Agni Purana· Agni Purāṇa
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अध्याय 341 / 381

Adhyaya 342

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अध्याय ३४१

श्लोक 1

शब्दालङ्काराः अग्निरुचाच स्यादावृत्तिरनुप्रासो वर्णानां पदवाक्ययोः ।एकवर्णानेकवर्णावृत्तेर्वर्णगुणो द्विधा

śabdālaṅkārāḥ agnirucāca syādāvṛttiranuprāso varṇānāṃ padavākyayoḥ / ekavarṇānekavarṇāvṛttervarṇaguṇo dvidhā

हिन्दी अर्थ

स्पष्टताके साथ इस प्रकार लिखा है--

English

RV. 10.97-3b.

अध्याय ३४१

श्लोक 2

एकवर्णगतावृत्तेर्जायन्ते पञ्च वृत्तयः ।मधुरा ललिता प्रौटा भद्रा परुषया सह

ekavarṇagatāvṛtterjāyante pañca vṛttayaḥ / madhurā lalitā prauṭā bhadrā paruṣayā saha

हिन्दी अर्थ

पदार्थको सूचित करना 'अपहनुति® है। जो प्रस्तुत किया जाता है, उसको 'पर्यायोक्ति” अभिधेय दूसरे प्रकारसे कहा जाता है अर्थात् कहते हैं। इनमेंसे किसी भी एकका नाम सीधे न कहकर प्रकारान्तरसे घुमा-फिराकर ध्वनि है॥ १--१८॥' इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'शब्दार्थोभयालकारोका कथन” नामक तीन सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

Of. dkar asi. Tail. Sam. 1. 1.4.1.

अध्याय ३४१

श्लोक 3

मधुरायाश् च वर्गन्तादधो वर्ग्या रणौ स्वनौ(१) ।ह्रस्वस्वरेणान्तरितौ संयुक्तत्वं नकारयोः

madhurāyāś ca vargantādadho vargyā raṇau svanau(1) / hrasvasvareṇāntaritau saṃyuktatvaṃ nakārayoḥ

हिन्दी अर्थ

अग्निदेव कहते हैं--द्विजश्रेष्ठ ! गुणहीन काव्य अलंकारयुक्त होनेपर भी सहदयके लिये प्रीतिकारक नहीं होता, जैसे नारीके यौवनजनित लालित्यसे" रहित शरीरपर हार भी भारस्वरूप हो जाता है।

English

In the absence of an image (of Lord Vi?Eiu) ( the deity should be invoked) on the altar or in water or - in 'a pot full (with water) or on the banks of a river or in a lotus. One would thus accomplish the propitiation by worshipping (lord) Vi§nu.

अध्याय ३४१

श्लोक 4

न कार्या वर्ग्यवर्णानामावृत्तिः पञ्चमाधिका ।महाप्राणोष्मसंयोगप्रविमुक्तलघूत्तरौ(२)

na kāryā vargyavarṇānāmāvṛttiḥ pañcamādhikā / mahāprāṇoṣmasaṃyogapravimuktalaghūttarau(2)

हिन्दी अर्थ

यदि कोई कहे कि “गुणनिरूपणकी क्या आवश्यकता है? दोषोंका अभाव ही गुण हो जायगा' तो उसका ऐसा कथन उचित नहीं है; क्योंकि 'श्लेष' आदि गुण और ' गूढार्थत्व' आदि दोष पृथक्-पृथक् कहे गये हैं। जो काव्यमें महती शोभाका आनयन करता है, उसको 'गुण' कहा जाता है। यह सामान्य और वैशेषिके भेदसे दो प्रकारका हो जाता है। जो गुण

English

Tait. Sam. 1.1.10.3

अध्याय ३४१

श्लोक 5

ललिता बलभूयिष्ठा(३) प्रौटा या पणवर्गजा ।ऊर्ध्वं रेफेण युज्यन्ते नटवर्गोनपञ्चमाः

lalitā balabhūyiṣṭhā(3) prauṭā yā paṇavargajā / ūrdhvaṃ repheṇa yujyante naṭavargonapañcamāḥ

हिन्दी अर्थ

सर्वसाधारण हो, उसे 'सामान्य' कहा जाता है। सामान्य गुण शब्द, अर्थ और शब्दार्थको प्राप्त होकर तीन प्रकारका हो जाता है। जो गुण काव्य-शरीरमें शब्दके आश्रित होता है, वह

English

CSonsisting of curd, clarified butter, water, honey and candied sugar.

अध्याय ३४१

श्लोक 6

भद्रायां परिशिष्टाः स्युः परुषा साभिधीयते ।भवन्ति यस्यामूष्माणः संयुक्तास्तत्तदक्षरैः

bhadrāyāṃ pariśiṣṭāḥ syuḥ paruṣā sābhidhīyate / bhavanti yasyāmūṣmāṇaḥ saṃyuktāstattadakṣaraiḥ

हिन्दी अर्थ

“समासोक्ति ' की गणना व्यङ्गय अलंकारोंमें होती है, इस दृष्टिसे अग्निपुराणोक्त लक्षणमें ' गम्यते'-इस क्रियापदका प्रयोग अधिक महत्त्वका है। अर्वाचीन आलंकारिक 'समासोक्ति' के लक्षणोंमें अप्रकृत व्यवहारके समारोपका भी उल्लेख करते हैं। १. काव्यादर्शकार दण्डीने अग्निपुराणोक्त लक्षणकी आनृपूर्वीको ही उद्धत कर लिया है। अन्तर इतना ही है कि अग्निपुराणमें “किंचिदन्यार्थसूचनम्' पाठ है और काव्यादर्शमें 'सूचनम् के स्थानमें ' दर्शनम्' कर दिया गया है। भामहने शब्दान्तरसे इसी भावको

English

Cf. AV. 20.127.9b and TB. 3.7.6.13.

अध्याय ३४१

श्लोक 7

अकारवर्जमावृत्तिः स्वराणामतिभूयसी ।अनुस्वारविसर्गौ च पारुष्याय निरन्तरौ

akāravarjamāvṛttiḥ svarāṇāmatibhūyasī / anusvāravisargau ca pāruṣyāya nirantarau

हिन्दी अर्थ

इस लक्षणमें 'किंचिदन्तर्गतोपमा' यह अंश विशेष है। वामनने तुल्य वस्तुके द्वारा वाक्यार्थे अपलापको 'अपह्लुति' कहा है- “समानवस्तुनान्यापलापोऽपह्नुतिः।' (३।५) परवती आलंकारिकोंने प्रकृत वस्तुका निषेध करके अन्य वस्तुकी स्थापनाको ' अपह्नुति’ कहा है।

English

RV. 10.121.1a.

अध्याय ३४१

श्लोक 8

शषसा रेफसंयुक्ताश्चाकारश्चापि भूयसा ।१ रशौ घनाविति ञ॥ २ महाप्राणोष्मसंयोगादवियुक्तलघूत्तराविति ट॥ ३ ललिता वनभूयिष्ठेति ख॥ ।ललिता वत्सभूयिष्ठेति ट॥ :प् २१८ अन्तस्थाभिन्नमाभ्याञ्च हः पारुष्याय संयुतः

śaṣasā rephasaṃyuktāścākāraścāpi bhūyasā / 1 raśau ghanāviti ña.. 2 mahāprāṇoṣmasaṃyogādaviyuktalaghūttarāviti ṭa.. 3 lalitā vanabhūyiṣṭheti kha.. / lalitā vatsabhūyiṣṭheti ṭa.. :p 218 antasthābhinnamābhyāñca haḥ pāruṣyāya saṃyutaḥ

हिन्दी अर्थ

२. भामहने भी 'पर्यायोक्ति'का यही लक्षण लिखा है। ३. प्राचीनोंने आक्षेप, अप्रस्तुतप्रशंसा, समासोक्ति तथा पर्यायोक्तिको 'ध्वनि' कहकर जो उसे अलंकारोंमें अन्तर्भूत करनेकी चेष्टा की है, उसका ध्वन्यालोककार आनन्दवर्धनने बड़ी प्रौढ़िके साथ खण्डन किया है।

English

RV. 10.90.1a.

