Agni Purana· Agni Purāṇa
337
अध्याय 337 / 381

Adhyaya 338

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अध्याय ३३७

श्लोक 1

शृङ्गारादिरसनिरूपणम् अग्निर् उवाच अक्षरं परमं ब्रह्म सनातनमजं विभुं ।वेदान्तेषु वदन्त्येकं चैतन्यं ज्योतिरीश्वरम्

śṛṅgārādirasanirūpaṇam agnir uvāca akṣaraṃ paramaṃ brahma sanātanamajaṃ vibhuṃ / vedānteṣu vadantyekaṃ caitanyaṃ jyotirīśvaram

हिन्दी अर्थ

१. यमकके जो पादान्त यमक' आदि दस भेद निरूपित हुए हैं, वे ' नाट्यशास्त्र' अध्याय १६, श्लोक ६०-६२ तक ज्यों-के- त्यों उपलब्ध होते हैं तथा श्लोक ६३ से ८६ तक इन सबके लक्षण और उदाहरण भी दिये गये हैं। उन सबको वहीं देखना चाहिए। केवल एक 'पादान्त-यमक' का लक्षण और उदाहरण यहाँ दिग्दर्शनमात्रके लिये दिया जाता है। जहाँ चारों पादोंके अन्तमें एक समान अक्षर प्रयुक्त होते हैं, उसे पादान्त-यमक' जानना चाहिए। जैसे-निम्नाङ्कित श्लोके चारों पादोंके अन्तमें “मण्डल '--इन तीन अक्षरोंकी समानरूपसे आवृत्ति हुई है-

English

Gould not be traced.

अध्याय ३३७

श्लोक 2

आनन्दः सहजस्तस्य व्यज्यते स कदाचन ।व्यक्तिः सा तस्य चैतन्यचमत्काररसाह्वया

ānandaḥ sahajastasya vyajyate sa kadācana / vyaktiḥ sā tasya caitanyacamatkārarasāhvayā

हिन्दी अर्थ

आचार्य भामहने यमकके पाँच ही भेद दिये हैं -आदि यमक, मध्यान्त यमक, पादाभ्यास, आवली और समस्तपाद यमक (द्रष्टव्य भामह ' काव्यालं० ' द्वितीय परिच्छेद) । आचार्य वामने पाद-यमक', एक पादके आदिमध्यान्त्य यमक, दो पादोंके आदिमध्यान्त्य यमक, एकान्तर पादान्त यमक, एकान्तर पादादि मध्य यमक, द्विविध अक्षर यमक, त्रिविध भृङ्गमार्ग-शृङ्कुला, परिवर्तक और चूर्ण आदि भेद माने हैं।

English

Bliss is innate in him; it is sometimes manifested. That manifestation of his is called the sentiment (rasa) of the wonder of consciousness.

अध्याय ३३७

श्लोक 3

आद्यस्तस्य विकारो यः सो ऽहङ्कार इति स्मृतः ।ततो ऽभिमानस्तत्रेदं समाप्तं भुवनत्रयं

ādyastasya vikāro yaḥ so 'haṅkāra iti smṛtaḥ / tato 'bhimānastatredaṃ samāptaṃ bhuvanatrayaṃ

हिन्दी अर्थ

२. 'सरस्वतीकण्ठाभरण' के रचयिता भोजराजने अग्निपुराणके इसी प्रसङ्गमें अपनी सुस्पष्ट वाणीद्वारा इस प्रकार कहा है- विभिन्नार्थैकरूपाया याऽऽवृत्तिर्वर्णसंहतेः । अव्यपेतव्यपेतात्मा यमकं तन्निगद्यते॥ चतुस्त्रद्ठेकपादेषु यमकानां विकल्पनाः । आदिमध्यान्तमध्यान्तमध्याद्यन्ताश्च॒सर्वतः॥ अत्यन्तबहवस्तेषां भेदाः सम्भेदयोनयः । सुकरा दुष्कराश्चैव दृश्यन्ते तत्र केचन॥

English

The first modification of it is remembered as ego (ahankara); from that arises self-conceit, wherein this triple world ends.

अध्याय ३३७

श्लोक 4

अभिमानाद्रतिः सा च परिपोषमुपेयुषी ।व्यभिचार्यादिसामान्यात् शृङ्गार इति गीयते

abhimānādratiḥ sā ca paripoṣamupeyuṣī / vyabhicāryādisāmānyāt śṛṅgāra iti gīyate

हिन्दी अर्थ

उपर्युक्त श्लोकोंके अनुसार यमकोंके भेद इस प्रकार बनते हैँ-- स्थानयमक' और ' अस्थानयमक'। स्थानयमकोंमें चतुष्पाद यमक, त्रिपाद यमक, द्विपाद यमक और एकपाद यमक होते हैं। चतुष्पाद यमकोंमें अव्यपेत आदि यमक, अव्यपेत मध्य यमक, अव्यपेत अन्त्य यमक, आदिमध्य यमक, आद्यन्त यमक, मध्यान्त यमक तथा आदिमध्यान्त यमक। त्रिपाद यमकोंमें अव्यपेत आदि यमक, अव्यपेत मध्य यमक, अव्यपेत अन्त्य यमक, मध्य यमक, अन्त्य यमक। द्विपाद यमकोंमें अव्यपेत आदि यमक, अव्यपेत मध्य

English

From conceit arises love, which, attaining fullness, by commonality with transient feelings and the like is sung as the erotic (shringara).

अध्याय ३३७

श्लोक 5

तद्भेदाः काममितरे हास्याद्या अप्यनेकशः ।स्वस्वस्थादिविशेषोत्थपरिघोषस्वलक्षणाः

tadbhedāḥ kāmamitare hāsyādyā apyanekaśaḥ / svasvasthādiviśeṣotthaparighoṣasvalakṣaṇāḥ

हिन्दी अर्थ

यमक, अन्त्य यमक, आदिमध्य यमक इत्यादि। एकपाद यमकोंमें अव्यपेत आदि यमक, अव्यपेत अन्त्य यमक, मध्य यमक। इसी प्रकार सकृत् आवृत्ति और असकृत् आवृत्तिमें भी अव्यपेत यमक होता है। ' अव्यपेत'का अर्थ है-अव्यवहित और 'व्यपेत' का अर्थ है--व्यवधानयुक्त। आवृत्तिकी एकरूपता और अधिकतामें भी अव्यपेत आदि, मध्यादि यमक होने सम्भव हैं। व्यपेत आदि यमक, मध्य यमक, अन्त्य यमक, आदिमध्य यमक, मध्यान्त्य यमक और आदिमध्यान्त्य यमक-ये चतुष्पाद यमकोंमें होते हैं । त्रिपाद और द्विपाद यमकोंमें भी व्यपेत आदि यमक, मध्य यमक और अन्त्य यमक होते हैं। आवृत्तिकी अधिकतामें भी आदि, मध्य यमकके व्यपेतरूप देखे जाते हैं। इसी तरह आवृत्तिकी एकरूपतामें भी आदि, मध्य तथा मध्यान्त्य यमक कविजनोंकी रचनाओंमें उपलब्ध हैं । इन सबमें आवृत्ति व्यवहित होती है, इसलिये इनको 'व्यपेत यमक' कहा जाता है। जहाँ आदि, मध्य और अन्तका नियम न हो, ऐसे यमकोंको ' अस्थानयमक' कहते हैं । इनके भी व्यपेत और अव्यपेत आदि बहुत-से स्थूल-सूक्ष्म भेद हैं। इन सबका विस्तार ' सरस्वतीकण्ठाभरण',

English

Its divisions are the other sentiments, love, the comic and the rest, in many ways, with marks of sounds arising from special states of self and the like;

अध्याय ३३७

श्लोक 6

सत्त्वादिगुणसन्तानाज्जायन्ते परमात्मनः ।रागाद्भवति शृङ्गारो रौद्रस्तैक्ष्णात् प्रजायते

sattvādiguṇasantānājjāyante paramātmanaḥ / rāgādbhavati śṛṅgāro raudrastaikṣṇāt prajāyate

हिन्दी अर्थ

द्वितीय परिच्छेदमें देखना चाहिए।

English

they arise from the continuum of qualities such as sattva from the Supreme Self. From passion arises the erotic; the furious from sharpness.

