Agni Purana· Agni Purāṇa
340
अध्याय 340 / 381

Adhyaya 341

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अध्याय ३४०

श्लोक 1

अभिनयादिनिरूपणं अग्निर् उवाच आभिमुख्यन्नयन्नर्थान्विज्ञेयो ऽभिनयो बुधैः ।चतुर्धा सम्भवः सत्त्ववागङ्गाहरणाश्रयः

abhinayādinirūpaṇaṃ agnir uvāca ābhimukhyannayannarthānvijñeyo 'bhinayo budhaiḥ / caturdhā sambhavaḥ sattvavāgaṅgāharaṇāśrayaḥ

हिन्दी अर्थ

अतद्रूपस्यान्यथाध्यवसानमतिशयार्थमुत्परेक्षा ॥ (का० सू० ४।३।९) दण्डीका लक्षण इस प्रकार है-- यही लक्षण अग्निपुराणमें भी है। दण्डीने उसे ज्यों-का-त्यों ले लिया है। अन्तर केवल इतना ही है कि अग्निपुराणमें “मन्यते? क्रियाका प्रयोग है और काव्यादर्शमें 'उत्प्रेक्ष्यते क्रियाका।

English

The women may deliver prematurely or may not deliver at the appropriate time. They may deliver children with deformities or deliver twins etc. One should worship the women and brahmins in the case of such deviations in the delivery (as above).

अध्याय ३४०

श्लोक 2

स्तम्भादिः सात्त्विको वागारम्भो वाचिक आङ्गिकः ।शरीरारम्भ आहार्यो बुद्ध्यारम्भप्रवृत्तयः

stambhādiḥ sāttviko vāgārambho vācika āṅgikaḥ / śarīrārambha āhāryo buddhyārambhapravṛttayaḥ

हिन्दी अर्थ

आचार्य मम्मटने थोड़े-से शब्दोंमें ही उत्प्रेक्षाका सर्वसम्मत रूप रख दिया है। यथा--

English

Where the fire does not glow, the waterpots ooze, there is the fear of death and witchcraft as the result of the portents. The portent is appeased by the worship of brahmins and gods, recitation of hymns and offer of oblations.

अध्याय ३४०

श्लोक 3

रसादिविनियोगो ऽथ कथ्यते ह्य् अभिमानतः ।तमन्तरेण सर्वे षामपार्थैव स्वतन्त्रता

rasādiviniyogo 'tha kathyate hy abhimānataḥ / tamantareṇa sarve ṣāmapārthaiva svatantratā

हिन्दी अर्थ

“सम्भावनमथोत्तरेक्षा प्रकृतस्य समेन यत्।' (का० प्रर १०। ९२) अर्थात् “प्रकृत (वर्ण्यं उपमेय) -की सम (उपमान)-के साथ सम्भावना ' उत्प्रेक्षा’ कहलाती है।''

English

O Brahmin! Water for washing the feet (should be offered) with the three (hymns beginning with) hiraiyamrr. Water for sipping ( is offered with the recitation of the hymn) ianna 3po and for bathing with (the hymn) idam&paht.

अध्याय ३४०

श्लोक 4

सम्भोगो विप्रलम्भश् च शृङ्गारो द्विविधः स्मृतः ।प्रच्छन्नश् च प्रकाशश् च तावपि द्विविधौ पुनः

sambhogo vipralambhaś ca śṛṅgāro dvividhaḥ smṛtaḥ / pracchannaś ca prakāśaś ca tāvapi dvividhau punaḥ

हिन्दी अर्थ

१. यह अतिशय ही आगे चलकर ' अतिशयोक्ति'के नामसे प्रसिद्ध हुआ है । आग्निपुराणके इस सूक्ष्म लक्षणको आचार्य भामहने विशद करते हुए कहा है कि किसी “ कारणवश लोकोत्तर अर्थका बोधक जो वचन है, उसे ' अतिशयोक्ति’ अलंकार मानते हैं। वामनने इसके असम्भव-पक्षको नहीं लिया है। वे सम्भाव्य धर्म तथा उसके उत्कर्षकी कल्पनाको ही ' अतिशयोक्ति मानते हैं (४।३।१०)। लोकसीमातीत होनेपर ही वस्तुधर्ममें उत्कर्ष सिद्ध होता है । आचार्य दण्डीने अग्निपुराणोक्त लक्षणके केवल भावकी ही नहीं, शब्दकी भी

English

Perfumes (are offered) with the three (hymns) rathe akse and dress with (the hynm) ytwa. Flowers (are given) with ( the recitation of the hymn ) pufpavatify' and • incense with ( the hymn ) dhupo*si.

