Agni Purana· Agni Purāṇa
343
अध्याय 343 / 381

Adhyaya 344

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अध्याय ३४३

श्लोक 1

शब्दार्थालङ्काराः अग्निर् उवाच शब्दार्थयोरलङ्कारो द्वावलङ्कुरुते समं ।एकत्र निहितो हारः स्तनं ग्रीवामिव स्त्रियाः

śabdārthālaṅkārāḥ agnir uvāca śabdārthayoralaṅkāro dvāvalaṅkurute samaṃ / ekatra nihito hāraḥ stanaṃ grīvāmiva striyāḥ

हिन्दी अर्थ

७. यह ' अयादेश-संधि' (“एचोञ्यवायावः ।'--पा० सू० ६।१।७८) है। नै+अकः=नायकः । यहाँ “नै 'के 'ऐ'के स्थानमें ' आय्' हुआ है। लौ+अकः=लावकः (औ'की जगह ' आव्')। ने+अ:=नयः (ए'के स्थानमें ' अय्'); अन्यत्र 'लबः', 'विष्णवे' आदि उदाहरण भी मिलते हैं । लोअः=ल् अव् अ:-लव: । विष्णो+ए=विष्णवे। ७३६ अग्निपुराण

English

Cf. RV. 6.47.30a.

अध्याय ३४३

श्लोक 2

प्रशस्तिः कान्तिरौचित्यं संक्षेपो यावदर्थता ।अभिव्यक्तिरिति व्यक्तं षड्भेदास्तस्य जाग्रति

praśastiḥ kāntiraucityaṃ saṃkṣepo yāvadarthatā / abhivyaktiriti vyaktaṃ ṣaḍbhedāstasya jāgrati

हिन्दी अर्थ

इत्यादि' । तेऽत्र, योऽत्र जलेऽकजम् । जहाँ संधि अब “व्यञ्ञनसंधि ”का वर्णन करूँगा--वाग्यतः। न होकर प्रकृत रूप ही रह जाता है, उसे अजेकमातृकः । षडेते। तदिमे। अबादि। वाङ्नीतिः । “प्रकृतिभाव' कहते हैं। उसके उदाहरण-नो षण्मुखः। वाङ्मनसम्। इत्यादि। वाग्भावादिः।

English

The three fragrant things are camphor, sandal and saffron. Musk, camphor and sandal (used as an unguent) yield all the pleasures.

अध्याय ३४३

श्लोक 3

प्रशस्तिः परवन्मर्मद्रवीकरणकर्मणः ।वाचो युक्तिर्द्विधा सा च प्रेमोक्तिस्तुतिभेदतः

praśastiḥ paravanmarmadravīkaraṇakarmaṇaḥ / vāco yuktirdvidhā sā ca premoktistutibhedataḥ

हिन्दी अर्थ

यज्ञभूते एहि देव इमं नय'॥ १-५॥ भवांष्टीका। भवांष्ठकः । भवांस्तीर्थम्। भवांस्थेत्याह। १. यह ' लोपादेश-संधि' (लोपः शाकल्यस्य।'—पा० सू० ८।३।१९) है। ते+इह-इस अवस्थामें 'ए'की जगह हुआ त्+अय+इह बना। फिर “लोपादेश ' के नियमानुसार “य्' का लोप हो गया-त इह' बना। लोप न होनेपर ' तयिह' बना।

English

One would duly get all peace by worshipping the planets with the gSyatri (hymn) after offering a lakh or crore oblations of sesamum, clarified butter, barley and other grains in a square sacrificial pit (done) by eight or sixteen brahmins.