अध्याय ३४१

श्लोक 9

अन्यथापि गुरुर्वर्णः संयुक्तेपरिपन्थिनि ।पारुष्यायादिमांस्तत्र पूजिता न तु पञ्चमो

anyathāpi gururvarṇaḥ saṃyukteparipanthini / pāruṣyāyādimāṃstatra pūjitā na tu pañcamo

हिन्दी अर्थ

४. इसी भावको लेकर वामनने कहा है--

English

This and the following three are different celestial gods.

अध्याय ३४१

श्लोक 10

क्षेपे शब्दानुकारे च परुषापि प्रयुज्यते ।कर्णाटी कौन्तली कौन्ती कौङ्कणी वामनासिका(१)

kṣepe śabdānukāre ca paruṣāpi prayujyate / karṇāṭī kauntalī kauntī kauṅkaṇī vāmanāsikā(1)

हिन्दी अर्थ

अपि जनदयितानि दुर्भगत्वं नियतमलंकरणानि संश्रयन्ते॥ अर्थात्-' गुणरहित वचन नारीके यौवनरहित रूपकी भाँति मनोरम नहीं होता। यदि उसे अलंकृत भी किया जाय तो वे अलंकार अपना दुर्भाग्य सूचित करते हैं ।'

English

A particular group of deities ten in number and supposed to be sons ofVisvli.

अध्याय ३४१

श्लोक 11

द्रावणी माधवी पञ्चवर्णान्तस्थोष्मभिः क्रमात् ।अनेकवर्णावृत्तिर्या भिन्नार्थप्रतिपादिका

drāvaṇī mādhavī pañcavarṇāntasthoṣmabhiḥ kramāt / anekavarṇāvṛttiryā bhinnārthapratipādikā

हिन्दी अर्थ

'शब्दगुण' कहलाता है। शब्दगुणके सात' भेद होते हैं-श्लेष, लालित्य, गाम्भीर्य, सौकुमार्य, उदारता, ओज और यौगिकी (समाधि) । शब्दोंका सुश्लिष्ट संनिवेश 'श्लेष” कहा जाता है। जहाँ

English

A female deity.

अध्याय ३४१

श्लोक 12

यमकं साव्यपेतञ्च व्यपेतञ्चेति तद्द्विधा ।आनन्तर्यादव्यपेतं व्यपेतं व्यवधानतः

yamakaṃ sāvyapetañca vyapetañceti taddvidhā / ānantaryādavyapetaṃ vyapetaṃ vyavadhānataḥ

हिन्दी अर्थ

गुणादेश आदिके द्वारा पूर्वपदसम्बद्ध अक्षर संधिको प्राप्त नहीं होता, वहाँ लालित्य' गुण माना गया है। विशिष्ट लक्षणके अनुसार उल्लेखनीय उच्चभावव्यञ्जक शब्दसमूहको श्रेष्ठ पुरुष ' गाम्भीर्य” कहते हैं। वही अन्यत्र 'उत्तान शब्दक' या “शब्दत्व' नामसे प्रसिद्ध है। जिसमें निष्टुरतारहित कोमल अक्षरोंका बाहुल्य हो, उस शब्दसमूहको

English

The physician of the gods.

अध्याय ३४१

श्लोक 13

द्वैविध्येनानयोः स्थानपादभेदाच्चतुर्विधम् ।आदिपादादिमध्यान्तेष्वेकद्वित्रिनियोगतः

dvaividhyenānayoḥ sthānapādabhedāccaturvidham / ādipādādimadhyānteṣvekadvitriniyogataḥ

हिन्दी अर्थ

वहाँ ' औदार्य” गुण माना जाता है। समासोंका बाहुल्य “ओज” कहलाता है। यह गद्य-पद्यरूप काव्यका प्राण है। ब्रह्मासे लेकर तृणपर्य्यन्त जो कोई भी प्राणी हैं, उनके 'पौरुष'का वर्णन

English

The deity that presides over the foundation of a house.

अध्याय ३४१

श्लोक 14

सप्तधा सप्तपूर्वेण(२) चेत् पादेनोत्तरोत्तरः ।एकद्वित्रिपदारम्भस्तुल्यः षोढा तदापरं

saptadhā saptapūrveṇa(2) cet pādenottarottaraḥ / ekadvitripadārambhastulyaḥ ṣoḍhā tadāparaṃ

हिन्दी अर्थ

एकमात्र 'ओज' गुणविशिष्ट पदावलीसे ही होता है। जिस-किसी भी शब्दके द्वारा वर्ण्यमान वस्तुका उत्कर्ष वहन करनेवाला गुण ' अर्थगुण' कहा जाता है। अर्थगुणके छः भेद प्रकाशित होते हैं-माधुर्य, संविधान, कोमलता, उदारता, प्रौढि एवं सामयिकता। क्रोध और ईर्ष्यामें भी आकारकी गम्भीरता तथा धैर्य्यधारणको “माधुर्य”

English

A woman who has a miscarriage should be bathed in a lotus tank, and one whose issue dies after birth should bathe in the presence of an aSoka (tree).

अध्याय ३४१

श्लोक 15

तृतीयं त्रिविधं पादस्यादिमध्यान्तगोचरम् ।पादान्तयमकञ्चैव काञ्चीयमकमेव च

tṛtīyaṃ trividhaṃ pādasyādimadhyāntagocaram / pādāntayamakañcaiva kāñcīyamakameva ca

हिन्दी अर्थ

कहते हैं। अपेक्षित कार्यकी सिद्धिके लिये उद्योग 'संविधान' माना गया है। जो कठिनता

English

One who desires to have flowers, one who desires to have progeny and who desires to have a house and other for¬ tunes (should bathe) respectively at a place abounding in flowers, an ocean and in the presence of (the image of Lord) Vi?nu.

अध्याय ३४१

श्लोक 16

संसर्गयमकञ्चैव(३) विक्रान्तयमकन्तथा ।पादादियमकञ्चैव तथाम्रेडितमेव च

saṃsargayamakañcaiva(3) vikrāntayamakantathā / pādādiyamakañcaiva tathāmreḍitameva ca

हिन्दी अर्थ

“सौकुमार्य गुणविशिष्ट माना गया है। जहाँ श्लाघ्य विशेषणोंसे युक्त उत्कृष्ट पदका प्रयोग हो, १. भरतमुनिने काव्यार्थ-गुण दस माने हैं-

English

Bathing in ( the asterisms) Sravatjuii revati and pufya is meritorious for all. One who wishes to do the ceremonial bathing has to observe a purificatory vow for seven days prior to that.

अध्याय ३४१

श्लोक 17

चतुर्व्यवसितञ्चैव मालायमकमेव च ।दशधा यमकं श्रेष्ठं तद्भेदा बहवो ऽपरे

caturvyavasitañcaiva mālāyamakameva ca / daśadhā yamakaṃ śreṣṭhaṃ tadbhedā bahavo 'pare

हिन्दी अर्थ

अर्थस्य च व्यक्तिरुदारता च कान्तिश्च काव्यार्थगुणा दशैते॥

English

I shall describe the bathing that would be beneficial for those afflicted by (the evil spirit called) Vin&yaka. The spirit Vinayaka was commissioned by (Lords) Kelava (Vinu), la (Siva) and Pitmaha (Brahma) as the leader of the attendants in order to fnistrgite the work of men. One who is possessed by Vinayaka dreams as if he is. bathing in water excessively, sees shaven heads, rides the demons (in a dream) and as he goes thinks that he is being followed by others. The fruitless beginning (of a task) leads to frustation and (the body) emaciates without any reason. A girl does not get a (suitable) bridegroom, a married woman does not get pro¬ geny, a brahmin does not become a preceptor and a pupil does not get instruction. A trader does not get profit and a culti¬ vator, the produce. A king does not get a kingdom. In such cases a (ceremonial) bath has to be done.