अध्याय ३४०

श्लोक 5

विप्रलम्भाभिधानो यः शृङ्गारः स चतुर्विधः ।पूर्वानुरागानाख्यः प्रवामकरुणात्मकः

vipralambhābhidhāno yaḥ śṛṅgāraḥ sa caturvidhaḥ / pūrvānurāgānākhyaḥ pravāmakaruṇātmakaḥ

हिन्दी अर्थ

छाया ली है। यथा -- विवक्षा या विशेषस्य लोकसीमातिवर्तिनी । असावतिशयोक्ति: स्यादलंकारोत्तमा यथा॥ (काव्यादर्श २। २१४)

English

RV. 10.9.1a.

अध्याय ३४०

श्लोक 6

एतेभ्यो ऽन्यतरं जायमानमम्भोगलक्षणम् ।विवर्तते चतुर्धैव न च प्रागतिवर्तते

etebhyo 'nyataraṃ jāyamānamambhogalakṣaṇam / vivartate caturdhaiva na ca prāgativartate

हिन्दी अर्थ

आचार्य मम्मटके द्वारा ' अतिशयोक्ति 'का विकसित स्वरूप इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है। उपमानके द्वारा उपमेयका निगरण करके जो कल्पित अभेद-कथनरूप अध्यवसान करना है, वह एक प्रकारकी ' अतिशयोक्ति' है । प्रस्तुत अर्थका अन्यरूपसे वर्णन द्वितीय प्रकारकी, “यदि 'के समानार्थक शब्दको लगाकर की गयी कल्पना तृतीय प्रकारकी और कार्य-कारणके पौर्वापर्यका विपर्यय चतुर्थ प्रकारकी अतिशयोक्ति ' है। (का० प्र० १०। १००-१०१)

English

RV.Kh. 5-87.1a.

अध्याय ३४०

श्लोक 7

स्त्रीपुंसयोस्तदुदयस्तस्य निर्विर्तिका रतिः ।निखिलाः सात्त्विकास्तत्र वैवर्ण्यप्रलयौ विना

strīpuṃsayostadudayastasya nirvirtikā ratiḥ / nikhilāḥ sāttvikāstatra vaivarṇyapralayau vinā

हिन्दी अर्थ

२. दण्डीके ' काव्यादर्श 'में अग्निपुराणकी ही शब्दावलीमें 'विशेषोक्ति' लक्षित करायी गयी है। भामहने भी अग्निपुराणके ही भाव तथा शब्दकी छाया ली है। यथा -- वामनने भी एकगुणहानिकल्पनायां साम्यदार्ढ्यं विशेषोक्तिः ।'--इस सूत्रमें ऐसा ही भाव व्यक्त किया है । अर्वाचीन आलंकारिकोंने

English

AV. 1.6.4a.

अध्याय ३४०

श्लोक 8

धर्मार्थकाममोक्षैश् च शृङ्गार उपचीयते ।आलम्वनविशेषैश् च तद्विशेषैर् निरन्तरः

dharmārthakāmamokṣaiś ca śṛṅgāra upacīyate / ālamvanaviśeṣaiś ca tadviśeṣair nirantaraḥ

हिन्दी अर्थ

“कारण प्राप्त होनेपर भी जो कार्यका न होना बताया जाय, उसे 'विशेषोक्ति' कहा है।'' जैसा कि आचार्य मम्मटका कथन है-- “ विशेषोक्तिरखण्डेषु कारणेषु फलावचः ॥' (१०। १०८) ३. काव्यादर्शकार दण्डीने अग्निपुराणमें दिये गये लक्षणकी आनृपूर्वीको ही अपने ग्रन्थमें उद्धत किया है। भामहने कारणभूत क्रियाका निषेध होनेपर भी उसके फलकी ' उद्धावना' को “विभावना' माना है। इसी भावको वामनने भी अपने सूत्रमें अभिव्यक्त किया है। यथा —

English

RV. 1.23.22a.