अध्याय ३४३

श्लोक 4

प्रेमोक्तिस्तुतिपर्यायौ प्रियोक्तिगुणकीर्तने ।कान्तिः सर्वमनोरुच्यवाच्यवात्तकसङ्गतिः

premoktistutiparyāyau priyoktiguṇakīrtane / kāntiḥ sarvamanorucyavācyavāttakasaṅgatiḥ

हिन्दी अर्थ

२. यहाँ 'पूर्वरूप-संधि' (एङः पदान्तादति।'-पा० सू० ६। १। १०९) है। ते+अत्र, यो" अत्र, जले+ अकजम्-इन तीनों ही पदोंमें 'अ' अपने पहलेके अक्षरमें मिल गया है।

English

RV. 3.62.10.

अध्याय ३४३

श्लोक 5

यथा वस्तु तथा रीतिर्यथा वृत्तिस् तथा रसः ।ऊर्जस्विमृदुसन्दर्भादौचित्यमुपजायते

yathā vastu tathā rītiryathā vṛttis tathā rasaḥ / ūrjasvimṛdusandarbhādaucityamupajāyate

हिन्दी अर्थ

३. अब 'प्रकृतिभाव' के उदाहरण देते हैं । 'नो अहो'-इस अवस्थामें (“एङः पदान्तादति'के अनुसार) ' पूर्वरूप एकादेश' प्राप्त था; किन्तु यहाँ प्रकृतिभावका विधान है; यह पद ज्यों-का-त्यों रहेगा; इसमें संधिजनित विकृति नहीं होगी। प्रकृतिभावके लिये पाणिनिने कई नियम बनाये हैं । (“नो अहो '--जैसे स्थलोंके नियम इस प्रकार हैं प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम्।' (पा० सू० ६। १। १२५) “प्लुत' तथा “प्रगृह्य' संज्ञावाले पदोंका ' प्रकृतिभाव” होता है, उनमें संधि नहीं होती। “दूराद्धूते च।' (पा० सू० ८।२।८४) दूरसे किसीको बुलाते समय जिस वाक्यका प्रयोग होता है, उसके अन्तिम स्वरकी 'प्लुत' संज्ञा होती है; क्योंकि उसका उच्चारण दीर्घतर स्वरमें होता है। 'प्रगृह्य संज्ञाके अनेक भेद हैं-(१) ईकारान्त, ऊकारान्त और एकारान्त द्विवचन। (२) ' अदस् ' शब्द- सम्बन्धी मकारके बाद होनेवाले ई और ऊ। (३) एक स्वरवाला आङ्वर्जित निपात। (४) ओकारान्त निपात । (द्रव्यार्थभिन्न 'च' आदि अव्यय तथा 'प्र' आदि उपसर्ग भी 'निपात' कहलाते हैं।) (५) सम्बोधन-निमित्तक ओकार “वैकल्पिक प्रगृह्य' होता है; किंतु

English

These arc respectively the periods corresponding to Junc-July and September-October.

अध्याय ३४३

श्लोक 6

संक्षेपो वाचकैर् अल्पैर् वहोरर्थस्य संग्रहः ।अन्यूनाधिकता शब्दवस्तुनोर्यावदर्थता

saṃkṣepo vācakair alpair vahorarthasya saṃgrahaḥ / anyūnādhikatā śabdavastunoryāvadarthatā

हिन्दी अर्थ

उसके बाद अवैदिक 'इति' शब्दका रहना आवश्यक है। (६) 'मय्' प्रत्याहारसे परे जो “उकार' हो, वह भी 'वैकल्पिक प्रगृह्य' है; किंतु उसके बाद कोई भी स्वर रहना चाहिए। (इनके सिवा और भी कई नियम हैं, जो विस्तारभयसे नहीं दिये जाते।) ' अहो+ एहि' में ' अयाद्यादेश'के नियमानुसार 'ओ' की जगह “अब प्रास था, किंतु 'अहो' पद ' ओकारान्त निपात' होनेसे 'प्रगृह्य' है; अतएव वह प्रकृतरूपमें रह गया। 'अ+अवेहि', इ+इन्द्रकम्, उ+उत्तिष्ठ-इनमें दीर्घ एकादेश प्राप्त था; किंतु नंबर ३ नियमके

English

Lustration of arms, a kind of military and religious ceremony, per¬ formed by kings or generals before they set out.