अध्याय ३३७

श्लोक 7

वीरो ऽवष्टम्भजः सङ्कोचभूर्वीभत्स इष्यते ।शृङ्गाराज्ज्यायते हासो रौद्रात्तु करुणो रसः

vīro 'vaṣṭambhajaḥ saṅkocabhūrvībhatsa iṣyate / śṛṅgārājjyāyate hāso raudrāttu karuṇo rasaḥ

हिन्दी अर्थ

जाती है। यथासम्भव वाक्यको भी आवृत्ति इस प्रकार होती है। अनृप्रास, यमक आदि अलंकार लघु होनेपर भी इस प्रकार सुधीजनोंद्वारा सम्मानित होते हैं। आवृत्ति पदकी हो या वाक्य आदिकी, जिस किसी आवृत्तिसे भी जो वर्णसमूह “समान' अनुभवमें आता है, उस आवृत्तरूपको आदिमें रखकर जो सानृप्रास पदरचना को जाती है, वह सहृदयजनोंको रसास्वाद करानेवाली

English

AV. 3.20.1a.

अध्याय ३३७

श्लोक 8

वीराच्चाद्भुतनिष्पत्तिः स्याद्वीभत्साद्भयानकः ।शृङ्गारहास्यकरुणा रौद्रवीरभयानकाः

vīrāccādbhutaniṣpattiḥ syādvībhatsādbhayānakaḥ / śṛṅgārahāsyakaruṇā raudravīrabhayānakāḥ

हिन्दी अर्थ

होती है। सहदयजनोंको गोष्ठीमें जिस वाग्बन्ध (पदरचना)-को कौतूहलपूर्वक पढ़ा और सुना जाता है, उसे “चित्र कहते हैं

English

RV. 1.187.3b.

अध्याय ३३७

श्लोक 9

वीभत्साद्भुतशान्ताख्याः स्वभावाच्चतुरो रसाः ।लक्ष्मीरिव विना त्यागान्न वाणी भाति नीरसा

vībhatsādbhutaśāntākhyāḥ svabhāvāccaturo rasāḥ / lakṣmīriva vinā tyāgānna vāṇī bhāti nīrasā

हिन्दी अर्थ

इनके मुख्य सात भेद होते हैं-प्रश्न, प्रहेलिका, जिसमें समानान्तरविन्यासपूर्वक उत्तर दिया जाय, वह 'प्रश्न' कहा जाता है और वह ' एकपृष्टोत्तर' और 'द्वपृष्टोत्तर'के भेदसे दो प्रकारका होता है। 'एकपृष्ट'के भी दो भेद हैं-'समस्त' और

English

AV. 7.51.1a.

अध्याय ३३७

श्लोक 10

अपारे काव्यसंसारे कविरेव प्रजापतिः ।यथा वै रोचते विश्वं तथेदं परिवर्तते

apāre kāvyasaṃsāre kavireva prajāpatiḥ / yathā vai rocate viśvaṃ tathedaṃ parivartate

हिन्दी अर्थ

' व्यस्त'। जिसमें दोनों अर्थोके वाचक शब्द गूढ रहते हैं, उसे प्रहेलिका' कहते हैं । वह प्रहेलिका 'आर्थी' और 'शाब्दी'के भेदसे दो प्रकारको होती है। अर्थबोधके सम्बन्धसे 'आर्थी' कही

English

AV. 3.11.1a.

अध्याय ३३७

श्लोक 11

शृङ्गारी चेत् कविः काव्ये जातं रसमयं जगत् ।स चेत् कविर्वीतरागो नीरसं व्यक्तमेव तत्

śṛṅgārī cet kaviḥ kāvye jātaṃ rasamayaṃ jagat / sa cet kavirvītarāgo nīrasaṃ vyaktameva tat

हिन्दी अर्थ

जाती है। शब्दबोधके सम्बन्धसे उसको 'शाब्दी' कहते हैं। इस प्रकार प्रहेलिकाके छः भेद बताये गये! हैं। वाक्याङ्गके गुप्त होनेपर भी सम्भाव्य अपारमार्थिक अर्थ जिसके अङ्गमें आकाइ्क्षासे युक्त स्थित रहता है, वह “गुप्त कही जाती है। इसीको 'गूढ़' भी कहते हैं। जिसमें वाक्याङ्गकी विकलतासे अर्थान्तरकी प्रतीति विकलित अङ्गम साकाङ्क्ष रहती है, वह 'च्युताक्षरा' कही जाती

English

One who masters the atharvaHrjas becomes free from all sins. I have described to you some procedures relating to some important hymns.

अध्याय ३३७

श्लोक 12

न भावहीनो ऽस्ति रसो न भावो रसवर्जितः ।भावयन्ति रसानेभिर्भाव्यन्ते च रसा इति

na bhāvahīno 'sti raso na bhāvo rasavarjitaḥ / bhāvayanti rasānebhirbhāvyante ca rasā iti

हिन्दी अर्थ

है। वह चार प्रकारकी होती है-स्वर, व्यञ्जन, बिन्दु और विसर्गकी च्युतिके भेदसे। जिसमें वाक्याङ्गके विकल अंशको पूर्ण कर देनेपर भी द्वितीय अर्थ प्रतीत होता है, उसको 'दत्ताक्षरा'

English

The first material for oblations is the twigs of trees suitable for such rites. O Bhargava! Clarified butter, rice, white mustard, unbroken rice, sesamum, curd, milk, darbha (grass), durvd (grass), bilva (leaves) and lotuses are always said to be the materials that promote peace and prosperity.

अध्याय ३३७

श्लोक 13

स्थायिनो ऽष्टौ रतिमुखाः स्तम्भाद्या व्यभिचारिणः ।मनो ऽनुकूले ऽनुभवः सुखस्य रतिरिष्यते

sthāyino 'ṣṭau ratimukhāḥ stambhādyā vyabhicāriṇaḥ / mano 'nukūle 'nubhavaḥ sukhasya ratiriṣyate

हिन्दी अर्थ

कहते हैं। उसके भी स्वर आदिके कारण पूर्ववत् भेद होते हैं। जिसमें लुप्तवर्णके स्थानपर अक्षरान्तरके रखनेपर भी अर्थान्तरका आभास होता है, वह 'च्युतदत्ताक्षरा' कही जाती है। जो किसी पद्यांशसे निर्मित और किसी पद्यसे सम्बद्ध हो, वह 'समस्या' कही जाती है। 'समस्या' दूसरेकी रचना होती है, उसकी पूर्ति अपनी कृति है। इस प्रकार अपनी तथा दूसरेकी कृतियोंके सांकर्यसे

English

The four hymns rathevaksefu vrabhc? in the Tajur {Veda) (are said to confer) fortune. The Sdma hymns srdoanttyeakP is the irisUkta in the Samaveda.

