Agni Purana· Agni Purāṇa
339
अध्याय 339 / 381

Adhyaya 340

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अध्याय ३३९

श्लोक 1

नृत्यादावङ्गकर्मनिरूपणं अग्निर् उवाच चेष्टाविशेषमप्यङ्गप्रत्यङ्गे कर्म चानयोः ।शरीरारम्भमिच्छन्ति प्रायः पूर्वो ऽवलाश्रयः

nṛtyādāvaṅgakarmanirūpaṇaṃ agnir uvāca ceṣṭāviśeṣamapyaṅgapratyaṅge karma cānayoḥ / śarīrārambhamicchanti prāyaḥ pūrvo 'valāśrayaḥ

हिन्दी अर्थ

हैं। यह उपमा अपने उपमानको दृष्टिसे दो प्रकारकी होती है-साधारणी' और ' अतिशायिनी '। जो एकका उपमेय है, वही दूसरेका उपमान हो, १. “व्यतिरिकोपमा'को ही अर्वाचीन आलंकारिकोंने ' व्यतिरेक' नामक अलंकार माना है । दण्डीने इसका उल्लेख नहीं किया है। परंतु रुय्यक और मम्मटने इसका उदाहरण यों दिया है- चन्द्रमा बारंबार क्षीण हो-होकर भी पुनः बढ़ जाता है; परंतु यौवन यदि चला गया तो फिर लौटता नहीं।' इसमें उपमानभूत चन्द्रमाकी अपेक्षा उपमेय यौवनकी अस्थिरता अधिक बतायी गयी है। अतः यहाँ ' व्यतिरेक' है।

English

RV. 10.90.1a.

अध्याय ३३९

श्लोक 2

लीला विलासो विछित्तिर्विभ्रमं किलकिञ्चितं ।मोट्टायितं कुट्टमितं विव्वोको ललितन्तथा

līlā vilāso vichittirvibhramaṃ kilakiñcitaṃ / moṭṭāyitaṃ kuṭṭamitaṃ vivvoko lalitantathā

हिन्दी अर्थ

२. “तुम्हारा स्पर्श चन्दन, जल, चन्द्रकिरण तथा चन्द्रकान्तमणि आदिके समान शीतल है'। यहाँ शीतलतामें सादृश्य रखनेवाले बहुत-से उपमानोंद्वारा उपमा दी गयी है, अतः “बहूपमा' अलंकार है । दण्डीने अपने ' काव्यादर्श 'में यही उदाहरण प्रस्तुत किया है। अर्वाचीन आचार्यलोग इसे 'मालोपमा' ही मानते हैं। उनकी 'मालोपमा'का लक्षण इस प्रकार है - मालोपमा यदेकस्योपमानं बहु दृश्यते।'

English

One would get all the pleasures by giving away a fruit with each one ( of the hymns) after bathing. By the re¬ petition of the PurufasBkta major and minor sins are destroyed.

अध्याय ३३९

श्लोक 3

विकृतं क्रीडितं केलिरिति द्वादशधैव सः ।लीलेष्टजनचेष्टानुकरणं संवृतक्षये

vikṛtaṃ krīḍitaṃ keliriti dvādaśadhaiva saḥ / līleṣṭajanaceṣṭānukaraṇaṃ saṃvṛtakṣaye

हिन्दी अर्थ

३. काव्यादर्शकार दण्डीने अग्निपुराणके ही पथका अनुसरण करते हुए 'बहूपमा' और 'मालोपमा' को अलग-अलग माना है। “बहूपमा'के उदाहरणमें बहुत-से उपमानोंकी गणनामात्र करा दी गयी है, परंतु “मालोपमा 'में प्रत्येक उपमानके साथ साधर्म्यका अन्वय होता है। यही इन दोनोंमें भेद है। 'मालोपमा'का उदाहरण दण्डीने इस प्रकार प्रस्तुत किया है—'राजन्! जैसे प्रकाश सूर्यमें शोभाका आधान करता है, जैसे सूर्य दिनमें लक्ष्मीका आधान करते हैं तथा जैसे दिन आकाशमें प्रकाश फैलाता है, उसी प्रकार तुम्हारा बल, पराक्रम तुममें लक्ष्मीको प्रतिष्ठित करता है।' यहाँ प्रत्येक उपमानके साथ पृथक्-पृथक् साधर्म्यका अन्वय होनेसे “मालोपमा' मानी गयी है।

English

One gets everything by repeating the krcckra (hymns) and offering oblations (with them) after becoming clean by bathing. Three other appeasing (hymns) besides the eighteen appeasing (hymns) are excellent.

