अध्याय ३३७
श्लोक 1
शृङ्गारादिरसनिरूपणम् अग्निर् उवाच अक्षरं परमं ब्रह्म सनातनमजं विभुं ।वेदान्तेषु वदन्त्येकं चैतन्यं ज्योतिरीश्वरम्
śṛṅgārādirasanirūpaṇam agnir uvāca akṣaraṃ paramaṃ brahma sanātanamajaṃ vibhuṃ / vedānteṣu vadantyekaṃ caitanyaṃ jyotirīśvaram
हिन्दी अर्थ
१. यमकके जो पादान्त यमक' आदि दस भेद निरूपित हुए हैं, वे ' नाट्यशास्त्र' अध्याय १६, श्लोक ६०-६२ तक ज्यों-के- त्यों उपलब्ध होते हैं तथा श्लोक ६३ से ८६ तक इन सबके लक्षण और उदाहरण भी दिये गये हैं। उन सबको वहीं देखना चाहिए। केवल एक 'पादान्त-यमक' का लक्षण और उदाहरण यहाँ दिग्दर्शनमात्रके लिये दिया जाता है। जहाँ चारों पादोंके अन्तमें एक समान अक्षर प्रयुक्त होते हैं, उसे पादान्त-यमक' जानना चाहिए। जैसे-निम्नाङ्कित श्लोके चारों पादोंके अन्तमें “मण्डल '--इन तीन अक्षरोंकी समानरूपसे आवृत्ति हुई है-
English
Gould not be traced.