अध्याय ३३७

श्लोक 14

हर्षादिभिश् च मनसो विकाशो हास उच्यते ।चित्रादिदर्शनाच्चेतोवैक्लव्यं ब्रुवते भयम्

harṣādibhiś ca manaso vikāśo hāsa ucyate / citrādidarśanāccetovaiklavyaṃ bruvate bhayam

हिन्दी अर्थ

'समस्या' पूर्ण होती है। पूर्वोक्त 'चित्रकाव्य' अत्यन्त क्लेशसाध्य होता है एवं दुष्कर होनेके कारण वह कविको कवित्व-शक्तिका सूचक होता है। यह नीरस होनेपर भी सहदयोंके लिये

English

In the same way, (the hymn) Sriyarh dhdtarmayi dhehi in the Atharvaveda is said (to be conferring fortune). One who repeats the irisUkta with devotion and offers pblation gets fortune.

अध्याय ३३७

श्लोक 15

जुगुप्सा च पदार्थानां निन्दा दौर्भाग्यवाहिनां ।विस्मयो ऽतिशयेनार्थदर्शनाच्चित्तविस्तृतिः

jugupsā ca padārthānāṃ nindā daurbhāgyavāhināṃ / vismayo 'tiśayenārthadarśanāccittavistṛtiḥ

हिन्दी अर्थ

महोत्सवके समान होता है। यह नियम, विदर्भ और बन्धके भेदसे तीन प्रकारका होता है। रमणीय कविताके रचयिता कविको प्रतिज्ञाको “नियम' कहते हैं। नियम भी स्थान, स्वर और व्यञ्जनके अनुबन्धसे तीन प्रकारका होता है।

English

One will get fortune by oflfering oblations of lotuses, biloa (leaves), clarified butter and sesamum. The puruasUktcfi is the same for each one of the Vedas, It gives everything.

अध्याय ३३७

श्लोक 16

अष्टौ स्तम्भादयः सत्त्वाद्रजसस्तमसः परम् ।स्तम्भश्चेष्टाप्रतीघातो भयरागाद्युपाहितः(१)

aṣṭau stambhādayaḥ sattvādrajasastamasaḥ param / stambhaśceṣṭāpratīghāto bhayarāgādyupāhitaḥ(1)

हिन्दी अर्थ

१. चित्रके छः भेद हैं-वर्ण, स्थान, स्वर, आकार, गति और बन्ध। वर्णचित्रके चतुर्व्यञ्जन, त्रिव्यञ्जन, द्विव्यञ्जन, एकव्यञ्जन,

English

The Atharvaa hymns.

अध्याय ३३७

श्लोक 17

श्रमरागाद्युपेतान्तःक्षोभजन्म वपुर्जलं ।स्वेदो हर्षादिभिर्देहोच्छासो ऽन्तःपुलकोद्गमः

śramarāgādyupetāntaḥkṣobhajanma vapurjalaṃ / svedo harṣādibhirdehocchāso 'ntaḥpulakodgamaḥ

हिन्दी अर्थ

क्रमस्थसर्वव्यञ्जन, छन्दोऽक्षरव्यञ्जन, षङ्जादिस्वरव्यञ्जन, मुरजाक्षर व्यञ्जन । चतुःस्थान चित्रोंमें निष्कण्ठ्य, निस्तालव्य, निर्दन्त्य, निरोष्ट्य, निर्मूर्धन्य । चतुःस्वराँमें दीर्घस्वर, प्रतिव्यञ्जनविन्यस्त स्वर, अपास्तसमस्तस्वर। आकार-चित्रोमें अष्टदल कमल, चतुर्दल कमल, षोडशदल कमल, चक्र, चतुरङ्क । गतिचित्रोमें गतप्रत्यागत, तुरङ्गपद, अर्द्धभ्रम, श्लोकाद्धभ्रम, सर्वतोभद्र । बन्धचित्रोंमें द्विचतुष्कचक्रबन्ध, द्विशृङ्गारबन्धक, विविडितबन्ध, षड्यन्त्रबन्ध, व्योमबन्ध, गोमूत्रिकाबन्ध, मुरजबन्ध, एकाक्षर मुरजबन्ध, मुरजप्रस्तार, पादगोमूत्रिका, अयुग्मपादगोमूत्रिका, युग्मपादगोमूत्रिका, श्लोकगोमूत्रिका, विपरीतगोमूत्रिका, भिन्नछन्दोगोमूत्रिका, संस्कृतप्राकृतगोमूत्रिका, अर्धमूत्रिकाप्रस्तार, गोमूत्रिकाधेनु, शतधेनु, सहस्रधेनु, अयुतधेनु, लक्षधेनु, कोटिधेनु, कामधेनु इत्यादि परिगणित चित्रोंके अतिरिक्त भी अनेक बन्ध होते हैं, जैसे-शरबन्ध, धनुर्बन्ध, मुसलबन्ध, खद्गबन्ध, क्षुरिकाबन्ध आदि। इनके अतिरिक्त भी अनेकानेक बन्ध विद्वानोंद्वारा ऊहनीय हैं। चित्रकाव्योंकी चर्चा

English

RV. Kh. 5.87.1a.

अध्याय ३३७

श्लोक 18

हर्षादिजन्मवाक्सङ्गः स्वरभेदो भयादिभिः ।मनोवैक्लव्यमिच्छन्ति शोकमिष्टक्षयादिभिः

harṣādijanmavāksaṅgaḥ svarabhedo bhayādibhiḥ / manovaiklavyamicchanti śokamiṣṭakṣayādibhiḥ

हिन्दी अर्थ

दण्डीके ' काव्यादर्श ' में भी मिलती है और भोजराजने ' सरस्वतीकण्ठाभरण ' में उनका विस्तारपूर्वक विवेचन किया है। २. भोजराजके मतमें 'प्रहेलिका'के छः भेद यों होते हैं-च्युताक्षरा, दत्ताक्षरा, च्युतदत्ताक्षरा, अक्षरमुष्टिका, विन्दुमोती तथा अर्थवती।

English

From joy and the like arises stammering of speech; voice-change from fear and the like. They hold mind-disturbance and grief from loss of the desired and the like;

अध्याय ३३७

श्लोक 19

क्रोधस्तैक्ष्णप्रबोधश् च प्रतिकूलानुकारिणि ।पुरुषार्थसमाप्त्यार्थो यः स उत्साह उच्यते

krodhastaikṣṇaprabodhaś ca pratikūlānukāriṇi / puruṣārthasamāptyārtho yaḥ sa utsāha ucyate

हिन्दी अर्थ

काव्यमें प्रातिलोम्य और आनुलोम्यसे विकल्पना होती है। 'प्रातिलोम्य' और ' आनुलोम्य' शब्द और अर्थके द्वारा भी होता है। विविध वृत्तोंके वर्णविन्यासके द्वारा उन-उन प्रसिद्ध वस्तुओंके चित्रकर्मादिकी कल्पनाको 'बन्ध' कहते हैं। बन्धके निम्नाङ्कित आठ भेद माने जाते हैं- गोमूत्रिका, अद्धभ्रमक, सर्वतोभद्र, कमल, चक्र, चक्राब्जक, दण्ड और मुरज। जिसमें श्लोकके

English

anger is sharp awakening toward the hostile imitator; what is for completing human aims is called energy (utsaha).