अध्याय ३३९

श्लोक 4

विशेषान् दर्शयन् किञ्चिद्विलासः सद्भिरिष्यते ।हसितक्रान्दितादीनां सङ्करः किलकिञ्चितं

viśeṣān darśayan kiñcidvilāsaḥ sadbhiriṣyate / hasitakrānditādīnāṃ saṅkaraḥ kilakiñcitaṃ

हिन्दी अर्थ

४. काव्यादर्श में ' विक्रियोपमा 'का उदाहरण इस प्रकार उपलब्ध होता है--' सुन्दरि ! तुम्हारा मुख चन्द्रमण्डलसे उत्कीर्ण (खोदकर निकाला हुआ)-सा तथा कमलके गर्भसे उद्धृत किया हुआ-सा जान पड़ता है।' यहाँ चन्द्रमण्डल तथा कमलगर्भ-ये प्रकृति हैं और मुख इनका विकार है। अतः यहाँ ' विक्रियोपमा ' हुई।

English

The portent will not bear any fruit if it rains within seven days. A portent without any appeasement within three years is very dangerous.

अध्याय ३३९

श्लोक 5

विकारः कोपि विव्वोको ललितं सौकुमार्यतः ।शिरः पाणिरुरः पार्श्वङ्कटिरङ्घ्रिरिति क्रमात्

vikāraḥ kopi vivvoko lalitaṃ saukumāryataḥ / śiraḥ pāṇiruraḥ pārśvaṅkaṭiraṅghririti kramāt

हिन्दी अर्थ

५. इसका उदाहरण दण्डीने इस प्रकार प्रस्तुत किया है--' सुन्दरि! यदि कोई कमल चञ्चल लोचनोंसे युक्त हो जाय तो वह तुम्हारे मुखकी शोभाको धारण कर सकता है।' ६. “सुन्दरि! मैं तुम्हारे मुखको ' यह चन्द्रमा है'--यों समझ लेता हूँ और तुम्हारे मुखके दर्शनकी आशासे बारंबार चन्द्रमाकी ओर दौड़ पड़ता हूँ।' यह वर्णन अग्निपुराणोक्त लक्षणको सामने रखकर किया गया है। अर्वाचीन आलंकारिक “मोहोपमा ' को ' भ्रान्तिमान्” अलंकारकी संज्ञा देते हैं।

English

When the trees bear fruit out of season, ooze out milk and blood, one should do the appeasing rite for the portents after worshipping ( Lord) Siva.

अध्याय ३३९

श्लोक 6

अङ्गानि भ्रूलतादीनि प्रत्यङ्गान्यभिजानते ।१ सङ्क्षिप्तकरपातौ चेति ज॥ :प् २१२ अङ्गप्रत्यङ्गयोः कर्म प्रयत्नजनितं विना

aṅgāni bhrūlatādīni pratyaṅgānyabhijānate / 1 saṅkṣiptakarapātau ceti ja.. :p 212 aṅgapratyaṅgayoḥ karma prayatnajanitaṃ vinā

हिन्दी अर्थ

७. दण्डीने 'संशयोपमा'का जो उदाहरण दिया है, उसका भावार्थ इस प्रकार है-जिसके भीतर भ्रमर मँडरा रहा हो, वह कमल है या कि चञ्चल लोचनोंसे युक्त तुम्हारा मुख है, इस संशयसे मेरा चित्त दोलायमान हो रहा है।' आधुनिक आलंकारिक इसीको “संदेहालंकार' कहते हैं।

English

Both excessive rains and draught are considered to give rise to famine. Rain occurring consecutively for three days out of season is known (to be a portent) of danger. The change in (the pattern of) rain is nullified by the worship of Parjanya (Rain god). Moon and Sun.