अध्याय ३४१

श्लोक 18

स्वतन्त्रस्यान्यतन्त्रस्य पदस्यावर्तना द्विधा ।१ बालवासिकेति ख॥ , ट॥ च ।वनवासिकेति ञ॥ २ पूर्वपूर्वेणेति ज॥ , ञ॥ , ट॥ च ३ सम्बन्धयमकश् चैवेति ख॥ :प् २१९ भिन्नप्रयोजनपदस्यावृत्तिं मनुजा विदुः

svatantrasyānyatantrasya padasyāvartanā dvidhā / 1 bālavāsiketi kha.. , ṭa.. ca / vanavāsiketi ña.. 2 pūrvapūrveṇeti ja.. , ña.. , ṭa.. ca 3 sambandhayamakaś caiveti kha.. :p 219 bhinnaprayojanapadasyāvṛttiṃ manujā viduḥ

हिन्दी अर्थ

अग्निदेवने शब्दगुण सात, अर्थगुण छः और शब्दार्थ-गुण छः माने हैं । काव्यादर्शकार दण्डीने भी भरतोक्त दस गुणोंका ही उल्लेख किया है। वामनने बीस और भोजने अड़तालीस गुण प्रदर्शित किये हैं। २. भामहने माधुर्य, प्रसाद और ओज--इन तीन गुणोंको ही स्वीकार किया है। वामनने शब्दगुण दस और अर्थगुण भी दस माने हैं । नाम दोनों विभागोंके एक ही हैं, केवल लक्षणमें अन्तर है। उन्होंने ' शब्दश्लेष 'का लक्षण इस प्रकार किया है--' मसृणत्वं श्लेषः '। इसकी व्याख्या करते हुए वे स्वयं लिखते हैं —'मसृणत्वं नाम यस्मिन् सति बहून्यपि पदानि एकवद् भासन्ते । अर्थात् जिसके होनेपर बहुत-से पद एकपदके तुल्य प्रतीत होते हैं, उसका नाम ' मसृणत्व' है।'' उदाहरणके लिये ' अस्त्युत्तरस्याम् '--यह पद्यांश है । इसमें दो

English

YDh. 1.280a.

अध्याय ३४१

श्लोक 19

द्वयोरावृत्तपदयोः समस्ता स्यात्समासतः ।असमासात्तयोर्व्यस्ता पादे त्वेकत्र विग्रहात्

dvayorāvṛttapadayoḥ samastā syātsamāsataḥ / asamāsāttayorvyastā pāde tvekatra vigrahāt

हिन्दी अर्थ

पद संधियुक्त होकर एकपदवत् प्रतीत होते हैं। दण्डीने ' श्लिष्टमस्पृष्टशैथिल्यम्'-यह श्लेषका लक्षण लिखा है। इसके अनुसार जिस वाक्यमें शिथिलता छू भी न गयी हो, वह 'श्लेष' है। इसका और वामनोक्त लक्षणका आधार अग्निपुराणका 'सुश्लिष्टसंनिवेशत्वं शब्दानां श्लेषः ।'--यह लक्षण ही है। भोजराजने इसीका भाव लेकर ' सुश्लिष्टपदता श्लेषः ।'--यह लक्षण लिखा है।

English

YDh. 1.281a.

अध्याय ३४१

श्लोक 20

वाक्यस्यावृत्तिरप्येवं यथासम्भवमिष्यते ।अलङ्काराद्यनुप्रासो लघुमध्येवमर्हणात्(१) *

vākyasyāvṛttirapyevaṃ yathāsambhavamiṣyate / alaṅkārādyanuprāso laghumadhyevamarhaṇāt(1) *

हिन्दी अर्थ

३-४. लालित्य नामक गुणका उल्लेख अन्यत्र नहीं मिलता। गाम्भीर्यका लक्षण भोजराजने इस प्रकार किया है--' ध्वनिमत्ता तु गाम्भीर्यम्'। इसमें भी अग्निपुराणोक्त लक्षणकी भावच्छाया दीख पड़ती है। ५. भोजराजके अनिष्टुराक्षरप्रायं सुकुमारमिति स्मृतम्।'-इस लक्षणमें अग्निपुराणकी शब्दावलीका ही समावेश किया गया है। दण्डीने भी इसी आनृपूर्वीमें 'सुकुमारता'को लक्षित कराया है। वामनने बन्धकी अकठोरताको ही 'सौकुमार्य' कहा है। उसका आधार भी अग्निपुराणोक्त लक्षण ही है।

English

I shall describe the bathing (known as) Maheivara that has been described by Uianas (preceptor of demons) to Bali, the king of demons, in olden days and that would promote the victory of a king and others.

अध्याय ३४१

श्लोक 21

यया कयाचिद्वृत्या यत् समानमनुभूयते ।तद्रूपादिपदासत्तिः सानुप्रसा रसावहा

yayā kayācidvṛtyā yat samānamanubhūyate / tadrūpādipadāsattiḥ sānuprasā rasāvahā

हिन्दी अर्थ

६. काव्यादर्शकार दण्डीने ' औदार्यका' यही लक्षण थोड़े-से पदोंके हेर-फेरके साथ अपने ग्रन्थमें ले लिया है। भोजराजने वैभवके उत्कर्षका प्रतिपादन ' औदार्य' माना है, किंतु यह उनका अर्थगुण है--' भूत्युत्कर्ष उदारता ।'--शब्दगुणान्तर्गत उदारताका लक्षण उनके मतमें 'विकटाक्षरबन्धत्व' है, जो वामनोक्त लक्षणसे मेल खाता है। वामनने ग्राम्यत्वदोषसे रहित रचनाको ' औदार्यगुणशालिनी ' स्वीकार किया है। यथा-- अग्राम्यत्वमुदारता।' (३। २। १२) किंतु यह उनके ' अर्थगुण'का लक्षण है । शब्दगुणके लक्षणमें वे बन्धकी विकटताको

English

By whatever mode, whatever similarity is felt — closeness of words with that form and the like, Anuprasa, conveys sentiment.

अध्याय ३४१

श्लोक 22

गोष्ठ्यां कुतूहलाध्यायी वाग्बन्धश्चित्रमुच्यते ।प्रश्नः प्रहेलिका गुप्तं च्युतदत्ते तथोभयम्

goṣṭhyāṃ kutūhalādhyāyī vāgbandhaścitramucyate / praśnaḥ prahelikā guptaṃ cyutadatte tathobhayam

हिन्दी अर्थ

ही “उदारता' मानते हैं। जिसके होनेपर पद नृत्य करते-से प्रतीत होते हैं। ७. ' काव्यादर्श’ में भी 'ओज'का यही लक्षण उद्धत किया गया है । वामनने निबन्धके गाढ़त्वको 'ओज' कहा है। यह गाढ़त्व समास-बाहुल्यसे ही आता है । अतः वामनने कोई नयी बात नहीं कही है । 'सरस्वतीकण्ठाभरण' के निर्माता भोजराजने भी अग्निपुराणकी आनृपूर्वीमें ही ' ओजः ' समासभूयष्टरम् ।'--इस प्रकार ' ओज'का लक्षण लिखा है।

English

In an assembly, delightful for the curious, a binding of speech is called Chitra: question, riddle, hidden, dropped, given, and both —

अध्याय ३४१

श्लोक 23

समस्या सप्त तद्भेदा नानार्थस्यानुयोगतः ।यत्र प्रदीयते तुल्यवर्णविन्यासमुत्तरं

samasyā sapta tadbhedā nānārthasyānuyogataḥ / yatra pradīyate tulyavarṇavinyāsamuttaraṃ

हिन्दी अर्थ

८. वामनने पृथक्-पदत्वं माधुर्यम्।'--यह लिखकर बताया है, जहाँ पद्यमें सभी पद पृथक्-पृथक् हों, समासमें आबद्ध होनेके कारण विकट या जटिल न हो जायेँ, वहा 'माधुर्य' है। यह शब्दगत माधुर्यका लक्षण है। अर्थगत माधुर्य वे वहाँ मानते हैं, जहाँ उक्ति-वैचित्र्य

English

Samasya — seven are its divisions, by the questioning of various meanings. Where an answer is given with similar arrangement of letters,

अध्याय ३४१

श्लोक 24

स प्रश्नः स्यादेकपृष्टद्विपृष्टोत्तरभेदतः ।द्विधैकपृष्टो द्विविधः समस्तो व्यस्त एव च

sa praśnaḥ syādekapṛṣṭadvipṛṣṭottarabhedataḥ / dvidhaikapṛṣṭo dvividhaḥ samasto vyasta eva ca

हिन्दी अर्थ

आदि दोषोंसे रहित है तथा संनिवेश विशेषका तिरस्कार करके मृदुरूपमें ही भासित होता है, वह गुण 'कोमलता'के नामसे प्रसिद्ध है जिसमें स्थूललक्ष्यत्वको प्रवृत्तिका लक्षण लक्षित होता है, आशय अत्यन्त सुन्दररूपमें प्रकट होता है, वह ' उदारता नामक गुण है । इच्छित अर्थके प्रति निर्वाहका उपपादन करनेवाली हेतुगर्भिणी

English

that is a question; by division of one-asked and two-asked answers: the one-asked is twofold: compound and separate.