अध्याय ३३७

श्लोक 20

चित्तक्षोभभवोत्तम्भो वेपथुः परिकीर्तितः ।वैवर्ण्यञ्च विषादादिजन्मा कान्तिविपर्ययः

cittakṣobhabhavottambho vepathuḥ parikīrtitaḥ / vaivarṇyañca viṣādādijanmā kāntiviparyayaḥ

हिन्दी अर्थ

दोनों-दोनों अर्द्धभागों तथा प्रत्येक पादमें एक- एक अक्षरके व्यवधानसे अक्षरसाम्य प्रयुक्त हो, उसको 'गोमूत्रिका-बन्ध' कहते हैं । ' गोमूत्रिका- बन्ध'के दो भेद कहे जाते हैं--' पूर्वा गोमूत्रिका'

English

Shaking from agitation of mind is declared trembling; discoloration, from despair and the like, is the reversal of luster;

अध्याय ३३७

श्लोक 21

दुःखानन्दादिजन्नेत्रजलमश्रु च विश्रुतम् ।इन्द्रयाणामस्तमयः प्रलयो लङ्घनादिभिः

duḥkhānandādijannetrajalamaśru ca viśrutam / indrayāṇāmastamayaḥ pralayo laṅghanādibhiḥ

हिन्दी अर्थ

जिसको कुछ काव्यवेत्ता ' अश्वपदा' भी कहते हैं, वह प्रति अरद्धभागमें एक-एक अक्षरके बाद अक्षरसाम्यसे युक्त होती है। ' अन्त्या गोमूत्रिका' जिसको 'धेनुजालबन्ध' भी कहते हैं, वह प्रत्येक पदमें एक-एक अक्षरके अन्तरे अक्षरसाम्यसमन्वित होती है

English

water in the eyes from sorrow, joy and the like is famed as tears; setting of the senses, dissolution, from transgression and the like;

अध्याय ३३७

श्लोक 22

वैराग्यादिर्मनःखेदो निर्वेद इति कथ्यते ।मनःपीडादिजन्मा च सादो ग्लानिः शरीरगा

vairāgyādirmanaḥkhedo nirveda iti kathyate / manaḥpīḍādijanmā ca sādo glāniḥ śarīragā

हिन्दी अर्थ

पूर्वी ( अशवपदा ) मोमत्रिकानन्ध

English

mind's weariness from detachment and the like is called despondency (nirveda); dejection arisen from mental pain and the like, exhaustion in the body;

अध्याय ३३७

श्लोक 23

शङ्कानिष्टागमोत्प्रेक्षा स्यादसूया च मत्सरः ।मदिराद्युपयोगोत्थं मनःसंमोहनं मदः

śaṅkāniṣṭāgamotprekṣā syādasūyā ca matsaraḥ / madirādyupayogotthaṃ manaḥsaṃmohanaṃ madaḥ

हिन्दी अर्थ

00000000000000 । से विक सदुध्यानं साथ ने प्य बिणा दिसिः ४ अन्त्या (धेनुजाल ) गोखजिका बन्‍थ हु

English

apprehension is anticipation of coming evil; envy and jealousy; bewilderment of mind from use of intoxicants and the like is intoxication;

अध्याय ३३७

श्लोक 24

क्रियातिशयजन्मान्तःशरीरोत्थक्लमः श्रमः ।शृङ्गारादिक्रियाद्वेषश्चित्तस्यालस्यमुच्यते

kriyātiśayajanmāntaḥśarīrotthaklamaḥ śramaḥ / śṛṅgārādikriyādveṣaścittasyālasyamucyate

हिन्दी अर्थ

गोमूत्रिका-बन्धके पूर्वोक्त दोनों भेदोंका क्रमशः अरद्धभागों और अद्धपादोंसे विन्यास करना चाहिए

English

fatigue arising from excessive action, a weariness within the body; aversion to action such as love is called laziness of mind;

अध्याय ३३७

श्लोक 25

१ भयरागाद्युपस्थित इति ख॥ :प् २०७ दैन्यं सत्त्वादपभ्रंशश्चिन्तार्थपरिभावनं ।इतिकर्तव्यतोपायाद्रशनं मोह उच्यते

1 bhayarāgādyupasthita iti kha.. :p 207 dainyaṃ sattvādapabhraṃśaścintārthaparibhāvanaṃ / itikartavyatopāyādraśanaṃ moha ucyate

हिन्दी अर्थ

यहाँ क्रमशः नीचे-नीचे विन्यस्त वर्णोका, नीचे-नीचे स्थित वर्णोंका जबतक चतुर्थ पाद पूर्ण न हो जाय, तबतक नयन करे। चतुर्थ पाद पूर्ण हो जानेपर प्रतिलोमक्रमसे अक्षरोंको पादार्ध- पर्यन्त ऊपर ले जाय। इस तरह तीन प्रकारका 'सर्वतोभद्र-मण्डल' बनता है। कमलबन्धके तीन प्रकार हैं-चतुर्दल, अष्टदल और षोडशदल। चतुर्दल कमलको इस प्रकारसे आबद्ध किया

English

wretchedness is fall from sattva; anxiety is consideration of an object; failure to see the means of what is to be done is called delusion;

अध्याय ३३७

श्लोक 26

स्मृतिः स्यादनुभूतस्य वस्तुनः प्रतिविम्बनं ।मतिरर्थपरिच्छेदस्तत्त्वज्ञानोपनायितः

smṛtiḥ syādanubhūtasya vastunaḥ prativimbanaṃ / matirarthaparicchedastattvajñānopanāyitaḥ

हिन्दी अर्थ

जाता है-प्रथम पादके ऊपरी तीन पदोंवाले अक्षर सभी पादोंके अन्तमें रखे जाते हैं। पूर्वपादके अन्तिम वर्णको पिछले पादके आदिमें प्रातिलोम्यक्रमसे रखा जाय। अन्तिम पादके

English

memory is reflection of an object experienced; judgment is determination of an object, brought by knowledge of truth;

अध्याय ३३७

श्लोक 27

व्रीडानुरागादिभवः सङ्कोचः कोपि चेतसः ।भवेच्चपलातास्थैर्यं हर्षश्चित्तप्रसन्नता

vrīḍānurāgādibhavaḥ saṅkocaḥ kopi cetasaḥ / bhaveccapalātāsthairyaṃ harṣaścittaprasannatā

हिन्दी अर्थ

अन्तिम दो अक्षरोंको प्रथम पादके आदिमं निविष्ट किया जाय। यह स्थिति चतुर्दल कमलमें होती है। अष्टदल कमलमें अन्त्य पादके अन्तिम तीन अक्षरोंको प्रथम पादके आदिमें विन्यस्त किया जाता है। षोडशदल कमलमें दो अक्षरोंके बीचमें कर्णिका-मध्यवर्ती एक अक्षरका उच्चारण होता है। कर्णिकाके अन्तमें ऊपर पत्राकार अक्षरोंकी पङ्कि लिखे और उसे कर्णिकामें प्रविष्ट

