Agni Purana· Agni Purāṇa
356
अध्याय 356 / 381

Adhyaya 357

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अध्याय ३५६

श्लोक 1

तिङ्विभक्तिसिद्धरूपं कुमार उवाच तिङ्विभक्तिं प्रवक्ष्यामि तथादेशं समासतः ।तिङ्स्त्रिष्वपि वर्तन्ते भावे कर्मणि कर्तरि

tiṅvibhaktisiddharūpaṃ kumāra uvāca tiṅvibhaktiṃ pravakṣyāmi tathādeśaṃ samāsataḥ / tiṅstriṣvapi vartante bhāve karmaṇi kartari

हिन्दी अर्थ

कुमार स्कन्ध कहते हैं- कात्यायन! अब तद्धित' इस प्रकार है-' अंस' शब्दसे “लच्' प्रत्यय त्रिविध 'तद्धित'का वर्णन करूँगा। “तद्धित 'के होनेपर ' अंसलः ' बनता है; इसका अर्थ है-- तीन भेद हैं-सामान्यावृत्ति तद्धित, अव्यय बलवान्। 'वत्स' शब्दसे 'लच्' प्रत्यय होनेपर तद्धित तथा भाववाचक तद्धित। 'सामान्यावृत्ति “वत्सलः ' रूप होता है, इसका अर्थ स्नेहवान् है। पाणिनि-व्याकरणके अनुसार ' वत्सांसाभ्यां कामबले।' (५। २ । ९८) --इस सूत्रसे क्रमशः “कामवान्? और ' बलवान्'के अर्थमें 'वत्स' और ' अंस' शब्दोंसे “लच्' प्रत्यय होता है। सूत्रमें 'काम' तथा 'बल' शब्द अर्श आद्यजन्य माने गये हैं। “काम' शब्द यहाँ 'स््रेह' का

English

Sudhanva, Sudhanu, Pariksit and Arimejaya (were the sons) of Kuru. Suhotra was from Sudhanva. Cyavana was born from Suhotra.

अध्याय ३५६

श्लोक 2

सकर्मकार्मकाच्च कर्तरि द्विपदे स्मृताः ।सकर्मकाकर्मणि च तदादेशस्तथेरितः

sakarmakārmakācca kartari dvipade smṛtāḥ / sakarmakākarmaṇi ca tadādeśastatheritaḥ

हिन्दी अर्थ

७६४ अग्निपुराण “फेन' शब्दसे 'इलच्' प्रत्यय होनेपर “फेनिलम्'' 'उरस्वान्' का अर्थ 'मनस्वी' समझना चाहिए। रूप होता है, इसका अर्थ है--फेनयुक्त जल। 'प्रज्ञाश्रद्धार्चाभ्यो णः।' (५। २। १०१)-इस

English

(His son was) Sudhanva, Orja was his son. Sambhava was (born) from Crja. Jarasandha (was) from Sambhava. Saliadeva was his son.

अध्याय ३५६

श्लोक 3

वर्तमाने लडाख्यातो विध्याद्यर्थे लिङीरितः ।विध्यादौ लोडाशिषि च भूतानद्यतने च लङ्

vartamāne laḍākhyāto vidhyādyarthe liṅīritaḥ / vidhyādau loḍāśiṣi ca bhūtānadyatane ca laṅ

हिन्दी अर्थ

लोमादिगणसे 'श' प्रत्यय होता है, (विकल्पसे “मतुप्' भी होता है)-इस नियमके अनुसार “श' प्रत्यय होनेपर 'लोमशः ° प्रयोग बनता है। (“मतुप्' होनेपर 'लोमवान्' होता है। इसी तरह 'रोमशः, रोमवान्'-ये प्रयोग सिद्ध होते हैं।) पामादि शब्दोंसे 'न' होता है--इस नियमके अनुसार “पाम' शब्दसे “न! होनेपर 'पामनः' ' अङ्कात् कल्याणे।'--इस वार्तिकके अनुसार

English

Udapi (was born) from Sahadeva. Srutakarmaka (was born) from Udapi. The righteous Janamejaya was the descendant of Pariksit.