अध्याय ३४०

श्लोक 9

शृङ्गारं द्विविधं विद्याद्वाङ्नेपथ्यक्रियात्मकम् ।हासश् च तुर्विधो ऽलक्ष्यदन्तः स्मित इतीरितः

śṛṅgāraṃ dvividhaṃ vidyādvāṅnepathyakriyātmakam / hāsaś ca turvidho 'lakṣyadantaḥ smita itīritaḥ

हिन्दी अर्थ

'क्रियाप्रतिषेधे प्रसिद्धतत्फलव्यक्तिर्विभावना॥' (काव्यालंकार, सू० ४। ३। १३) आचार्य मम्मटने अपनी कारिकामें उक्त सूत्रका ही भाव ग्रहण किया है-- “सरस्वतीकण्ठाभरण 'के रचयिता राजा भोजने “विभावना 'के अपने लक्षणमें अग्निपुराणकी शब्दावलीको ही अविकलरूपसे ले लिया है।

English

Rathe akfefu, AV. 6.38.3m.

अध्याय ३४०

श्लोक 10

किञ्चिल्लक्षितदन्ताग्रं हसितं फुल्ललोचनम् ।विहसितं सस्वनं स्याज्जिह्मोपहसितन्तु तत्

kiñcillakṣitadantāgraṃ hasitaṃ phullalocanam / vihasitaṃ sasvanaṃ syājjihmopahasitantu tat

हिन्दी अर्थ

४. भामहने “विरोध'का लक्षण इस प्रकार बताया है-- विशेषता बतानेके लिये किसी गुण या क्रियाके विरुद्ध अन्य क्रियाका वर्णन हो, तो उसे विद्वान् “विरोध' कहते हैं ''--

English

Gf. Bloomfield, Vedie Concordance p -93.

अध्याय ३४०

श्लोक 11

सशब्दं पापहसितमशब्दमतिहासितं ।यश्चासौ करुणो नाम स रसस्त्रिविधो भवेत्

saśabdaṃ pāpahasitamaśabdamatihāsitaṃ / yaścāsau karuṇo nāma sa rasastrividho bhavet

हिन्दी अर्थ

सिद्धि अभिलषित हो, ऐसे अर्थका साधक है और उन्हीं भेदोंमें कार्य-कारणभावसे अथवा “हेतु” अलंकार कहलाता है। उस ' हेतु' अलंकारके किसी नियामक स्वभावसे या अविनाभावके भी 'कारक' एवं 'ज्ञापक'--ये दो भेद हो जाते दर्शनसे जो अविनाभावका नियम होता है, वह हैं। इनमें कारक-हेतु कार्य-जन्मके पूर्वमें और ज्ञापक हेतुका भेद है। 'नदीपूर' आदिका दर्शन पश्चात् भी रहनेवाला है, जो 'पूर्वशेष' कहा जाता ज्ञापकका उदाहरण है! ॥ २४--३२॥

English

Laughter with sound, sinful laughter, soundless, and excessive laughter. The one called pathetic is a sentiment of three kinds:

अध्याय ३४०

श्लोक 12

धर्मोपघातजश्चित्तविलासजनितस् तथा ।शोकः शोकाद्भवेत् स्थायी कः स्थायी पूर्वजो मतः

dharmopaghātajaścittavilāsajanitas tathā / śokaḥ śokādbhavet sthāyī kaḥ sthāyī pūrvajo mataḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अर्थालकारका वर्णन” नामक तीन सौ चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

arising from injury to dharma, and born of play of mind; grief arises from sorrow, the abiding feeling — which is held the earlier-born.