English

shyness arisen from modesty, love and the like, a certain contraction of the mind; fickleness is instability; joy is clarity of mind;

अध्याय ३३७

श्लोक 28

आवेशश् च प्रतीकारः शयो वैधुर्यमात्मनः ।कर्तव्ये प्रतिभाभ्रंशो जडतेत्यभिधीयते

āveśaś ca pratīkāraḥ śayo vaidhuryamātmanaḥ / kartavye pratibhābhraṃśo jaḍatetyabhidhīyate

हिन्दी अर्थ

कराये। यह बात चतुर्दल कमलके विषयमें कही गयी है। कर्णिकामें एक अक्षर लिखे और दिशाओं तथा विदिशाओंमें दो-दो अक्षर लिखे; प्रवेश और निर्गमका मार्ग प्रत्येक दिशामें रखे।

English

possession, retaliation, sleeplessness, distress of the self; in a duty, failure of insight — is called dullness;

अध्याय ३३७

श्लोक 29

इष्टप्राप्तेरूपचितः सम्पदाभ्युदयो धृतिः ।गर्वाः परेष्ववज्ञानमात्मन्युत्कर्षभावना

iṣṭaprāpterūpacitaḥ sampadābhyudayo dhṛtiḥ / garvāḥ pareṣvavajñānamātmanyutkarṣabhāvanā

हिन्दी अर्थ

यह बात “अष्टदल कमल 'के विषयमें कही गयी है। चारों ओर विषम-वर्णोंका उतनी ही पत्रावली बनाकर न्यास करे और मध्यकर्णिकामें सम अक्षरोंका एक अक्षरके रूपमें न्यास करे। यह बात 'षोडशदल कमल'के विषयमें बतायी गयी है। 'चक्रबन्ध' दो प्रकारका होता है-एक चार अरोंका और दूसरा छः अरोंका। उनमें जो आदिम, अर्थात् चार अरोंवाला चक्र है, उसके

English

fortitude is the prosperity of increase from obtaining the desired; pride is contempt for others, feeling of superiority in oneself;

अध्याय ३३७

श्लोक 30

भवेद्विषादो दैवादेर्विघातो ऽभीष्टवस्तुनि ।औत्सुक्यमीप्सिताप्राप्तेर्वाञ्छया तरला स्थितिः

bhavedviṣādo daivādervighāto 'bhīṣṭavastuni / autsukyamīpsitāprāptervāñchayā taralā sthitiḥ

हिन्दी अर्थ

ूर्वारद्धमें समवर्णोकी स्थापना करे और प्रत्येक पादके जो प्रथम, पञ्चम आदि विषमवर्ण हैं, उनको एवं चौथे और आठवें, दोनों समवर्णोको क्रमशः उत्तर, पूर्व, दक्षिण और पश्चिमके आरोंमें

English

dejection is the frustration of fate and the like in a desired object; eagerness is trembling state from desire of the unattained;

अध्याय ३३७

श्लोक 31

चित्तेन्द्रियाणां स्तैमित्यमपस्मारो ऽचला स्थितिः ।युद्धे बाधादिभीस्त्रासो वीप्सा चित्तचमत्कृतिः

cittendriyāṇāṃ staimityamapasmāro 'calā sthitiḥ / yuddhe bādhādibhīstrāso vīpsā cittacamatkṛtiḥ

हिन्दी अर्थ

उत्तर पादार्धके चार अक्षरोंको नाभिमें रखे और उसके आदि अक्षरको पिछले दो अरोंमें ले जाय। शेष दो पदोंको नेमिमें स्थापित करे। तृतीय अक्षरको चतुर्थ पादके अन्तमें तथा प्रथम दो समवर्णोको तीनों पादोंके अन्तमें रखे। यदि दसवाँ अक्षर सम हो तो उसे प्रथम अरेपर रखे और छः अक्षरोंको पश्चिम अरेपर स्थापित करे। वे दो-दोके अन्तरसे स्थापित होंगे। इस प्रकार

English

stupor of the mind and senses, epilepsy is immobile state; in battle terror from fear of obstacles and the like; curiosity is amazement of mind;

अध्याय ३३७

श्लोक 32

क्रोधस्याप्रशमो ऽमर्षः प्रबोधश्चेतनोदयः ।अवहित्थं भवेद्गुप्तिरिङ्गिताकारगोचरा

krodhasyāpraśamo 'marṣaḥ prabodhaścetanodayaḥ / avahitthaṃ bhavedguptiriṅgitākāragocarā

हिन्दी अर्थ

'बृहच्चक्र'का निर्माण होगा। यह 'बृहच्चक्र' बताया गया। सामनेके दो आरोंमें क्रमशः एक- एक पाद लिखे। नाभिमें दशम अक्षर अङ्कित करे और नेमिमें चतुर्थ चरणको ले जाय। श्लोकके

English

non-calming of anger is impatience; awakening is the rise of consciousness; concealment is hiding by gesture and form;

अध्याय ३३७

श्लोक 33

रोषतो गुरुवाग्दण्डपारुष्यं विदुरुग्रतां ।ऊहो वितर्कःस्याद्व्याधिर्मनोवपुरवग्रहः

roṣato guruvāgdaṇḍapāruṣyaṃ vidurugratāṃ / ūho vitarkaḥsyādvyādhirmanovapuravagrahaḥ

हिन्दी अर्थ

दूसरे और चौथे चरणोंके आदि और अन्तिम अक्षर भी समान हों। प्रथम और चौथे चरणके द्वितीय चरणको विलोमक्रमसे पढ्नेपर यदि तृतीय चरण बन जाता हो तो उसे पत्रके स्थानमें स्थापित करे तो उस रचनाका नाम ' दण्डचक्राब्जबन्ध' समझना चाहिए। पूर्वदल

English

from rage, harshness of heavy speech and punishment they know as fierceness; reasoning is conjecture; disease is mind's and body's obstruction;

अध्याय ३३७

श्लोक 34

अनिबद्धप्रलापादिरुन्मादो मदनादिभिः ।तत्त्वज्ञानादिना चेतःकषायो परमः शमः

anibaddhapralāpādirunmādo madanādibhiḥ / tattvajñānādinā cetaḥkaṣāyo paramaḥ śamaḥ

हिन्दी अर्थ

(पूर्वाद्ध) -में दोनों चरणोंके द्वितीय अक्षर एक समान हों और उत्तराद्धमें दोनों चरणोंके सातवें अक्षर समान हों। साथ ही द्वितीय अक्षरोंकी दृष्टिसे भी पूर्वाद्ध और उत्तरारद्ध परस्पर समता

English

madness is incoherent talk and the like from passion; by knowledge of truth and the like, the dissolving of mind's stains is supreme peace (shama).