अध्याय ३५६

श्लोक 4

भूते लुङ्लिट् परोक्षे ऽथ भाविन्यद्यतने च लुट् ।लिङाशिषि च शेषे ऽर्थे लड्भविष्यति ऌङ्भवेत्

bhūte luṅliṭ parokṣe 'tha bhāvinyadyatane ca luṭ / liṅāśiṣi ca śeṣe 'rthe laḍbhaviṣyati ḷṅbhavet

हिन्दी अर्थ

“कल्याण' अर्थमें अङ्ग’ शब्दसे 'न' होनेपर “लक्ष्मणः ' (उत्तम लक्षणोंसे युक्त) ये रूप बनते हैं। वैकल्पिक “मतुप् होनेपर तो “पामवान्' आदि रूप होंगे। जिसे खुजली हुई हो, वह

English

Trasadasyu (was born) from Janamejaya. Suratha, Srutasena, Ugrasena and Bhimasena (are) the names of the sons of Jahnu.

अध्याय ३५६

श्लोक 5

लिङ्निमिमित्ते क्रियातिपत्तौ परे नवात्मनेपदम् ।पूर्वं नव परस्मैपदन्तिप्तसन्तीति प्रथमः पुमान

liṅnimimitte kriyātipattau pare navātmanepadam / pūrvaṃ nava parasmaipadantiptasantīti prathamaḥ pumāna

हिन्दी अर्थ

“पामन' या “पामवान्' है। इसी तरह पिच्छादि शब्दोंसे 'इलच्' होता है-इस नियमके अनुसार “उरसिलः', ' उरस्वान् इत्यादि रूप होते हैं। “पिच्छिलः? का अर्थ 'पंखवान्' होता है। मार्गका विशेषण होनेपर यह फिसलनयुक्तका बोधक होता है-यथा "पिच्छिलः पन्थाः।'

English

Janamejaya had two sons Suratha and Mahiman. Viduratha was born from Suratha. Rk?a was born from Viduratha.

अध्याय ३५६

श्लोक 6

सिप्थस्थ मध्यमनरो मिप्वस्मस्चोत्तमः पुमान् ।त आतां अन्तात्मने मुख्यः थासाथां ध्वञ्च मध्यमः

sipthastha madhyamanaro mipvasmascottamaḥ pumān / ta ātāṃ antātmane mukhyaḥ thāsāthāṃ dhvañca madhyamaḥ

हिन्दी अर्थ

पाणिनि-सूत्रके अनुसार .“ण' प्रत्यय करनेपर 'प्रज्ञा' शब्दसे 'प्राज्ञः' (प्रज्ञावान्), ' श्रद्धा शब्दसे ' श्राद्धः ' (श्रद्धावान्) और ' अर्चा’ शब्दसे ' आर्चः ' (अर्चावान्) रूप बनते हैं। वाक्यमें प्रयोग-

English

Devapi, Balhika and Somadatta (were born) from Santanu. Somadatta, Bhuri, Bhurisravas and Sala were born from Balhika.

अध्याय ३५६

श्लोक 7

उत्तम इ वहि महि भूवाद्या धातवः स्मृताः ।भुविरेधिः पचिर्नन्दिर्ध्वंसिः श्रंसिः पदिस्त्वदिः

uttama i vahi mahi bhūvādyā dhātavaḥ smṛtāḥ / bhuviredhiḥ pacirnandirdhvaṃsiḥ śraṃsiḥ padistvadiḥ

हिन्दी अर्थ

“प्राज्ञो व्याकरणे।' स्त्रीलिङ्गमें 'प्राज्ञा' (प्रज्ञावती) रूप होगा। “ण' प्रत्यय होनेसे अणन्तत्वप्रयुक्त “ङीप्' प्रत्यय यहाँ नहीं होगा। यद्यपि “प्रकर्षेण ( स्वार्थे अण् प्रत्ययः )--इस प्रकार भी 'प्राज्ञः' की सिद्धि तो होती है, तथापि इससे स्त्रीलिङ्गमें 'प्राज्ञी' रूप बनेगा, 'प्राज्ञा' नहीं। 'वृत्ति' शब्दसे भी “ण' प्रत्यय होता है--'वार्त:' (वृत्तिमान्) ।

English

Describe to me the science of medicine that would cure 1. See verse 25 for Rksa, the first.