अध्याय ३४०

श्लोक 13

अङ्गनेपथ्यवाक्यैश् च रौद्रो ऽपि त्रिविधो रसः ।तस्य निर्वर्तकः क्रोधः स्वेदो रोमाञ्चवपथुः

aṅganepathyavākyaiś ca raudro 'pi trividho rasaḥ / tasya nirvartakaḥ krodhaḥ svedo romāñcavapathuḥ

हिन्दी अर्थ

शब्दार्थो भयालंकार अग्निदेव कहते हैं-- वसिष्ट ! ' शब्दार्थालंकार' शब्द और अर्थ दोनोंको समानरूपसे अलंकृत करता है; जैसे एक ही अङ्गमें धारण किया हुआ हार कामिनीके कण्ठ एवं कुचमण्डलको कान्तिको

English

By limbs, costume and speech the furious sentiment too is threefold; its producer is anger, sweat, horripilation and trembling.

अध्याय ३४०

श्लोक 14

दानवीरो धर्मवीरो युद्धवीर इति त्रयम् ।वीरस्तस्य च निष्पत्तिहेतुरुत्साह इष्यते

dānavīro dharmavīro yuddhavīra iti trayam / vīrastasya ca niṣpattiheturutsāha iṣyate

हिन्दी अर्थ

बढ़ा देता है। ' शब्दार्थालंकार' के छः भेद काव्यमें उपलब्ध होते हैं-प्रशस्ति, कान्ति, औचित्य, संक्षेप, यावदर्थता तथा अभिव्यक्ति। दूसरोंके मर्मस्थलको द्रवीभूत करनेवाले वाक्-कौशलको

English

The heroic: hero of gift, hero of dharma, hero of battle — three. The cause of its production is said to be energy (utsaha).

अध्याय ३४०

श्लोक 15

आरम्भेषु भवेद्यत्र वीरमेवानुवर्तते ।भयानको नाम रसस्तस्य निर्वर्तकं भयं

ārambheṣu bhavedyatra vīramevānuvartate / bhayānako nāma rasastasya nirvartakaṃ bhayaṃ

हिन्दी अर्थ

“ प्रशस्ति’ कहते हैं। वह प्रशस्ति 'प्रेमोक्ति’ एवं 'स्तुति'के भेदसे दो प्रकारकी मानी गयी है। प्रेमोक्ति और स्तुतिके पर्यायवाचक शब्द क्रमशः 'प्रियोक्ति' एवं गुण-कोर्तन' हैं । वाच्य-वाचकको सर्वसम्मत एवं रुचिकर संगतिको 'कान्ति' कहते हैं। यदि ओज एवं माधुर्ययुक्त संदर्भमें -वस्तुके अनुसार रीति एवं वृत्तिके अनुसार रसका प्रयोग हो तो औचित्यका प्रादुर्भाव होता है। अल्पसंख्यक

English

Where in beginnings the heroic alone follows — the sentiment named terrible has fear as its producer;

अध्याय ३४०

श्लोक 16

उद्वेजनः क्षोभणश् च वीभत्सो द्विविधः स्मृतः ।उद्वेजनः स्यात् प्लुत्याद्यैः क्षोभणो रुधिरादिभिः

udvejanaḥ kṣobhaṇaś ca vībhatso dvividhaḥ smṛtaḥ / udvejanaḥ syāt plutyādyaiḥ kṣobhaṇo rudhirādibhiḥ

हिन्दी अर्थ

शब्दोंसे अर्थ-बाहुल्यका संग्रह ' संक्षेप तथा शब्द एवं वस्तुका अन्यूनाधिक्य “यावदर्थता' कहा जाता है। अर्थ-प्राकट्यको “अभिव्यक्ति! कहते हैं। उसके दो भेद हैं-'श्रुति' और 'आक्षेप'।

English

disturbing and agitating: the odious is remembered twofold; the disturbing by leaps and the like; the agitating by blood and the like;

अध्याय ३४०

श्लोक 17

जगुप्सारम्भिका तस्य सात्त्विकांशो निवर्तते ।काव्यशोभाकरान् धर्मानलङ्कारान् प्रचक्ष्यते

jagupsārambhikā tasya sāttvikāṃśo nivartate / kāvyaśobhākarān dharmānalaṅkārān pracakṣyate

हिन्दी अर्थ

शब्दके द्वारा अपने अर्थका उद्घाटन ' श्रुति’ कहा जाता है। श्रुतिके दो भेद हैं --'नैमित्तिकी' और “पारिभाषिकी '। “संकेत' को परिभाषा कहते हैं। परिभाषाके सम्बन्धसे ही वह पारिभाषिकी है। दण्डीने “जहाँ प्रस्तुत वस्तुकी विशेषता (उत्कर्ष) दिखानेके लिये परस्परविरुद्ध संसर्ग (एकत्र अवस्थान) प्रदर्शित किया जाय,

English

disgust begins it; its sattvic part arises. The properties that make the beauty of poetry are called ornaments (alankara).