अध्याय ३३७

श्लोक 35

कविभिर्योजनीया वै भावाः काव्यादिके रसाः ।विभाव्यते हि रत्यादिर्यत्र येन विभाव्यते

kavibhiryojanīyā vai bhāvāḥ kāvyādike rasāḥ / vibhāvyate hi ratyādiryatra yena vibhāvyate

हिन्दी अर्थ

एक-दूसरेके तुल्य हों। उत्तराद्ध भागके सातवें अक्षर प्रथम और चतुर्थ चरणोंके उन्हीं अक्षरोंके पञ्चम अक्षरको क्रमशः योजना करनी चाहिए। क्रमपादगत जो चतुर्थ अक्षर हैं, उनको तथा दलान्त वर्णोको पूर्ववत् स्थापित करना चाहिए। 'मुरजबन्ध'में पूर्वार्ध और उत्तरार्द्ध दोनोंके अन्तिम

English

Poets should employ the feelings and sentiments in poetry and the like. That by which love and the like is brought out,

अध्याय ३३७

श्लोक 36

विभावो नाम सद्वेधालम्बनोद्दीपनात्मकः ।रत्यादिभाववर्गो ऽयं यमाजीव्योपजायते

vibhāvo nāma sadvedhālambanoddīpanātmakaḥ / ratyādibhāvavargo 'yaṃ yamājīvyopajāyate

हिन्दी अर्थ

और आदि अक्षर समान होते हैं। पादार्ध भागमें स्थित जो वर्ण है, उसे प्रातिलोम्यानुलोम्य-क्रमसे स्थापित करे। अन्तिम अक्षरको इस प्रकार निबद्ध करे कि वह चौथे चरणका आदि अक्षर

English

is called a determinant (vibhava), twofold: of object and of stimulus; this group of feelings, love and the like, arises from it.

अध्याय ३३७

श्लोक 37

आलम्बनविभावो ऽसौ नायकादिभवस् तथा ।धीरोदात्तो धीरोद्धतः स्याद्धीरललितस् तथा

ālambanavibhāvo 'sau nāyakādibhavas tathā / dhīrodātto dhīroddhataḥ syāddhīralalitas tathā

हिन्दी अर्थ

बन जाय। चौथे चरणमें जो आदि अक्षर हो, उससे नवें तथा सोलहवें अक्षरसे पुटकके बीच- बीचमें चार-चार अक्षरोंका निवेश करे। ऐसा करनेसे उस श्लोकबन्धद्वारा मुरज (ढोल)-को आकृति स्पष्ट हो जाती है। द्वितीय चक्र ' शार्दूलविक्रोडित' छन्दसे सम्पादित होता है। 'गोमूत्रिकाबन्ध' सभी छन्दोसे निर्मित हो सकता है। अन्य सब बन्ध अनुष्टुप् छन्दसे निर्मित होते

English

The object-determinant arises from the hero and the like: the steady-exalted, steady-arrogant, steady-playful,

अध्याय ३३७

श्लोक 38

धीरप्रशान्त इत्य् एवं चतुर्धा नायकः स्मृतः ।अनुकूलो दक्षिणश् च शठो धृष्टः प्रवर्तितः

dhīrapraśānta ity evaṃ caturdhā nāyakaḥ smṛtaḥ / anukūlo dakṣiṇaś ca śaṭho dhṛṣṭaḥ pravartitaḥ

हिन्दी अर्थ

हैं। यदि इन बन्धोंमें कवि और काव्यका नाम न हो तो मित्रभाव रखनेवाले लोग संतुष्ट होते हैं तथा शत्रु भी खिन्न नहीं होता। बाण,

English

and steady-peaceful — thus the hero is remembered fourfold; favorable, courteous, deceitful, brazen are the classes;

अध्याय ३३७

श्लोक 39

पीठमर्दो विटश् चैव विदूषक इति त्रयः ।शृङ्गारे नर्मसचिवा नायकस्यानुनायकाः

pīṭhamardo viṭaś caiva vidūṣaka iti trayaḥ / śṛṅgāre narmasacivā nāyakasyānunāyakāḥ

हिन्दी अर्थ

रथपद, नागपद, पुष्करिणी, असिपुत्रिका (कटारी या छुरी)-इन सबको आकृतियोंमें चित्रबन्ध लिखे जाते हैं। ये तथा और भी बहुत-से 'चित्रबन्ध' हो सकते हैं, जिन्हें विद्वान् पुरुषोंको स्वयं जानना चाहिए॥ ५०--६५ ॥

English

the pithamarda, vita and vidushaka — three; in the erotic, the hero's confidants are subsidiaries;

अध्याय ३३७

श्लोक 40

पीठमर्दः सम्बलकः श्रीमांस्तद्वेशजो विटः ।विदूषको वैहसिकस्त्वष्टनायकनायिकाः

pīṭhamardaḥ sambalakaḥ śrīmāṃstadveśajo viṭaḥ / vidūṣako vaihasikastvaṣṭanāyakanāyikāḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणे 'शब्दालंकारका कथन” नामक तीन सौ तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

pithamarda, sambalaka, the glorious vita of his kind, the jester, the humorist: eight heroes and heroines.

अध्याय ३३७

श्लोक 41

स्वकीया परकीया च पुनर्भूरिति कौशिकाः ।सामान्या न पुनर्भूरिरित्याद्या बहुभेदतः

svakīyā parakīyā ca punarbhūriti kauśikāḥ / sāmānyā na punarbhūrirityādyā bahubhedataḥ

हिन्दी अर्थ

इस अध्यायके अन्तिम बीस-पचीस श्लोकोंका मूल अधिक स्पष्ट नहीं है। इनका आधार अन्वेषणीय है। ७२० अग्निपुराण

English

Own wife, another's wife, and remarried — say the Kaushikas; the common one, not the remarried, and so on, in many divisions.

अध्याय ३३७

श्लोक 42

उद्दिपनविभावास्ते संस्कारैर् विविधैः स्थितैः ।आलम्बनविभावेषु भावानुद्वीपयन्ति ये

uddipanavibhāvāste saṃskārair vividhaiḥ sthitaiḥ / ālambanavibhāveṣu bhāvānudvīpayanti ye

हिन्दी अर्थ

अर्थालंकारोंका निरूपण

English

The stimulus-determinants stand through various refinements; those which kindle the feelings in the object-determinants;

अध्याय ३३७

श्लोक 43

चतुःषष्टिकला द्वेधा कर्माद्यैर् गीतिकादिभिः ।कुहकं स्मृतिरप्येषां प्रायो हासोपहारकः

catuḥṣaṣṭikalā dvedhā karmādyair gītikādibhiḥ / kuhakaṃ smṛtirapyeṣāṃ prāyo hāsopahārakaḥ

हिन्दी अर्थ

अग्निदेव कहते हैं--वसिष्ठ! अर्थोंका स्वभावको 'स्वरूप' कहते हैं। उसके दो भेद अलंकरण ' अर्थालंकार' कहा जाता है। उसके बतलाये गये हैं-'निज' एवं ' आगन्तुक । बिना शब्द-सौन्दर्यं भी मनको आकर्षित नहीं सांसिद्धिकको निज' तथा नैमित्तिकको ' आगन्तुक ' करता है । अर्थालंकारसे हीन सरस्वती विधवाके कहा जाता है। धर्मको समानताको 'सादूश्य' समान शोभाहीन है। अर्थालंकारके आठ भेद कहते हैं। वह भी उपमा, रूपक, सहोक्ति तथा माने गये हैं -स्वरूप, सादृश्य, उत्प्रेक्षा, अतिशय, अर्थान्तरन्यासके भेदसे चार प्रकारका होता है। विभावना, विरोध, हेतु और सम। पदार्थोके जिसमें भेद और सामान्यधर्मके साथ उपमान एन हेतु और सम। पदार्थोके जिसमें भेद और सामान्यधर्मके साथ उपमान एवं