अध्याय ३४३

श्लोक 7

प्रकटत्वमभिव्यक्तिः श्रुतिराक्षेप इत्य् अपि ।तस्या भेदौ श्रुतिस्तत्र शब्दं स्वार्थसमर्पणम्

prakaṭatvamabhivyaktiḥ śrutirākṣepa ity api / tasyā bhedau śrutistatra śabdaṃ svārthasamarpaṇam

हिन्दी अर्थ

अनुसार ' प्रगृह्य’ होनेसे यहाँ प्रकृतिभाव होता है। 'कवी+एतौ', वायू+एतौ इनमें “यणादेश” प्राप्त था और “वने इमे' में अय्' आदेशको प्राप्ति थी; किंतु नं० १ नियमके अनुसार प्रगृह्य होनेसे यहाँ भी प्रकृतरूप ही रह जाता है। 'कवी', ' वायू' और “वने'—ये तीनों पद द्विवचनान्त हैं । ' अमी एते' में 'यण्' प्राप्त था; नं० २ नियमके अनुसार प्रगृह्य होनेसे प्रकृतिभाव हो गया। ' यज्ञभूते ! एहि ' इसमें अयादेश और ' देव! इमं नय' में गुण एकादेश प्राप्त था; किंतु प्लुत होनेसे यहाँ प्रकृतिभाव हुआ। दूरसे सम्बोधनका वाक्य है “यज्ञभूते एहि? ४. व्यञ्जनसंधिके बहुत-से प्रकार या भेद पाणिनिसूत्रोमें वर्णित हैं । परंतु अग्निपुराणमें उल्लिखित इस कौमार-व्याकरणमें व्यञ्जनसंधिके सिद्ध रूपोंका जो उल्लेख मिलता है, उसके अनुसार व्यञ्जनसंधिके ग्यारह प्रकार निर्दिष्ट हुए हैं (१)-जश्त्वविधान जो 'झलां जशोऽन्ते'-इस पाणिनिसूत्र (८। २। ३९)-े निर्दिष्ट है । (२)-अनुनासिकविधान जो ' यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा इस पाणिनिसूत्र (८।४।४५) तथा 'प्रत्यये भाषायां च नित्यम्।' इस कात्यायन-वार्तिकट्ठारा प्रतिपादित है । (३) -छत्वविधान जो ' शश्छोऽटि '-

English

Manifestness is revelation; Shruti and Akshepa too. Its two divisions: Shruti there is a word giving over its own meaning,

अध्याय ३४३

श्लोक 8

भवेन्नैमित्तिकी पारिभाषिकी द्विविधैव सा ।सङ्केतः परिभाषेति ततः स्यात् पारिभाषिकी

bhavennaimittikī pāribhāṣikī dvividhaiva sā / saṅketaḥ paribhāṣeti tataḥ syāt pāribhāṣikī

हिन्दी अर्थ

(८।४।६३) 'छत्वममीति वाच्यम्।'--इन सूत्र- वार्तिकोंद्वरा निर्दिष्ट है । (४) -श्रुत्वविधान जो 'स्तोः श्चुना श्चुः इस पा० सू० (८।४।४०) में कहा गया है। (५)-छुल्वविधान जो टना ष्टुः '-इस पा० सू० (८।४।४१) में वर्णित है। (६) -लकारात्मक परसवर्णविधान जो 'तोलि'--इस पा० सू० (८।४।६०) के नियमसे आबद्ध है । (७)-ङमुडागमविधान जो “ङमो हस्वादचि ङमुण् नित्यम्'-इस पा० सू० (८।३।३२) द्वारा कथित है । (८) -नकारसत्वविधान जो ' नश्छव्यप्रशान्।'--इस पा० सू० (८।३।७)

English

it would be occasional and technical, twofold only. Convention is "terminology" (paribhasha), hence it is Paribhashiki;