अध्याय ३४०

श्लोक 18

अलङ्करिष्णवस्ते च शब्दमर्थमुभौ त्रिधा ।ये व्युत्पत्त्यादिना शब्दमलङ्कर्तुमिह क्षमाः

alaṅkariṣṇavaste ca śabdamarthamubhau tridhā / ye vyutpattyādinā śabdamalaṅkartumiha kṣamāḥ

हिन्दी अर्थ

वह “विरोध' नामक अलंकार है''--ऐसा लक्षण किया है। वामनने ' विरुद्धाभासत्वं विरोध: ।' (४।३। १२)--ऐसा कहा है। “काव्यप्रकाश ' में “विरुद्ध: सोऽविरुद्धेऽपि विरुद्धत्वेन यद्वचः ।'--ऐसा विरोधका लक्षण देखा जाता है । इन सबकी शब्दावलीमें किंचित् भेद होते हुए भी अभिप्राय सबका एक ही जान पड़ता है। विरोधपूर्वक संगतिकरणको कुछ लोग ' असंगति' अलंकार भी मानते हैं।

English

They are the adorners of word, meaning and both — threefold. Those which here are able to adorn the word by derivation and the like

अध्याय ३४०

श्लोक 19

शब्दालङ्कारमाहुस्तान् काव्यमीमांसका विदः ।छाया मुद्रा तथोक्तिश् च युक्तिर्गुम्फनया सह

śabdālaṅkāramāhustān kāvyamīmāṃsakā vidaḥ / chāyā mudrā tathoktiś ca yuktirgumphanayā saha

हिन्दी अर्थ

१. अग्निपुराणमें वर्णित हेतु' अलंकारको भामहने चमत्कार-शून्य बताकर अस्वीकार कर दिया है । उन्होंने 'सूक्ष्म' और 'लेश'को भी अलंकार नहीं माना है। परंतु दण्डीने “वाचामुत्तमभूषणम्'-यों कहकर इन तीनोंको उत्तम अलंकारकी कोटिमें रखा है। उन्होंने 'हेतु' का कोई स्वतन्त्र लक्षण नहीं दिया है, परंतु अग्निपुराणोक्त कारक और ज्ञापक दोनों हेतुओंका उल्लेख किया है । अत: अग्निपुराणोक्त लक्षण ही उन्हें अभिमत है। अग्नि धूमका कारक हेतु है और धूम अग्निका ज्ञापक हेतु। इस प्रकार हेतुके दोनों भेद देखे जाते हैं। आचार्य दण्डी 'हेतु' में ही ' काव्यलिङ्ग', ' अनुमान' तथा कार्यकारणमूलक ' अर्थान्तरन्यास ' का अन्तर्भाव मानते हैं। अतएव उन्होंने इन सबके पृथक् लक्षण आदि नहीं लिखे हैं। भोजराजने 'हेतु'का ' क्रियाया: कारणे हेतुः '--ऐसा लक्षण किया है।

English

are called word-ornaments by those knowing poetics: chhaya, mudra, ukti, yukti, gumphana,

अध्याय ३४०

श्लोक 20

वाकोवाक्यमनुप्रासश्चित्रं दुष्करमेव च ।ज्णेया नवालङ्कृतयः शब्दानामित्यसङ्करात्

vākovākyamanuprāsaścitraṃ duṣkarameva ca / jṇeyā navālaṅkṛtayaḥ śabdānāmityasaṅkarāt

हिन्दी अर्थ

२. जैसे नदीके जलप्रवाहके दर्शनसे उसके उद्गम-स्थानकी सत्ता सिद्ध होती है तथा धूमके दर्शनसे अग्निकी सत्ता सूचित होती है। इस तरहके वर्णनोंमें ज्ञापक हेतु समझना चाहिए।

English

vakovakya, anuprasa, chitra and dushkara — nine ornaments of words are to be known, without mixing.