English

the sixty-four arts, twofold by action and the like, by songs and the like; jugglery and memory — mostly the offering of laughter;

अध्याय ३३७

श्लोक 44

आलम्बनविभावस्य भावैर् उद्बुद्धसंस्कृतैः ।मनोवाग्बुद्धिवपुषां स्मृतीछाद्वेषयत्नतः

ālambanavibhāvasya bhāvair udbuddhasaṃskṛtaiḥ / manovāgbuddhivapuṣāṃ smṛtīchādveṣayatnataḥ

हिन्दी अर्थ

' अलंकार' शब्दकी व्युत्पत्ति तीन प्रकारसे उपलब्ध होती है-(१) “अलंकरणमलंकारः।' (२) ' अलंक्रियते अनेन इति वा अलंकार: ।' (३) ' अलंकरोति इति अलंकारः ' । प्रथम व्युत्पत्तिके अनुसार ' अलंकार ' शब्द भावघञन्त है। दूसरीके अनुसार करणदजन्त तथा तीसरीके अनुसार कत्रर्थप्रधान ' अण्'-प्रत्ययान्त है। ' अलंकरणमर्थानामर्थालंकार इष्यते ।'—यों कहकर अग्निपुराणमें भावघजन्त ' अलंकार' शब्दकी ही व्युत्पत्ति प्रदर्शित की गयी है। दण्डीने काव्य-शोभाकारी धर्मोको “अलंकार” कहा है (काव्यादर्श २।१)।

English

of the object-determinant by the awakened refined feelings; from memory, desire, aversion and effort of mind, speech, intellect and body,

अध्याय ३३७

श्लोक 45

आरम्भ एव विदुषामनुभाव इति स्मृतः ।स चानुभूयते चात्र भवत्युत निरुच्यते

ārambha eva viduṣāmanubhāva iti smṛtaḥ / sa cānubhūyate cātra bhavatyuta nirucyate

हिन्दी अर्थ

बामनके मतमें सौन्दर्य और अलंकार पर्यायवाची शब्द हैं सौन्दर्यमलंकारः १। २। इन दोनोंने क्रमशः करणदअन्त और भावघजन्त व्युत्पत्ति स्वीकार की है। किसी भी व्युत्पत्तिके अनुसार अर्थोका अलंकरण ही ' अर्थालंकार' है, इस मान्यतामें कोई बाधा नहीं आती । अतः दण्डी और वामनपर भी अग्निपुराणका ही प्रभाव मानना चाहिए। भामहने ' अलंकार' शब्दकी कोई सुस्पष्ट व्युत्पत्ति नहीं दी है। अतः उपर्युक्त व्युत्पत्तियोंपर अग्निपुराणोक्त व्युत्पत्तिका ही प्रभाव परिलक्षित होता है। मम्मटने “उपकुर्वन्ति तं सन्तं येऽङ्गद्वारेण जातुचित्।'--ऐसा लिखकर ' अलंकार' शब्दकी तीसरी व्युत्पत्ति स्वीकार की है। जैसे हार आदि शरीरके अलंकरणद्वारा शरीरीको अलंकृत करते हैं, उसी प्रकार उपमा आदि अलंकार काव्यके अलंकरणद्वारा काव्यात्मा रसका अलंकरण बनते हैं। अतः वे रसके उपकारी हैं। विश्वनाथका भी ऐसा ही मत है। भोजराजने--' अलमर्थमलंकर्तु यद्व्युत्पत्त्यादिवर्त्मना' इत्यादि लिखकर अग्निपुराणोक्त मतका ही अनुकरण किया है।

English

the very beginning is remembered by the wise as the consequent (anubhava). It is experienced here and is stated.

अध्याय ३३७

श्लोक 46

मनोव्यापारभूयिष्ठो मन आरम्भ उच्यते ।द्विविधः पौरुषस्त्रैण ईदृशो ऽपि प्रसिध्यति

manovyāpārabhūyiṣṭho mana ārambha ucyate / dvividhaḥ pauruṣastraiṇa īdṛśo 'pi prasidhyati

हिन्दी अर्थ

अलंकारोंकी संख्याके विषयमें अनेक मत उपलब्ध होते हैं। भरतमुनिके ' नाट्यशास्त्र'में उपमा, दीपक, रूपक तथा यमक--केवल इन चार अलंकारोंका ही उल्लेख है-- उपमा दीपकं चैव रूपकं यमकं तथा। काव्यस्यैते ह्यलंकाराश्चत्वारः परिकीर्तिताः ॥' (ना० शा० १६। ४३) यद्यपि भूषण, अक्षरसंघात, शोभा और उदाहरण आदि छत्तीस अलंकार ' नाट्यशास्त्र 'में लक्षणसहित लिखे गये हैं तथापि वे विशेषतः नाट्योपयोगी हैं। उनका काव्यबन्धोंमें भी यथासम्भव प्रयोग करनेकी प्रेरणा दी गयी है, तथापि काव्य-सम्बन्धी अलंकार चार ही

English

What is mostly mental activity is called mental beginning; twofold, masculine and feminine, such is also famed.

अध्याय ३३७

श्लोक 47

शोभा विलासो माधुर्यं स्थैर्यं गाम्भीर्यमेव च ।ललितञ्च तथौदार्यन्तेजो ऽष्टाविति पौरुषाः

śobhā vilāso mādhuryaṃ sthairyaṃ gāmbhīryameva ca / lalitañca tathaudāryantejo 'ṣṭāviti pauruṣāḥ

हिन्दी अर्थ

भरतमुनिको पूर्वपरम्परासे प्राप्त रहे हैं, जिनका उन्होंने ' परिकीर्तिता: कहकर स्पष्टीकरण किया है। वामनने अलंकारोंके तैंतीस भेद दिखलाये हैं । दण्डीने पैंतीस, भामहने उनतालीस और उद्धटने चालीस प्रकारके अलंकारोंका वर्णन किया है । रुद्रटने अपने ' काव्यालंकार में बावन तथा मम्मटने सडसठ अलंकारभेद दिखलाये हैं। जयदेवके “चन्द्रालोक'में अलंकारोंकी संख्या सौ हो गयी है और अप्पय्य दीक्षितके 'कुवलयानन्द'में वह संख्या बढ़कर एक सौ चौबीसतक पहुँच गयी है। सरस्वतीकण्ठाभरणकारने शब्दालंकार, अर्थालंकार और शब्दार्थोभयालंकार --इन तीन भेदोंमें अलंकारोंका विभाजन करके तीनोंकी ही पृथक्-पृथक् चौबीस-चौबीस संख्याएँ स्वीकार की हैं। इस प्रकार उन्होंने बहत्तर अलंकारोंके लक्षण और उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। साहित्यदर्पणकारने सतहत्तर अर्थालंकारोंका उल्लेख करके उन सबके सोदाहरण लक्षण दिये हैं। इन सभी अलंकारोंके अवान्तरभेद और सांकर्यभेदसे इन सबकी संख्या बहुत अधिक हो जाती है । अग्निपुराणमें अर्थालंकारके मूलतः आठ भेद माने हैं -स्वरूप, सादृश्य, उत्प्रेक्षा, अतिशय, विभावना, विरोध, हेतु और सम।