अध्याय ३४३

श्लोक 9

मुख्यौपचारिकी चेति सा च सा च द्विधा द्विधा ।स्वाभिधेयस्खलद्वृत्तिरमुख्यार्थस्य वाचकः

mukhyaupacārikī ceti sā ca sā ca dvidhā dvidhā / svābhidheyaskhaladvṛttiramukhyārthasya vācakaḥ

हिन्दी अर्थ

के नियमानुसार सम्पादित होता है। (९)-परसर्णविधान जो ' अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः ।'--पा० सू० (८।४।५८) तथा वा पदान्तस्य।' (८ । ४।५९)--इन पा० सूत्रोद्वारा कथित है । (१०) -तुगागमविधान जो शि तुक्।', (८।३।३१) ' छे च।, (६।१।७३) "दीर्घात् (६।१।७५) तथा “पदान्ताद्वा' (६। १।७६)-इन सूत्रोके नियमोंसे सम्बद्ध है। ११ -परसवर्णविधान जो ' अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः ।' (८।४। ५८) “वा पदान्तस्य' (८।४।५९)--इन पा० सूत्रोंद्वारा प्रतिपादित है। भवाञ्शेते। भवाण्ढीनः। सम्भर्त्ता। त्वङ्करिष्यसि इसके बादकी पदावलियोँमें विसर्ग-

English

and Mukhya and Aupacharika — each twofold. Aupacharika is a word that, with its own denotation failing, denotes a non-primary meaning

अध्याय ३४३

श्लोक 10

यया शब्दो निमित्तेन केनचित्सौपचारिकी ।सा च लाक्षणिकी गौणी लक्षणागुणयोगतः

yayā śabdo nimittena kenacitsaupacārikī / sā ca lākṣaṇikī gauṇī lakṣaṇāguṇayogataḥ

हिन्दी अर्थ

वाक् यतः=वाग्यतः। ('झलां जशोऽन्ते।' पा० सू० ८।२।३९) “पदान्तमें “झल्' के स्थानमें 'जश्' होता है '--इस नियमके अनुसार 'वाक्'के ' क्' का 'ग्' हो गया है। यद्यपि जशमें ज् ब् ग् ड् दू-ये पाँच अक्षर हैं, तथापि “क् ' के स्थानमें 'ग्' होनेका कारण है स्थानकी समानता। 'क्' और 'ग्'का स्थान एक है। दोनों ही कण्ठस्थानसे निकलते हैं। आगेके चार उदाहरणोंमें भी यही नियम है-- अच्+एकमातृकः=अजेकमातृकः । यहाँ 'च्' के स्थानमें “ज्' हो गया है। स्वरहीन अक्षर अपने बादवाले अक्षरसे मिल जाते हैं, अतः

English

through some ground; that is Lakshanika and Gauni, by connection of indication and quality.

अध्याय ३४३

श्लोक 11

अभिधेयाविनाभूता प्रतीतिर् लक्षणोच्यते ।अभिधेयेन सम्बन्धात्सामीप्यात्समवायतः

abhidheyāvinābhūtā pratītir lakṣaṇocyate / abhidheyena sambandhātsāmīpyātsamavāyataḥ