अध्याय ३४०

श्लोक 21

तत्रान्योक्तेरनुकृतिश्छाया सापि चत्रुव्विधा ।लोकच्छेकार्भकोक्तीनामेकोक्तेरनुकारतः

tatrānyokteranukṛtiśchāyā sāpi catruvvidhā / lokacchekārbhakoktīnāmekokteranukārataḥ

हिन्दी अर्थ

पारिभाषिकीको 'मुख्या' और नैमित्तिकीको ' औपचारिकी ' कहते हैं। ये ही क्रमश: ' अभिधा' और “लक्षणा' हैं। उस औपचारिकीके भी दो भेद हैं। जिसके द्वारा अभिधेय अर्थसे स्खलित हुआ शब्द किसी निमित्तवश अमुख्य अर्थका बोधक होता है, वह वृत्ति 'औपचारिकी' है। ये ही दोनों भेद नैमित्तिकीके भी होते हैं। वह लक्षणायोगसे 'लाक्षणिकी ' और गुणयोगसे “गौणी '

English

Of these, imitation of another's speech is Chhaya, and that too is fourfold: by imitation of the single utterance of popular, clever, childish speech;

अध्याय ३४०

श्लोक 22

आभाणकोक्तिर्लोकोक्तिः सर्वसामान्य एव ताः ।यानुधावति लोकोक्तिश्छायामिच्छन्ति तां बुधाः

ābhāṇakoktirlokoktiḥ sarvasāmānya eva tāḥ / yānudhāvati lokoktiśchāyāmicchanti tāṃ budhāḥ

हिन्दी अर्थ

कहलाती है। अभिधेय अर्थके साथ सम्बद्ध रहकर जो अन्यार्थकी प्रतीति होती है, उसको "लक्षणा? कहते हैं। अभिधेयके साथ सम्बन्ध, सामीप्य, समवाय, वैपरीत्य एवं क्रियायोगसे

English

proverbial speech, popular speech — those are common to all; that which follows popular speech the wise desire as Chhaya.

अध्याय ३४०

श्लोक 23

छेका विदग्धा वैदग्ध्यं कलासु कुशला मतिः ।तामुल्लिखन्ती छेकोक्तिश्छाया कविभिरिष्यते

chekā vidagdhā vaidagdhyaṃ kalāsu kuśalā matiḥ / tāmullikhantī chekoktiśchāyā kavibhiriṣyate

हिन्दी अर्थ

लक्षणा पाँच प्रकारकी मानी जाती है। गुणोंकी अनन्तता होनेसे उनकी विवक्षाके कारण गौणीके अनन्त भेद हो जाते हैं। लोकसीमाके पालनमें तत्पर कविद्वारा जब अप्रस्तुत वस्तुके धर्म प्रस्तुत वस्तुपर सम्यग्रूपसे आहित- आरोपित किये जाते

English

The clever are the refined; refinement is intelligence skilled in arts; the Chhekokti expressing that is desired by poets as Chhaya.

अध्याय ३४०

श्लोक 24

अव्युत्पन्नोक्तिरखिलैर् अर्भकोक्त्योपलक्ष्यते ।तेनार्भकोक्तिश्छाया तन्मात्रोक्तिमनुकुर्वती

avyutpannoktirakhilair arbhakoktyopalakṣyate / tenārbhakoktiśchāyā tanmātroktimanukurvatī

हिन्दी अर्थ

हैं, तब उसे “समाधि कहते हैं। जिसके द्वारा श्रुतिसे अनृपलब्ध अर्थ चैतन्ययुक्त होकर भासित होता है, वह ' आक्षेप कहा जाता है। इसको ' ध्वनि' भी माना गया है; क्योंकि वह ध्वनिसे ही

English

Speech of the untrained is observed by all as childish speech; therefore Arbhakokti Chhaya imitates only that speech.