अध्याय ३४१

श्लोक 25

द्वयोरप्यर्थयोर्गुह्यमानशब्दा प्रहेलिका ।सा द्विधार्थो च शाब्दी च तत्रार्थी चार्थबोधतः

dvayorapyarthayorguhyamānaśabdā prahelikā / sā dvidhārtho ca śābdī ca tatrārthī cārthabodhataḥ

हिन्दी अर्थ

युक्तियोंको 'प्रौढ़ि कहते हैं । स्वतन्त्र या परतन्त्र कार्यके बाह्य एवं आन्तरिक संयोगसे अर्थकी जो व्युत्पत्ति होती है, उसको 'सामयिकता' कहते हैं। जो शब्द एवं अर्थ-दोनोंको उपकृत करता

English

A riddle (prahelika) where the word is concealed for both meanings; it is twofold: of meaning and of word; the meaning one by understanding of meaning,

अध्याय ३४१

श्लोक 26

शब्दावबोधतः शाब्दी प्राहुः षोढा प्रहेलिकां ।यस्मिन् गुप्ते ऽपि वाक्याङ्गे भाव्यर्थो ऽपारमार्थिकः

śabdāvabodhataḥ śābdī prāhuḥ ṣoḍhā prahelikāṃ / yasmin gupte 'pi vākyāṅge bhāvyartho 'pāramārthikaḥ

हिन्दी अर्थ

है, वह “उभयगुण' (शब्दार्थगुण) कहलाता है। साहित्यशास्त्रियोंने इसका विस्तार छः भेदोंमें किया है-प्रसाद, सौभाग्य, यथासंख्य, प्रशस्ता, पाक और राग। सुप्रसिद्ध अर्थसे समन्वित पदोंका संनिवेश ' प्रसाद कहा जाता है। जिसके उक्त होनेपर कोई गुण उत्कर्षको प्राप्त हुआ प्रतीत होता है, विद्वान् उसको 'सौभाग्य' या ' औदार्य?

English

the verbal one by understanding of words — they call the riddle sixfold. Where even with part of the sentence hidden the meaning is not real,

अध्याय ३४१

श्लोक 27

तदङ्गविहिताकाङ्क्षस्तद्गुप्तं गूढमप्यदः ।यत्रार्थान्तरनिर्भासो वाक्याङ्गच्यवनादिभिः

tadaṅgavihitākāṅkṣastadguptaṃ gūḍhamapyadaḥ / yatrārthāntaranirbhāso vākyāṅgacyavanādibhiḥ

हिन्दी अर्थ

बतलाते हैं। तुल्य वस्तुओंका क्रमशः कथन “यथासंख्य' माना जाता है । समयानुसार वर्णनीय दारुण वस्तुका भी अदारुण शब्दसे वर्णन 'प्राशस्त्य' कहलाता है। किसी पदार्थको उच्च

English

with expectation arranged by that part — that is Gupta, and it is also Gudha. Where another meaning appears by dropping a part of the sentence and the like,

अध्याय ३४१

श्लोक 28

तदङ्गविहिताकाङ्क्षस्तच्चुतं स्याच्चतुर्विधम् ।१ लघुमप्येवमर्हणादिति ट॥ ।लघुमध्येव वर्हणादिति ज॥ लघुमध्येवमर्हणात्, लघुमप्येवमर्हणात्, लघुमध्येव वर्हणात् एतत् पाठत्रयं न सम्यक् प्रतिभाति :प् २२० स्वरव्यञ्जनविन्दूनां विसर्गस्य च विच्युतेः

tadaṅgavihitākāṅkṣastaccutaṃ syāccaturvidham / 1 laghumapyevamarhaṇāditi ṭa.. / laghumadhyeva varhaṇāditi ja.. laghumadhyevamarhaṇāt, laghumapyevamarhaṇāt, laghumadhyeva varhaṇāt etat pāṭhatrayaṃ na samyak pratibhāti :p 220 svaravyañjanavindūnāṃ visargasya ca vicyuteḥ

हिन्दी अर्थ

परिणतिको “पाक' कहते हैं। ' मृद्दीकापाक' एवं “नारिकेलाम्बुपाक'के भेदसे 'पाक' दो प्रकारका होता है। आदि और अन्तमें भी जहाँ सौरस्य हो, वह 'मृद्ठीकापाक' है। काव्यमें जो छायाविशेष (शोभाधिक्य) प्रस्तुत किया जाय, उसे 'राग' कहते हैं। यह राग अभ्यासमें लाया जानेपर सहज कान्तिको भी लाँघ जाता है, अर्थात् उसमें और भी उत्कर्ष ला देता है। जो अपने

English

with expectation set by that part — that is Chyuta, fourfold by dropping of vowel, consonant, dot (anusvara) and visarga.

अध्याय ३४१

श्लोक 29

दत्तेपि यत्र वाक्याङ्गे द्वितीयोर्थः प्रतीयते ।दत्तन्तदाहुस्तद्भेदाः स्वराद्यैः पूर्ववन्मताः

dattepi yatra vākyāṅge dvitīyorthaḥ pratīyate / dattantadāhustadbhedāḥ svarādyaiḥ pūrvavanmatāḥ

हिन्दी अर्थ

विशेष लक्षणसे अनुभवमें आता हो, उसे ' वैशेषिक गुण' जानना चाहिए। यह राग तीन प्रकारका होता है-हारिद्रराग, कौसुम्भराग और नीलीराग। (यहाँतक सामान्य गुणका विवेचन हुआ) ।

English

Where, even with the part of the sentence given, a second meaning is understood — they call it Datta; its divisions by vowels and the rest as before.

अध्याय ३४१

श्लोक 30

अपनीताक्षरस्थाने न्यस्ते वर्णान्तरे ऽपि च ।भासते ऽर्थान्तरं यत्र च्युतदत्तं तदुच्यते

apanītākṣarasthāne nyaste varṇāntare 'pi ca / bhāsate 'rthāntaraṃ yatra cyutadattaṃ taducyate

हिन्दी अर्थ

अब 'वैशेषिक'का परिचय देते हैं। वैशेषिक उसको जानना चाहिए, जो स्वलक्षणगोचर हो अनन्यसाधारण हो इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'काव्यगुणविवेककथन' नामक तीन सौ छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

Where, in place of a removed letter, another letter placed shows another meaning — that is called Chyutadatta.

अध्याय ३४१

श्लोक 31

सुश्लिष्टपद्यमेकं यन्नानाश्लोकांशनिर्मितम् ।सा ममस्या परस्यात्मपरयोः कृतिसङ्करात्

suśliṣṭapadyamekaṃ yannānāślokāṃśanirmitam / sā mamasyā parasyātmaparayoḥ kṛtisaṅkarāt

हिन्दी अर्थ

हो। दण्डीने सरस वाक्यको 'मधुर' बताया है, परंतु राजा भोजने ' सरस्वतीकण्ठाभरण' में अग्निपुराणोक्त लक्षणका ही भाव लेकर लिखा है—-' माधुर्यमुक्तमाचार्येः क्रोधादावप्यतीव्रता'। यह अर्थगत माधुर्य है। शब्दगत माधुर्यका लक्षण वे भी वामनकी भाँति “पृथकूपदत्व' ही

English

One closely joined verse made of portions of various verses — that is Samasya, by mingling of the work of another and one's own.