हिन्दी अर्थ

“ज्! “ए' में मिलकर ' जे' बन गया। षट्+ एते'-इसमें ' ट्' के स्थानमें ' ड्' हुआ है। इसी तरह “तत् + इमे' में 'त्'के स्थानमें 'द्' तथा ' अप्+आदि' में 'प्' के स्थानमें ' ब्' हुआ है। ये पूर्वनि्दिष्ट जशत्वविधान के उदाहरण हैं। अब अनुनासिकविधानके उदाहरण दिये जाते हैं-वाक्+नीतिः=वाङ्नीतिः। पदान्त यर्' प्रत्याहारके अक्षरोंका विकल्पसे अनुनासिक होता है, कोई अनुनासिक अक्षर परे हो तब। यदि प्रत्यय अनुनासिक परे हो तो ' यर्'के स्थानमें नित्य अनुनासिक होता है । इस नियमके अनुसार 'क्' के स्थानमें उसी वर्गका अनुनासिक अक्षर 'ङ्' हो गया। अनुनासिक न होनेकी स्थितिमें पूर्वनियमानुसार ' जश्त्व' होता है । उस दशामें ' वाग्नीतिः' रूप होता है। षट्+मुखः=षण्मुखः (षड्मुखः) । उक्त नियमसे 'ट्' की जगह उसीके स्थान (मूर्धा)-का अनुनासिक 'ण्' हुआ। जश्त्व होनेपर “ड्' होता है। निम्नाङ्कित पदोंका पदच्छेद इस प्रकार है-वाक्+मनसम्=वाङ्मनसम्। वाक्+मात्रम्=वाङ्मात्रम्। अब छत्वविधानके उदाहरण देते हैं-वाक्+श्लक्ष्णम्= वाक्छूलक्ष्णम्, वाक्शलक्ष्णम् । यहाँ 'श्'के स्थानमें विकल्पेन 'छ' हुआ है । नियम इस प्रकार है--'झय्' से परे

English

The understanding inseparable from the denoted is called Lakshana (indication): by relation with the denoted, nearness, inherence,

अध्याय ३४३

श्लोक 12

वैपरीत्यात्क्रियायोगाल्लक्षणा पञ्चधा मता ।गौणीगुणानामानन्त्यादनन्ता तद्विवक्षया

vaiparītyātkriyāyogāllakṣaṇā pañcadhā matā / gauṇīguṇānāmānantyādanantā tadvivakṣayā

हिन्दी अर्थ

“श्' का 'छ्' हो जाता है, ' अम्' प्रत्याहार परे रहनेपर । श्रुत्वविधान--सकार-तवर्गके स्थानमें 'शकार' “चवर्ग” होते हैं, शकार- चवर्गका योग होनेपर । ' तत्+शरीरम् '=' तच्छरीरम् '। यहाँ ' शरीरम् ' के शकारका योग होनेसे “तत्' के त्' की जगह 'च्' हो गया। इसके बाद छत्व-विधानके नियमानुसार “शकार 'के स्थानमें 'छकार' हो गया। 'तल्लुनाति' यह लकारात्मक परसवर्णका उदाहरण है । नियम यह है कि 'तवर्गसे परे लकार हो तो उस तवर्गका “परसवर्ण” होता है।' इसके अनुसार 'तत्+लुनाति' इस अवस्थामें 'त्' के स्थानमें 'ल्' हो

English

opposition and action-connection, Lakshana is held fivefold; Gauni is endless by endlessness of qualities, in the wish to express that.

अध्याय ३४३

श्लोक 13

अन्यधर्मस्ततो ऽन्यत्र लोकसीमानुरोधिना ।सम्यगाधीयते यत्र स समाधिरिह स्मृतः

anyadharmastato 'nyatra lokasīmānurodhinā / samyagādhīyate yatra sa samādhiriha smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

