Agni Purana· Agni Purāṇa
338
अध्याय 338 / 381

Adhyaya 339

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अध्याय ३३८

श्लोक 1

रीतिनिरूपणं अग्निरुचाच वाग्विद्यासम्प्रतिज्ञाने रीतिः सापि चतुर्विधा ।पाञ्चाली गौडदेशीया वैदर्भी लाटजा तथा

rītinirūpaṇaṃ agnirucāca vāgvidyāsampratijñāne rītiḥ sāpi caturvidhā / pāñcālī gauḍadeśīyā vaidarbhī lāṭajā tathā

हिन्दी अर्थ

१. उपमाका अग्निपुराणोक्त लक्षण बहुत ही सीधा-सादा और स्पष्ट है। भरतमुनिने सादृश्यमूलक सभी अलंकारोंका 'उपमा' नाम दिया है यत्किंचित् काव्यबन्धेषु सादृश्येनोपमीयते। उपमा नाम सा ज्ञेया।' (१६। ४१) व्यासजीने अपने लक्षणमें उपमान, उपमेय, सामान्य धर्म और भेदका उल्लेख किया है। भामहने भी इसीको आधार बनाकर 'यथेवशब्दौ सादूश्यमाहतुर्व्यतिरेकिणोः '--ऐसा लक्षण किया है। इसमें वाचक शब्द, सामान्य धर्म तथा भेद-तीनका उल्लेख किया है। उपमानोपमेयका होना तो स्वत:सिद्ध है। वामनने ' उपमानोपमेयस्य गुणलेशतः साम्यमुपमा ।'--इस सूत्रके द्वारा उक्त अभिप्रायका ही पोषण किया है। दण्डीने जहाँ किसी तरह भी

English

Vidh. 65.7.

अध्याय ३३८

श्लोक 2

उपचारयुता मृद्वी पाञ्चाली ह्रस्वविग्रहा ।अनवस्थितसन्दर्भा गौडीया दीर्घविग्रहा

upacārayutā mṛdvī pāñcālī hrasvavigrahā / anavasthitasandarbhā gauḍīyā dīrghavigrahā

हिन्दी अर्थ

सादृश्यकी स्पष्ट प्रतीति होती हो, उसे 'उपमा' कहा है। मम्मटने ' साधर्म्यमुपमा भेदे', विश्वनाथने “साम्यं वाच्यमवैधर्म्यं वाक्यैक्यं उपमा द्वयोः ।' तथा भोजराजने ' प्रसिद्धेरनुरोधेन यः परस्परमर्थयोः । भूयोऽवयवसामान्ययोगः सेहोपमा मता॥'--ऐसा लक्षण किया है। इन सबने पूर्ववर्ती आचार्योके ही मतोंका उपपादन किया है।

English

Gf. Srdvanta u«a, Vaj. Sam. 33.41a.

अध्याय ३३८

श्लोक 3

उपचारैर् न बहुभिरुपचारैर् विवर्जिता ।नातिकोमलसन्दर्भा वैदर्भी मुक्तविग्रहा

upacārair na bahubhirupacārair vivarjitā / nātikomalasandarbhā vaidarbhī muktavigrahā

हिन्दी अर्थ

२. दण्डीने अपने ' काव्यादर्श ' में अग्निपुराण-कथित उपमाके इन भेदोंको ग्रहण किया है और इनके सोदाहरण लक्षण भी दिये हैं । जहाँ मुख्यतया तुल्यधर्मका प्रदर्शन किया गया, वहाँ ' धर्मोपमा' होती है। जैसे 'तुम्हारी हथेली कमलके समान लाल है'-इसमें लालिमारूपी धर्मका स्पष्ट कथन होनेसे यहाँ ' धर्मोपमा' है। ३. जिसमें शब्दसे अनृपात्त-प्रतीयमान साधारण धर्म हो, केवल उपमान वस्तुका प्रतिपादन होनेसे वहाँ ' वस्तृपमा' होती है। जैसे --' तुम्हारा मुख कमलके समान है।'

English

Ap. Sr. 6.20.2.

अध्याय ३३८

श्लोक 4

लाटीया स्फुटसन्धर्भा नातिविस्फुरविग्रहा ।परित्यक्तापि भूयोभिरुपचारैर् उदाहृता

lāṭīyā sphuṭasandharbhā nātivisphuravigrahā / parityaktāpi bhūyobhirupacārair udāhṛtā

हिन्दी अर्थ

४. 'परस्परोपमा 'का दूसरा नाम “ अन्योन्योपमा' है । दण्डीने इसी नामसे इसका उल्लेख किया है । जहाँ उपमान और उपमेय --दोनों एक-दूसरेके उपमेय तथा उपमान बनते है, वहाँ ' परस्परोपमा' होती है। जैसे --' तुम्हारे मुखके समान कमल है और कमलके समान तुम्हारा मुख है।'

English

The Latiya style has clear arrangement and not too brilliant an embodiment; though abandoned, it is told with many ornaments;

अध्याय ३३८

श्लोक 5

क्रियास्वविषमा वृत्तिर्भारत्यारभटी तथा ।कौशिकी सात्वती चेति सा चतुर्धा प्रतिष्ठिता

kriyāsvaviṣamā vṛttirbhāratyārabhaṭī tathā / kauśikī sātvatī ceti sā caturdhā pratiṣṭhitā

हिन्दी अर्थ

५. दण्डीने अपने ' काव्यादर्श ' में विपरीतोपमाका ' विपर्यासोपमा 'के नामसे उल्लेख किया है । जहाँ प्रसिद्धिके विपरीत उपमानोपमेयभाव गृहीत होता है, वहाँ 'विपरीतोपमा' होती है। जैसे -'खिला हुआ कमल तुम्हारे मुखके समान प्रतीत होता था'-इत्यादि। ६. दण्डीने इसका उदाहरण इस प्रकार प्रस्तुत किया है --' तुम्हारा मुख कमलके ही समान है, दूसरी किसी वस्तुके समान नहीं ।'

English

the mode that is even in actions: Bharati, Arabhati, Kaishiki and Sattvati — thus it is established fourfold.