अध्याय ३५६

श्लोक 8

शीङः क्रीडो जुहोतिश् च जहातिश् च दधात्यपि ।दीव्यतिः स्वपितिर्नहिः सुनोतिर्वसिरेव च

śīṅaḥ krīḍo juhotiś ca jahātiś ca dadhātyapi / dīvyatiḥ svapitirnahiḥ sunotirvasireva ca

हिन्दी अर्थ

“वार्ता' विद्या इत्यादि। ऊँचे दाँत हैं इसके-इस अर्थमें 'दन्त' शब्दसे “उरच्' प्रत्यय होनेपर ' दन्तुरः -- यह रूप होता है। 'दन्त उन्नत उरच्।' (५। २। १०६) - इस पाणिनि-सूत्रसे उक्त अर्थमें “दन्तुरः ' इस पदकी

English

The food.that does not cause excessive (motion), and that mixed with the barks of lodhra (a kind of tree) are commended. One should avoid taking food that causes excess of wind. One should always make (extra) efforts in (treating) the enlargement of spleen.

अध्याय ३५६

श्लोक 9

तुदिर्मृशतिर्मुञ्चतिः रुधिर्भुजिस्त्यजिस्तनिः ।शवादिके विकरणे मनिश् चैव करोत्यपि

tudirmṛśatirmuñcatiḥ rudhirbhujistyajistaniḥ / śavādike vikaraṇe maniś caiva karotyapi

हिन्दी अर्थ

सिद्धि होती है। 'मधु' शब्दसे “र' प्रत्यय होनेपर “मधुरम्”, सुषि’ शब्दसे 'र' प्रत्यय होनेपर ' सुषिरम्', 'केश' शब्दसे “व” प्रत्यय होनेपर “केशवः ” वाचक है। यद्यपि लोकमें 'वत्स'का अर्थ बछड़ा और ' अंस'का अर्थ कंधा समझा जाता है, तथापि तद्धि वृत्तिमें 'वत्स' और ' अंस' शब्द क्रमशः ' ख्रेह' तथा 'बल ' के अर्थमें ही लिये गये हैं (तत्त्वबोधिनी) । इन अर्थोमें “मतुप् प्रत्ययका समुच्चय नहीं होता; क्योंकि “मतुप्' प्रत्यय करनेपर उक्त अर्थोकी प्रतीति न होकर अर्थान्तरकी ही प्रतीति होती है। यथा ' वत्सवती गौः ।' ' अंसवान् दुर्बलः ।' इत्यादि ।

English

(Those suffering from dropsy) should take fried barley with milk. VdsiOka (chenopodium album) mixed with ghee,

अध्याय ३५६

श्लोक 10

क्रीड्तिर्वृङो ग्रहिश्चोरिः पा नीरर्चिश् च नायकाः ।भुवि स्यात् तिङ् भवति सः भवतस्तौ भवन्ति ते

krīḍtirvṛṅo grahiścoriḥ pā nīrarciś ca nāyakāḥ / bhuvi syāt tiṅ bhavati saḥ bhavatastau bhavanti te

हिन्दी अर्थ

१. पाणिनिके अनुसार "फेनादिलच् च' (५। २।९९)-इस सूत्रसे 'इलच्' प्रत्यय होता है। यहाँ चकारसे “लच्' प्रत्ययका भी विकल्पसे विधान सूचित होता है। ' प्राणिस्थादातो लजन्यतरस्याम्।' (५।२।९६)-इस सूत्रसे ' अन्यतरस्याम्' पदकी अनुवृत्ति होती है, जिससे यहाँ “मतुप् 'का भी समुच्चय होता है । इस प्रकार 'फेन' शब्दसे तीन रूप होते हैं-' फेनिलः ', फेनलः ' तथा 'फेनवान्' सागरः ।

English

Krid, Vrin, Grahi, Chori, Pa, Nirarchi and Nayaka (verb roots and agents). On earth: "bhavati: sah bhavatah, tau bhavanti, te" (present tense of the root bhu).