अध्याय ३४०

श्लोक 25

विप्लुताक्षरमश्लीलं वचो मत्तस्य तादृशी ।या सा भवति मत्तोक्तिश्छायोक्ताप्यतिशोभते

viplutākṣaramaślīlaṃ vaco mattasya tādṛśī / yā sā bhavati mattoktiśchāyoktāpyatiśobhate

हिन्दी अर्थ

व्यक्त होता है। इसमें ध्वनिके आश्रयसे शब्द और अर्थके द्वारा स्वतः संकलित अर्थ ही व्यञ्जित होता है। अभीष्ट कथनका विशेष विवक्षासे अर्थात् उसमें और भी उत्कर्षकी प्रतीति करानेके लिये जो प्रतिषेध-सा होता है, उसको ' आक्षेप” कहते हैं। अधिकार (प्रकरण) -से पृथक्, अर्थात् अप्रकृत या अप्रस्तुत अन्य वस्तुको जो स्तुति की जाती है, उसे 'अस्तुतस्तोत्र” (अप्रस्तुतप्रशंसा)

English

Speech with scrambled letters and indecent, of a drunken man — such is Mattokti; that Chhaya too shines greatly.

अध्याय ३४०

श्लोक 26

अभिप्रायविशेषेण कविशक्तिं विवृण्वती ।मुत्प्रदायिनीति सा मुद्रा सैव शय्यापि नो मते

abhiprāyaviśeṣeṇa kaviśaktiṃ vivṛṇvatī / mutpradāyinīti sā mudrā saiva śayyāpi no mate

हिन्दी अर्थ

कहते हैं । जहाँ किसी एक वस्तुके कहनेपर उसके समान विशेषणवाले दूसरे अर्थकी प्रतीति हो, उसे विद्वान् पुरुष अर्थको संक्षिप्ताके कारण 'समासोक्ति कहते हैं। वास्तविक पदार्थका

English

By a special intention, showing the poet's power, bringing delight — that is Mudra; that same is Shayya, not in my view.

अध्याय ३४०

श्लोक 27

उक्तिः सा कथ्यते यस्यामर्थको ऽप्युपपत्तिमान् ।लोकयात्रार्थविधिना धिनोति हृदयं सतां

uktiḥ sā kathyate yasyāmarthako 'pyupapattimān / lokayātrārthavidhinā dhinoti hṛdayaṃ satāṃ

हिन्दी अर्थ

अपलाप या निषेध करके किसी अन्य १. अग्निपुराणमें समाधि’ का जो लक्षण किया गया है, वह भरतमुनिके निम्नाङ्कित श्लोकपर आधारित है- अभियुक्तैर्निशेषस्तु योऽर्थस्यैवोपलभ्यते । तेन चार्थेन सम्पन्न: समाधिः परिकीर्त्यते ॥

English

That is called Ukti in which even the meaning is reasonable and pleases the hearts of the good by the rule of worldly conduct.

अध्याय ३४०

श्लोक 28

उभौ विधिनिषेधौ च नियमानियमावपि ।विकल्पपरिसङ्ख्ये च तदीयाः षडथोक्तयः

ubhau vidhiniṣedhau ca niyamāniyamāvapi / vikalpaparisaṅkhye ca tadīyāḥ ṣaḍathoktayaḥ

हिन्दी अर्थ

दण्डीने अग्निपुराणोक्त लक्षणको अविकलरूपसे अपने ग्रन्थमें ले लिया है। वामनने आरोहावरोहक्रमरूप 'समाधि'को शब्दगुण स्वीकार किया है, किंतु भोजराजने अग्निपुराण और दण्डीके ही भावको लेकर --' समाधिः सोऽन्यधर्माणां यदन्यत्राधिरोपणम्।'--यह लक्षण लिखा है । वाग्भट्टने भी यही बात कही है-- अन्यस्य धर्मो यत्रान्यत्रारोप्यते स समाधि: '।

English

Command and prohibition, rule and non-rule, option and exclusion — six are its utterances.

अध्याय ३४०

श्लोक 29

अयुक्तयोरिव मिथो वाच्यवाचकयोर्द्वयोः ।योजनायै कल्प्यमाना युक्तिरुक्ता मनीषिभिः

ayuktayoriva mitho vācyavācakayordvayoḥ / yojanāyai kalpyamānā yuktiruktā manīṣibhiḥ

हिन्दी अर्थ

२. यहाँ आक्षेपको ध्वनिरूप बताया गया है; क्योंकि उससे अर्थविशेषका ध्वनन होता है। ३. यह ' आक्षेपालंकार'का लक्षण है। आचार्य मम्मटने भी इसी भावका आश्रय लेकर कहा है कि--

English

The arrangement imagined for joining two, speakable and speaker, that are as if unrelated mutually, is called Yukti by the wise.