गया। तत्+ चरेत्=तच्चरेत् । यहाँ श्रुत्वविधानके नियमानुसार पूर्ववत् “त्' की जगह “च्' हो गया है। क्रुड+ आस्ते-क्रु ूझस्ते । यह ङ्मुडागम- विधानका उदाहरण है। नियम है कि हस्व अक्षरसे परे यदि 'ङ् ण् न्' -ये व्यञ्जन हों और इनके बाद स्वर अक्षर हों तो उक्त 'ङ्' आदिकी जगह एक और 'ङ्' आदि बढ़ जाते हैं। अर्थात् वे ङू ङू ण् णू और न् न् हो जाते हैं। इस नियमसे उक्त उदाहरणमें एक ङ्' की जगह दो 'ङ् ङ्' हो गये हैं। इसी तरह ' सुगण्+इह' की जगह “सुगणह ' बनता है । भवान्+चरन्=' भवांश्चरन्'-यह नकाररुत्वविधानका उदाहरण है। नियम यह है--' प्रशान्' से भिन्न जो नकारान्त पद है, उनके 'न्' की जगह 'र्' हो जाता है, यदि बादमें 'छ ठू थ् च् टू त्'-इनमेंसे कोई अक्षर विद्यमान हो, तब। इस नियमसे उक्त उदाहरणमें 'न्' के स्थानमें 'र्' हुआ। 'र्' का विसर्ग, विसर्गके स्थानमें “स्! हुआ। 'स्' का श्रुत्व-विधानके अनुसार 'श्' हो गया। उसके पूर्व अनुस्वारका आगम होता है । कहीं-कहीं 'चिरम्' पाठ मिलता है। उस दशामें ' भवांश्चिरम्' रूप सिद्ध होगा। यदि 'चिरम्' के साथ परवर्ती ' भवान्' शब्द ले लिया जाय तो निम्नाङ्कितरूप सिद्ध होगा।

English

Another's property elsewhere, in accordance with the limits of the world, is properly placed — that is here remembered as Samadhi.

अध्याय ३४३

श्लोक 14

श्रूतेरलभ्यमानो ऽर्थो यस्माद्भाति सचेतनः ।स आक्षेपो धनिः स्याच्च ध्वनिना व्यज्यते यतः

śrūteralabhyamāno 'rtho yasmādbhāti sacetanaḥ / sa ākṣepo dhaniḥ syācca dhvaninā vyajyate yataḥ

हिन्दी अर्थ

चिरम्+ भवान्=चिरंभवान्, चिरम्भवान्-यहाँ मकारके स्थानमें अनुस्वार हुआ है। अनुस्वारका वैकल्पिक परसवर्ण होनेपर ' चिरम्भवान्' रूप बनता है । “मोऽनुस्वारः ।'--इस पा० सूत्र (८।३। २३) के अनुसार मकारानुस्वारविधानका नियम इस प्रकार है-पदान्तमें “म्'का अनुस्वार होता है, 'हल्' परे रहनेपर। (“नश्चापदान्तस्य झलि।' पा० सू० ८।३। २४) के अनुसार “झल्' परे रहनेपर अपदान्त “न् म्' के स्थानमें भी अनुस्वार होता है। 'न्'के अनुस्वारका उदाहरण है-“यशांसि'। 'म्' के अनुस्वारका उदाहरण है 'आक्रंस्यते'।

English

A meaning not obtainable from the text but shining in the mind — that is Akshepa and Dhvani; and it is suggested by Dhvani.

अध्याय ३४३

श्लोक 15

शब्देनार्थेन यत्रार्थः कृत्वा स्वयमुपार्जनम् ।प्रतिषेध इवेष्टस्य यो विशेषो ऽभिधित्सया

śabdenārthena yatrārthaḥ kṛtvā svayamupārjanam / pratiṣedha iveṣṭasya yo viśeṣo 'bhidhitsayā