अध्याय ३५६

श्लोक 11

भवसि त्वं युवां भवथो यूयं भवथ चाप्यहं ।भवाम्यावां भवावश् च भवामो ह्य् एधते कुलं

bhavasi tvaṃ yuvāṃ bhavatho yūyaṃ bhavatha cāpyahaṃ / bhavāmyāvāṃ bhavāvaś ca bhavāmo hy edhate kulaṃ

हिन्दी अर्थ

२. "लोमशः ' “पामन:' और पिच्छिलः' आदि पदोंके साधनके लिये पाणिनिने एक ही सूत्रका उल्लेख किया है- ३. “ऊषसुषिमुष्कमधो रः' (पा० सू० ५। २। १०७)--इस सूत्रसे 'र' प्रत्यय होनेपर ' ऊष' आदि शब्दोंसे 'ऊषर: ', 'सुषिरम्', “मुष्करः', “मधुरम्'-ये प्रयोग सिद्ध होते हैं। ये क्रमशः ऊसर भूमि, छिद्र, अण्डकोशवान् तथा माधुर्ययुक्तके बोधक हैं।

English

"Bhavasi tvam, yuvam bhavathah, yuyam bhavatha, aham; bhavami, avam bhavavah, bhavamah" — the lineage prospers (verb forms; edhate).

अध्याय ३५६

श्लोक 12

एधेते द्वे तथैधन्ते एधसे त्वं हि मेधया ।एधेथे च समेधध्वे एधे ह्य् एधावहे धिया

edhete dve tathaidhante edhase tvaṃ hi medhayā / edhethe ca samedhadhve edhe hy edhāvahe dhiyā

हिन्दी अर्थ

४. 'केशाद्वोऽन्यतरस्याम्।' (५। २। १०९)--इस सूत्रसे 'केश' शब्दसे 'व' प्रत्यय होनेपर ' केशवः ' रूप बनता है। ' अन्यतरस्याम्' की अनुवृत्ति प्रकरणतः प्राप्त होनेसे ' मतुप्' सिद्ध था; पुनः उक्त सूत्रमें जो उसका ग्रहण किया गया, इससे 'इन्' और 'ठन्' का भी समावेश होता है, अतः केशवान्, केशी और केशिकः-ये तीन रूप और बनते हैं। ये सभी प्रयोग मत्वर्थीयप्रत्ययान्त हैं, तथापि व्यवहारमें अन्तर है। 'केशवः' का अर्थ है--घुँघराले केशवाले भगवान् श्रीकृष्ण। अन्य किसीके लिये इस शब्दका प्रयोग नहीं देखा

English

"Edhete dve tatha edhante; edhase tvam hi medhaya; edhethe cha samedhadhve; edhe hi edhavahe dhiya" (middle-voice present forms of edh).

अध्याय ३५६

श्लोक 13

एधामहे हरेर्भक्त्या पचतीत्यादि पूर्ववत् ।भूयते ऽनुभूयते ऽसौ भावे कर्मणि वै यकि

edhāmahe harerbhaktyā pacatītyādi pūrvavat / bhūyate 'nubhūyate 'sau bhāve karmaṇi vai yaki

हिन्दी अर्थ

जाता। 'केशी' और 'केशिक' उस हैत्यका वाचक है, जो अश्वरूपधारी था और उसकी गर्दनपर बड़े-बड़े बाल (अयाल) थे। 'केशवान्' पद सामान्यतः सभी केशधारियोंके लिये प्रयुक्त होता है। “हिरण्य' तथा 'मणि' शब्दोंसे 'व' प्रत्यय होनेपर “हिरण्यबमणि वः? ' ये प्रयोग सिद्ध होते हैं। 'रजस्' शब्दसे ' वलच्' प्रत्यय होनेपर ' रजस्वलम् ?' पदको सिद्धि होती है

English

"Edhamahe" (we prosper through devotion to Hari), "pacati" and the like, as before; "bhuyate" and "anubhuyate" are the passive/impersonal forms of the root bhu (verb conjugation).

अध्याय ३५६

श्लोक 14

वुभूषति समीत्येवं णिचि भावयतीश्वरं ।यङि वोभूयते वाद्यं वोभोतेइ स्याच्च यङ्लुकि

vubhūṣati samītyevaṃ ṇici bhāvayatīśvaraṃ / yaṅi vobhūyate vādyaṃ vobhotei syācca yaṅluki

हिन्दी अर्थ

“धन”, 'कर' तथा 'हस्त'-इन शब्दोंसे 'इनि' प्रत्यय होनेपर क्रमशः ' धनी', 'करी” और 'हस्ती'-ये पद सिद्ध होते हैं। ' धन' शब्दसे

English

"Bubhushati" (desires to be), "bhavayati" (causes to be: "he causes Ishvara to be"); the intensive "bobhuyate" and the intensive-elided "bobhoti" (forms of bhu).

