णां जर्जरा निर्झरौघाः । कुर्वन्ति द्यामुत्पतन्तं स्मरार्त स्वर्लोकस्त्रीगात्रनिर्वाणमत्र॥

English

Opening (mukha), progression (pratimukha), womb (garbha), reflection (vimarsha) and conclusion (nirvahana) — in order the five junctures.

अध्याय ३३६

श्लोक 22

अल्पमात्रं समुद्दिष्टं बहुधा यत् प्रसर्पति ।फलावसानं यच्चैव वीजं तदभिधीयते

alpamātraṃ samuddiṣṭaṃ bahudhā yat prasarpati / phalāvasānaṃ yaccaiva vījaṃ tadabhidhīyate

हिन्दी अर्थ

३. कोमला या भद्राका उदाहरण-- दारुणरणे रणन्तं करिदारणकारणं कृपाणं ते। रमणकृते रणरणको पश्यति तरुणीजनो दिव्यः ॥ (सर० कं० २। १९७)

English

What is indicated in small measure and spreads in many ways, ending in the fruit, is called the seed.

अध्याय ३३६

श्लोक 23

यत्र वीजसमुत्पत्तिर्नानार्थरससम्भवा ।काव्ये शरीरानुगतं तन्मुखं परिकीर्तितं

yatra vījasamutpattirnānārtharasasambhavā / kāvye śarīrānugataṃ tanmukhaṃ parikīrtitaṃ

हिन्दी अर्थ

५. अग्निपुराणवर्णित इन वृत्तियोंके देश-भेदसे जो बारह भेद हैं, उन्हें भोजराजने ' सरस्वतीकण्ठाभरण ' में ज्यों-का-त्यों ले लिया है और अपनी ओरसे उनके लक्षण तथा उदाहरण प्रस्तुत किये हैं (द्रष्टव्य: २। ७८-८१ कारिकातक) ।

English

Where the origin of the seed arises from various meanings and sentiments, following the body in the poem, that is declared the opening.

अध्याय ३३६

श्लोक 24

इष्टस्यार्थस्य रचना वृत्तान्तस्यानुपक्षयः ।रागप्राप्तिः प्रयोगस्य गुह्यानाञ्चैव गूहनम्

iṣṭasyārthasya racanā vṛttāntasyānupakṣayaḥ / rāgaprāptiḥ prayogasya guhyānāñcaiva gūhanam

हिन्दी अर्थ

६. नाट्यशास्त्र में भरतमुनिने ' शब्दाभ्यासस्तु यमकं पादादिषु विकल्पितम्।' (१।५९) --इस प्रकार 'यमक' का लक्षण किया है। इसीका आशय लेकर व्यासजीने ' अनेकवर्णावृत्तिर्या भिन्नार्थप्रतिपादिका। यमकं साव्यपेतं च व्यपेतं चेति तद् द्विधा ॥'-एऐसा लक्षण किया है। इसीका आश्रय लेकर दण्डीने--' अव्यपेतव्यपेतात्मा याऽऽवृत्तिर्वर्णसंहतेः । यमकं तत् " ॥'--ऐसा लक्षण प्रस्तुत किया है। (काव्यादर्श ३। १) इन्हीं लक्षणोंको आधार बनाकर भोजराजने 'यमक'का लक्षण इस प्रकार किया है-- विभिन्नार्थैकरूपाया याऽऽवृत्तिर्वर्णसंहतेः । अव्यपेतव्यपेतात्मा यमकं तन्निगद्यते ॥ (२। ५८)

English

Arrangement of the desired matter, non-diminution of the account, attainment of passion in the performance and concealing of secrets,

अध्याय ३३६

श्लोक 25

आश् चर्यवदभिख्यातं प्रकाशानां प्रकाशनम् ।अङ्गहीनं नरो यद्वन्न श्रेष्ठं काव्यमेव च

āś caryavadabhikhyātaṃ prakāśānāṃ prakāśanam / aṅgahīnaṃ naro yadvanna śreṣṭhaṃ kāvyameva ca

हिन्दी अर्थ

७१६ अग्निपुराण

English

described as wonderful, revelation of the revealed. As a man without limbs, so a poem is not excellent.

अध्याय ३३६

श्लोक 26

देशकालौ विना किञ्चिन्नेतिवृत्तं प्रवर्तते ।अतस्तयोरुपादाननियमात् पदमुच्यते

deśakālau vinā kiñcinnetivṛttaṃ pravartate / atastayorupādānaniyamāt padamucyate

हिन्दी अर्थ

एक, दो और तीन वर्णोंकी पर्यायसे आवृत्ति यमक, आम्रेडित यमक, चतुर्व्यवसित यमक होनेपर कुल सात भेद होते हैं। यदि सात पादोंमें तथा माला: यमक। इनके भी अन्य अनेक भेद! उत्तरोत्तर पाद एक, दो और तीन पदोंसे आरम्भ होते हैं॥ ११--१७॥ हो तो अन्तिम पाद छः प्रकारका हो जाता है। सहदयजन भिन्नार्थवाची पदकी आवृत्तिको तीसरा पाद पादके आदि, मध्य और अन्तमें 'स्वतन्त्र' एवं ' अस्वतन्त्रः पदके आवर्त्तनसे दो आवृत्ति होनेसे तीन प्रकारका होता है। श्रेष्ठ प्रकारकी मानते हैं। दो आवृत्त पदोंका समास यमकके निम्नलिखित दस भेद होते हैं-पादान्त होनेपर ' समस्ता' और उनके समासरहित रहनेपर

English

Without place and time no plot proceeds; therefore by the rule of taking those two the point is stated.

अध्याय ३३६

श्लोक 27

देशेषु भारतं वर्षं काले कृतयुगत्रयं ।नर्ते ताभ्यां प्राणभृतां सुखदुःखोदयः क्वचित् ।सर्गे सर्गादिवार्ता च प्रसज्जन्ती न दुष्यति

deśeṣu bhārataṃ varṣaṃ kāle kṛtayugatrayaṃ / narte tābhyāṃ prāṇabhṛtāṃ sukhaduḥkhodayaḥ kvacit / sarge sargādivārtā ca prasajjantī na duṣyati

हिन्दी अर्थ

यमक, काञ्जी यमक, समुद्ग यमक, विक्रान्त्य 'व्यस्ता' आवृत्ति कही जाती है। एक पादमें यमक, वक्रवाल यमक, संदष्ट यमक, पादादि विग्रह होनेसे असमासत्वप्रयुक्त ' व्यस्ता’ जानी

English

Of places, the land of Bharata; of times, the three ages beginning with Krita; without these two, the rise of happiness and sorrow of beings in places is nowhere. In a canto, news from the beginning of a canto, if brought in, is not a fault.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 336
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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