अध्याय ३३९

श्लोक 7

न प्रयोगः क्वचिन्मुख्यन्तिरश्चीनञ्च तत् क्वचित् ।आकम्पितं कम्पितञ्च(१) धूतं विधूतमेव च

na prayogaḥ kvacinmukhyantiraścīnañca tat kvacit / ākampitaṃ kampitañca(1) dhūtaṃ vidhūtameva ca

हिन्दी अर्थ

८. दण्डीने इसे ' निर्णयोपमा' नाम दिया है। उनके द्वारा प्रस्तुत उदाहरण इस प्रकार है-'जिस कमलको चन्द्रमाने अभिभूत कर दिया था, उसकी कान्ति स्वयं चन्द्रमाको ही लज्जित कर दे, ऐसा नहीं हो सकता। अत: यह तुम्हारा मुख ही है (कमल नहीं है) ।' अर्वाचीन आचार्यगण इसे ' निश्चयान्त संदेहालंकार' ही मानते हैं। ९. दण्डीने भी 'वाक्यार्थोपमा'का ऐसा ही लक्षण किया है। वे भी इसके दो ही भेद मानते हैं। परंतु उनके दोनों भेदोंके नाम

English

No chief application anywhere, and that sometimes oblique. Akampita and Kampita, Dhuta and Vidhuta,

अध्याय ३३९

श्लोक 8

परिवाहितमाधूतमवधूतमथाचितं ।निकुञ्चितं परावृत्तमुत्क्षिप्तञ्चाप्यधोगतम्

parivāhitamādhūtamavadhūtamathācitaṃ / nikuñcitaṃ parāvṛttamutkṣiptañcāpyadhogatam

हिन्दी अर्थ

और ' अनेकेवशब्दा'-इस प्रकार दो भेदोंका उल्लेख किया है। इनके उदाहरण 'काव्यादर्श' (२।४४-४५) में द्रष्टव्य हैं ।

English

Parivahita, Adhuta, Avadhuta, Achita, Nikunchita, Paravritta, Utkshipta and Adhogata,

अध्याय ३३९

श्लोक 9

ललितञ्चेति विज्ञेयं त्रयोदशविधं शिरः ।भ्रूकर्म सप्तधा ज्ञेयं पातनं भ्रूकुटीमुखं

lalitañceti vijñeyaṃ trayodaśavidhaṃ śiraḥ / bhrūkarma saptadhā jñeyaṃ pātanaṃ bhrūkuṭīmukhaṃ

हिन्दी अर्थ

अर्थात् दोनों एक-दूसरेके उपमान-उपमेय कहे होनेपर उपमा ही 'रूपक' हो जाती है। तुल्यधर्मसे गये हों तो उसे 'अन्योन्योपमा” कहते हैं। इस युक्त दो पदार्थोका एक साथ रहनेका वर्णन प्रकार यदि उत्तरोत्तर क्रम चलता जाय तो'सहोक्ति कहा जाता है उसको 'गमनोपमा" कहा जाता है। इसके सिवा पूर्ववर्णित वस्तुके समर्थनके लिये साधर्म्य उपमाके और भी पाँच भेद होते हैं--' प्रशस्त” अथवा वैधर्म्यसे जो अर्थान्तरका उपन्यास किया “निन्दा” कल्पिता“ 'सदूशी '' एवं 'किंचितसटूशी' । जाता है, उसे ' अर्थान्तरन्यास” कहते हैं। गुणोंकी समानता देखकर उपमेयका जो तत्त्व जिसमें चेतन या अचेतन पदार्थको अन्यथास्थित

English

and Lalita — thus the head is to be known as thirteenfold. The brow-work is sevenfold: Patana, Bhrukuti, Mukha;

अध्याय ३३९

श्लोक 10

दृष्तिस्त्रिधा रमस्थायिसञ्चारिप्रतिबन्धना ।षट्त्रिंशद्भेदविधुरा रसजा तत्र चाष्टधा

dṛṣtistridhā ramasthāyisañcāripratibandhanā / ṣaṭtriṃśadbhedavidhurā rasajā tatra cāṣṭadhā