अध्याय ३४१

श्लोक 32

दुःखेन कृतमत्यर्थं कविसामर्थ्यसूचकम् ।दुष्करं नीरसत्वेपि विदग्धानां महोत्सवः

duḥkhena kṛtamatyarthaṃ kavisāmarthyasūcakam / duṣkaraṃ nīrasatvepi vidagdhānāṃ mahotsavaḥ

हिन्दी अर्थ

१. दण्डीने शब्दान्तरसे अपने लक्षणमें कुछ ऐसा ही भाव प्रकट किया है। उनका कहना है कि--“जिस वाक्यका उच्चारण करनेपर उसमें किसी उत्कृष्ट गुणकी प्रतीति हो, वहाँ 'उदारता' नामक गुण है। उसके द्वारा काव्यपद्धति ' कृतार्थ' (चमत्कारकारिणी) २. भोजराजने इसी अभिप्रायको और भी सरल रीतिसे व्यक्त किया है-- विवक्षितार्थनिर्वाह: काव्ये प्रौढिरिति स्मृता'। ३. दण्डीने इसी लक्षणका भाव लेकर “प्रसादवत् प्रसिद्धार्थम्।'--ऐसा लक्षण किया है । वामनने भी ' अर्थवैमत्यं प्रसाद: ।'--योँ कहकर इसी अभिप्रायकी पुष्टि की है । भोजराजने भी “ यत्नु प्राकट्यमर्थस्य प्रसाद: सो5भिधीयते '--यों लिखकर पूर्वोक्त अभिप्रायका ही

English

Made with great difficulty, showing the poet's ability — Dushkara — a great festival for the cultured even in lack of sentiment.

अध्याय ३४१

श्लोक 33

नियमाच्च विदर्भाच बन्धाच्च भवति त्रिधा ।कवेः प्रतिज्ञा निर्माणरम्यस्य नियमः स्मृतः

niyamācca vidarbhāca bandhācca bhavati tridhā / kaveḥ pratijñā nirmāṇaramyasya niyamaḥ smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

४. “यथासंख्य'को अर्वाचीन आलंकारिकोंने गुण नहीं माना है, उसे अलंकारकी कोटिमें रखा है।

English

By rule, by Vidarbha (arrangement), and by binding it is threefold. The poet's vow of beautiful construction is remembered as rule.

अध्याय ३४१

श्लोक 34

स्थानेनापि स्वरेणापि व्यञ्जनेनापि स त्रिधा ।विकल्पः प्रातिलोम्यानुलोम्यादेवाभिधीयते

sthānenāpi svareṇāpi vyañjanenāpi sa tridhā / vikalpaḥ prātilomyānulomyādevābhidhīyate

हिन्दी अर्थ

अग्निदेव कहते हैं--वसिष्ठ ! 'दृश्य' और ' श्रव्य' काव्यमें यदि “दोष” हो तो वह सहृदय सभ्यों (दर्शकों और पाठकों )-के लिये उद्वेगजनक होता है। वक्ता, वाचक एवं वाच्य--इनमेंसे एक-एकके नियोगसे, दो-दोके नियोगसे और तीनोंके नियोगसे सात प्रकारके दोषर होते हैं। इनमें 'वक्ता' कविको माना गया है, जो संदिहान, अविनीत, अज्ञ और ज्ञाताके भेदसे चार प्रकारका

English

By place, by vowel, by consonant it is threefold. Option is described by reverse and forward order;

अध्याय ३४१

श्लोक 35

प्रतिलोम्यानुलोम्यञ्च शब्देनार्थेन जायते ।अनेकधावृत्तवर्णविन्यासैः शिल्पकल्पना

pratilomyānulomyañca śabdenārthena jāyate / anekadhāvṛttavarṇavinyāsaiḥ śilpakalpanā

हिन्दी अर्थ

है। निमित्त और परिभाषा (संकेत)-के अनुसार अर्थका स्पर्श करनेवाले शब्दको 'वाचक' कहते हैं। उसके दो भेद हैं--'पद' और “वाक्य '। इन दोनोंके लक्षणोंका वर्णन पहले हो चुका है।

English

reverse and forward arise by word and by meaning. Artistic invention by arrangement of letters of many meters

अध्याय ३४१

श्लोक 36

तत्तत्प्रसिद्धवस्तूनां बन्ध इत्य् अभिधीयते ।गोमूत्रिकार्धभ्रमणे सर्वतोभद्रमम्बुजम्

tattatprasiddhavastūnāṃ bandha ity abhidhīyate / gomūtrikārdhabhramaṇe sarvatobhadramambujam

हिन्दी अर्थ

पददोष दो प्रकारके होते हैं--असाधुत्व और अप्रयुक्तत्व । व्याकरणशास्त्रसे विरुद्ध पदमें विद्वानोंने 'असाधुत्व' दोष माना है। काव्यकी व्युत्पत्तिसे सम्पन्न विद्वानोंद्वारा जिसका कहीं उल्लेख न किया गया हो, उसमें ' अप्रयुक्तत्व' दोष कहा जाता है। अप्रयुक्तत्वके भी पाँच भेद होते हैं-छान्दसत्व,

English

of those well-known objects is called Bandha. Gomutrika, Ardhabhramana, Sarvatobhadra, lotus,

अध्याय ३४१

श्लोक 37

चक्रञ्चक्राब्जकं दण्डो मुरजाश्चेति चाष्टधा ।प्रत्यर्धं प्रतिपादं स्यादेकान्तरसमाक्षरा

cakrañcakrābjakaṃ daṇḍo murajāśceti cāṣṭadhā / pratyardhaṃ pratipādaṃ syādekāntarasamākṣarā

हिन्दी अर्थ

जिसका लोकभाषामें प्रयोग न हो, वह ' छान्दसत्व' दोष एवं जो बोधगम्य न हो, वह ' अविस्पष्टत्व'

English

wheel, wheel-lotus, staff and drum — eight kinds. In each half and each foot letters equal at alternate places;

अध्याय ३४१

श्लोक 38

द्विधा गोमूत्रिकां पूर्वामाहुरश्वपदां परे ।अन्त्याङ्गोमूत्रिकां धेनुं जालबन्धं(१) वदन्ति हि

dvidhā gomūtrikāṃ pūrvāmāhuraśvapadāṃ pare / antyāṅgomūtrikāṃ dhenuṃ jālabandhaṃ(1) vadanti hi

हिन्दी अर्थ

दोष कहलाता है। अविस्पष्टत्वके भेद निम्नलिखित हैं —गूढार्थता, विपर्यस्तार्थता तथा संशयितार्थता । जहाँ अर्थका क्लेशपूर्वक ग्रहण हो, वहाँ ' गूढार्थता' दोष होता है। जो विवक्षितार्थसे भिन्न शब्दार्थके ज्ञानसे दूषित हो उसे विपर्यस्तार्थता' कहते हैं।

English

twofold Gomutrika: the first, others call it Ashvapada; the last Gomutrika; they call the cow and net-binding.

अध्याय ३४१

श्लोक 39

अर्धाभ्यामर्धपादैश् च कुर्याद्विन्यासमेतयोः ।१ जानुबन्धमिति क॥ , ख॥ च :प् २२१ न्यस्तानामिह वर्णानामधोधः क्रमभागिनां

ardhābhyāmardhapādaiś ca kuryādvinyāsametayoḥ / 1 jānubandhamiti ka.. , kha.. ca :p 221 nyastānāmiha varṇānāmadhodhaḥ kramabhāgināṃ

हिन्दी अर्थ

'विपर्यस्तार्थता' का ही अनुगमन करते हैं। जिसमें अर्थ संदिग्ध होता है, उसको 'संशयितार्थता' कहते हैं। यह सहृदयके लिये उद्देगकारक न होनेपर दोष नहीं माना जाता। सुखपूर्वक उच्चारण

English

By halves and half-feet one should make the arrangement of these two; of the letters placed here in their order below and below,

अध्याय ३४१

श्लोक 40

अधोधःस्थितवर्णानां यावत्तूर्यपदन्नयेत् ।तुर्यपादान्नयेदूर्ध पादार्धं प्रातिलोम्यतः

adhodhaḥsthitavarṇānāṃ yāvattūryapadannayet / turyapādānnayedūrdha pādārdhaṃ prātilomyataḥ

हिन्दी अर्थ

न होना 'कष्टत्वदोष' माना जाता है। जो रचना समय--कविजन-निर्धारित मर्यादासे च्युत हो, उसमें 'असामयिकता' मानी जाती है। उस असामयिकताको मुनिजन ' नेया' कहते हैं। जिसमें निकृष्ट एवं दूषित अर्थकी प्रतीति होती है, उसमें “ग्राम्यतादोष' होता है। निन्दनीय ग्राम्यार्थके कथनसे, उसके स्मरणसे तथा उसके वाचक पदके साथ समानता होनेसे 'ग्राम्यदोष' तीन

English

of letters standing below and below, one should carry up to the fourth foot; from the fourth foot one should carry upward the half-foot in reverse.