हिन्दी अर्थ

भवान्+ छात्रः =भवांश्छात्रः । यहाँ पूर्ववत् नकाररुत्व-विधानके अनुसार नकारका रुत्व, विसर्ग, सकार तथा अनुस्वारागम होकर शरुत्वविधानके अनुसार 'स्' के स्थानमें ' श्' हो गया है। भवान्+टीका=भवाँ्टीका। यहाँ भी 'न्' की जगह रुत्व, विसर्ग और सकार होकर अनुस्वारागम हुआ और ष्टुत्व-विधानके अनुसार 'स्'के स्थानमें 'ष्' हो गया। यही बात ' भवाँष्ठक:' के साधनमें भी समझनी चाहिए भवान्+ठकः । भवान्+तीर्थम्- भवाँस्तीर्थम् । यहाँ भी नकारका रुत्व, विसर्ग, सकार और अनुस्वारागम समझना चाहिए । ' भवान्+था+इत्याह-इसमें भी पूर्ववत् सब कार्य होंगे और था+इत्याहमें गुण एकादेश होनेपर ' भवांस्थेत्याह '--ऐसा रूप सिद्ध होगा। ' भवान्+लेखाः=भवाँल्लेखाः । ¬ यहाँ लकारात्मक परसवर्ण सानुनासिक हुआ है। ' भवान्+जयः ' इसमें श्रुत्वविधानके अनुसार चवर्ग-योगके कारण तवर्गीय ' न्' को जगह चवर्गीय 'जू' हो गया है। ' भवान्+शेते' इस पदच्छेदमें ' भवाञ्च्छेते, भवाञ्छेते, भवाञ्चशेते, भवाज् शेते ।'--ये रूप बनते हैं। पहलेमें शि तुक्।' पा० सू० (८।३।३१) के अनुसार 'शकार' परे रहते नान्त पदको 'तुक्'का आगम होता है। इसे “नान्ततुगागम' कहा जा

English

Where meaning by word or meaning, having itself gained it — a special thing, as if prohibition of the desired, in the wish to say,

अध्याय ३४३

श्लोक 16

तमाक्षेपं व्रुवन्त्यत्र स्तुतं स्तोत्रमिदं पुनः ।अधिकारादपेतस्य वस्तुनो ऽन्यस्य या स्तुतिः

tamākṣepaṃ vruvantyatra stutaṃ stotramidaṃ punaḥ / adhikārādapetasya vastuno 'nyasya yā stutiḥ

हिन्दी अर्थ

सकता है । इसी तरह हस्व, दीर्घ और पदान्तसे परे भी तुगागम होते हैं । यहाँ ' नान्ततुगागम'के अनुसार 'तुक्' हुआ। 'उक्' की इत्संज्ञा हुई, लोप हुआ। ' भवान् त् शेते' रहा। श्रुत्वविधानके अनुसार 'त्' के स्थानमें “च्' और 'न्' के स्थानमें 'ज्' हुआ और 'श्' को जगह 'छ' हुआ तो ' भवाञ्च्छेते' बना। 'झरो झरि सवणें।' (पा० सू० ८।४।६५) के अनुसार ' झर्'का लोप होनेपर “च् अदृश्य हो जाता है, अतः

English

they call Akshepa; here Stuta is this praise again: praise of another thing irrelevant to the context;

अध्याय ३४३

श्लोक 17

यत्रोक्तं गम्यते नार्थस्तत्समानविशेषणं ।सा समासोकितिरुदिता सङ्क्षेपार्थतया बुधैः

yatroktaṃ gamyate nārthastatsamānaviśeṣaṇaṃ / sā samāsokitiruditā saṅkṣepārthatayā budhaiḥ

हिन्दी अर्थ

७३८ अग्निपुराण संधि जाननी चाहिए-कश्छिन्द्यात'। कश्चरेत्। कश्श्वशुरः', कः श्वशुरः। कस्स्वरः१, कः

English

where the meaning said is not understood, an equal qualifier — that is Samasokti told by the wise for brevity of sense.

अध्याय ३४३

श्लोक 18

अपह्नुतिरपह्नुत्य किञ्चिदन्यार्थसूचनम् ।पर्यायोक्तं यदन्येन प्रकारेनाभिधीयते ।एषामेकंतमस्येव समाख्या ध्वनिरित्यतः

apahnutirapahnutya kiñcidanyārthasūcanam / paryāyoktaṃ yadanyena prakārenābhidhīyate / eṣāmekaṃtamasyeva samākhyā dhvanirityataḥ

हिन्दी अर्थ

क खनेत्ः। क/करोति”। कपठेत्। क.फलेत्। कोऽत्रयोधः। क उत्तमः। देवाएते।

English

Apahnuti conceals and suggests something of another meaning; Paryayokta is what is said in another way; of these one alone is thus named Dhvani.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 343
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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