अध्याय ३३९
श्लोक 1
नृत्यादावङ्गकर्मनिरूपणं अग्निर् उवाच चेष्टाविशेषमप्यङ्गप्रत्यङ्गे कर्म चानयोः ।शरीरारम्भमिच्छन्ति प्रायः पूर्वो ऽवलाश्रयः
nṛtyādāvaṅgakarmanirūpaṇaṃ agnir uvāca ceṣṭāviśeṣamapyaṅgapratyaṅge karma cānayoḥ / śarīrārambhamicchanti prāyaḥ pūrvo 'valāśrayaḥ
हिन्दी अर्थ
हैं। यह उपमा अपने उपमानको दृष्टिसे दो प्रकारकी होती है-साधारणी' और ' अतिशायिनी '। जो एकका उपमेय है, वही दूसरेका उपमान हो, १. “व्यतिरिकोपमा'को ही अर्वाचीन आलंकारिकोंने ' व्यतिरेक' नामक अलंकार माना है । दण्डीने इसका उल्लेख नहीं किया है। परंतु रुय्यक और मम्मटने इसका उदाहरण यों दिया है- चन्द्रमा बारंबार क्षीण हो-होकर भी पुनः बढ़ जाता है; परंतु यौवन यदि चला गया तो फिर लौटता नहीं।' इसमें उपमानभूत चन्द्रमाकी अपेक्षा उपमेय यौवनकी अस्थिरता अधिक बतायी गयी है। अतः यहाँ ' व्यतिरेक' है।
English
RV. 10.90.1a.