अध्याय ३५६

श्लोक 15

पुत्रीयति पुत्रकाम्यत्येवं पटपटायते ।घटयत्य् अथ सनि णिचि बुभूषयति रूपकं

putrīyati putrakāmyatyevaṃ paṭapaṭāyate / ghaṭayaty atha sani ṇici bubhūṣayati rūpakaṃ

हिन्दी अर्थ

पुरुषः'ये प्रयोग सिद्ध होते हैं। 'पयस्' तथा “माया' शब्दोंसे “विनि प्रत्यय होनेपर “पयस्वी ', 'मायावी'-ये रूप बनते हैं। 'ऊर्णा' शब्दसे मत्वर्थीय 'युस्' प्रत्यय होनेपर ' ऊर्णायुः ' पदकी सिद्धि बतायी गयी है। 'वाच्' शब्दसे “ग्मिनि'

English

Denominatives "putriyati" (acts like a son), "putrakamyati" (desires a son), "patapatayate"; causative "ghatayati"; desiderative-causative "bubhushayati", and "rupaka" (verb formations).

अध्याय ३५६

श्लोक 16

भवेद्भवेताञ्च लिङि भवेयुश् च भवेः परे ।भवेतञ्च भवेतैवं भवेयञ्च भवेव च भवेम च

bhavedbhavetāñca liṅi bhaveyuś ca bhaveḥ pare / bhavetañca bhavetaivaṃ bhaveyañca bhaveva ca bhavema ca

हिन्दी अर्थ

“वाचालः'-ये रूप बनते हैं। उसीसे 'आटच्' प्रत्यय होनेपर “वाचाटः' रूप बनता है। 'फल' तथा ' बई शब्दोंसे 'इनच्' प्रत्यय होनेपर क्रमशः “फलिनः ', ' बर्हिणः '—ये रूप बनते हैं। 'वृन्द'

English

Optative forms of bhu: "bhavet, bhavetam, bhaveyuh, bhaveh, bhavetam, bhaveta, bhaveyam, bhaveva, bhavema" (optative conjugation).

अध्याय ३५६

श्लोक 17

एधेत एधेयातामेधेरन् मनसा श्रिया ।एधेथाश् च एधेयाथामेधेध्वमेधेय एधेवहि एधेमहि

edheta edheyātāmedheran manasā śriyā / edhethāś ca edheyāthāmedhedhvamedheya edhevahi edhemahi

हिन्दी अर्थ

शब्दसे ' आरकन्' प्रत्यय होनेपर ' वृन्दारकः '-- इस पदको सिद्धि होती है“ “शीतं न सहते', “हिमं न सहते'--इस विग्रहमें 'शीत' तथा 'हिम' शब्दोंसे 'आलुच्' प्रत्यय

English

Optative middle of edh: "edheta, edheyatam, edheran, edhetha, edheyatham, edhedhvam, edheya, edhevahi, edhemahi" ("prospering by mind and fortune").

अध्याय ३५६

श्लोक 18

अस्तु तावद्भवताम् लोटि भवन्तु भवताद्भव ।भवतं भवत भवानि भवाव च भवाम च

astu tāvadbhavatām loṭi bhavantu bhavatādbhava / bhavataṃ bhavata bhavāni bhavāva ca bhavāma ca

हिन्दी अर्थ

करनेपर 'शीतालु: तथा 'हिमालु: ' रूप बनते हैं। “वात' शब्दसे “उलच्” प्रत्यय होनेपर 'वातुलः' रूप बनता है । 'अपत्य' अर्थमें 'अण्' प्रत्यय होता है । “वसिष्ठस्यापत्यं पुमान् वासिष्ठः।', ' कुरोरपत्यं

English

Imperative of bhu: "astu", "bhavantu", "bhavatat", "bhava", "bhavatam", "bhavata", "bhavani", "bhavava", "bhavama" (imperative conjugation).