हिन्दी अर्थ

उपमानसे रूपित अभेदेन प्रतिपादित होता है, परिस्थितिको दूसरी तरहसे माना जाता है, उसे “रूपक” मानते हैं। अथवा भेदके तिरोहित उसको “उत्प्रेक्षा कहते हैं। लोकसीमातीत

English

the glance is threefold: love, steady, transient, obstructive; with thirty-six divisions; the sentiment-born has eightfold there;

अध्याय ३३९

श्लोक 11

नवधा तारकाकर्म भ्रमणञ्चलनादिकं ।षोढा च नासिका ज्ञेया निश्वासो नवधा मतः

navadhā tārakākarma bhramaṇañcalanādikaṃ / ṣoḍhā ca nāsikā jñeyā niśvāso navadhā mataḥ

हिन्दी अर्थ

१. काव्यादर्शमें इसका उदाहरण इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है--' तुम्हारे मुखके समान कमल है और कमलके समान तुम्हारा मुख है।' इसे ही 'उपमेयोपमा' भी कहते हैं। २. काव्यादर्शकारने 'गमनोपमा' का उल्लेख नहीं किया है। अग्निपुराणमें दिये गये लक्षणके अनुसार हम ' गमनोपमा' को ' अन्योन्योपमा'की माला कह सकते हैं। उदाहरणके लिये निम्नाङ्कित श्लोक द्रष्टव्य है --

English

the eyeball action ninefold: whirling, moving and the like; the nose sixfold; the breath ninefold is held;

अध्याय ३३९

श्लोक 12

षोटौष्ठकर्मकं पापं सप्तधा चिवुकक्रिया ।कलुषादिमुखं षोढा ग्रीवा नवविधा स्मृता

ṣoṭauṣṭhakarmakaṃ pāpaṃ saptadhā civukakriyā / kaluṣādimukhaṃ ṣoḍhā grīvā navavidhā smṛtā

हिन्दी अर्थ

कौमुदीव भवती विभाति मे कातराक्षि भवतीव कौमुदी। अम्बुजेन तुलितं विलोचनं लोचनेन च तवाम्बुजं समम्॥

English

the lip work: sixfold; the chin action sevenfold; the face with turbidity and the like sixfold; the neck is remembered ninefold.

अध्याय ३३९

श्लोक 13

असंयुतः संयुतश् च भूम्ना हस्तः प्रमुच्यते ।पताकस्त्रिपाताकश् च तथा वै कर्तरीमुखः

asaṃyutaḥ saṃyutaś ca bhūmnā hastaḥ pramucyate / patākastripātākaś ca tathā vai kartarīmukhaḥ

हिन्दी अर्थ

३-७, इससे पहले उपमाके अठारह भेद कहे गये हैं। इन्हीं भेदोंका विस्तार करके दण्डीने बत्तीस प्रकारकी उपमाएँ प्रदर्शित की हैं। उक्त भेदोंके अतिरिक्त जो उपमाके ' प्रशंसा? आदि पाँच भेद और कहे गये हैं, उनका आधार है- भरतका 'नाट्यशास्त्र' (द्रष्टव्य १६। ४६) । भरतमुनिने प्रशंसा आदि पाँचों भेदोंके जो उदाहरण दिये हैं, वे भी सोलहवें अध्यायके श्लोक सैंतालीससे इक्यावनतक द्रष्टव्य हैं। ८. अग्निपुराणोक्त 'रूपक'का लक्षण नाट्यशास्त्रोक्त लक्षणका संक्षिप्त रूप है। अग्निपुराणके ही भावको लेकर दण्डीने “उपमैव तिरोभूतभेदा रूपकमुच्यते'-ऐसा लक्षण किया है। अर्वाचीन आलंकारिकोंने “रूपक 'के बहुत-से भेदों और उपभेदोंकी चर्चा की है। 'रूपक'का उदाहरण 'नाट्यशास्त्र' १६। ५८ में द्रष्टव्य है।

English

The hand is said to be mostly uncombined and combined: Pataka, Tripataka, and Kartarimukha,