अध्याय ३४१

श्लोक 41

तदेव सर्वतोभद्रं त्रिविधं सरसीरुहं ।चतुष्पत्रं ततो विघ्नं चतुष्पत्रे उभे अपि

tadeva sarvatobhadraṃ trividhaṃ sarasīruhaṃ / catuṣpatraṃ tato vighnaṃ catuṣpatre ubhe api

हिन्दी अर्थ

प्रकारका है। 'अर्थदोष' साधारण और प्रातिस्वितकके भेदसे दो प्रकारका होता है। जो दोष अनेकवर्ती होता है, उसको 'साधारण' माना

English

That same is Sarvatobhadra, threefold lotus; the four-petalled; then Vighna; both in the four-petalled.

अध्याय ३४१

श्लोक 42

अथ प्रथमपादस्य मूर्धन्यस्त्रिपदाक्षरं ।सर्वेषामेव पादानामन्ते तदुपजायते

atha prathamapādasya mūrdhanyastripadākṣaraṃ / sarveṣāmeva pādānāmante tadupajāyate

हिन्दी अर्थ

१. काव्यमें 'दोष' का परिहार अत्यन्त आवश्यक माना गया है। दण्डीने कहा है कि-- जिस प्रकार सुन्दर-से-सुन्दर शरीर श्रेतकुष्ठके एक दागसे भी अपनी कमनीयता खो बैठता है, उसी प्रकार कितना भी रमणीय काव्य क्यों न हो, थोड़े-से दोषसे भी दूषित होकर सहदयोंके लिये अग्राह्य हो जाता है। अतः दोषकी कदापि उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।' (काव्या०१।७) भामहने दोषयुक्त काव्यको कुपुत्रके समान निन्दाजनक माना है। वाग्भट (प्रथम)-का कहना है कि दोषरहित काव्य ही कीर्तिका विस्तार करनेवाला है।

English

Then of the first foot, the cerebral three-foot letter arises at the end of all the feet;

अध्याय ३४१

श्लोक 43

प्राक्पदस्यान्तिमं प्रत्यक् पादादौ प्रातिलोम्यतः ।अन्त्यपादान्तिमञ्चाद्यपादादावक्षरद्वयं

prākpadasyāntimaṃ pratyak pādādau prātilomyataḥ / antyapādāntimañcādyapādādāvakṣaradvayaṃ

हिन्दी अर्थ

गिनाये हैं। यथा--निगूढ़, अर्थान्तर, अर्थहीन, भिन्नार्थ, एकार्थ, अभिप्लुतार्थ, न्यायापेत, विषम, विसंधि तथा शब्दच्युति। अग्निपुराणमें इन सबका वर्णन तो है ही, अन्यान्य दोषोंकी भी विस्तारपूर्वक उद्धावना की गयी है। भामहके प्रथम निर्दिष्ट दस दोष भरतोक्त दोषोंपर ही आधारित हैं। दण्डीने भी किञ्जित् शब्दान्तरके साथ उन्हीं दस दोषोंको वर्जनीय बताया है । भामहने सबसे अधिक दोषोंकी उद्धावना की है, किंतु उनका कोई क्रमबद्ध वर्णन देखनेमें नहीं आता, यद्यपि उन्होंने अपना आधा ग्रन्थ दोषनिरूपणमें ही लगा दिया है।

English

the last of the former foot at the beginning of the latter foot in reverse; the last of the last foot and two letters at the beginning of the first foot;

अध्याय ३४१

श्लोक 44

चतुश्छदे भवेदष्टच्छदे वर्णत्रयं पुनः ।स्यात् षोडशच्छदे त्वेकान्तरञ्चेदेकमक्षरं

catuśchade bhavedaṣṭacchade varṇatrayaṃ punaḥ / syāt ṣoḍaśacchade tvekāntarañcedekamakṣaraṃ

हिन्दी अर्थ

२. अग्निपुराणमें पहले वक्तृ, वाचक और वाच्य-इन तीनोंमें एक-एक, दो-दो और तीनोंके नियोग (सम्बन्ध)-से सात प्रकारके दोष माने हैं। यथा--वब्तृनियुक्तदोष, वाचकनियुक्तदोष, वाच्यनियुक्तदोष, वक्तृवाचकनियुक्तदोष, वाचकवाच्यनियुक्तदोष, वव्तृवाच्यनियुक्तदोष गया है । क्रियाभ्रंश, कारकभ्रंश, विसंधि, पुनरुक्तता एवं व्यस्त-सम्बन्धताके भेदसे ' साधारण दोष' पाँच प्रकारके होते हैं। क्रियाहीनताको ' क्रियाभ्रंश', कर्ता आदि कारकके अभावको 'कारकभ्रंश' एवं

English

in a four-petal; in an eight-petal three letters again; in a sixteen-petal if there is alternate, one letter;

अध्याय ३४१

श्लोक 45

कर्णिकां तोलयेदूर्ध्वं पत्राकाराक्षरावलिं ।प्रवेशयेत् कर्णिकायाञ्चतुष्पत्रसरोरुहे

karṇikāṃ tolayedūrdhvaṃ patrākārākṣarāvaliṃ / praveśayet karṇikāyāñcatuṣpatrasaroruhe

हिन्दी अर्थ

संधिदोषको 'विसंधि' कहते हैं

English

one should weigh the pericarp upward, a row of letters in petal-shape; one should enter on the pericarp in the four-petalled lotus;

अध्याय ३४१

श्लोक 46

कर्णिकायां लिखेदेकं द्वे द्वे दिक्षु विदिक्षु च ।प्रवेशनिर्गमौ दिक्षु कुर्यादष्टच्छदे ऽम्बुजे

karṇikāyāṃ likhedekaṃ dve dve dikṣu vidikṣu ca / praveśanirgamau dikṣu kuryādaṣṭacchade 'mbuje

हिन्दी अर्थ

विसंधि दोष दो प्रकारका होता है--'संधिका अभाव' एवं “विरुद्ध संधि '। विरुद्ध पदार्थान्तरको प्रतीति होनेसे विरुद्ध संधिको कष्टकर माना गया है। बार-बार कथनको “पुनरुक्तत्व' दोष कहते हैं। वह भी दो प्रकारका होता है-- अर्थावृत्ति' एवं 'पदावृत्ति'। अर्थावृत्ति’ भी दो प्रकारको होती है-काव्यमें प्रयुक्त अभीष्ट या विवक्षित शब्दके द्वारा एवं शब्दान्तरके द्वारा 'पदावृत्ति में

English

one should write one on the pericarp, two each in the directions and corners; one should make entry and exit in the directions on the eight-petalled lotus;

अध्याय ३४१

श्लोक 47

विश्वग्विषमवर्णानां तावत् पत्राबलीजुषां ।मध्ये समाक्षरन्यासःसरोजे षोडशच्छदे

viśvagviṣamavarṇānāṃ tāvat patrābalījuṣāṃ / madhye samākṣaranyāsaḥsaroje ṣoḍaśacchade

हिन्दी अर्थ

अर्थको आवृत्ति नहीं होती, पदमात्रकी ही आवृत्ति होती है। जहाँ व्यवधानसे भली-भाँति सम्बन्ध हो, वहाँ 'व्यस्त-सम्बन्धता' दोष होता है। सम्बन्धान्तरकी प्रतीतिसे, सम्बन्धान्तरजन्य

English

of the uneven letters all around, enjoying so many rows of petals; in the middle the placing of equal letters in the sixteen-petalled lotus.