अध्याय ३५६

श्लोक 19

एधतामेधेतामेधन्तामेधै पचावहै पचामहै ।अभ्यनन्ददपचतामचन्नपचस् तथा

edhatāmedhetāmedhantāmedhai pacāvahai pacāmahai / abhyanandadapacatāmacannapacas tathā

हिन्दी अर्थ

पुमान् कौरबः।' (वसिष्ठको संतान 'वासिष्ठ' कहलाती है तथा कुरुकी संतति “कौरव')-वहाँ उसका निवास है '--इस अर्थमें सप्तम्यन्त 'समर्थ' शब्दसे “अण्' प्रत्यय होता है । यथा ' मथुरायां वासोऽस्येति माथुरः।' (मथुरामे निवास है इसका, इसलिये यह “माथुर” है।) “सोऽस्य वासः ।'--वह इसका वासस्थान है, इस अर्थमें भी प्रथमान्त 'समर्थसे ' “अण्' प्रत्यय होता है। ' उसको जानता और उसे

English

Imperative middle: "edhatam, edhetam, edhantam, edhai, pacavahai, pacamahai"; imperfect forms "abhyanandat", "apacatam", "apacan", "apacah" (verb forms).

अध्याय ३५६

श्लोक 20

अभवतमभवतापचमपचावापचाम च ।ऐधतैर्धेतामैधध्वं ऐधे चैधामहीरितं(?)

abhavatamabhavatāpacamapacāvāpacāma ca / aidhatairdhetāmaidhadhvaṃ aidhe caidhāmahīritaṃ(?)

हिन्दी अर्थ

पढ़ता है '--इस अर्थमें द्वितीयान्त “समर्थ' पदसे ' अण्' प्रत्यय होता है। 'चान्द्रं व्याकरणमधीते

English

Imperfect forms: "abhavatam, abhavata, apacam, apacava, apacama"; middle "aidhata, aidhetam, aidhadhvam, aidhe, aidhamahi" (imperfect conjugation).

अध्याय ३५६

श्लोक 21

अभूदभूतामभूवनभूश्चाभूवमेव लुङ् ।ऐधिष्टैधिसातां नरावैधिष्ठा एइधिषीदृशं

abhūdabhūtāmabhūvanabhūścābhūvameva luṅ / aidhiṣṭaidhisātāṃ narāvaidhiṣṭhā eidhiṣīdṛśaṃ

हिन्दी अर्थ

स्वार्थे कप्रत्ययः )। क्रमादि’ शब्दोंसे 'वुन्' प्रत्यय होता है (बु'के स्थानमें 'अक' आदेश होता है।) “क्रम वेत्ति इति क्रमकः '--जो क्रमपाठको जानता है, वह 'क्रमक' है। इसी तरह “पदक: ', 'शिक्षकः', “मीमांसकः ' इत्यादि पद बनते हैं। “कोशम् अधीते वेद वा।'--जो कोशको जानता या पढ़ता है, वह “कौशक' है

English

Aorist (lun): "abhut, abhutam, abhuvan, abhuh, abhuvam"; middle "aidhishta, aidhishatam, aidhishthah, aidhishi" and so on (aorist forms).

अध्याय ३५६

श्लोक 22

लिटि बभूव बभूवतुः बभूवुश् च बव्हूविथ ।बभूवथुर्वभूव च बभूविव बभूविम

liṭi babhūva babhūvatuḥ babhūvuś ca bavhūvitha / babhūvathurvabhūva ca babhūviva babhūvima

हिन्दी अर्थ

१-२. “हिरण्यवः ' का अर्थ “हिरण्यवान्' (सुवर्ण-सम्पत्तिसे युक्त) तथा मणिवः ' शब्द मणिधारी' (मनियारा) सर्प या नागके

English

Perfect (lit): "babhuva, babhuvatuh, babhuvuh, babhuvitha, babhuvathuh, babhuva, babhuviva, babhuvima" (perfect conjugation of bhu).