अध्याय ३३९

श्लोक 14

अर्धचन्द्रोत्करालश् च शुकतुण्डस्तथैव च ।सुष्टिश् च शिखरश् चैव कपित्थः खेटकामुखः

ardhacandrotkarālaś ca śukatuṇḍastathaiva ca / suṣṭiś ca śikharaś caiva kapitthaḥ kheṭakāmukhaḥ

हिन्दी अर्थ

९. दण्डीने गुण और क्रियाका सहभावसे कथन 'सहोक्ति' माना है और “सह दीर्घा मम श्वासैरिमाः सम्प्रति रात्रयः।' (इस समय मेरी लम्बी साँसोंके साथ ये रातें भी बहुत बड़ी हो गयी हैं) ऐसा उदाहरण दिया है।

English

Ardhachandra, Utkarala, Shukatunda, Mushti, Shikhara, Kapittha, Khetakamukha,

अध्याय ३३९

श्लोक 15

सूच्यास्यः पद्मकोषो हि शिराः समृगशीर्षकाः ।कांमूलकालपद्मौ(२)* च चतुरभ्रमरौ तथा

sūcyāsyaḥ padmakoṣo hi śirāḥ samṛgaśīrṣakāḥ / kāṃmūlakālapadmau(2)* ca caturabhramarau tathā

हिन्दी अर्थ

१०. अर्थान्तरन्यासका जो लक्षण अग्निपुराणमें दिया गया है, लगभग इसीकी छायाको लेकर भामहने इस प्रकार अपने ग्रन्थमें उक्त अलंकारका लक्षण लिखा है -- उपन्यसनमन्यस्य यदर्थस्योदितादृते। ज्ञेयः सोऽर्थान्तरन्यासः पूर्वार्थानुगतो यथा॥ (का०२। ७१)

English

Suchyasya, Padmakosha, Shiras, Mrigashirsha, Kamulakalapadma, and Chatura, Bhramara,

अध्याय ३३९

श्लोक 16

हंसास्यहंसपक्षौ च सन्दंशमुकुलौ तथा ।१ आकल्पितं कल्पितञ्चेति ख॥ २ काङ्गूलकालपद्माविति ञ॥ कांमूलकालपद्मौ काङ्गूलकालपद्मौ एतत्पाठद्वयं न समीचीनं :प् २१३ उर्णनाभस्ताम्रचूडश् चतुर्विंशतिरित्यमी

haṃsāsyahaṃsapakṣau ca sandaṃśamukulau tathā / 1 ākalpitaṃ kalpitañceti kha.. 2 kāṅgūlakālapadmāviti ña.. kāṃmūlakālapadmau kāṅgūlakālapadmau etatpāṭhadvayaṃ na samīcīnaṃ :p 213 urṇanābhastāmracūḍaś caturviṃśatirityamī

हिन्दी अर्थ

वामनने इसमें सादृश्य, असादृश्य (साधर्म्य, वैधर्म्य)-की चर्चा नहीं की है, परंतु 'पूर्वार्धानुगतः '-यह विशेषण देकर उसी अर्थको व्यक्त किया है। अर्थात् जिस अर्थान्तरका उपन्यास किया जाय, वह पूर्वोदित अर्थका अनुगामी होना चाहिए। यह अनुगमन सादृश्य अथवा वैसाटृश्यसे ही सम्भव है। वामने अग्निपुराण तथा भामहके भावोंको अपने सूत्रमें और भी अधिक स्पष्ट किया है।

English

Hamsasya, Hamsapaksha, Sandamsha, Mukula, Urnanabha, Tamrachuda — these twenty-four;

अध्याय ३३९

श्लोक 17

असंयुतकराः प्रोक्ताः संयुतास्तु त्रयोदश ।अञ्जलिश् च कपोतश् च कर्कटः स्वस्तिकस् तथा

asaṃyutakarāḥ proktāḥ saṃyutāstu trayodaśa / añjaliś ca kapotaś ca karkaṭaḥ svastikas tathā