अध्याय ३४१

श्लोक 48

द्विधा चक्रं चतुररं षडरन्तत्र चादिमं ।पूर्वार्धे सदृशा वर्णाः पादप्रथमपञ्चमाः

dvidhā cakraṃ caturaraṃ ṣaḍarantatra cādimaṃ / pūrvārdhe sadṛśā varṇāḥ pādaprathamapañcamāḥ

हिन्दी अर्थ

होनेसे तथा इन दोनोंके अभावमें भी अन्तर्व्यवधानसे व्यस्त-सम्बन्धताके तीन भेद हो जाते हैं। बीचमें पद अथवा वाक्यसे व्यवधान होनेके कारण उक्त भेदोंमेंसे प्रत्येकके दो-दो भेद और होते हैं। पद और वाक्यमें अर्थ और अर्थ्यमानके भेदसे वाच्यार्थे दो भेद होते हैं। पदगत वाच्य 'व्युत्पादित' और 'व्युत्पाद्य'के भेदसे दो प्रकारका माना जाता है। यदि हेतु अभीष्टसिद्धिमें व्याघातकारी

English

The wheel is twofold: four-spoked and six-spoked, there the first; in the first half equal letters, the first and fifth of the foot;

अध्याय ३४१

श्लोक 49

अयुजो ऽश्वयुजश् चैव तुर्यावप्यष्टमावपि ।तस्योपपादप्राक्प्रत्यगरेषु च यथाक्रमं

ayujo 'śvayujaś caiva turyāvapyaṣṭamāvapi / tasyopapādaprākpratyagareṣu ca yathākramaṃ

हिन्दी अर्थ

हो तो यह उसका दोष माना गया है। यह ' हेतुदोष' ग्यारह प्रकारका होता है-असमर्थत्व, असिद्धत्व, विरुद्धत्व, अनेकान्तिकता, सत्प्रतिपक्षत्व, कालातीतत्व, संकर, पक्षमें अभाव, सपक्षमें

English

odd and Ashvayuj, the fourth and eighth; of that in the spokes east and west, in order,

अध्याय ३४१

श्लोक 50

स्यात्पादार्धचतुष्कन्तु नाभौ तस्याद्यमक्षरं ।पश्चिमारावधि नयेन्नेमौ शेषे पदद्वयी

syātpādārdhacatuṣkantu nābhau tasyādyamakṣaraṃ / paścimārāvadhi nayennemau śeṣe padadvayī

हिन्दी अर्थ

अभाव, विपक्षमें अस्तित्व और ग्यारहवाँ निरर्थत्व। वह इष्टव्याघातकारित्व दोष काव्य और नाटकोंमें तथा सहृदय सभासदोंमें (श्रोताओं, दर्शकों और पाठकोंमें) मार्मिक पीड़ा उत्पन्न करनेवाला है। निरर्थत्वदोष दुष्कर चित्रबन्धादि काव्यमें दूषित नहीं माना जाता। पूर्वोक्त गूढार्थत्वदोष दुष्कर चित्रबन्धमें विद्वानोंके लिये दुःखप्रद नहीं प्रतीत होता। 'ग्राम्यत्व' भी यदि लोक और शस्त्र

English

four half-feet in the nave; its first letter; one should lead up to the western spoke; in the rim the two feet in the rest;

अध्याय ३४१

श्लोक 51

तृतीयं तुर्यपादान्ते प्रथमौ सदृशावुभौ ।वर्णौ पादत्रयस्यापि दशमः सदृशो यदि

tṛtīyaṃ turyapādānte prathamau sadṛśāvubhau / varṇau pādatrayasyāpi daśamaḥ sadṛśo yadi

हिन्दी अर्थ

दोनोंमें प्रसिद्ध हो तो उद्देगकारक नहीं जान पड्ता। क्रियाभ्रंशमें यदि क्रियाका अध्याहार करके उसका सम्बन्ध जोड़ा जा सके तो वह दोष नहीं रह जाता। इसी तरह भ्रष्टकारकता दोष

English

the third at the end of the fourth foot; the first two letters alike; of the three feet the tenth, if alike;

अध्याय ३४१

श्लोक 52

प्रथमे चरमे तस्य षड्तर्णाः पथिमे यदि ।भवन्ति द्व्यन्तरं तर्हि वृहच्च क्रमुदाहृतं

prathame carame tasya ṣaḍtarṇāḥ pathime yadi / bhavanti dvyantaraṃ tarhi vṛhacca kramudāhṛtaṃ

हिन्दी अर्थ

नहीं रह जाता, जब कि आशक्षेपबलसे कारकका होनेके कारण प्रकृतिभाव प्राप्त हो, वहाँ विसंधित्व दोष नहीं माना गया है। जहाँ संधि कर देनेपर उच्चारणमें कठिनाई आ जाय, वैसे दुर्वाच्य स्थलोंमें विसंधित्व दोषकारक नहीं है

English

in the first and last of it six letters if in the west; they are at two intervals, then Brihat is told in order.

अध्याय ३४१

श्लोक 53

सम्मुखारद्वये पादमेकैकं क्रमशो लिखेत् ।नाभौ तु वर्णं दशमं नेमौ तूर्यपदन्नयेत्

sammukhāradvaye pādamekaikaṃ kramaśo likhet / nābhau tu varṇaṃ daśamaṃ nemau tūryapadannayet

हिन्दी अर्थ

' अनृप्रास' अलंकारकी योजनामें पदोंकी आवृत्ति तथा व्यस्त-सम्बन्धता शुभ है। अर्थात् दोष न होकर गुण है। अर्थसंग्रहमें अर्थावृत्ति दोषकारक नहीं होती। वह व्युत्क्रम (क्रमोल्लङ्घन) आदि

English

In two facing spokes one should write a foot each in order; in the nave the tenth letter; in the rim one should lead the fourth foot;

अध्याय ३४१

श्लोक 54

श्लोकस्याद्यन्तदशमाः समा आद्यन्तिमौ युजोः ।आदौ वर्णः समौ तुर्यपञ्चमावाद्यतर्ययोः

ślokasyādyantadaśamāḥ samā ādyantimau yujoḥ / ādau varṇaḥ samau turyapañcamāvādyataryayoḥ

हिन्दी अर्थ

दोषॉसे भी लिप्त नहीं होती। उपमान और उपमेयमें विभक्ति, संज्ञा, लिङ्ग और वचनका भेद होनेपर भी वह तबतक दोषकारक नहीं माना जाता, जबतक कि बुद्धिमान् पुरुषोंको उससे उद्देगका अनुभव नहीं होता। (उद्वेगजनकता ही दूषकताका बीज है।) वह न हो तो माने गये दोष भी दोषकारक नहीं समझे जाते। अनेकको एकसे और बहुतोंको बहुतोंसे दी गयी उपमा

English

the first and last, the tenth of the verse equal; the first and last of the even; in the beginning the letter equal, fourth and fifth of the first and second;

अध्याय ३४१

श्लोक 55

द्वितीयप्रातिलोम्येन तृतीयं जायते यदि ।पदं विदध्यात् पत्रस्य दण्डश् चक्राब्जकं कृतेः

dvitīyaprātilomyena tṛtīyaṃ jāyate yadi / padaṃ vidadhyāt patrasya daṇḍaś cakrābjakaṃ kṛteḥ

हिन्दी अर्थ

शुभ मानी गयी है। (अर्थात् यदि सहृदयोंको उद्ठेग न हो तो लिङ्ग-वचनादिके भेद होनेपर भी दोष नहीं मानना चाहिए।) कविजनोंका परम्परानुमोदित सदाचार 'समय' कहा जाता है।

English

if the third arises by reversal of the second, one should make the foot of the petal; staff, wheel-lotus, of the work;

अध्याय ३४१

श्लोक 56

द्वितीयौ प्राग्दले तुल्यौ सप्तमौ च तथापरौ ।सदृशावुत्तरदलौ द्वितीयाभ्यामथार्धयोः

dvitīyau prāgdale tulyau saptamau ca tathāparau / sadṛśāvuttaradalau dvitīyābhyāmathārdhayoḥ

हिन्दी अर्थ

जिसके द्वारा समस्त सिद्धान्तवादी निर्बाध संचरण करते हैं तथा जिसके ऊपर कुछ ही सिद्धान्तवादी चल पाते हैं-इस पक्षद्वयके कारण सामान्य समय दो भेदोंमें विभक्त हो जाता है। यह मतभेद किसीको तो सिद्धान्तका आश्रय लेनेसे और किसीको भ्रान्तिसे होता है। किसी मुनिके सिद्धान्तका आधार तर्क होता है और किसीके