अध्याय ३५६

श्लोक 23

पेचे पेचाते पेचिरे त्वमेधाञ्चकृषे तथा ।एधाञ्चक्राथे पेचिध्वे पेचे पेचिमहे तथा

pece pecāte pecire tvamedhāñcakṛṣe tathā / edhāñcakrāthe pecidhve pece pecimahe tathā

हिन्दी अर्थ

लिये प्रयुक्त होता है। ३. 'रजः कृष्यासुतिपरिषदो वलच्' (५। २। ११२)-इस सूत्रसे 'वलच्' प्रत्यय होनेपर क्रमशः 'रजस्वल', 'कृषीवल', ' आसुतीवल' तथा 'परिषद्वल' शब्द सिद्ध होते हैं। इनके अर्थ क्रमशः इस प्रकार हैं-धूलसे भरा, किसान, जुआरी तथा परिषत्-

English

Perfect middle of pac and edh: "pece, pecate, pecire", "edhamchakrishe", "edhamchakrathe", "pecidhve", "pece", "pecimahe" (perfect forms).

अध्याय ३५६

श्लोक 24

लुटि भविता भवितारौ भवितारो हरादयः ।भवितासि भवितास्थो भवितास्मस् तथा वयं

luṭi bhavitā bhavitārau bhavitāro harādayaḥ / bhavitāsi bhavitāstho bhavitāsmas tathā vayaṃ

हिन्दी अर्थ

सभा या समूहसे युक्त।

English

Periphrastic future (lut): "bhavita, bhavitarau, bhavitarah — Hara and the others"; "bhavitasi, bhavitastha, bhavitasmah — and we ourselves" (future conjugation).

अध्याय ३५६

श्लोक 25

पक्ता पक्तारौ पक्तारः पक्तासे त्वं शुभौदनं ।पक्ताध्वे पक्ताहे चाहं पक्तास्महे हरेश् चरुं

paktā paktārau paktāraḥ paktāse tvaṃ śubhaudanaṃ / paktādhve paktāhe cāhaṃ paktāsmahe hareś caruṃ

हिन्दी अर्थ

४. अत इनिठनौ' (५। २। ११५)--इस सूत्रसे 'इनि' प्रत्यय होनेपर 'धनी' तथा ' ठन्' प्रत्यय होनेपर ' धनिकः? रूप बनते हैं। इसी प्रकार करी, करिकः, हस्ती, हस्तिकः-ये रूप बनते हैं। ' धनी' का अर्थ है-धनवान् तथा 'करी' और 'हस्ती' का अर्थ है--हाथी। 'पयस्वी' का अर्थ है-दूधवाला तथा 'मायावी' का अर्थ है-माया फैलानेवाला। ' विनि' प्रत्ययका विधायक सूत्र है—' अस्मायामेधास्रजो विनिः।' (५। २। १२१) । ' ऊर्णाया युस्।' (५। २। १२३)--इस सूत्रसे ' युस्' प्रत्ययका विधान हुआ। ' ऊर्णायुः '

English

"Pakta, paktarau, paktarah"; "paktase — you, the auspicious rice"; "paktadhve, paktahe — I"; "paktasmahe — we, Hari's offering of cooked rice" (future of pac).

अध्याय ३५६

श्लोक 26

लिङाशिषि सुखं भूयात् भूयास्तां हरिशङ्करौ ।भूयासुस्ते च भूयास्त्वं युवां भूयास्तमीश्वरौ

liṅāśiṣi sukhaṃ bhūyāt bhūyāstāṃ hariśaṅkarau / bhūyāsuste ca bhūyāstvaṃ yuvāṃ bhūyāstamīśvarau

हिन्दी अर्थ

५. 'वाचोग्मिनिः।' (५। २। १२४) -इस सूत्रसे ' ग्मिनि' प्रत्यय होता है। “आलजाटचौ बहुभाषिणि।' “कुत्सित इति वक्तव्यम्! इन वार्तिकोंद्वारा 'आलच्' और ' आटच्' प्रत्यय होते हैं। अच्छी बातको बहुत बोलनेवाला “वाग्मी कहलाता है और कुत्सित बातको अधिक बोलनेवाला 'वाचाल' और 'वाचाट' कहलाता है। 'फलबर्हाभ्यामिनच्।' इस वार्तिकसे 'इनच्' और ' शृङ्गवृन्दाभ्याम् आरकन्।' इस वार्तिकसे ' आरकन्' प्रत्यय होनेपर "फलिनः ' (फलवान्), ' बर्हिणः ' (मोर) तथा ' वृन्दारकः ' (देवता) ये प्रयोग सिद्ध होते हैं ।

English

Benedictive (ashirlin): "May there be happiness: bhuyat; bhuyastam — Hari and Shankara; bhuyasuh; bhuyah; bhuyastam — you two Lords" (blessing forms).