अध्याय ३४०

श्लोक 30

पदञ्चैव पदार्थश् च वाक्यं वाक्यर्थमेव च ।विषयो ऽस्त्याः प्रकरणं प्रपञ्चश्चेति षड्विधः

padañcaiva padārthaś ca vākyaṃ vākyarthameva ca / viṣayo 'styāḥ prakaraṇaṃ prapañcaśceti ṣaḍvidhaḥ

हिन्दी अर्थ

इस लक्षणमें उक्त विषय और वक्ष्यमाण विषयके भेदसे आक्षेपके दो प्रकार बताये गये हैं।

English

Word, word-meaning, sentence and sentence-meaning, subject, context, and expansion — thus sixfold.

अध्याय ३४०

श्लोक 31

गुम्फना रचनाचर्या शब्दार्थक्रमगोचरा ।शब्दानुकारादर्थानुपूर्वार्थेयं क्रमात्त्रिधा

gumphanā racanācaryā śabdārthakramagocarā / śabdānukārādarthānupūrvārtheyaṃ kramāttridhā

हिन्दी अर्थ

४. इस ' अस्तुत-स्तोत्रको ही परवर्ती आलंकारिकोंने ' अप्रस्तुतप्रशंसा' नाम दिया है; इसी को ' अन्योक्ति' भी कहते हैं । अग्निपुराणमें जो लक्षण दिया गया है, उसीको भामहने अविकलरूपसे उद्धूत किया है । अन्तर इतना ही है कि वे“ अस्तुतस्तोत्र'के स्थानमें ' अप्रस्तुतप्रशंसा ' लिखते हैं। उनका लक्षण इस प्रकार है --

English

Gumphana is the practice of composition concerning the order of words and meanings; by imitation of words, by sequence of meaning, by meaning — threefold in order.

अध्याय ३४०

श्लोक 32

उक्तिप्रत्युक्तिमद्वाक्यं वाकोवाक्यं द्विधैव तत् ।ऋजुवक्रोक्तिभेदेन तत्राद्यं सहजं वचः

uktipratyuktimadvākyaṃ vākovākyaṃ dvidhaiva tat / ṛjuvakroktibhedena tatrādyaṃ sahajaṃ vacaḥ

हिन्दी अर्थ

अधिकारादपेतस्य वस्तुनोऽन्यस्य या स्तुतिः । अप्रस्तुतप्रशंसेति सा चैवं कथ्यते यथा॥

English

A sentence with utterance and reply is Vakovakya, twofold: by the difference of straight and crooked speech, the first is natural speech;

अध्याय ३४०

श्लोक 33

सा पूर्वप्रश्निका प्रश्नपूर्विकेति द्विधा भवेत् ।वक्रोक्तिस्तु भवेड्भङ्ग्या काकुस्तेन कृता द्विधा

sā pūrvapraśnikā praśnapūrviketi dvidhā bhavet / vakroktistu bhaveḍbhaṅgyā kākustena kṛtā dvidhā

हिन्दी अर्थ

दण्डीने इसी भावको संक्षिप्त शब्दोंमें व्यक्त किया है -- ' अप्रस्तुतप्रशंसा स्यादप्रक्रान्तेषु या स्तुति: ।' (२। ३४०) वामनने उपमेयकी अनुक्तिमें 'समासोक्ति' और किंचिद् उक्तिमें ' अप्रस्तुतप्रशंसा ' मानी है। ५. आचार्य भामहने अपने ग्रन्थमें अग्निपुराणोक्त लक्षणको ज्यों-का-त्यों ले लिया है। अन्तर इतना ही है कि अग्निपुराणमें 'उदिता' है और भामहके ग्रन्थमें ' उद्दिष्टा'। वहाँ अन्तमें “बुधैः ' पदका प्रयोग है और यहाँ “यथा 'का। दण्डीने इसी भावको कुछ अधिक

English

that has two forms: with earlier question and with question first; Vakrokti arises by bhangi and kaku, twofold by that.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 340
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.