English

second and first in the east petal alike, and seventh, and another; in the north petal alike; with the two seconds in the halves;

अध्याय ३४१

श्लोक 57

द्वितीयषष्ठाः सदृशाश् चतुर्थपञ्चमावपि ।आद्यन्तपादयोस्तुल्यौ परार्धसप्तमावपि

dvitīyaṣaṣṭhāḥ sadṛśāś caturthapañcamāvapi / ādyantapādayostulyau parārdhasaptamāvapi

हिन्दी अर्थ

मतका आलम्बन क्षणिक विज्ञानवाद। किसीका यह मत है कि पञ्चभूतोंके संघातसे शरीरमें चेतनता आ जाती है, कोई स्वतःप्रकाश ज्ञानको ही चैतन्यरूप मानते हैं। कोई प्रज्ञात स्थूलतावादी

English

the second and sixth alike, fourth and fifth too; at the beginning and end feet equal; the seventh of the latter half;

अध्याय ३४१

श्लोक 58

समौ तुर्यं पञ्चमन्तु क्रमेण विनियोजयेत् ।तुर्यौ योज्यौ तु तद्वच्च दलान्ताः क्रमपादयोः

samau turyaṃ pañcamantu krameṇa viniyojayet / turyau yojyau tu tadvacca dalāntāḥ kramapādayoḥ

हिन्दी अर्थ

है और कोई शब्दानेकान्तवादी। शैव, वैष्णव, शाक्त तथा सौर सिद्धान्तोंको माननेवालोंका विचार है कि इस जगत्का कारण 'ब्रह्म' है। परंतु सांख्यवादी प्रधानतत्त्व (प्रकृति)-को ही दृश्य जगतूका कारण मानते हैं। इसी वाणीलोकमें विचरते हुए विचारक जो एक-दूसरेके प्रति

English

equal; the fourth and fifth one should apply in order; the fourth should be applied likewise, at the petal ends in the feet in order;

अध्याय ३४१

श्लोक 59

अर्धयोरन्तिमाद्यौ तु मुरजे सदृशावभौ ।पादार्धपतितो वर्णः प्रातिलोम्यानुलोमतः

ardhayorantimādyau tu muraje sadṛśāvabhau / pādārdhapatito varṇaḥ prātilomyānulomataḥ

हिन्दी अर्थ

विपर्यस्त दृष्टि रखते हुए परस्पर युक्तियोंद्वारा एक-दूसरेको बाँधते हैं, उनका वह भिन्न-भिन्न मत या मार्ग ही ' विशिष्ट समय' कहा गया है। यह विशिष्ट समय 'असतके परिग्रह ' तथा 'सत्के

English

the last and first of the halves in the drum alike; a letter fallen in the half-foot by reverse and forward;

अध्याय ३४१

श्लोक 60

अन्तिमं परिबध्नीयाद्यावत्तुर्यमिहादिमत् ।पादात्तुर्याद्यदेवाद्यं नवमात् षोडशादपि

antimaṃ paribadhnīyādyāvatturyamihādimat / pādātturyādyadevādyaṃ navamāt ṣoḍaśādapi

हिन्दी अर्थ

परित्याग'के कारण दो भेदोंमें विभक्त होता है। जो “प्रत्यक्ष? आदि प्रमाणोंसे बाधित हो, उस मतको ' असत्' मानते हैं। कवियोंको वह मत ग्रहण करना चाहिए, जहाँ ज्ञानका प्रकाश हो। जो अर्थक्रियाकारी हो, वही “परमार्थ सत्' है। अज्ञान और ज्ञानसे परे जो एकमात्र ब्रह्म है, वही परमार्थ सत् जाननेयोग्य है। वही सृष्टि, पालन और संहारका हेतुभूत विष्णु है, वही शब्द और अलंकाररूप है। वही

English

one should bind the last up to the fourth, as the first; from the fourth foot as the first from the ninth, from the sixteenth too;

अध्याय ३४१

श्लोक 61

अक्षरात् पुटके मध्ये मध्ये ऽक्षरचतुष्टयम् ।कृत्वा कुर्याद्यथैतस्य मुरजाकारता भवेत्

akṣarāt puṭake madhye madhye 'kṣaracatuṣṭayam / kṛtvā kuryādyathaitasya murajākāratā bhavet

हिन्दी अर्थ

अपरा और परा विद्या है। उसीको जानकर मनुष्य संसारबन्धनसे मुक्त होता है॥ २८--४०॥

English

making four letters in the middle of the case, in the middle of the letter, one should make it so that it has a drum shape.

अध्याय ३४१

श्लोक 62

द्वितीयं चक्रशार्दूलविक्रीडितकसम्पदम् ।गोमूत्रिका सर्ववृत्तैर् अन्ये बन्धास्त्वनुष्टुभा

dvitīyaṃ cakraśārdūlavikrīḍitakasampadam / gomūtrikā sarvavṛttair anye bandhāstvanuṣṭubhā

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें “काव्यदोषविवेकका कथन” नामक तीन सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ अग्निदेव कहते हैं-अब मैं तुम्हें “एकाक्षराभिधान' तथा मातृकाओंके नाम एवं

English

The second has the wealth of Chakra and Shardulavikridita; Gomutrika with all meters; the other Bandhas with Anushtubh.

अध्याय ३४१

श्लोक 63

नामधेयं यदि न चेदमीषु कविकाव्ययोः ।मित्रधेयाभितुष्यन्ति नामित्रः खिद्यते तथा

nāmadheyaṃ yadi na cedamīṣu kavikāvyayoḥ / mitradheyābhituṣyanti nāmitraḥ khidyate tathā

हिन्दी अर्थ

विष्णुका। 'अ' निषेध अर्थमें भी आता है। 'आ' ब्रह्माजीका बोध कराता है। वाक्य-प्रयोगमें भी उसका उपयोग होता है। 'सीमा' अर्थमें 'आ' अव्ययपद है । क्रोध और पीड़ा अर्थमें भी उसका

English

If the name is not among them in the poet's and the poem's — friends are pleased; no enemy suffers thus.

अध्याय ३४१

श्लोक 64

वाणवाणासनव्योमखड्गमुद्गरशक्तयः ।द्विचतुर्थत्रिशृङ्गाटा दम्भोलिमुषलाङ्कुशाः

vāṇavāṇāsanavyomakhaḍgamudgaraśaktayaḥ / dvicaturthatriśṛṅgāṭā dambholimuṣalāṅkuśāḥ

हिन्दी अर्थ

प्रयोग किया जाता है। 'इ' काम-अर्थमें प्रयुक्त होता है। ई' रति और लक्ष्मीके अर्थमें आता है। “ड' शिवका वाचक है। 'ऊ' रक्षक आदि अर्थोमें प्रयुक्त होता है। 'ऋ' शब्दका बोधक है । ऋ? अदितिके अर्थमें प्रयुक्त होता है। “ल्', “लृ'-ये दोनों अक्षर दिति एवं कुमार कार्तिकेयके

English

Arrow, bow, sky, sword, mace, spear, two- and four-, three-horned, thunderbolt, pestle, goad,

अध्याय ३४१

श्लोक 65

पदं रथस्य नागस्य पुष्करिण्यसिपुत्रिका ।एते बन्धास् तथा चान्ये एवं ज्ञेयाः स्वयं बुधैः

padaṃ rathasya nāgasya puṣkariṇyasiputrikā / ete bandhās tathā cānye evaṃ jñeyāḥ svayaṃ budhaiḥ

हिन्दी अर्थ

योगिनीका वाचक है। 'ओ' ब्रह्माजीका और 'औ' महादेवजीका बोध करानेवाला है। 'अं' का प्रयोग काम अर्थमें होता है। 'अः' प्रशस्त ( श्रेष्ठ) -का वाचक है। 'क' ब्रह्मा आदिके अर्थमें

English

foot of chariot, of elephant, lotus pond, sword-daughter — these Bandhas, and others, are to be known by the wise themselves.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 341
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.