अध्याय ३३८

श्लोक 6

वाक्प्रधाना नरप्राया स्त्रीयुक्ता प्राकृतोक्तिता ।भरतेन प्रणीतत्वाद् भारती रीतिरुच्यते

vākpradhānā naraprāyā strīyuktā prākṛtoktitā / bharatena praṇītatvād bhāratī rītirucyate

हिन्दी अर्थ

७. इसका उदाहरण दण्डीके ' काव्यादर्श ' में इस प्रकार दिया गया है -'कमल तो तुम्हारे मुखका अनुकरण करता ही है, यदि दूसरी वस्तुएँ (चन्द्र आदि) भी तुम्हारे मुखके समान हैं तो रहें।'

English

Primarily speech, mostly men, with women, in Prakrit — because composed by Bharata it is called the Bharati style.

अध्याय ३३८

श्लोक 7

चत्वार्यङ्गानि भारत्या वीथी प्रहसनन्तथा ।प्रस्तावना नाटकादेर्वीथ्यङ्गाश् च त्रयोदश

catvāryaṅgāni bhāratyā vīthī prahasanantathā / prastāvanā nāṭakādervīthyaṅgāś ca trayodaśa

हिन्दी अर्थ

८. 'समुच्चयोपमा' का उदाहरण दण्डीने इस प्रकार किया है -' सुन्दरि! तुम्हारा मुख केवल कान्तिसे ही नहीं, आह्वादनकर्मसे भी इन्दुका अनुसरण करता है।' यहाँ कान्तिगुण और आह्लादनकर्म -दोनोंका समुच्चय होनेके कारण “समुच्चयोपमा' कही गयी है। विवक्षित हो और इसके कारण जो अतिरिक्तत्वका कथन होता है, उसे 'व्यतिरेकोपमा'' कहते हैं।

English

Bharati has four limbs: Vithi, Prahasana, Prastavana of plays and the like; and the Vithi limbs are thirteen:

अध्याय ३३८

श्लोक 8

उद्घातकं तथैव स्याल्लपितं स्याद्द्वितीयकम् ।असत्प्रलापो वाक्श्रेणी(१) नालिका विपणन्तथा

udghātakaṃ tathaiva syāllapitaṃ syāddvitīyakam / asatpralāpo vākśreṇī(1) nālikā vipaṇantathā

हिन्दी अर्थ

जाय, उसे “बहूपमा? माना गया है। यदि उनमेंसे प्रत्येक उपमान भिन्न-भिन्न साधारण धर्मोसे युक्त हो तो उसे “मालोपमा २ कहा जाता है। उपमेयको उपमानका विकार बताकर तुलना की जाय तो

English

Udghataka, Lapita the second, Asatpralapa, Vakshreni, Nalika, Vipana,

अध्याय ३३८

श्लोक 9

व्याहारस्तिमतञ्चैव(२) छलावस्कन्दिते तथा ।१ वाग्वेणीति क॥ , ञ॥ , ट॥ च २ व्याहारस्त्रिगतञ्चैवेति ख॥ :प् २११ गण्डो ऽथ मृदवश् चैव त्रयोदशमथाचितम्

vyāhārastimatañcaiva(2) chalāvaskandite tathā / 1 vāgveṇīti ka.. , ña.. , ṭa.. ca 2 vyāhārastrigatañcaiveti kha.. :p 211 gaṇḍo 'tha mṛdavaś caiva trayodaśamathācitam

हिन्दी अर्थ

“विक्रियोपमा” होती है। यदि कवि उपमानमें किसी ऐसे वैशिष्ट्यका, जो तीनों लोकोंमें असम्भव हो, आरोप करके उसके द्वारा उपमा देता है, तो वह “अद्भुतोपमा कही जाती है। उपमानको आरोपित करके उससे अभिन्नरूपमें जो उपमेयका कीर्तन होता है और उससे जो भ्रम होनेका वर्णन किया जाता है, उसे “मोहोपमा कहा जाता है। दो धर्मियोंमेंसे किसी एकका यथार्थ निश्चय न

English

Vyahara, Timata, Chhalavaskandita, Ganda, Mridava, and the thirteenth Achita.

अध्याय ३३८

श्लोक 10

तापसादेः प्रहसनं परिहासपरं वचः ।मायेन्द्रजालयुद्धादिबहुलारभटी स्मृता ।मङ्क्षिप्तकारपातौ च(१) वस्तूत्थापनमेव च

tāpasādeḥ prahasanaṃ parihāsaparaṃ vacaḥ / māyendrajālayuddhādibahulārabhaṭī smṛtā / maṅkṣiptakārapātau ca(1) vastūtthāpanameva ca

हिन्दी अर्थ

होनेसे 'संशयोपमा" तथा पहले संशय होकर फिर निश्चय होनेसे 'निश्चयोपमा “ होती है। जहाँ वाक्यार्थको उपमान बनाकर उससे ही वाक्यार्थकी उपमा दी जाय, उसको “ वाक्यार्थोपमा १ कहते

English

Prahasana is speech aimed at ridicule of ascetics and the like; Arabhati is remembered as full of magic, jugglery, battle and the like. Sankshiptaka, Pata and the raising of the matter...

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 338
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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