English

Beauty, play, sweetness, steadiness, depth, gracefulness, generosity, splendor — eight are the masculine ones;

अध्याय ३३७

श्लोक 48

नीचनिन्दोत्तमस्पर्धा शौर्यं दाक्षादिकारणं ।मनोधर्मे भवेच्छोभा शोभते भवनं यथा

nīcanindottamaspardhā śauryaṃ dākṣādikāraṇaṃ / manodharme bhavecchobhā śobhate bhavanaṃ yathā

हिन्दी अर्थ

फिर स्वरूपके दो भेद, सादूश्यके चार भेद, अतिशयके दो भेद और विभावनाके साथ विशेषोक्तिको जोड़कर दो भेद किये हैं । सादूश्यके चार भेद--उपमा, रूपक, सहोक्ति और अर्थान्तरन्यास बताकर उपमाके लगभग उनतीस भेदोंका उल्लेख किया है। इन भेदोंमें ही अन्य बहुत-से अलंकार समाविष्ट हो गये हैं, जो दूसरे-दूसरे नामोंसे व्यवहत होते हैं। उन्होंने उपमाके जो अन्तिम पाँच भेद लिखे हैं, उनके नाम हैं--प्रशंसा, निन्दा, कल्पिता, सदूशी और किंचित्सदूशी। ये भेद भरतमुनिके ' नाट्यशास्त्र 'में भी वर्णित हैं और वहाँ उनके लक्षण

English

censure of the low, rivalry with the high, valor, skill and the like as causes; in the mind's nature there is beauty, as a house is adorned.

अध्याय ३३७

श्लोक 49

भावो हावश् च हेला च शोभा कान्तिस्तथैव च ।दीप्तिर्माधुर्यशौर्ये च प्रागल्भ्यं स्यादुदारता

bhāvo hāvaś ca helā ca śobhā kāntistathaiva ca / dīptirmādhuryaśaurye ca prāgalbhyaṃ syādudāratā

हिन्दी अर्थ

तथा उदाहरण भी दिये गये हैं। अग्निपुराणमें उनके नाममात्रका संकलन वहींसे किया गया है, ऐसा जान पड़ता है। उपमेयकी सत्ता हो, उसको 'उपमा" कहते हैं; क्योंकि यत्किचिद्विवक्षित सारूप्यका आश्रय लेकर ही लोकयात्रा प्रवर्तित होती है। प्रतियोगी (उपमान) -के समस्त और असमस्त होनेसे उपमा

English

Bhava, hava, hela, shobha, kanti, dipti, madhurya, shaurya, pragalbhya, udarata,

अध्याय ३३७

श्लोक 50

स्थैर्यं गम्भीरता स्त्रीणां विभावा द्वादशेरिताः ।भावो विलासो हावःस्याद्भावः किञ्चिच्च हर्षजः

sthairyaṃ gambhīratā strīṇāṃ vibhāvā dvādaśeritāḥ / bhāvo vilāso hāvaḥsyādbhāvaḥ kiñcicca harṣajaḥ

हिन्दी अर्थ

दो प्रकारकी मानी गयी है-ससमासा' एवं ' असमासा'। “घन इव श्यामः ' इत्यादि पदोंमें समासके कारण वाचक शब्दके लुप्त होनेसे 'ससमासा उपमा' कही गयी है, इससे भिन्न

English

sthairya, gambhirata — for women twelve determinants are told. Bhava, vilasa, hava: bhava is something born of joy;

अध्याय ३३७

श्लोक 51

वाचो युक्तिर्भवेद्वागारम्भो द्वादश एव सः ।तत्राभाषणमालापः प्रलापो वचनं वहु(१)

vāco yuktirbhavedvāgārambho dvādaśa eva saḥ / tatrābhāṣaṇamālāpaḥ pralāpo vacanaṃ vahu(1)

हिन्दी अर्थ

प्रकारकी उपमा ' असमासा' है । कहीं उपमाद्योतक 'इवादि' पद, कहीं उपमेय और कहीं दोनोंके विरहसे 'ससमासा' उपमाके तीन भेद होते हैं। इसी प्रकार 'असमासा' उपमाके भी तीन भेद हैं। विशेषणसे युक्त होनेपर उपमाके अठारह भेद होते हैं। जिसमें साधारण धर्मका कथन या ज्ञान होता है-उपमाके उस भेदविशेषको धर्म या

English

the logic of speech is the beginning of speech, twelvefold: address (abhashana), converse (alapa), prattle (pralapa), much speech;

अध्याय ३३७

श्लोक 52

विलापो दुःखवचनमनुलापो ऽसकृद्वचः ।संलाप उक्तप्रत्युक्तमपलापो ऽन्यथावचः

vilāpo duḥkhavacanamanulāpo 'sakṛdvacaḥ / saṃlāpa uktapratyuktamapalāpo 'nyathāvacaḥ

हिन्दी अर्थ

वस्तुको प्रधानताके कारण "धर्मोपमा एवं “वस्तूपमा' कहा जाता है। जिसमें उपमान और उपमेयकी प्रसिद्धिके अनुसार परस्पर तुल्य उपमा दी जाती है, वह 'परस्परोपमा' होती है।

English

lament is speech of grief; repeated speech is anulapa; dialogue is utterance and reply; apalapa is speech otherwise;

अध्याय ३३७

श्लोक 53

वार्ताप्रयाणं सन्देशो निर्देशः प्रतिपादनम् ।तत्त्वदेशो ऽतिदेशो ऽयमपदेशो ऽन्यवर्णनम्

vārtāprayāṇaṃ sandeśo nirdeśaḥ pratipādanam / tattvadeśo 'tideśo 'yamapadeśo 'nyavarṇanam

हिन्दी अर्थ

प्रसिद्धिके विपरीत उपमान और उपमेयकी विषमतामें जब उपमा दी जाती है, तब वह 'विपरीतोपमा " कहलाती है। उपमा--जहाँ एक वस्तुसे ही उपमा देकर अन्य उपमानोंका व्यावर्तन-निराकरण किया जाता है, वहाँ "नियमोपमा" होती है। यदि उपमेयके गुणादि धर्मको अन्य उपमानोंमें भी अनुवृत्ति हो तो उसे ' अनियमोपमा कहते हैं

English

news, departure, message, direction, exposition, essential instruction, application, pretext, description of another;

अध्याय ३३७

श्लोक 54

उपदेशश् च शिक्षावाक् व्याजोक्तिर्व्यपदेशकः ।बोधाय एष व्यापारःसुबुद्ध्यारम्भ इष्यते ।तस्य भेदास्त्रयस्ते च रीतिवृत्तिप्रवृत्तयः

upadeśaś ca śikṣāvāk vyājoktirvyapadeśakaḥ / bodhāya eṣa vyāpāraḥsubuddhyārambha iṣyate / tasya bhedāstrayaste ca rītivṛttipravṛttayaḥ

हिन्दी अर्थ

एकसे भिन्न धर्मोके बाहुल्यका कीर्तन होनेसे “समुच्चयोपमा“ होती है। जहाँ अनेक धर्मोंकी समानता होनेपर भी उपमानसे उपमेयकी विलक्षणता

English

instruction, teaching words, pretended speech, naming — this activity is for awakening, the beginning of right understanding; its three kinds are style, mode and function.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 337
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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