हिन्दी अर्थ

उक्तसिद्ध्यै वस्तुनो ऽर्थान्तरस्यैव न्यसनमर्थान्तरन्यासः ॥ (का०सू० ४। ३। २१) काव्यादर्शकार दण्डीने इसके लक्षणको और भी स्वच्छरूपसे प्रस्तुत किया है। यथा -- आचार्य मम्मरतक पहुँचते-पहुँचते इसका लक्षण पूर्णतः निखर उठा है। वे लिखते हैं -- सामान्यं वा विशेषो वा तदन्येन समर्थ्यते । यत्तु सोऽर्थान्तरन्यासः साधर्म्येणेतरेण या॥ (का०प्र० १०। १०९) अर्थात् -सामान्य अथवा विशेषका उससे भिन्न विशेष और सामान्यसे जो समर्थन किया जाता है, वह ' अर्थान्तरन्यास' है। यह समर्थन साधर्म्य अथवा वैधर्म्यको लेकर किया जाता है। इस प्रकार अर्थान्तरन्यासके चार भेद होते हैं। इनके उदाहरण काव्यप्रकाशमें

English

the uncombined hands are told; the combined are thirteen: Anjali, Kapota, Karkata, Svastika,

अध्याय ३३९

श्लोक 18

कटको वर्धमानश्चाप्यसङ्गो निषधस् तथा ।दोलः पुष्पपुटश् चैव तथा मकर एव च

kaṭako vardhamānaścāpyasaṅgo niṣadhas tathā / dolaḥ puṣpapuṭaś caiva tathā makara eva ca

हिन्दी अर्थ

द्रष्टव्य हैं। ११. इसी लक्षणको कुछ और विशद करते हुए भामहने इस प्रकार कहा है अविवक्षितसामान्या किंचिच्चोपमया सह । अतदूणक्रियायोगादुत्प्रेक्षातिशयान्विता॥ (का० २।९१) वामनने अग्निदेव तथा भामह-दोनोंके भावोंको अपने सूत्रमें इस प्रकार संकलित किया है--

English

Katakavardhamana, Asanga, Nishadha, Dola, Pushpaputa, and Makara,

अध्याय ३३९

श्लोक 19

गजदन्तो वहिस्तम्भो वर्धमानो ऽपरे कराः ।उरः पञ्चविधं स्यात्तु आभुग्ननर्तनादिकम्

gajadanto vahistambho vardhamāno 'pare karāḥ / uraḥ pañcavidhaṃ syāttu ābhugnanartanādikam

हिन्दी अर्थ

७२४ अग्निपुराण + वस्तु-धर्मका कीर्तन ' अतिशयालंकार'' कहलाता दिखाते हुए) अन्य किसी कारणको उद्भावना को है। यह 'सम्भव' और 'असम्भव'के भेदसे दो जाय अथवा स्वाभाविकता स्वीकार की जाय प्रकारका माना जाता है। जिसमें विशेष्यदर्शनके अर्थात् बिना किसी कारणके ही स्वाभाविक लिये गुण, जाति एवं क्रियादिकी विकलताका रूपसे कार्यको उत्पत्ति मानी जाय, उसे विभावना?

English

Gajadanta, Bahistambha, Vardhamana — other hands. The chest is fivefold: Abhugna, dancing and the like.

अध्याय ३३९

श्लोक 20

उदरन्दुरतिक्षामं खण्डं पूर्णमिति त्रिधा ।पार्श्वयोः पञ्चकर्माणि जङ्घाकर्म च पञ्चधा ।अनेकधा पादकर्म नृत्यादौ नाटके स्मृतम्

udaranduratikṣāmaṃ khaṇḍaṃ pūrṇamiti tridhā / pārśvayoḥ pañcakarmāṇi jaṅghākarma ca pañcadhā / anekadhā pādakarma nṛtyādau nāṭake smṛtam

हिन्दी अर्थ

प्रदर्शन-अनपेक्षताका प्रकाशन हो, उसको कहते हैं । परस्पर असंगत पदार्थोंका जहाँ युक्तिके “विशेषोक्ति'' कहा जाता है। जिसमें प्रसिद्ध द्वारा विरोधपूर्वक संगतिकरण किया हेतुकी व्यावृत्तिपूर्वक (अर्थात् उसका अभाव जाय, वह 'विरोधालंकार” होता है। जिसकी

English

The belly is threefold: hollow, thin (kshama), and full (a part and whole). The sides have five actions; the shank action is fivefold; the foot action is of many kinds, remembered in dance and drama.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 339
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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