अध्याय ३५६

श्लोक 27

भूयास्त यूयं भूयासमहं भूयास्म सर्वदा ।यक्षीष्ट ह्य् एधिषीयास्तां यक्षीरन्नेधिसीय च

bhūyāsta yūyaṃ bhūyāsamahaṃ bhūyāsma sarvadā / yakṣīṣṭa hy edhiṣīyāstāṃ yakṣīrannedhisīya ca

हिन्दी अर्थ

२। १)-इस सूत्रके अनुसार धान्योंकी उत्पत्तिके आधारभूत क्षेत्रके अर्थमें षष्ठ्यन्त समर्थ धान्य- वाचक शब्दसे 'खञ्' प्रत्यय होता है। (स्कन्दने कात्यायनको जिसका उपदेश किया, उस कौमार- व्याकरणमें भी यह नियम देखा जाता है।) इसके

English

"Bhuyasta, bhuyasta yuyam, bhuyasam aham, bhuyasma — always"; "yakshishta", "edhishiyastam", "yakshiran", "edhishiya" (benedictive forms).

अध्याय ३५६

श्लोक 28

यक्षीवह्येधिसीमहि लिङि चायक्ष्यतेति ऌङ् ।अयक्ष्येतामयक्ष्यन्तायक्ष्ये ऽयक्ष्येथां युवां

yakṣīvahyedhisīmahi liṅi cāyakṣyateti ḷṅ / ayakṣyetāmayakṣyantāyakṣye 'yakṣyethāṃ yuvāṃ

हिन्दी अर्थ

( कँगनी )की उत्पत्तिके आधारभूत क्षेत्रका बोध करानेके लिये 'खज्' प्रत्यय होनेपर (ख' के

English

"Yakshivahi, edhishimahi"; the conditional (lrin): "ayakshyata, ayakshyetam, ayakshyanta, ayakshye, ayakshyetham — you two" (conditional forms).

अध्याय ३५६

श्लोक 29

अयक्ष्यध्वमैधिष्यावह्यैधिष्यामह्यरेर्वयम् ।ऌटि स्याद्भविष्यतीति एधिष्यामह ईदृशम्

ayakṣyadhvamaidhiṣyāvahyaidhiṣyāmahyarervayam / ḷṭi syādbhaviṣyatīti edhiṣyāmaha īdṛśam

हिन्दी अर्थ

यह पद बनता है। इसका अर्थ है--'प्रियंगु ( कँगनी ) की उपज देनेवाला खेत'। इसी तरह मूँग, कोदो आदिकी उत्पत्तिके उपयुक्त खेतको “मौद्रीन' तथा 'कौद्रबीण' कहते हैं। यहाँ 'मुद्ग' शब्दसे 'खञ्' होनेपर “मौद्वीन' शब्द और 'कोद्रव' शब्दसे 'खज्' होनेपर 'कौद्रवीण ' शब्दकी सिद्धि होती है। 'विदेहस्यापत्यम्' (विदेहका पुत्र)-इस अर्थमें 'विदेह' शब्दसे

English

"Ayakshyadhvam, aidhishyavahi, aidhishyamahi"; the simple future (lrit): "syat, bhavishyati, edhishyamahe" and similar (future forms).

अध्याय ३५६

श्लोक 30

एवं विभावयिष्यन्ति बोभविष्यति रूपकं ।घटयेत् पटयेत्तद्वत् पुत्रीयति च काम्यति

evaṃ vibhāvayiṣyanti bobhaviṣyati rūpakaṃ / ghaṭayet paṭayettadvat putrīyati ca kāmyati

हिन्दी अर्थ

'अण्' प्रत्यय होनेपर 'बैदेहः' पदको सिद्धि होती है। (इन सबमें आदि स्वरकी वृद्धि होती है।) अकारान्त शब्दसे ' अपत्य' अर्थमें ' अण्'का बाधक 'इ' प्रत्यय होता है। आदि स्वरको वृद्धि

English

So too "vibhavayishyanti", "bobhavishyati" (intensive); "ghatayet", "patayet"; likewise "putriyati" and "kamyati" (further verbal formations).

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 356
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.